भानपुर की कार्रवाई: क्या यह सुधार है या सिर्फ रस्म अदायगी? सील और नोटिस के पीछे छिपी विभाग की "कुंभकर्णी" नींद भानपुर की कार्रवाई: क्या यह सुधार है या सिर्फ रस्म अदायगी? हाल ही में भानपुर में स्वास्थ्य विभाग द्वारा एक पैथोलॉजी को सील करने और अस्पताल का लाइसेंस निरस्त करने की खबर सामने आई है। सुनने में यह प्रशासन की मुस्तैदी लगती है, लेकिन गहराई से देखें तो यह स्वास्थ्य विभाग की उस विफलता का प्रमाण है जो सालों से "आंखें मूंदकर" अवैध केंद्रों को फलने-फूलने का मौका देती है। 1. अवैध केंद्र आखिर खुले कैसे? सवाल यह है कि बिना पंजीकरण के एक पैथोलॉजी सेंटर और बिना डॉक्टर के एक निजी अस्पताल महीनों तक कैसे चलता रहा? क्या विभाग को तब तक भनक नहीं लगती जब तक स्थिति हाथ से बाहर न निकल जाए? किसी भी केंद्र का संचालन रातों-रात शुरू नहीं होता। यह विभाग के स्थानीय जिम्मेदारों की नाक के नीचे होता है, जो अक्सर भ्रष्टाचार या अनदेखी की चादर ओढ़कर सोए रहते हैं। 2. मरीजों की जान से खिलवाड़ का जिम्मेदार कौन? भानपुर में जो हुआ, वह केवल कागजी कार्रवाई नहीं है। यह उन अनगिनत मरीजों की जान के साथ खिलवाड़ है जिन्होंने उस अस्पताल में इलाज कराया जहाँ डॉक्टर ही नहीं थे। उन गलत पैथोलॉजी रिपोर्टों का क्या, जिनके आधार पर लोगों ने दवाइयां खाई होंगी? क्या विभाग उन अधिकारियों पर कार्रवाई करेगा जिन्होंने इन सेंटरों को पनपने दिया? 3. छापामारी या खानापूर्ति? अक्सर देखा जाता है कि विभाग एक दिन "सक्रिय" होता है, दो-चार सेंटरों को सील करता है, और फिर महीनों के लिए शांत हो जाता है। ऐसी कार्रवाई केवल जनता का गुस्सा शांत करने के लिए "हेडलाइन" बनाने का जरिया बनकर रह गई है। जब तक सिस्टम में बैठे भ्रष्ट तंत्र को साफ नहीं किया जाता, तब तक एक सेंटर सील होगा और उसकी जगह दो नए अवैध सेंटर खुल जाएंगे। 4. दलालों का नेटवर्क और विभाग की चुप्पी खबरों के मुताबिक, स्वास्थ्य विभाग की टीम के पहुँचने से पहले ही कई अवैध सेंटर संचालक शटर गिराकर भाग निकले। यह साफ जाहिर करता है कि विभाग के भीतर ही "विभीषण" मौजूद हैं जो छापेमारी की सूचना लीक कर देते हैं। बिना मिलीभगत के इतना बड़ा गिरोह सक्रिय नहीं रह सकता। निष्कर्ष: स्वास्थ्य विभाग को केवल सेंटरों को सील करने तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि अपनी कार्यप्रणाली का भी 'पोस्टमार्टम' करना चाहिए। जनता को "अवैध" अस्पतालों के भरोसे छोड़ देना विभाग की सबसे बड़ी आपराधिक लापरवाही है। केवल कार्रवाई का ढोंग नहीं, बल्कि एक पारदर्शी और सख्त व्यवस्था की जरूरत है ताकि किसी गरीब को दोबारा "बिना डॉक्टर वाले अस्पताल" की चौखट पर न जाना पड़े।
