पीने के पानी में फ्लोराइड की मात्रा होने से होती है कई प्रकार की बीमारियां स्वच्छ पेयजल एवं जल गुणवत्ता को लेकर हुआ एक दिवसीय कार्यशाला का आयोजन रजौली। प्रफुल्ल कुमार सुमन रजौली प्रखंड कार्यालय स्थित सभागार में स्वच्छ पेयजल एवं जल गुणवत्ता को लेकर एक दिवसीय कार्यशाला का आयोजन किया गया। आयोजित इस कार्यशाला की अध्यक्षता बीडीओ संजीव कुमार झा ने किया। कार्यशाला के दौरान उन्होंने उपस्थित लोगों को बताया कि फ्लोराइड क्या है, फ्लोरोसिस क्या है, पीने के पानी में फ्लोराइड के खतरे को कैसे जानना है। पानी में पाए जाने वाला खनिज लवण फ्लोराइड है एवं फ्लोरोसिस बीमारी के लक्षण कंकालीय फ्लोरोसिस, यह प्रक्रिया ए अकंकालीय फ्लोरोसिस व दन्तीय फ्लोरोसिस फ्लोराइड से होने वाले लक्षण है। पानी में फ्लोराइड की अधिकता के कारण होने वाली बीमारी से कैसे निजात पाया जा सकता है। इस बारे में विस्तृत चर्चा की गई। उन्होंने बताया कि पीने के पानी में फ्लोराइड की अधिकता के कारण हमेशा थकान होना और कंधे के जोड़ों में दर्द होना, कमर के नीचे व घुटनों में दर्द होना, पेट में दर्द होना, कब्ज होना, खून की कमी होना, बार-बार पेशाब आना, अधिक प्यास लगना, भूख कम लगना, जी मिचलाना, दांतों पर पीले भूरे धब्बे एवं धारियां पड़ जाना। यह सभी फ्लोराइड पानी से होने वाले लक्षण हैं। पीने के पानी में फ्लोराइड की अधिकता की पहचान करें, खून की जांच कराना, पानी की जांच प्रयोगशाला में कराना, डॉक्टर की सलाह व हड्डियों का एक्सरे करवाना। फ्लोराइड की रोकथाम और नियंत्रण के लिए लोगों को साफ पानी पीना चाहिए। फिल्टर का प्रयोग करना, कुएं का पानी पीना चाहिए। लाल रंग से रंगे हुए हैंडपंप का पानी कभी भी नहीं पीना चाहिए। उक्त विधि करने से फ्लोरोसिस की बीमारी से बचा जा सकता है और बेहतर खान-पान में विटामिन सी युक्त भोजन जिसमें आंवला, नींबू, संतरा, टमाटर, अनाज व दालें हैं। विटामिन ई युक्त भोजन जिसमें वनस्पति तेल, सुखा मेवा, अनाज, हरी सब्जियां व दालें हैं। आयरन युक्त भोजन जिसमें सेव, केला, बैगन, धनिया व सब्जियां है। कैल्शियम युक्त भोजन जिसमें दूध, दही, हरी पत्तेदार सब्जियां, गुड़, तिल, ककड़ी, अरबी (सहजन) का फल व पत्ते। एंटी आक्सीडेंट युक्त भोजन जिसमें लहसुन, अदरक, गाजर, प्याज, कद्दू, पपीता व शकरकंद आदि शामिल किया जा सकता है। जिससे फ्लोरोसिस नामक बीमारी में रोकथाम हो सकता है। उक्त बातें कार्यशाला में बताया गया।
पीने के पानी में फ्लोराइड की मात्रा होने से होती है कई प्रकार की बीमारियां स्वच्छ पेयजल एवं जल गुणवत्ता को लेकर हुआ एक दिवसीय कार्यशाला का आयोजन रजौली। प्रफुल्ल कुमार सुमन रजौली प्रखंड कार्यालय स्थित सभागार में स्वच्छ पेयजल एवं जल गुणवत्ता को लेकर एक दिवसीय कार्यशाला का आयोजन किया गया। आयोजित इस कार्यशाला की अध्यक्षता बीडीओ संजीव कुमार झा ने किया। कार्यशाला के दौरान उन्होंने उपस्थित लोगों को बताया कि फ्लोराइड क्या है, फ्लोरोसिस क्या है, पीने के पानी में फ्लोराइड के खतरे को कैसे जानना है। पानी में पाए जाने वाला खनिज लवण फ्लोराइड है एवं फ्लोरोसिस बीमारी के लक्षण कंकालीय फ्लोरोसिस, यह प्रक्रिया ए अकंकालीय फ्लोरोसिस व दन्तीय फ्लोरोसिस फ्लोराइड से होने वाले लक्षण है। पानी में फ्लोराइड की अधिकता के कारण होने वाली बीमारी से कैसे निजात पाया जा सकता है। इस बारे में विस्तृत चर्चा की गई। उन्होंने बताया कि पीने के पानी में फ्लोराइड की अधिकता के कारण हमेशा थकान होना और कंधे के जोड़ों में दर्द होना, कमर के नीचे व घुटनों में दर्द होना, पेट में दर्द होना, कब्ज होना, खून की कमी होना, बार-बार पेशाब आना, अधिक प्यास लगना, भूख कम लगना, जी
