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कृष्ण जब अंधकार के बीच एक चेतना जन्म लेती है- डा० महंत भरतदास-महराज जी। अयोध्या। कृष्ण का जन्म उस रात हुआ था, जब बाहर भी अंधकार था और भीतर भी। मथुरा की कारागार में जन्मा वह बालक केवल देवकी और वसुदेव का पुत्र नहीं था; वह उस व्यवस्था के विरुद्ध जन्मी एक चेतना था, जो भय, अत्याचार और सत्ता के अहंकार पर खड़ी थी। शायद इसीलिए कृष्ण का जन्मोत्सव केवल धार्मिक उत्सव नहीं है। यह मनुष्य के भीतर प्रकाश के जन्म का उत्सव भी है। कृष्ण की कथा जितनी पुरानी है, उतनी ही आज की भी। समय बदला, राजसत्ताएँ बदलीं, शासन के तरीके बदले, समाज की संरचना बदली, लेकिन कंस का चरित्र समाप्त नहीं हुआ। हर युग में कोई न कोई सत्ता अपने अहंकार में मनुष्य की स्वतंत्रता को कुचलने लगती है। हर युग में भय को व्यवस्था का नाम दिया जाता है और मौन को विवेक समझ लिया जाता है। ऐसे समय में कृष्ण हमें याद दिलाते हैं कि अन्याय के सामने निष्पक्ष रहना हमेशा न्याय के पक्ष में खड़ा होना नहीं होता। कृष्ण का जीवन विरोधाभासों का अद्भुत दर्शन है। उनके हाथ में बांसुरी है, लेकिन आवश्यकता पड़ने पर वही कृष्ण रणभूमि में सारथी बन जाते हैं। वे प्रेम के प्रतीक हैं, लेकिन अन्याय के सामने कठोर निर्णय लेने से पीछे नहीं हटते। वे राजमहल में भी सहज हैं और ग्वाल-बालों के बीच भी उतने ही अपने। उनकी यही व्यापकता उन्हें केवल धार्मिक प्रतीक नहीं, बल्कि भारतीय जीवन-दर्शन का जीवंत रूप बनाती है। कृष्ण का दर्शन मनुष्य को भाग्य के भरोसे बैठने की शिक्षा नहीं देता। गीता में वे कर्म की ओर लौटाते हैं। उनका संदेश है कि मनुष्य अपने अधिकार और कर्तव्य से विमुख होकर जीवन की कठिनाइयों से मुक्त नहीं हो सकता। कर्म से पलायन शांति नहीं देता; वह केवल भीतर एक और युद्ध पैदा करता है। आज जब हम सफलता को परिणाम से और मनुष्य को उसकी उपयोगिता से मापने लगे हैं, तब कृष्ण का कर्मयोग हमें याद दिलाता है कि कर्म का मूल्य केवल उसके परिणाम में नहीं, उसकी निष्ठा में भी है। राजनीति के क्षेत्र में कृष्ण को समझना और भी महत्वपूर्ण है। उन्होंने सत्ता को कभी अंतिम लक्ष्य नहीं माना। वे जानते थे कि सत्ता यदि लोककल्याण से कट जाए तो वह केवल शक्ति का प्रदर्शन बन जाती है। कंस का अंत इसलिए महत्वपूर्ण नहीं था कि एक राजा मारा गया; महत्वपूर्ण यह था कि भय के शासन के विरुद्ध न्याय की संभावना पैदा हुई। महाभारत में कृष्ण की राजनीति हमें एक और कठिन सत्य सिखाती है—अच्छे समाज के निर्माण के लिए केवल अच्छे इरादे पर्याप्त नहीं होते; विवेक, रणनीति और समय की पहचान भी आवश्यक होती है। उन्होंने युद्ध को उत्सव नहीं बनाया। उन्होंने शांति का प्रयास किया। लेकिन जब संवाद की सारी संभावनाएँ समाप्त हो गईं और अन्याय अपनी सीमा पार कर गया, तब उन्होंने अर्जुन को कर्तव्य से भागने नहीं दिया। आज लोकतंत्र में हमारी सबसे बड़ी चुनौती भी शायद यही है कि हम राजनीति को केवल सत्ता प्राप्त करने का साधन न बनने दें। राजनीति का अर्थ यदि जनता के जीवन को बेहतर बनाना है, तो उसमें कृष्ण का विवेक चाहिए—जहाँ नीति हो, लेकिन नीति के केंद्र में मनुष्य हो; जहाँ शक्ति हो, लेकिन शक्ति के ऊपर न्याय हो; जहाँ असहमति हो, लेकिन शत्रुता न हो। सामाजिक जीवन में भी कृष्ण की प्रासंगिकता कम नहीं हुई है। कृष्ण का लोकजीवन हमें बताता है कि संस्कृति केवल ऊँचे महलों और राजदरबारों में नहीं रहती। वह गाँव की गलियों में, लोकगीतों में, रिश्तों में, उत्सवों में और सामान्य मनुष्य की स्मृतियों में भी सांस लेती है। कृष्ण जितने राजाओं के हैं, उतने ही उस सामान्य जन के भी हैं जिसकी जिंदगी में उत्सव अक्सर कठिन परिस्थितियों के बीच आशा का एक छोटा-सा दीप होता है। इसीलिए जन्माष्टमी के अवसर पर हमें केवल कृष्ण की मूर्ति के सामने दीप नहीं जलाना चाहिए; हमें अपने भीतर भी यह देखना चाहिए कि कहीं कोई अंधकार तो नहीं पल रहा। क्या हम किसी कमजोर के साथ खड़े हैं? क्या हम अन्याय देखकर चुप तो नहीं हैं? क्या हमारी राजनीति समाज को जोड़ रही है या मनुष्यों के बीच दीवारें खड़ी कर रही है? क्या हमारा धर्म हमें अधिक संवेदनशील बना रहा है या केवल दूसरों को गलत साबित करने का हथियार बन गया है? कृष्ण की सबसे बड़ी चुनौती शायद यही है कि वे हमें पूजा से आगे बढ़कर आत्मपरीक्षण के लिए मजबूर करते हैं। कृष्ण को जानना आसान है, कृष्ण को मानना भी आसान है; लेकिन कृष्ण को अपने आचरण में उतारना कठिन है। क्योंकि कृष्ण केवल बांसुरी की मधुरता नहीं हैं, वे अन्याय के विरुद्ध उठी हुई चेतना भी हैं। वे केवल राधा के प्रेम की स्मृति नहीं हैं, वे अर्जुन के संशय के बीच खड़ा हुआ विवेक भी हैं। वे केवल मंदिरों के देवता नहीं हैं, वे उस मनुष्य के भीतर की आवाज हैं जो अंधकार में भी प्रकाश की संभावना को बचाए रखना चाहता है। इस जन्माष्टमी पर यदि कृष्ण का जन्म सचमुच मनाना है, तो शायद हमें अपने भीतर तीन चीजों को जन्म देना होगा—विवेक, साहस और करुणा। विवेक ताकि हम सही और गलत में अंतर कर सकें। साहस ताकि सही के साथ खड़े हो सकें। और करुणा ताकि हमारी विजय किसी दूसरे मनुष्य की पराजय का उत्सव न बन जाए। कृष्ण की कथा हमें यह नहीं सिखाती कि जीवन में कभी अंधकार नहीं आएगा। वह तो यह सिखाती है कि अंधकार कितना भी गहरा हो, मनुष्य के भीतर प्रकाश को जन्म लेने से रोका नहीं जा सकता,और शायद इसीलिए कृष्ण का जन्म मथुरा की उस कारागार में एक बार नहीं हुआ था। वे हर उस क्षण जन्म लेते हैं, जब भय के विरुद्ध साहस खड़ा होता है,अन्याय के विरुद्ध न्याय आवाज उठाता है, और मनुष्य अपने भीतर के अंधकार पर प्रकाश को चुनता है। यही कृष्ण हैं,यही जन्माष्टमी का वास्तविक अर्थ है।

5 hrs ago
user_पत्रकार राकेश तिवारी अयोध्या
पत्रकार राकेश तिवारी अयोध्या
फैजाबाद, अयोध्या, उत्तर प्रदेश•
5 hrs ago

