मोतिहारी में ज़हरीली शराब पर जिम्मेवार कौन,पाबंदी के बावजूद हर गली में उपलब्ध रहती शराब पाबंदी के बावजूद हर गली में उपलब्ध शराब, पुलिस कार्रवाई पर विरोध—नैतिकता, व्यवस्था और सामाजिक विडंबना पर बड़ा सवाल लोकल पब्लिक न्यूज़ | विशेष रिपोर्ट बिहार में साल 2016 से लागू पूर्ण शराबबंदी कानून का उद्देश्य था—समाज को नशामुक्त बनाना, परिवारों को टूटने से बचाना और अपराध दर में कमी लाना। लेकिन लगभग एक दशक बाद भी जमीनी हकीकत कुछ और ही कहानी बयां करती है। कानून सख्त है, दंड कठोर है, लेकिन शराब की उपलब्धता आज भी गांव से लेकर शहर तक बनी हुई है। यह विरोधाभास न सिर्फ प्रशासनिक व्यवस्था पर सवाल खड़ा करता है, बल्कि समाज के दोहरे चरित्र को भी उजागर करता है। शराबबंदी लागू होने के बावजूद अधिकांश इलाकों में शराब आसानी से मिल जाती है। यह स्थिति बताती है कि अवैध कारोबार का जाल अब भी मजबूत है। स्थानीय स्तर पर नेटवर्क इतने सक्रिय हैं कि कानून की पकड़ से बच निकलते है। आम तौर पर समाज में नशे को बुरा माना जाता है, लेकिन हकीकत यह है कि बड़ी संख्या में लोग इसके आदी हैं। अपनी मेहनत की कमाई का बड़ा हिस्सा शराब पर खर्च करने में उन्हें कोई हिचकिचाहट नहीं होती। यह प्रवृत्ति न केवल आर्थिक नुकसान पहुंचाती है, बल्कि परिवारों को भी बर्बादी की कगार पर ला देती है। जब पुलिस अवैध शराब के खिलाफ कार्रवाई करती है, तो कई बार उसे स्थानीय विरोध का सामना करना पड़ता है। कहीं पथराव होता है, तो कहीं लाठी-डंडे चलाए जाते हैं। यह स्थिति बेहद चिंताजनक है—जहां कानून लागू करने वाली एजेंसी को ही दुश्मन समझ लिया जाता है। शराब की लत का सबसे बड़ा असर परिवारों पर पड़ता है। घर के सदस्य, खासकर महिलाएं और बच्चे, आर्थिक तंगी और मानसिक तनाव झेलते हैं। कई मामलों में घरेलू हिंसा, झगड़े और सामाजिक कलंक भी सामने आते हैं, लेकिन इसके बावजूद लत से छुटकारा पाने की गंभीर कोशिश कम ही दिखती है। शराबबंदी: कानून से ज्यादा सामाजिक बदलाव की जरूरत विशेषज्ञ मानते हैं कि सिर्फ कानून बना देने से समस्या खत्म नहीं होती। जब तक समाज में जागरूकता, आत्मनियंत्रण और वैकल्पिक जीवनशैली को बढ़ावा नहीं मिलेगा, तब तक शराबबंदी का उद्देश्य अधूरा ही रहेगा। बिहार में शराबबंदी आज एक ऐसे मोड़ पर खड़ी है, जहां कानून और वास्तविकता के बीच बड़ा अंतर दिखता है। यह केवल प्रशासन की चुनौती नहीं, बल्कि पूरे समाज के आत्ममंथन का विषय है— क्या हम सच में नशामुक्त समाज चाहते हैं, या सिर्फ कागजों में?