भानपुर की कार्रवाई: क्या यह सुधार है या सिर्फ रस्म अदायगी? सील और नोटिस के पीछे छिपी विभाग की "कुंभकर्णी" नींद भानपुर की कार्रवाई: क्या यह सुधार है या सिर्फ रस्म अदायगी? हाल ही में भानपुर में स्वास्थ्य विभाग द्वारा एक पैथोलॉजी को सील करने और अस्पताल का लाइसेंस निरस्त करने की खबर सामने आई है। सुनने में यह प्रशासन की मुस्तैदी लगती है, लेकिन गहराई से देखें तो यह स्वास्थ्य विभाग की उस विफलता का प्रमाण है जो सालों से "आंखें मूंदकर" अवैध केंद्रों को फलने-फूलने का मौका देती है। 1. अवैध केंद्र आखिर खुले कैसे? सवाल यह है कि बिना पंजीकरण के एक पैथोलॉजी सेंटर और बिना डॉक्टर के एक निजी अस्पताल महीनों तक कैसे चलता रहा? क्या विभाग को तब तक भनक नहीं लगती जब तक स्थिति हाथ से बाहर न निकल जाए? किसी भी केंद्र का संचालन रातों-रात शुरू नहीं होता। यह विभाग के स्थानीय जिम्मेदारों की नाक के नीचे होता है, जो अक्सर भ्रष्टाचार या अनदेखी की चादर ओढ़कर सोए रहते हैं। 2. मरीजों की जान से खिलवाड़ का जिम्मेदार कौन? भानपुर में जो हुआ, वह केवल कागजी कार्रवाई नहीं है। यह उन अनगिनत मरीजों की जान के साथ खिलवाड़ है जिन्होंने उस अस्पताल में इलाज कराया जहाँ डॉक्टर ही नहीं थे। उन गलत पैथोलॉजी रिपोर्टों का क्या, जिनके आधार पर लोगों ने दवाइयां खाई होंगी? क्या विभाग उन अधिकारियों पर कार्रवाई करेगा जिन्होंने इन सेंटरों को पनपने दिया? 3. छापामारी या खानापूर्ति? अक्सर देखा जाता है कि विभाग एक दिन "सक्रिय" होता है, दो-चार सेंटरों को सील करता है, और फिर महीनों के लिए शांत हो जाता है। ऐसी कार्रवाई केवल जनता का गुस्सा शांत करने के लिए "हेडलाइन" बनाने का जरिया बनकर रह गई है। जब तक सिस्टम में बैठे भ्रष्ट तंत्र को साफ नहीं किया जाता, तब तक एक सेंटर सील होगा और उसकी जगह दो नए अवैध सेंटर खुल जाएंगे। 4. दलालों का नेटवर्क और विभाग की चुप्पी खबरों के मुताबिक, स्वास्थ्य विभाग की टीम के पहुँचने से पहले ही कई अवैध सेंटर संचालक शटर गिराकर भाग निकले। यह साफ जाहिर करता है कि विभाग के भीतर ही "विभीषण" मौजूद हैं जो छापेमारी की सूचना लीक कर देते हैं। बिना मिलीभगत के इतना बड़ा गिरोह सक्रिय नहीं रह सकता। निष्कर्ष: स्वास्थ्य विभाग को केवल सेंटरों को सील करने तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि अपनी कार्यप्रणाली का भी 'पोस्टमार्टम' करना चाहिए। जनता को "अवैध" अस्पतालों के भरोसे छोड़ देना विभाग की सबसे बड़ी आपराधिक लापरवाही है। केवल कार्रवाई का ढोंग नहीं, बल्कि एक पारदर्शी और सख्त व्यवस्था की जरूरत है ताकि किसी गरीब को दोबारा "बिना डॉक्टर वाले अस्पताल" की चौखट पर न जाना पड़े।
- ईरान इजरायल अमेरिका मेडलिस्ट में बढ़ रहे तनाव से अभी हमारे इंडिया में भी असर दिखने लगा है घरेलू गैस का यह हाल है क्योंकि सप्लाई वहीं से सब आता है अभी तो पेट्रोल का हाल बाकि है1
- बस्ती। उत्तर प्रदेश में सुशासन के दावों की पोल एक बार फिर बस्ती जनपद में खुल गई है। यहाँ बड़ेबन पुलिस चौकी से महज 30 मीटर की दूरी पर आधा दर्जन बेखौफ गुंडों ने एक पत्रकार के साथ न केवल बदसलूकी की, बल्कि उनकी जान लेने की कोशिश और असलहा छीनने का दुस्साहस भी किया। यह घटना चीख-चीख कर कह रही है कि बस्ती में अब गुंडों को न तो कानून का डर है और न ही वर्दी का खौफ। क्या है पूरा मामला? मिली जानकारी के मुताबिक, पत्रकार