कृष्ण जब अंधकार के बीच एक चेतना जन्म लेती है- डा० महंत भरतदास-महराज जी। अयोध्या। कृष्ण का जन्म उस रात हुआ था, जब बाहर भी अंधकार था और भीतर भी। मथुरा की कारागार में जन्मा वह बालक केवल देवकी और वसुदेव का पुत्र नहीं था; वह उस व्यवस्था के विरुद्ध जन्मी एक चेतना था, जो भय, अत्याचार और सत्ता के अहंकार पर खड़ी थी। शायद इसीलिए कृष्ण का जन्मोत्सव केवल धार्मिक उत्सव नहीं है। यह मनुष्य के भीतर प्रकाश के जन्म का उत्सव भी है। कृष्ण की कथा जितनी पुरानी है, उतनी ही आज की भी। समय बदला, राजसत्ताएँ बदलीं, शासन के तरीके बदले, समाज की संरचना बदली, लेकिन कंस का चरित्र समाप्त नहीं हुआ। हर युग में कोई न कोई सत्ता अपने अहंकार में मनुष्य की स्वतंत्रता को कुचलने लगती है। हर युग में भय को व्यवस्था का नाम दिया जाता है और मौन को विवेक समझ लिया जाता है। ऐसे समय में कृष्ण हमें याद दिलाते हैं कि अन्याय के सामने निष्पक्ष रहना हमेशा न्याय के पक्ष में खड़ा होना नहीं होता। कृष्ण का जीवन विरोधाभासों का अद्भुत दर्शन है। उनके हाथ में बांसुरी है, लेकिन आवश्यकता पड़ने पर वही कृष्ण रणभूमि में सारथी बन जाते हैं। वे प्रेम के प्रतीक हैं, लेकिन अन्याय के सामने कठोर निर्णय लेने से पीछे नहीं हटते। वे राजमहल में भी सहज हैं और ग्वाल-बालों के बीच भी उतने ही अपने। उनकी यही व्यापकता उन्हें केवल धार्मिक प्रतीक नहीं, बल्कि भारतीय जीवन-दर्शन का जीवंत रूप बनाती है। कृष्ण का दर्शन मनुष्य को भाग्य के भरोसे बैठने की शिक्षा नहीं देता। गीता में वे कर्म की ओर लौटाते हैं। उनका संदेश है कि मनुष्य अपने अधिकार और कर्तव्य से विमुख होकर जीवन की कठिनाइयों से मुक्त नहीं हो सकता। कर्म से पलायन शांति नहीं देता; वह केवल भीतर एक और युद्ध पैदा करता है। आज जब हम सफलता को परिणाम से और मनुष्य को उसकी उपयोगिता से मापने लगे हैं, तब कृष्ण का कर्मयोग हमें याद दिलाता है कि कर्म का मूल्य केवल उसके परिणाम में नहीं, उसकी निष्ठा में भी है। राजनीति के क्षेत्र में कृष्ण को समझना और भी महत्वपूर्ण है। उन्होंने सत्ता को कभी अंतिम लक्ष्य नहीं माना। वे जानते थे कि सत्ता यदि लोककल्याण से कट जाए तो वह केवल शक्ति का प्रदर्शन बन जाती है। कंस का अंत इसलिए महत्वपूर्ण नहीं था कि एक राजा मारा गया; महत्वपूर्ण यह था कि भय के शासन के विरुद्ध न्याय की संभावना पैदा हुई। महाभारत में कृष्ण की राजनीति हमें एक और कठिन सत्य सिखाती है—अच्छे समाज के निर्माण के लिए केवल अच्छे इरादे पर्याप्त नहीं होते; विवेक, रणनीति और समय की पहचान भी आवश्यक होती है। उन्होंने युद्ध को उत्सव नहीं बनाया। उन्होंने शांति का प्रयास किया। लेकिन जब संवाद की सारी संभावनाएँ समाप्त हो गईं और अन्याय अपनी सीमा पार कर गया, तब उन्होंने अर्जुन को कर्तव्य से भागने नहीं दिया। आज लोकतंत्र में हमारी सबसे बड़ी चुनौती भी शायद यही है कि हम राजनीति को केवल सत्ता प्राप्त करने का साधन न बनने दें। राजनीति का अर्थ यदि जनता के जीवन को बेहतर बनाना है, तो उसमें कृष्ण का विवेक चाहिए—जहाँ नीति हो, लेकिन नीति के केंद्र में मनुष्य हो; जहाँ शक्ति हो, लेकिन शक्ति के ऊपर न्याय हो; जहाँ असहमति हो, लेकिन शत्रुता न हो। सामाजिक जीवन में भी कृष्ण की प्रासंगिकता कम नहीं हुई है। कृष्ण का लोकजीवन हमें बताता है कि संस्कृति केवल ऊँचे महलों और राजदरबारों में नहीं रहती। वह गाँव की गलियों में, लोकगीतों में, रिश्तों में, उत्सवों में और सामान्य मनुष्य की स्मृतियों में भी सांस लेती है। कृष्ण जितने राजाओं के हैं, उतने ही उस सामान्य जन के भी हैं जिसकी जिंदगी में उत्सव अक्सर कठिन परिस्थितियों के बीच आशा का एक छोटा-सा दीप होता है। इसीलिए जन्माष्टमी के अवसर पर हमें केवल कृष्ण की मूर्ति के सामने दीप नहीं जलाना चाहिए; हमें अपने भीतर भी यह देखना चाहिए कि कहीं कोई अंधकार तो नहीं पल रहा। क्या हम किसी कमजोर के साथ खड़े हैं? क्या हम अन्याय देखकर चुप तो नहीं हैं? क्या हमारी राजनीति समाज को जोड़ रही है या मनुष्यों के बीच दीवारें खड़ी कर रही है? क्या हमारा धर्म हमें अधिक संवेदनशील बना रहा है या केवल दूसरों को गलत साबित करने का हथियार बन गया है? कृष्ण की सबसे बड़ी चुनौती शायद यही है कि वे हमें पूजा से आगे बढ़कर आत्मपरीक्षण के लिए मजबूर करते हैं। कृष्ण को जानना आसान है, कृष्ण को मानना भी आसान है; लेकिन कृष्ण को अपने आचरण में उतारना कठिन है। क्योंकि कृष्ण केवल बांसुरी की मधुरता नहीं हैं, वे अन्याय के विरुद्ध उठी हुई चेतना भी हैं। वे केवल राधा के प्रेम की स्मृति नहीं हैं, वे अर्जुन के संशय के बीच खड़ा हुआ विवेक भी हैं। वे केवल मंदिरों के देवता नहीं हैं, वे उस मनुष्य के भीतर की आवाज हैं जो अंधकार में भी प्रकाश की संभावना को बचाए रखना चाहता है। इस जन्माष्टमी पर यदि कृष्ण का जन्म सचमुच मनाना है, तो शायद हमें अपने भीतर तीन चीजों को जन्म देना होगा—विवेक, साहस और करुणा। विवेक ताकि हम सही और गलत में अंतर कर सकें। साहस ताकि सही के साथ खड़े हो सकें। और करुणा ताकि हमारी विजय किसी दूसरे मनुष्य की पराजय का उत्सव न बन जाए। कृष्ण की कथा हमें यह नहीं सिखाती कि जीवन में कभी अंधकार नहीं आएगा। वह तो यह सिखाती है कि अंधकार कितना भी गहरा हो, मनुष्य के भीतर प्रकाश को जन्म लेने से रोका नहीं जा सकता,और शायद इसीलिए कृष्ण का जन्म मथुरा की उस कारागार में एक बार नहीं हुआ था। वे हर उस क्षण जन्म लेते हैं, जब भय के विरुद्ध साहस खड़ा होता है,अन्याय के विरुद्ध न्याय आवाज उठाता है, और मनुष्य अपने भीतर के अंधकार पर प्रकाश को चुनता है। यही कृष्ण हैं,यही जन्माष्टमी का वास्तविक अर्थ है।