मोतिहारी में ज़हरीली शराब पर जिम्मेवार कौन,पाबंदी के बावजूद हर गली में उपलब्ध रहती शराब पाबंदी के बावजूद हर गली में उपलब्ध शराब, पुलिस कार्रवाई पर विरोध—नैतिकता, व्यवस्था और सामाजिक विडंबना पर बड़ा सवाल लोकल पब्लिक न्यूज़ | विशेष रिपोर्ट बिहार में साल 2016 से लागू पूर्ण शराबबंदी कानून का उद्देश्य था—समाज को नशामुक्त बनाना, परिवारों को टूटने से बचाना और अपराध दर में कमी लाना। लेकिन लगभग एक दशक बाद भी जमीनी हकीकत कुछ और ही कहानी बयां करती है। कानून सख्त है, दंड कठोर है, लेकिन शराब की उपलब्धता आज भी गांव से लेकर शहर तक बनी हुई है। यह विरोधाभास न सिर्फ प्रशासनिक व्यवस्था पर सवाल खड़ा करता है, बल्कि समाज के दोहरे चरित्र को भी उजागर करता है। शराबबंदी लागू होने के बावजूद अधिकांश इलाकों में शराब आसानी से मिल जाती है। यह स्थिति बताती है कि अवैध कारोबार का जाल अब भी मजबूत है। स्थानीय स्तर पर नेटवर्क इतने सक्रिय हैं कि कानून की पकड़ से बच निकलते है। आम तौर पर समाज में नशे को बुरा माना जाता है, लेकिन हकीकत यह है कि बड़ी संख्या में लोग इसके आदी हैं। अपनी मेहनत की कमाई का बड़ा हिस्सा शराब पर खर्च करने में उन्हें कोई हिचकिचाहट नहीं होती। यह प्रवृत्ति न केवल आर्थिक नुकसान पहुंचाती है, बल्कि परिवारों को भी बर्बादी की कगार पर ला देती है। जब पुलिस अवैध शराब के खिलाफ कार्रवाई करती है, तो कई बार उसे स्थानीय विरोध का सामना करना पड़ता है। कहीं पथराव होता है, तो कहीं लाठी-डंडे चलाए जाते हैं। यह स्थिति बेहद चिंताजनक है—जहां कानून लागू करने वाली एजेंसी को ही दुश्मन समझ लिया जाता है। शराब की लत का सबसे बड़ा असर परिवारों पर पड़ता है। घर के सदस्य, खासकर महिलाएं और बच्चे, आर्थिक तंगी और मानसिक तनाव झेलते हैं। कई मामलों में घरेलू हिंसा, झगड़े और सामाजिक कलंक भी सामने आते हैं, लेकिन इसके बावजूद लत से छुटकारा पाने की गंभीर कोशिश कम ही दिखती है। शराबबंदी: कानून से ज्यादा सामाजिक बदलाव की जरूरत विशेषज्ञ मानते हैं कि सिर्फ कानून बना देने से समस्या खत्म नहीं होती। जब तक समाज में जागरूकता, आत्मनियंत्रण और वैकल्पिक जीवनशैली को बढ़ावा नहीं मिलेगा, तब तक शराबबंदी का उद्देश्य अधूरा ही रहेगा। बिहार में शराबबंदी आज एक ऐसे मोड़ पर खड़ी है, जहां कानून और वास्तविकता के बीच बड़ा अंतर दिखता है। यह केवल प्रशासन की चुनौती नहीं, बल्कि पूरे समाज के आत्ममंथन का विषय है— क्या हम सच में नशामुक्त समाज चाहते हैं, या सिर्फ कागजों में?
- पाबंदी के बावजूद हर गली में उपलब्ध शराब, पुलिस कार्रवाई पर विरोध—नैतिकता, व्यवस्था और सामाजिक विडंबना पर बड़ा सवाल लोकल पब्लिक न्यूज़ | विशेष रिपोर्ट बिहार में साल 2016 से लागू पूर्ण शराबबंदी कानून का उद्देश्य था—समाज को नशामुक्त बनाना, परिवारों को टूटने से बचाना और अपराध दर में कमी लाना। लेकिन लगभग एक दशक बाद भी जमीनी हकीकत कुछ और ही कहानी बयां करती है। कानून सख्त है, दंड कठोर है, लेकिन शराब की उपलब्धता आज भी गांव से लेकर शहर तक बनी हुई है। यह विरोधाभास न सिर्फ प्रशासनिक व्यवस्था पर सवाल खड़ा करता है, बल्कि समाज के दोहरे चरित्र को भी उजागर करता है। शराबबंदी लागू होने के बावजूद अधिकांश इलाकों में शराब आसानी से मिल जाती है। यह स्थिति बताती है कि अवैध कारोबार का जाल अब भी मजबूत है। स्थानीय स्तर पर नेटवर्क इतने सक्रिय हैं कि कानून की पकड़ से बच निकलते है। आम तौर पर समाज में नशे को बुरा माना जाता है, लेकिन हकीकत यह है कि बड़ी संख्या में लोग इसके आदी हैं। अपनी मेहनत की कमाई का बड़ा हिस्सा शराब पर खर्च करने में उन्हें कोई हिचकिचाहट नहीं होती। यह प्रवृत्ति न केवल आर्थिक नुकसान पहुंचाती है, बल्कि परिवारों को भी बर्बादी की कगार पर ला देती है। जब पुलिस अवैध शराब के खिलाफ कार्रवाई करती है, तो कई बार उसे स्थानीय विरोध का सामना करना पड़ता है। कहीं पथराव होता है, तो कहीं लाठी-डंडे चलाए जाते हैं। यह स्थिति बेहद