मिचलाना, दांतों पर पीले भूरे धब्बे एवं धारियां पड़ जाना। यह सभी फ्लोराइड पानी से होने वाले लक्षण हैं। पीने के पानी में फ्लोराइड की अधिकता की पहचान करें, खून की जांच कराना, पानी की जांच प्रयोगशाला में कराना, डॉक्टर की सलाह व हड्डियों का एक्सरे करवाना। फ्लोराइड की रोकथाम और नियंत्रण के लिए लोगों को साफ पानी पीना चाहिए। फिल्टर का प्रयोग करना, कुएं का पानी पीना चाहिए। लाल रंग से रंगे हुए हैंडपंप का पानी कभी भी नहीं पीना चाहिए। उक्त विधि करने से फ्लोरोसिस की बीमारी से बचा जा सकता है और बेहतर खान-पान में विटामिन सी युक्त भोजन जिसमें आंवला, नींबू, संतरा, टमाटर, अनाज व दालें हैं। विटामिन ई युक्त भोजन जिसमें वनस्पति तेल, सुखा मेवा, अनाज, हरी सब्जियां व दालें हैं। आयरन युक्त भोजन जिसमें सेव, केला, बैगन, धनिया व सब्जियां है। कैल्शियम युक्त भोजन जिसमें दूध, दही, हरी पत्तेदार सब्जियां, गुड़, तिल, ककड़ी, अरबी (सहजन) का फल व पत्ते। एंटी आक्सीडेंट युक्त भोजन जिसमें लहसुन, अदरक, गाजर, प्याज, कद्दू, पपीता व शकरकंद आदि शामिल किया जा सकता है। जिससे फ्लोरोसिस नामक बीमारी में रोकथाम हो सकता है। उक्त बातें कार्यशाला में बताया गया।
- अतिपिछड़ा वर्ग (EBC) बिहार की सामाजिक संरचना का एक बड़ा और महत्वपूर्ण हिस्सा है और इस समाज को भी समान अधिकार, संजय वर्मा बिहार नवादा बिहार में अतिपिछड़ा वर्ग (EBC) बिहार की सामाजिक संरचना का एक बड़ा और महत्वपूर्ण हिस्सा है और इस समाज को भी समान अधिकार, सुरक्षा और सम्मान मिलना चाहिए। वर्षों से यह वर्ग राजनीतिक रूप से प्रभावशाली माना जाता रहा है, लेकिन इसके बावजूद कई बुनियादी सवाल आज भी अनसुलझे हैं। जिस तरह SC/ST (Prevention of Atrocities) Act के तहत दलित या आदिवासी समाज के किसी व्यक्ति की हत्या या अत्याचार की घटना पर पीड़ित परिवार को सरकारी सहायता और कई मामलों में नौकरी देने जैसी व्यवस्थाएं हैं, उसी तर्ज पर अतिपिछड़ा वर्ग के लिए भी प्रभावी कानून बनाने की मांग समय-समय पर उठती रही है। यह मांग इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि समाज के कमजोर तबकों को सुरक्षा और न्याय का भरोसा मिलना जरूरी है। बिहार की राजनीति में नीतीश कुमार ने अतिपिछड़ा वर्ग को एक बड़ी राजनीतिक ताकत के रूप में संगठित किया और लंबे समय से उनकी सरकार इस वर्ग के समर्थन पर टिकी रही है। लेकिन आलोचकों का कहना है कि इस समाज को जितना राजनीतिक महत्व मिला, उतना ठोस अधिकार और संरचनात्मक लाभ नहीं मिल पाया। पंचायत और नगर निकाय चुनावों में आरक्षण का मुद्दा भी इसी बहस का हिस्सा है। कई लोगों का मानना है कि यदि 50 प्रतिशत आरक्षण की सीमा के भीतर रहते हुए अधिक हिस्सेदारी दी जाती, तो अतिपिछड़ा समाज को और मजबूत प्रतिनिधित्व मिल सकता था। साथ ही यह भी सच है कि चाहे नैशनल Democratic Alliance हो या Mahagathbandhan, दोनों ही राजनीतिक गठबंधनों पर अक्सर यह आरोप लगता रहा है कि उन्होंने अतिपिछड़े वर्ग को स्थायी अधिकार देने के बजाय उसे एक वोट बैंक की तरह इस्तेमाल किया। यही कारण है कि आज इस समाज के भीतर अपने अधिकारों और हिस्सेदारी को लेकर नई जागरूकता दिखाई दे रही है। अंततः यह स्पष्ट है कि किसी भी समाज की पहचान सिर्फ उसके वोट से नहीं, बल्कि उसके अधिकार, सुरक्षा और सम्मान से तय होती है। अतिपिछड़ा समाज भी अब अपने अधिकारों को समझ रहा है और चाहता है कि उसके मुद्दे सिर्फ चुनावी वादों तक सीमित न रहें, बल्कि ठोस नीतियों और फैसलों के जरिए वास्तविक बदलाव दिखाई दे। व्यक्ति की पहचान आखिरकार उसके फैसलों से ही होती है।1
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