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  • एसएन एकेडमी के बच्चों द्वारा जन्माष्टमी कार्यक्रम आयोजित हुआ।* अयोध्या में श्रीकृष्ण जन्माष्टमी का पर्व श्रद्धा और उल्लास के साथ मनाया जा रहा है। जालपा स्थित शारदा निकेतन एसएन एकेडमी द्वारा जन्माष्टमी कार्यक्रम आयोजित हुआ। वजीरगंज स्थित ब्रह्माकुमारी आश्रम में विद्यालय की ओर से हर वर्ष की भांति इस वर्ष भी कार्यक्रम हुआ। विद्यालय के प्रबंधक तनुज मेहरोत्रा और प्रधानाचार्य कंचन मेहरोत्रा की मौजूदगी रही। शिक्षक-शिक्षिकाओं के सहयोग से कार्यक्रम का भव्य आयोजन किया गया। बच्चों ने भगवान श्रीकृष्ण के जन्मोत्सव की मनमोहक प्रस्तुति दी। श्रीकृष्ण-सुदामा मिलन का भावपूर्ण मंचन भी किया गया। बच्चों ने कृष्ण की विभिन्न लीलाओं को अपनी प्रस्तुतियों के जरिए जीवंत किया। आकर्षक सांस्कृतिक प्रस्तुतियों ने कार्यक्रम में मौजूद लोगों का मन मोह लिया। जन्माष्टमी कार्यक्रम में बच्चों ने भक्ति, संस्कृति और उत्साह का सुंदर संगम प्रस्तुत किया। बाइट योगिता गुप्ता
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    एसएन एकेडमी के बच्चों द्वारा जन्माष्टमी कार्यक्रम आयोजित हुआ।*
अयोध्या में श्रीकृष्ण जन्माष्टमी का पर्व श्रद्धा और उल्लास के साथ मनाया जा रहा है। जालपा स्थित शारदा निकेतन एसएन एकेडमी द्वारा जन्माष्टमी कार्यक्रम आयोजित हुआ।
वजीरगंज स्थित ब्रह्माकुमारी आश्रम में विद्यालय की ओर से हर वर्ष की भांति इस वर्ष भी कार्यक्रम हुआ। विद्यालय के प्रबंधक तनुज मेहरोत्रा और प्रधानाचार्य कंचन मेहरोत्रा की मौजूदगी रही। शिक्षक-शिक्षिकाओं के सहयोग से कार्यक्रम का भव्य आयोजन किया गया। बच्चों ने भगवान श्रीकृष्ण के जन्मोत्सव की मनमोहक प्रस्तुति दी। श्रीकृष्ण-सुदामा मिलन का भावपूर्ण मंचन भी किया गया।
बच्चों ने कृष्ण की विभिन्न लीलाओं को अपनी प्रस्तुतियों के जरिए जीवंत किया। आकर्षक सांस्कृतिक प्रस्तुतियों ने कार्यक्रम में मौजूद लोगों का मन मोह लिया। जन्माष्टमी कार्यक्रम में बच्चों ने भक्ति, संस्कृति और उत्साह का सुंदर संगम प्रस्तुत किया।
बाइट योगिता गुप्ता
    user_Ashwani Sonkar
    Ashwani Sonkar
    Court reporter फैजाबाद, अयोध्या, उत्तर प्रदेश•
    3 hrs ago
  • कृष्ण जब अंधकार के बीच एक चेतना जन्म लेती है- डा० महंत भरतदास-महराज जी। अयोध्या। कृष्ण का जन्म उस रात हुआ था, जब बाहर भी अंधकार था और भीतर भी। मथुरा की कारागार में जन्मा वह बालक केवल देवकी और वसुदेव का पुत्र नहीं था; वह उस व्यवस्था के विरुद्ध जन्मी एक चेतना था, जो भय, अत्याचार और सत्ता के अहंकार पर खड़ी थी। शायद इसीलिए कृष्ण का जन्मोत्सव केवल धार्मिक उत्सव नहीं है। यह मनुष्य के भीतर प्रकाश के जन्म का उत्सव भी है। कृष्ण की कथा जितनी पुरानी है, उतनी ही आज की भी। समय बदला, राजसत्ताएँ बदलीं, शासन के तरीके बदले, समाज की संरचना बदली, लेकिन कंस का चरित्र समाप्त नहीं हुआ। हर युग में कोई न कोई सत्ता अपने अहंकार में मनुष्य की स्वतंत्रता को कुचलने लगती है। हर युग में भय को व्यवस्था का नाम दिया जाता है और मौन को विवेक समझ लिया जाता है। ऐसे समय में कृष्ण हमें याद दिलाते हैं कि अन्याय के सामने निष्पक्ष रहना हमेशा न्याय के पक्ष में खड़ा होना नहीं होता। कृष्ण का जीवन विरोधाभासों का अद्भुत दर्शन है। उनके हाथ में बांसुरी है, लेकिन आवश्यकता पड़ने पर वही कृष्ण रणभूमि में सारथी बन जाते हैं। वे प्रेम के प्रतीक हैं, लेकिन अन्याय के सामने कठोर निर्णय लेने से पीछे नहीं हटते। वे राजमहल में भी सहज हैं और ग्वाल-बालों के बीच भी उतने ही अपने। उनकी यही व्यापकता उन्हें केवल धार्मिक प्रतीक नहीं, बल्कि भारतीय जीवन-दर्शन का जीवंत रूप बनाती है। कृष्ण का दर्शन मनुष्य को भाग्य के भरोसे बैठने की शिक्षा नहीं देता। गीता में वे कर्म की ओर लौटाते हैं। उनका संदेश है कि मनुष्य अपने अधिकार और कर्तव्य से विमुख होकर जीवन की कठिनाइयों से मुक्त नहीं हो सकता। कर्म से पलायन शांति नहीं देता; वह केवल भीतर एक और युद्ध पैदा करता है। आज जब हम सफलता को परिणाम से और मनुष्य को उसकी उपयोगिता से मापने लगे हैं, तब कृष्ण का कर्मयोग हमें याद दिलाता है कि कर्म का मूल्य केवल उसके परिणाम में नहीं, उसकी निष्ठा में भी है। राजनीति के क्षेत्र में कृष्ण को समझना और भी महत्वपूर्ण है। उन्होंने सत्ता को कभी अंतिम लक्ष्य नहीं माना। वे जानते थे कि सत्ता यदि लोककल्याण से कट जाए तो वह केवल शक्ति का प्रदर्शन बन जाती है। कंस का अंत इसलिए महत्वपूर्ण नहीं था कि एक राजा मारा गया; महत्वपूर्ण यह था कि भय के शासन के विरुद्ध न्याय की संभावना पैदा हुई। महाभारत में कृष्ण की राजनीति हमें एक और कठिन सत्य सिखाती है—अच्छे समाज के निर्माण के लिए केवल अच्छे इरादे पर्याप्त नहीं होते; विवेक, रणनीति और समय की पहचान भी आवश्यक होती है। उन्होंने युद्ध को उत्सव नहीं बनाया। उन्होंने शांति का प्रयास किया। लेकिन जब संवाद की सारी संभावनाएँ समाप्त हो गईं और अन्याय अपनी सीमा पार कर गया, तब उन्होंने अर्जुन को कर्तव्य से भागने नहीं दिया। आज लोकतंत्र में हमारी सबसे बड़ी चुनौती भी शायद यही है कि हम राजनीति को केवल सत्ता प्राप्त करने का साधन न बनने दें। राजनीति का अर्थ यदि जनता के जीवन को बेहतर बनाना है, तो उसमें कृष्ण का विवेक चाहिए—जहाँ नीति हो, लेकिन नीति के केंद्र में मनुष्य हो; जहाँ शक्ति हो, लेकिन शक्ति के ऊपर न्याय हो; जहाँ असहमति हो, लेकिन शत्रुता न हो। सामाजिक जीवन में भी कृष्ण की प्रासंगिकता कम नहीं हुई है। कृष्ण का लोकजीवन हमें बताता है कि संस्कृति केवल ऊँचे महलों और राजदरबारों में नहीं रहती। वह गाँव की गलियों में, लोकगीतों में, रिश्तों में, उत्सवों में और सामान्य मनुष्य की स्मृतियों में भी सांस लेती है। कृष्ण जितने राजाओं के हैं, उतने ही उस सामान्य जन के भी हैं जिसकी जिंदगी में उत्सव अक्सर कठिन परिस्थितियों के बीच आशा का एक छोटा-सा दीप होता है। इसीलिए जन्माष्टमी के अवसर पर हमें केवल कृष्ण की मूर्ति के सामने दीप नहीं जलाना चाहिए; हमें अपने भीतर भी यह देखना चाहिए कि कहीं कोई अंधकार तो नहीं पल रहा। क्या हम किसी कमजोर के साथ खड़े हैं? क्या हम अन्याय