चिंताजनक है—जहां कानून लागू करने वाली एजेंसी को ही दुश्मन समझ लिया जाता है। शराब की लत का सबसे बड़ा असर परिवारों पर पड़ता है। घर के सदस्य, खासकर महिलाएं और बच्चे, आर्थिक तंगी और मानसिक तनाव झेलते हैं। कई मामलों में घरेलू हिंसा, झगड़े और सामाजिक कलंक भी सामने आते हैं, लेकिन इसके बावजूद लत से छुटकारा पाने की गंभीर कोशिश कम ही दिखती है। शराबबंदी: कानून से ज्यादा सामाजिक बदलाव की जरूरत विशेषज्ञ मानते हैं कि सिर्फ कानून बना देने से समस्या खत्म नहीं होती। जब तक समाज में जागरूकता, आत्मनियंत्रण और वैकल्पिक जीवनशैली को बढ़ावा नहीं मिलेगा, तब तक शराबबंदी का उद्देश्य अधूरा ही रहेगा। बिहार में शराबबंदी आज एक ऐसे मोड़ पर खड़ी है, जहां कानून और वास्तविकता के बीच बड़ा अंतर दिखता है। यह केवल प्रशासन की चुनौती नहीं, बल्कि पूरे समाज के आत्ममंथन का विषय है— क्या हम सच में नशामुक्त समाज चाहते हैं, या सिर्फ कागजों में?1
- पूर्वी चंपारण के मोतिहारी से बड़ी खबर सामने आई है, जहां चकिया अनुमंडल कार्यालय स्थित सभागार में कड़ी सुरक्षा व्यवस्था के बीच कल्याणपुर उपप्रमुख का चुनाव शांतिपूर्ण ढंग से संपन्न हुआ। इस चुनाव की निगरानी जिला से आए पर्यवेक्षक एडीएम जांच मो. शिबूग तूल्लाह तथा निर्वाची पदाधिकारी सह अनुमंडल पदाधिकारी शिवानी शुभम के नेतृत्व में की गई। उपप्रमुख पद के लिए भाजपा प्रदेश नेता राकेश रौशन की पत्नी पूजा रौशन और शंभू दास के बीच सीधा मुकाबला था। चुनाव प्रक्रिया शुरू होने के बाद कुल मतों की गिनती में पूजा रौशन को 25 वोट मिले, जबकि उनके निकटतम प्रतिद्वंद्वी शंभू दास को मात्र 7 वोट प्राप्त हुए। इस तरह पूजा रौशन ने 18 वोटों के बड़े अंतर से जीत हासिल करते हुए लगातार दूसरी बार उपप्रमुख पद पर कब्जा जमाया। चुनाव के बाद निर्वाची पदाधिकारी द्वारा पूजा रौशन को प्रमाण पत्र प्रदान किया गया और पद एवं गोपनीयता की शपथ दिलाई गई। वहीं, विधि व्यवस्था बनाए रखने के लिए चकिया डीएसपी संतोष कुमार के नेतृत्व में भारी संख्या में पुलिस बल और मजिस्ट्रेट की तैनाती की गई थी। चुनाव परिणाम घोषित होने के बाद समर्थकों में खुशी की लहर दौड़ गई। अनुमंडल कार्यालय परिसर के बाहर समर्थकों ने पूजा रौशन का अबीर-गुलाल और फूल मालाओं के साथ जोरदार स्वागत किया। इस मौके पर भाजपा जिला अध्यक्ष पवन राज, विधायक सचिंद्र प्रसाद सिंह, मुखिया हेमंत सिंह, संजय चौधरी समेत कई जनप्रतिनिधियों और कार्यकर्ताओं ने उन्हें जीत की बधाई दी। तो कुल मिलाकर, कड़े मुकाबले के बीच पूजा रौशन ने एक बार फिर अपनी राजनीतिक पकड़ मजबूत साबित की है।1
- Post by RAJA KUMAR1
- कटिहार और नवादा में पांच लोगों की गई जान। लोगों में हाहाकार।1
- थाना क्षेत्र में अपहरण के एक मामले में पुलिस ने तत्परता और मुस्तैदी का परिचय देते हुए बड़ी सफलता हासिल की है। फरार चल रहे आरोपी युवक को युवती के साथ सकुशल बरामद कर लिया गया है।थानाध्यक्ष अजय कुमार ने जानकारी देते हुए बताया कि युवती की मां द्वारा आरोपी के खिलाफ अपहरण की प्राथमिकी दर्ज कराई गई थी। मामले की गंभीरता को देखते हुए पुलिस ने तत्काल एक विशेष टीम का गठन कर कार्रवाई शुरू की।जांच के क्रम में पश्चिमी चंपारण जिले के जगदीशपुर थाना क्षेत्र के नौका टोला निवासी योगेंद्र साहनी के पुत्र रंजीत कुमार को शांति कुमारी, निवासी ननेया पचीमारी टोला, के साथ बरामद किया गया। पुलिस की इस त्वरित कार्रवाई से एक संभावित गंभीर घटना को समय रहते टाल दिया गया।थानाध्यक्ष ने बताया कि दोनों को न्यायालय में प्रस्तुत किया जाएगा, जहां से आगे की विधिसम्मत कार्रवाई सुनिश्चित की जाएगी।पुलिस की सक्रियता और तेज कार्रवाई से क्षेत्र में कानून-व्यवस्था को लेकर लोगों का भरोसा और मजबूत हुआ है।1
- Post by Talk On Chair1
- शराब कारोबार पर नकेल कसते हुए सुगौली पुलिस ने एक कारोबारों को 60 लीटर देशी चुलाई शराब के साथ गिरफ्तार कर न्यायिक हिरासत में भेजा है।1
- Post by RAJA KUMAR1