देखकर चुप तो नहीं हैं? क्या हमारी राजनीति समाज को जोड़ रही है या मनुष्यों के बीच दीवारें खड़ी कर रही है? क्या हमारा धर्म हमें अधिक संवेदनशील बना रहा है या केवल दूसरों को गलत साबित करने का हथियार बन गया है? कृष्ण की सबसे बड़ी चुनौती शायद यही है कि वे हमें पूजा से आगे बढ़कर आत्मपरीक्षण के लिए मजबूर करते हैं। कृष्ण को जानना आसान है, कृष्ण को मानना भी आसान है; लेकिन कृष्ण को अपने आचरण में उतारना कठिन है। क्योंकि कृष्ण केवल बांसुरी की मधुरता नहीं हैं, वे अन्याय के विरुद्ध उठी हुई चेतना भी हैं। वे केवल राधा के प्रेम की स्मृति नहीं हैं, वे अर्जुन के संशय के बीच खड़ा हुआ विवेक भी हैं। वे केवल मंदिरों के देवता नहीं हैं, वे उस मनुष्य के भीतर की आवाज हैं जो अंधकार में भी प्रकाश की संभावना को बचाए रखना चाहता है। इस जन्माष्टमी पर यदि कृष्ण का जन्म सचमुच मनाना है, तो शायद हमें अपने भीतर तीन चीजों को जन्म देना होगा—विवेक, साहस और करुणा। विवेक ताकि हम सही और गलत में अंतर कर सकें। साहस ताकि सही के साथ खड़े हो सकें। और करुणा ताकि हमारी विजय किसी दूसरे मनुष्य की पराजय का उत्सव न बन जाए। कृष्ण की कथा हमें यह नहीं सिखाती कि जीवन में कभी अंधकार नहीं आएगा। वह तो यह सिखाती है कि अंधकार कितना भी गहरा हो, मनुष्य के भीतर प्रकाश को जन्म लेने से रोका नहीं जा सकता,और शायद इसीलिए कृष्ण का जन्म मथुरा की उस कारागार में एक बार नहीं हुआ था। वे हर उस क्षण जन्म लेते हैं, जब भय के विरुद्ध साहस खड़ा होता है,अन्याय के विरुद्ध न्याय आवाज उठाता है, और मनुष्य अपने भीतर के अंधकार पर प्रकाश को चुनता है। यही कृष्ण हैं,यही जन्माष्टमी का वास्तविक अर्थ है।
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    कृष्ण  जब अंधकार के बीच एक चेतना जन्म लेती है- डा० महंत भरतदास-महराज जी।

अयोध्या। कृष्ण का जन्म उस रात हुआ था, जब बाहर भी अंधकार था और भीतर भी। मथुरा की कारागार में जन्मा वह बालक केवल देवकी और वसुदेव का पुत्र नहीं था; वह उस व्यवस्था के विरुद्ध जन्मी एक चेतना था, जो भय, अत्याचार और सत्ता के अहंकार पर खड़ी थी। शायद इसीलिए कृष्ण का जन्मोत्सव केवल धार्मिक उत्सव नहीं है। यह मनुष्य के भीतर प्रकाश के जन्म का उत्सव भी है। कृष्ण की कथा जितनी पुरानी है, उतनी ही आज की भी। समय बदला, राजसत्ताएँ बदलीं, शासन के तरीके बदले, समाज की संरचना बदली, लेकिन कंस का चरित्र समाप्त नहीं हुआ। हर युग में कोई न कोई सत्ता अपने अहंकार में मनुष्य की स्वतंत्रता को कुचलने लगती है। हर युग में भय को व्यवस्था का नाम दिया जाता है और मौन को विवेक समझ लिया जाता है। ऐसे समय में कृष्ण हमें याद दिलाते हैं कि अन्याय के सामने निष्पक्ष रहना हमेशा न्याय के पक्ष में खड़ा होना नहीं होता। कृष्ण का जीवन विरोधाभासों का अद्भुत दर्शन है। उनके हाथ में बांसुरी है, लेकिन आवश्यकता पड़ने पर वही कृष्ण रणभूमि में सारथी बन जाते हैं। वे प्रेम के प्रतीक हैं, लेकिन अन्याय के सामने कठोर निर्णय लेने से पीछे नहीं हटते। वे राजमहल में भी सहज हैं और ग्वाल-बालों के बीच भी उतने ही अपने। उनकी यही व्यापकता उन्हें केवल धार्मिक प्रतीक नहीं, बल्कि भारतीय जीवन-दर्शन का जीवंत रूप बनाती है। कृष्ण का दर्शन मनुष्य को भाग्य के भरोसे बैठने की शिक्षा नहीं देता। गीता में वे कर्म की ओर लौटाते हैं। उनका संदेश है कि मनुष्य अपने अधिकार और कर्तव्य से विमुख होकर जीवन की कठिनाइयों से मुक्त नहीं हो सकता। कर्म से पलायन शांति नहीं देता; वह केवल भीतर एक और युद्ध पैदा करता है। आज जब हम सफलता को परिणाम से और मनुष्य को उसकी उपयोगिता से मापने लगे हैं, तब कृष्ण का कर्मयोग हमें याद दिलाता है कि कर्म का मूल्य केवल उसके परिणाम में नहीं, उसकी निष्ठा में भी है। राजनीति के क्षेत्र में कृष्ण को समझना और भी महत्वपूर्ण है। उन्होंने सत्ता को कभी अंतिम लक्ष्य नहीं माना। वे जानते थे कि सत्ता यदि लोककल्याण से कट जाए तो वह केवल शक्ति का प्रदर्शन बन जाती है। कंस का अंत इसलिए महत्वपूर्ण नहीं था कि एक राजा मारा गया; महत्वपूर्ण यह था कि भय के शासन के विरुद्ध न्याय की संभावना पैदा हुई। महाभारत में कृष्ण की राजनीति हमें एक और कठिन सत्य सिखाती है—अच्छे समाज के निर्माण के लिए केवल अच्छे इरादे पर्याप्त नहीं होते; विवेक, रणनीति और समय की पहचान भी आवश्यक होती है। उन्होंने युद्ध को उत्सव नहीं बनाया। उन्होंने शांति का प्रयास किया। लेकिन जब संवाद की सारी संभावनाएँ समाप्त हो गईं और अन्याय अपनी सीमा पार कर गया, तब उन्होंने अर्जुन को कर्तव्य से भागने नहीं दिया। आज लोकतंत्र में हमारी सबसे बड़ी चुनौती भी शायद यही है कि हम राजनीति को केवल सत्ता प्राप्त करने का साधन न बनने दें। राजनीति का अर्थ यदि जनता के जीवन को बेहतर बनाना है, तो उसमें कृष्ण का विवेक चाहिए—जहाँ नीति हो, लेकिन नीति के केंद्र में मनुष्य हो; जहाँ शक्ति हो, लेकिन शक्ति के ऊपर न्याय हो; जहाँ असहमति हो, लेकिन शत्रुता न हो। सामाजिक जीवन में भी कृष्ण की प्रासंगिकता कम नहीं हुई है। कृष्ण का लोकजीवन हमें बताता है कि संस्कृति केवल ऊँचे महलों और राजदरबारों में नहीं रहती। वह गाँव की गलियों में, लोकगीतों में, रिश्तों में, उत्सवों में और सामान्य मनुष्य की स्मृतियों में भी सांस लेती है। कृष्ण जितने राजाओं के हैं, उतने ही उस सामान्य जन के भी हैं जिसकी जिंदगी में उत्सव अक्सर कठिन परिस्थितियों के बीच आशा का एक छोटा-सा दीप होता है। इसीलिए जन्माष्टमी के अवसर पर हमें केवल कृष्ण की मूर्ति के सामने दीप नहीं जलाना चाहिए; हमें अपने भीतर भी यह देखना चाहिए कि कहीं कोई अंधकार तो नहीं पल रहा। क्या हम किसी कमजोर के साथ खड़े हैं? क्या हम अन्याय देखकर चुप तो नहीं हैं? क्या हमारी राजनीति समाज को जोड़ रही है या मनुष्यों के बीच दीवारें खड़ी कर रही है? क्या हमारा धर्म हमें अधिक संवेदनशील बना रहा है या केवल दूसरों को गलत साबित करने का हथियार बन गया है? कृष्ण की सबसे बड़ी चुनौती शायद यही है कि वे हमें पूजा से आगे बढ़कर आत्मपरीक्षण के लिए मजबूर करते हैं। कृष्ण को जानना आसान है, कृष्ण को मानना भी आसान है; लेकिन कृष्ण को अपने आचरण में उतारना कठिन है। क्योंकि कृष्ण केवल बांसुरी की मधुरता नहीं हैं, वे अन्याय के विरुद्ध उठी हुई चेतना भी हैं। वे केवल राधा के प्रेम की स्मृति नहीं हैं, वे अर्जुन के संशय के बीच खड़ा हुआ विवेक भी हैं। वे केवल मंदिरों के देवता नहीं हैं, वे उस मनुष्य के भीतर की आवाज हैं जो अंधकार में भी प्रकाश की संभावना को बचाए रखना चाहता है। इस जन्माष्टमी पर यदि कृष्ण का जन्म सचमुच मनाना है, तो शायद हमें अपने भीतर तीन चीजों को जन्म देना होगा—विवेक, साहस और करुणा।
विवेक ताकि हम सही और गलत में अंतर कर सकें। साहस ताकि सही के साथ खड़े हो सकें।
और करुणा ताकि हमारी विजय किसी दूसरे मनुष्य की पराजय का उत्सव न बन जाए।
कृष्ण की कथा हमें यह नहीं सिखाती कि जीवन में कभी अंधकार नहीं आएगा। वह तो यह सिखाती है कि अंधकार कितना भी गहरा हो, मनुष्य के भीतर प्रकाश को जन्म लेने से रोका नहीं जा सकता,और शायद इसीलिए कृष्ण का जन्म मथुरा की उस कारागार में एक बार नहीं हुआ था। वे हर उस क्षण जन्म लेते हैं, जब भय के विरुद्ध साहस खड़ा होता है,अन्याय के विरुद्ध न्याय आवाज उठाता है, और मनुष्य अपने भीतर के अंधकार पर प्रकाश को चुनता है। यही कृष्ण हैं,यही जन्माष्टमी का वास्तविक अर्थ है।
    user_पत्रकार राकेश तिवारी अयोध्या
    पत्रकार राकेश तिवारी अयोध्या
    फैजाबाद, अयोध्या, उत्तर प्रदेश•
    5 hrs ago
  • बुजुर्ग दम्पत्ति के साथ लूट की घटना करने वाले दो वांछित अभियुक्त को किया गया गिरफ्तार, लूट गयी चेन, व घटना में प्रयुक्त तमंचा, कारतूस व एक बाईक बरामद पुलिस अधीक्षक ग्रामीण जनपद अयोध्या, श्री बलवंत कुमार चौधरी की बाईट
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    बुजुर्ग दम्पत्ति के साथ लूट की घटना करने वाले दो वांछित अभियुक्त को किया गया गिरफ्तार, लूट गयी चेन, व घटना में प्रयुक्त तमंचा, कारतूस व एक बाईक बरामद पुलिस अधीक्षक ग्रामीण जनपद अयोध्या, श्री बलवंत कुमार चौधरी की बाईट
    user_अमर जीत सिंह ब्यूरो चीफ
    अमर जीत सिंह ब्यूरो चीफ
    Newspaper publisher फैजाबाद, अयोध्या, उत्तर प्रदेश•
    6 hrs ago
  • अयोध्या में श्रीकृष्ण जन्माष्टमी का पर्व श्रद्धा और उल्लास के साथ मनाया जा रहा है। अयोध्या में श्रीकृष्ण जन्माष्टमी का पर्व श्रद्धा और उल्लास के साथ मनाया जा रहा है। वजीरगंज जप्ती स्थित शारदा निकेतन एसएन एकेडमी में जन्माष्टमी कार्यक्रम आयोजित हुआ। ब्रह्माकुमारी आश्रम में विद्यालय की ओर से हर वर्ष की भांति इस वर्ष भी कार्यक्रम हुआ। विद्यालय के प्रबंधक तनुज मल्होत्रा और प्रधानाचार्य कंचन मेहरोत्रा की मौजूदगी रही। शिक्षक-शिक्षिकाओं के सहयोग से कार्यक्रम का भव्य आयोजन किया गया। बच्चों ने भगवान श्रीकृष्ण के जन्मोत्सव की मनमोहक प्रस्तुति दी। श्रीकृष्ण-सुदामा मिलन का भावपूर्ण मंचन भी किया गया। बच्चों ने कृष्ण की विभिन्न लीलाओं को अपनी प्रस्तुतियों के जरिए जीवंत किया। आकर्षक सांस्कृतिक प्रस्तुतियों ने कार्यक्रम में मौजूद लोगों का मन मोह लिया। जन्माष्टमी कार्यक्रम में बच्चों ने भक्ति, संस्कृति और उत्साह का सुंदर संगम प्रस्तुत किया।
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    अयोध्या में श्रीकृष्ण जन्माष्टमी का पर्व श्रद्धा और उल्लास के साथ मनाया जा रहा है।

अयोध्या में श्रीकृष्ण जन्माष्टमी का पर्व श्रद्धा और उल्लास के साथ मनाया जा रहा है।
वजीरगंज जप्ती स्थित शारदा निकेतन एसएन एकेडमी में जन्माष्टमी कार्यक्रम आयोजित हुआ।
ब्रह्माकुमारी आश्रम में विद्यालय की ओर से हर वर्ष की भांति इस वर्ष भी कार्यक्रम हुआ।
विद्यालय के प्रबंधक तनुज मल्होत्रा और प्रधानाचार्य कंचन मेहरोत्रा की मौजूदगी रही।
शिक्षक-शिक्षिकाओं के सहयोग से कार्यक्रम का भव्य आयोजन किया गया।
बच्चों ने भगवान श्रीकृष्ण के जन्मोत्सव की मनमोहक प्रस्तुति दी।
श्रीकृष्ण-सुदामा मिलन का भावपूर्ण मंचन भी किया गया।
बच्चों ने कृष्ण की विभिन्न लीलाओं को अपनी प्रस्तुतियों के जरिए जीवंत किया।
आकर्षक सांस्कृतिक प्रस्तुतियों ने कार्यक्रम में मौजूद लोगों का मन मोह लिया।
जन्माष्टमी कार्यक्रम में बच्चों ने भक्ति, संस्कृति और उत्साह का सुंदर संगम प्रस्तुत किया।
    user_Mayank Srivastava
    Mayank Srivastava
    Photographer फैजाबाद, अयोध्या, उत्तर प्रदेश•
    6 hrs ago
  • कृष्ण जब अंधकार के बीच एक चेतना जन्म लेती है- महराज जी। कृष्ण जब अंधकार के बीच एक चेतना जन्म लेती है- महराज जी। अयोध्या। कृष्ण का जन्म उस रात हुआ था, जब बाहर भी अंधकार था और भीतर भी। मथुरा की कारागार में जन्मा वह बालक केवल देवकी और वसुदेव का पुत्र नहीं था; वह उस व्यवस्था के विरुद्ध जन्मी एक चेतना था, जो भय, अत्याचार और सत्ता के अहंकार पर खड़ी थी। शायद इसीलिए कृष्ण का जन्मोत्सव केवल धार्मिक उत्सव नहीं है। यह मनुष्य के भीतर प्रकाश के जन्म का उत्सव भी है। कृष्ण की कथा जितनी पुरानी है, उतनी ही आज की भी। समय बदला, राजसत्ताएँ बदलीं, शासन के तरीके बदले, समाज की संरचना बदली, लेकिन कंस का चरित्र समाप्त नहीं हुआ। हर युग में कोई न कोई सत्ता अपने अहंकार में मनुष्य की स्वतंत्रता को कुचलने लगती है। हर युग में भय को व्यवस्था का नाम दिया जाता है और मौन को विवेक समझ लिया जाता है। ऐसे समय में कृष्ण हमें याद दिलाते हैं कि अन्याय के सामने निष्पक्ष रहना हमेशा न्याय के पक्ष में खड़ा होना नहीं होता। कृष्ण का जीवन विरोधाभासों का अद्भुत दर्शन है। उनके हाथ में बांसुरी है, लेकिन आवश्यकता पड़ने पर वही कृष्ण रणभूमि में सारथी बन जाते हैं। वे प्रेम के प्रतीक हैं, लेकिन अन्याय के सामने कठोर निर्णय लेने से पीछे नहीं हटते। वे राजमहल में भी सहज हैं और ग्वाल-बालों के बीच भी उतने ही अपने। उनकी यही व्यापकता उन्हें केवल धार्मिक प्रतीक नहीं, बल्कि भारतीय जीवन-दर्शन का जीवंत रूप बनाती है। कृष्ण का दर्शन मनुष्य को भाग्य के भरोसे बैठने की शिक्षा नहीं देता। गीता में वे कर्म की ओर लौटाते हैं। उनका संदेश है कि मनुष्य अपने अधिकार और कर्तव्य से विमुख होकर जीवन की कठिनाइयों से मुक्त नहीं हो सकता। कर्म से पलायन शांति नहीं देता; वह केवल भीतर एक और युद्ध पैदा करता है। आज जब हम सफलता को परिणाम से और मनुष्य को उसकी उपयोगिता से मापने लगे हैं, तब कृष्ण का कर्मयोग हमें याद दिलाता है कि कर्म का मूल्य केवल उसके परिणाम में नहीं, उसकी निष्ठा में भी है। राजनीति के क्षेत्र में कृष्ण को समझना और भी महत्वपूर्ण है। उन्होंने सत्ता को कभी अंतिम लक्ष्य नहीं माना। वे जानते थे कि सत्ता यदि लोककल्याण से कट जाए तो वह केवल शक्ति का प्रदर्शन बन जाती है। कंस का अंत इसलिए महत्वपूर्ण नहीं था कि एक राजा मारा गया; महत्वपूर्ण यह था कि भय के शासन के विरुद्ध न्याय की संभावना पैदा हुई। महाभारत में कृष्ण की राजनीति हमें एक और कठिन सत्य सिखाती है—अच्छे समाज के निर्माण के लिए केवल अच्छे इरादे पर्याप्त नहीं होते; विवेक, रणनीति और समय की पहचान भी आवश्यक होती है। उन्होंने युद्ध को उत्सव नहीं बनाया। उन्होंने शांति का प्रयास किया। लेकिन जब संवाद की सारी संभावनाएँ समाप्त हो गईं और अन्याय अपनी सीमा पार कर गया, तब उन्होंने अर्जुन को कर्तव्य से भागने नहीं दिया। आज लोकतंत्र में हमारी सबसे बड़ी चुनौती भी शायद यही है कि हम राजनीति को केवल सत्ता प्राप्त करने का साधन न बनने दें। राजनीति का अर्थ यदि जनता के जीवन को बेहतर बनाना है, तो उसमें कृष्ण का विवेक चाहिए—जहाँ नीति हो, लेकिन नीति के केंद्र में मनुष्य हो; जहाँ शक्ति हो, लेकिन शक्ति के ऊपर न्याय हो; जहाँ असहमति हो, लेकिन शत्रुता न हो। सामाजिक जीवन में भी कृष्ण की प्रासंगिकता कम नहीं हुई है। कृष्ण का लोकजीवन हमें बताता है कि संस्कृति केवल ऊँचे महलों और राजदरबारों में नहीं रहती। वह गाँव की गलियों में, लोकगीतों में, रिश्तों में, उत्सवों में और सामान्य मनुष्य की स्मृतियों में भी सांस लेती है। कृष्ण जितने राजाओं के हैं, उतने ही उस सामान्य जन के भी हैं जिसकी जिंदगी में उत्सव अक्सर कठिन परिस्थितियों के बीच आशा का एक छोटा-सा दीप होता है। इसीलिए जन्माष्टमी के अवसर पर हमें केवल कृष्ण की मूर्ति के सामने दीप नहीं जलाना चाहिए; हमें अपने भीतर भी यह देखना चाहिए कि कहीं कोई अंधकार तो नहीं पल रहा। क्या हम किसी कमजोर के साथ खड़े हैं? क्या हम अन्याय देखकर चुप तो नहीं हैं? क्या हमारी राजनीति समाज को जोड़ रही है या मनुष्यों के बीच दीवारें खड़ी कर रही है? क्या हमारा धर्म हमें अधिक संवेदनशील बना रहा है या केवल दूसरों को गलत साबित करने का हथियार बन गया है? कृष्ण की सबसे बड़ी चुनौती शायद यही है कि वे हमें पूजा से आगे बढ़कर आत्मपरीक्षण के लिए मजबूर करते हैं। कृष्ण को जानना आसान है, कृष्ण को मानना भी आसान है; लेकिन कृष्ण को अपने आचरण में उतारना कठिन है। क्योंकि कृष्ण केवल बांसुरी की मधुरता नहीं हैं, वे अन्याय के विरुद्ध उठी हुई चेतना भी हैं। वे केवल राधा के प्रेम की स्मृति नहीं हैं, वे अर्जुन के संशय के बीच खड़ा हुआ विवेक भी हैं। वे केवल मंदिरों के देवता नहीं हैं, वे उस मनुष्य के भीतर की आवाज हैं जो अंधकार में भी प्रकाश की संभावना को बचाए रखना चाहता है। इस जन्माष्टमी पर यदि कृष्ण का जन्म सचमुच मनाना है, तो शायद हमें अपने भीतर तीन चीजों को जन्म देना होगा—विवेक, साहस और करुणा। विवेक ताकि हम सही और गलत में अंतर कर सकें। साहस ताकि सही के साथ खड़े हो सकें। और करुणा ताकि हमारी विजय किसी दूसरे मनुष्य की पराजय का उत्सव न बन जाए। कृष्ण की कथा हमें यह नहीं सिखाती कि जीवन में कभी अंधकार नहीं आएगा। वह तो यह सिखाती है कि अंधकार कितना भी गहरा हो, मनुष्य के भीतर प्रकाश को जन्म लेने से रोका नहीं जा सकता,और शायद इसीलिए कृष्ण का जन्म मथुरा की उस कारागार में एक बार नहीं हुआ था। वे हर उस क्षण जन्म लेते हैं, जब भय के विरुद्ध साहस खड़ा होता है,अन्याय के विरुद्ध न्याय आवाज उठाता है, और मनुष्य अपने भीतर के अंधकार पर प्रकाश को चुनता है। यही कृष्ण हैं,यही जन्माष्टमी का वास्तविक अर्थ है।
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    कृष्ण  जब अंधकार के बीच एक चेतना जन्म लेती है- महराज जी।
कृष्ण  जब अंधकार के बीच एक चेतना जन्म लेती है- महराज जी।
अयोध्या। कृष्ण का जन्म उस रात हुआ था, जब बाहर भी अंधकार था और भीतर भी। मथुरा की कारागार में जन्मा वह बालक केवल देवकी और वसुदेव का पुत्र नहीं था; वह उस व्यवस्था के विरुद्ध जन्मी एक चेतना था, जो भय, अत्याचार और सत्ता के अहंकार पर खड़ी थी। शायद इसीलिए कृष्ण का जन्मोत्सव केवल धार्मिक उत्सव नहीं है। यह मनुष्य के भीतर प्रकाश के जन्म का उत्सव भी है। कृष्ण की कथा जितनी पुरानी है, उतनी ही आज की भी। समय बदला, राजसत्ताएँ बदलीं, शासन के तरीके बदले, समाज की संरचना बदली, लेकिन कंस का चरित्र समाप्त नहीं हुआ। हर युग में कोई न कोई सत्ता अपने अहंकार में मनुष्य की स्वतंत्रता को कुचलने लगती है। हर युग में भय को व्यवस्था का नाम दिया जाता है और मौन को विवेक समझ लिया जाता है। ऐसे समय में कृष्ण हमें याद दिलाते हैं कि अन्याय के सामने निष्पक्ष रहना हमेशा न्याय के पक्ष में खड़ा होना नहीं होता। कृष्ण का जीवन विरोधाभासों का अद्भुत दर्शन है। उनके हाथ में बांसुरी है, लेकिन आवश्यकता पड़ने पर वही कृष्ण रणभूमि में सारथी बन जाते हैं। वे प्रेम के प्रतीक हैं, लेकिन अन्याय के सामने कठोर निर्णय लेने से पीछे नहीं हटते। वे राजमहल में भी सहज हैं और ग्वाल-बालों के बीच भी उतने ही अपने। उनकी यही व्यापकता उन्हें केवल धार्मिक प्रतीक नहीं, बल्कि भारतीय जीवन-दर्शन का जीवंत रूप बनाती है। कृष्ण का दर्शन मनुष्य को भाग्य के भरोसे बैठने की शिक्षा नहीं देता। गीता में वे कर्म की ओर लौटाते हैं। उनका संदेश है कि मनुष्य अपने अधिकार और कर्तव्य से विमुख होकर जीवन की कठिनाइयों से मुक्त नहीं हो सकता। कर्म से पलायन शांति नहीं देता; वह केवल भीतर एक और युद्ध पैदा करता है। आज जब हम सफलता को परिणाम से और मनुष्य को उसकी उपयोगिता से मापने लगे हैं, तब कृष्ण का कर्मयोग हमें याद दिलाता है कि कर्म का मूल्य केवल उसके परिणाम में नहीं, उसकी निष्ठा में भी है। राजनीति के क्षेत्र में कृष्ण को समझना और भी महत्वपूर्ण है। उन्होंने सत्ता को कभी अंतिम लक्ष्य नहीं माना। वे जानते थे कि सत्ता यदि लोककल्याण से कट जाए तो वह केवल शक्ति का प्रदर्शन बन जाती है। कंस का अंत इसलिए महत्वपूर्ण नहीं था कि एक राजा मारा गया; महत्वपूर्ण यह था कि भय के शासन के विरुद्ध न्याय की संभावना पैदा हुई। महाभारत में कृष्ण की राजनीति हमें एक और कठिन सत्य सिखाती है—अच्छे समाज के निर्माण के लिए केवल अच्छे इरादे पर्याप्त नहीं होते; विवेक, रणनीति और समय की पहचान भी आवश्यक होती है। उन्होंने युद्ध को उत्सव नहीं बनाया। उन्होंने शांति का प्रयास किया। लेकिन जब संवाद की सारी संभावनाएँ समाप्त हो गईं और अन्याय अपनी सीमा पार कर गया, तब उन्होंने अर्जुन को कर्तव्य से भागने नहीं दिया। आज लोकतंत्र में हमारी सबसे बड़ी चुनौती भी शायद यही है कि हम राजनीति को केवल सत्ता प्राप्त करने का साधन न बनने दें। राजनीति का अर्थ यदि जनता के जीवन को बेहतर बनाना है, तो उसमें कृष्ण का विवेक चाहिए—जहाँ नीति हो, लेकिन नीति के केंद्र में मनुष्य हो; जहाँ शक्ति हो, लेकिन शक्ति के ऊपर न्याय हो; जहाँ असहमति हो, लेकिन शत्रुता न हो। सामाजिक जीवन में भी कृष्ण की प्रासंगिकता कम नहीं हुई है। कृष्ण का लोकजीवन हमें बताता है कि संस्कृति केवल ऊँचे महलों और राजदरबारों में नहीं रहती। वह गाँव की गलियों में, लोकगीतों में, रिश्तों में, उत्सवों में और सामान्य मनुष्य की स्मृतियों में भी सांस लेती है। कृष्ण जितने राजाओं के हैं, उतने ही उस सामान्य जन के भी हैं जिसकी जिंदगी में उत्सव अक्सर कठिन परिस्थितियों के बीच आशा का एक छोटा-सा दीप होता है। इसीलिए जन्माष्टमी के अवसर पर हमें केवल कृष्ण की मूर्ति के सामने दीप नहीं जलाना चाहिए; हमें अपने भीतर भी यह देखना चाहिए कि कहीं कोई अंधकार तो नहीं पल रहा। क्या हम किसी कमजोर के साथ खड़े हैं? क्या हम अन्याय देखकर चुप तो नहीं हैं? क्या हमारी राजनीति समाज को जोड़ रही है या मनुष्यों के बीच दीवारें खड़ी कर रही है? क्या हमारा धर्म हमें अधिक संवेदनशील बना रहा है या केवल दूसरों को गलत साबित करने का हथियार बन गया है? कृष्ण की सबसे बड़ी चुनौती शायद यही है कि वे हमें पूजा से आगे बढ़कर आत्मपरीक्षण के लिए मजबूर करते हैं। कृष्ण को जानना आसान है, कृष्ण को मानना भी आसान है; लेकिन कृष्ण को अपने आचरण में उतारना कठिन है। क्योंकि कृष्ण केवल बांसुरी की मधुरता नहीं हैं, वे अन्याय के विरुद्ध उठी हुई चेतना भी हैं। वे केवल राधा के प्रेम की स्मृति नहीं हैं, वे अर्जुन के संशय के बीच खड़ा हुआ विवेक भी हैं। वे केवल मंदिरों के देवता नहीं हैं, वे उस मनुष्य के भीतर की आवाज हैं जो अंधकार में भी प्रकाश की संभावना को बचाए रखना चाहता है। इस जन्माष्टमी पर यदि कृष्ण का जन्म सचमुच मनाना है, तो शायद हमें अपने भीतर तीन चीजों को जन्म देना होगा—विवेक, साहस और करुणा।
विवेक ताकि हम सही और गलत में अंतर कर सकें। साहस ताकि सही के साथ खड़े हो सकें।
और करुणा ताकि हमारी विजय किसी दूसरे मनुष्य की पराजय का उत्सव न बन जाए।
कृष्ण की कथा हमें यह नहीं सिखाती कि जीवन में कभी अंधकार नहीं आएगा। वह तो यह सिखाती है कि अंधकार कितना भी गहरा हो, मनुष्य के भीतर प्रकाश को जन्म लेने से रोका नहीं जा सकता,और शायद इसीलिए कृष्ण का जन्म मथुरा की उस कारागार में एक बार नहीं हुआ था। वे हर उस क्षण जन्म लेते हैं, जब भय के विरुद्ध साहस खड़ा होता है,अन्याय के विरुद्ध न्याय आवाज उठाता है, और मनुष्य अपने भीतर के अंधकार पर प्रकाश को चुनता है। यही कृष्ण हैं,यही जन्माष्टमी का वास्तविक अर्थ है।
    user_Varun kumar
    Varun kumar
    Local News Reporter Faizabad, Ayodhya•
    7 hrs ago
  • भारत ने नेपाल के लिए अपरेशन मदद मिशन के तहत मदद् कर रही है आओ मिलकर दुनिया वालो नेपाल में भारी तरस्दी को देखते हुए मदद करे उनका जीवन सावरे, मानवता यही कहती है जो सदेव मानवता को सबसे पहले और आगे हाथ बढ़ता है जीवन मानवता के साथ जीना चाहिए सुख दुःख सबके साथ आ सकता है जिस तरह से नेपाल में प्राकृतिक बढ़ आपदा में दुनिया को झकझोर कर रख दिया है वही पर मानवता के लिए भारत सबसे पहले हाथ बढ़ाया मदद के लिए , भारत ने अपरेशन मदद के तहत नेपाल में बचाव दल लगातार कार्य कर रही है ।। Aaj subah times।। ।। रिपोर्टिंग Lal Chand Soni,, भारत ने नेपाल के लिए अपरेशन मदद मिशन के तहत मदद् कर रही है आओ मिलकर दुनिया वालो नेपाल में भारी तरस्दी को देखते हुए मदद करे उनका जीवन सावरे, मानवता यही कहती है जो सदेव मानवता को सबसे पहले और आगे हाथ बढ़ता है जीवन मानवता के साथ जीना चाहिए सुख दुःख सबके साथ आ सकता है जिस तरह से नेपाल में प्राकृतिक बढ़ आपदा में दुनिया को झकझोर कर रख दिया है वही पर मानवता के लिए भारत सबसे पहले हाथ बढ़ाया मदद के लिए , भारत ने अपरेशन मदद के तहत नेपाल में बचाव दल लगातार कार्य कर रही है ।। Aaj subah times।। ।। रिपोर्टिंग Lal Chand Soni,,
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    भारत ने नेपाल के लिए अपरेशन मदद मिशन के तहत मदद् कर रही है आओ मिलकर दुनिया वालो नेपाल में भारी  तरस्दी को देखते हुए मदद करे उनका जीवन सावरे, मानवता यही कहती है जो सदेव मानवता को सबसे पहले और आगे हाथ  बढ़ता है जीवन मानवता के साथ जीना चाहिए सुख दुःख सबके साथ आ सकता है जिस तरह से नेपाल में प्राकृतिक बढ़ आपदा में दुनिया को झकझोर कर रख दिया है वही पर मानवता के लिए भारत सबसे पहले हाथ बढ़ाया मदद के लिए , भारत ने अपरेशन मदद के तहत नेपाल में बचाव दल लगातार कार्य कर रही है 
।। Aaj subah times।।
।। रिपोर्टिंग Lal Chand Soni,,
भारत ने नेपाल के लिए अपरेशन मदद मिशन के तहत मदद् कर रही है आओ मिलकर दुनिया वालो नेपाल में भारी  तरस्दी को देखते हुए मदद करे उनका जीवन सावरे, मानवता यही कहती है जो सदेव मानवता को सबसे पहले और आगे हाथ  बढ़ता है जीवन मानवता के साथ जीना चाहिए सुख दुःख सबके साथ आ सकता है जिस तरह से नेपाल में प्राकृतिक बढ़ आपदा में दुनिया को झकझोर कर रख दिया है वही पर मानवता के लिए भारत सबसे पहले हाथ बढ़ाया मदद के लिए , भारत ने अपरेशन मदद के तहत नेपाल में बचाव दल लगातार कार्य कर रही है 
।। Aaj subah times।।
।। रिपोर्टिंग Lal Chand Soni,,
    user_Aaj Subah Times
    Aaj Subah Times
    पत्रकार Ayodhya, Uttar Pradesh•
    7 hrs ago
  • अयोध्या में दि रामा रिजेड रेजिडेंसी होटल का भव्य शुभारंभ, अतिथियों के ठहरने और खान-पान की आधुनिक सुविधाएं उपलब्ध बिपिन पांडेय संवाददाता अजेय भारत ए बी न्यूज़ अयोध्या लोकेशन अयोध्या दि रामा रिजेड रेजिडेंसी होटल का हुआ भव्य शुभारंभ अयोध्या। श्रीराम की पावन नगरी अयोध्या में चूड़ामणि चौराहा स्थित भावदीय स्कूल के सामने दि रामा रिजेड रेजिडेंसी होटल का भव्य शुभारंभ हुआ। होटल के शुभारंभ अवसर पर बड़ी संख्या में सम्मानित अतिथियों एवं गणमान्य लोगों ने पहुंचकर शुभकामनाएं दीं। होटल के प्रोपराइटर श्री मृदुल शुक्ला एवं मैनेजिंग डायरेक्टर अमरेश मौर्य ने बताया कि अयोध्या आने वाले श्रद्धालुओं और पर्यटकों की सुविधा को ध्यान में रखते हुए होटल में आधुनिक एवं आरामदायक सुविधाएं उपलब्ध कराई गई हैं। होटल में एलिवेटर, स्टे इंप्रेस लग्जरी रूम, बैंक्विट हॉल सहित विभिन्न सुविधाओं की व्यवस्था की गई है। साथ ही अलग-अलग तरह के स्वादिष्ट व्यंजनों को कुशल कारीगरों द्वारा तैयार कराने की व्यवस्था भी की गई है, ताकि यहां आने वाले अतिथियों को बेहतर ठहरने और खान-पान की सुविधा मिल सके। शुभारंभ समारोह में पहुंचे सभी सम्मानित अतिथियों का होटल प्रबंधन की ओर से आभार व्यक्त किया गया। होटल प्रबंधन ने विश्वास जताया कि अयोध्या आने वाले देश-विदेश के श्रद्धालुओं एवं पर्यटकों को यहां बेहतर आतिथ्य और सुविधाएं उपलब्ध रहेगी।
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    अयोध्या में दि रामा रिजेड रेजिडेंसी होटल का भव्य शुभारंभ, अतिथियों के ठहरने और खान-पान की आधुनिक सुविधाएं उपलब्ध
बिपिन पांडेय 
संवाददाता 
अजेय भारत ए बी न्यूज़ 
अयोध्या 
लोकेशन अयोध्या 
दि रामा रिजेड रेजिडेंसी होटल का हुआ भव्य शुभारंभ
अयोध्या। श्रीराम की पावन नगरी अयोध्या में चूड़ामणि चौराहा स्थित भावदीय स्कूल के सामने दि रामा रिजेड रेजिडेंसी होटल का भव्य शुभारंभ हुआ। होटल के शुभारंभ अवसर पर बड़ी संख्या में सम्मानित अतिथियों एवं गणमान्य लोगों ने पहुंचकर शुभकामनाएं दीं।
होटल के प्रोपराइटर श्री मृदुल शुक्ला एवं मैनेजिंग डायरेक्टर अमरेश मौर्य ने बताया कि अयोध्या आने वाले श्रद्धालुओं और पर्यटकों की सुविधा को ध्यान में रखते हुए होटल में आधुनिक एवं आरामदायक सुविधाएं उपलब्ध कराई गई हैं।
होटल में एलिवेटर, स्टे इंप्रेस लग्जरी रूम, बैंक्विट हॉल सहित विभिन्न सुविधाओं की व्यवस्था की गई है। साथ ही अलग-अलग तरह के स्वादिष्ट व्यंजनों को कुशल कारीगरों द्वारा तैयार कराने की व्यवस्था भी की गई है, ताकि यहां आने वाले अतिथियों को बेहतर ठहरने और खान-पान की सुविधा मिल सके।
शुभारंभ समारोह में पहुंचे सभी सम्मानित अतिथियों का होटल प्रबंधन की ओर से आभार व्यक्त किया गया। होटल प्रबंधन ने विश्वास जताया कि अयोध्या आने वाले देश-विदेश के श्रद्धालुओं एवं पर्यटकों को यहां बेहतर आतिथ्य और सुविधाएं उपलब्ध रहेगी।
    user_Vipin pandey Ayodhya
    Vipin pandey Ayodhya
    Local News Reporter फैजाबाद, अयोध्या, उत्तर प्रदेश•
    1 hr ago
  • समय महिला आग की चपेट में आई, गंभीर हालत में ट्रॉमा सेंटर रेफर बिपिन पांडेय संवाददाता अजय भारत ए बी न्यूज़ अयोध्या लोकेशन अयोध्या अयोध्या। थाना पूराकलंदर क्षेत्र के ग्राम बरवा में खाना बनाते समय एक महिला आग की चपेट में आकर गंभीर रूप से घायल हो गई। घटना में करीब 30 वर्षीय प्रियंका पत्नी राहुल गंभीर रूप से झुलस गईं। परिजनों द्वारा आनन-फानन में उन्हें उपचार के लिए जिला अस्पताल पहुंचाया गया। चिकित्सकों ने उनकी हालत गंभीर देखते हुए बेहतर उपचार के लिए ट्रॉमा सेंटर रेफर कर दिया। घटना के बाद परिजनों में चिंता का माहौल है। आग लगने की घटना किन परिस्थितियों में हुई, इसकी जानकारी सामने नहीं आ सकी है।
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    समय महिला आग की चपेट में आई, गंभीर हालत में ट्रॉमा सेंटर रेफर 
बिपिन पांडेय 
संवाददाता 
अजय भारत ए बी न्यूज़ 
अयोध्या 
लोकेशन अयोध्या
अयोध्या। थाना पूराकलंदर क्षेत्र के ग्राम बरवा में खाना बनाते समय एक महिला आग की चपेट में आकर गंभीर रूप से घायल हो गई। घटना में करीब 30 वर्षीय प्रियंका पत्नी राहुल गंभीर रूप से झुलस गईं।
परिजनों द्वारा आनन-फानन में उन्हें उपचार के लिए जिला अस्पताल पहुंचाया गया। चिकित्सकों ने उनकी हालत गंभीर देखते हुए बेहतर उपचार के लिए ट्रॉमा सेंटर रेफर कर दिया।
घटना के बाद परिजनों में चिंता का माहौल है। आग लगने की घटना किन परिस्थितियों में हुई, इसकी जानकारी सामने नहीं आ सकी है।
    user_Vipin pandey Ayodhya
    Vipin pandey Ayodhya
    Local News Reporter फैजाबाद, अयोध्या, उत्तर प्रदेश•
    28 min ago
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