ने जब देखा कि कुछ दबंग एक छोटे दुकानदार के साथ गाली-गलौज और अभद्रता कर रहे हैं, तो उन्होंने अपने पेशेवर धर्म का पालन करते हुए वीडियो बनाना शुरू किया। बस यही बात उन 'सफेदपोश' गुंडों को नागवार गुजरी। पुलिस की नाक के नीचे तांडव हैरानी की बात यह है कि जहाँ परिंदा भी पर मारने से पहले पुलिस की मौजूदगी महसूस करता है, वहाँ चौकी से चंद कदमों की दूरी पर: आधा दर्जन गुंडों ने पत्रकार को घेर लिया। हाथों से मोबाइल छीनकर साक्ष्य (वीडियो) डिलीट कराया गया। पत्रकार का असलहा छीनने का प्रयास किया गया। सरेराह गाली-गलौज करते हुए जान से मारने की धमकी दी गई। बड़ा सवाल: क्या बस्ती की पुलिस इतनी लाचार हो गई है कि उसकी चौखट पर पत्रकार सुरक्षित नहीं हैं? अगर बीच सड़क पर एक सजग पत्रकार के साथ ऐसा हो सकता है, तो आम जनता की सुरक्षा का क्या? चौकी इंचार्ज और कप्तान साहब ध्यान दें यह हमला सिर्फ पत्रकार पर नहीं, बल्कि अभिव्यक्ति की आजादी पर हमला है। वीडियो डिलीट करा देना इस बात का प्रमाण है कि हमलावर पेशेवर अपराधी हैं और उन्हें साक्ष्य मिटाने की तकनीक बखूबी पता है। पत्रकार के साथ हुई यह घटना प्रशासन के लिए एक चुनौती है। क्या इन गुंडों पर बुलडोजर वाली कार्रवाई होगी या फिर पुलिस 'जांच जारी है' का रटा-रटाया जुमला बोलकर अपनी जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ लेगी? सम्पादकीय टिप्पणी: पत्रकारिता का गला घोंटने की कोशिश करने वाले ये तत्व समाज के लिए कैंसर हैं। अगर समय रहते इन पर कठोर कार्रवाई नहीं हुई, तो बस्ती की गलियों में कलम की आवाज दब जाएगी और गुंडाराज का उदय होगा।1
- अब नहीं होगी गैस की किल्लत, भक्तों के पॉपॉ ने बता दिया उपाय1
- 🙏😊1
- Pramod Kumar Goswami. 10/03/20261
- गांवों के विकास में क्षेत्र पंचायत सदस्यों की भूमिका अहम — विधायक अनिल कुमार त्रिपाठी संतकबीरनगर। जनपद संतकबीरनगर के ब्लॉक बघौली में आयोजित क्षेत्र पंचायत सदस्यों की बैठक में मुख्य अतिथि के रूप में मेहदावल विधायक Anil Kumar Tripathi ने पहुंचकर बैठक को संबोधित किया। इस दौरान उन्होंने ग्रामीण विकास योजनाओं को प्रभावी ढंग से लागू करने पर जोर देते हुए कहा कि गांवों के विकास में क्षेत्र पंचायत सदस्यों की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण है। विधायक ने कहा कि सरकार की मंशा है कि विकास की योजनाएं अंतिम व्यक्ति तक पहुंचे। इसके लिए जनप्रतिनिधियों को जिम्मेदारी के साथ कार्य करना होगा और अपने क्षेत्रों की समस्याओं को गंभीरता से उठाना होगा। उन्होंने कहा कि सड़क, पेयजल, शिक्षा, स्वास्थ्य और स्वच्छता जैसी मूलभूत सुविधाओं को बेहतर बनाने के लिए सरकार निरंतर कार्य कर रही है। बैठक के दौरान क्षेत्र पंचायत सदस्यों ने अपने-अपने क्षेत्रों से जुड़ी समस्याओं और विकास कार्यों से संबंधित प्रस्ताव भी रखे। विधायक ने संबंधित अधिकारियों को निर्देश दिया कि जनहित से जुड़े मामलों का त्वरित निस्तारण सुनिश्चित किया जाए और विकास कार्यों में किसी प्रकार की लापरवाही न हो। उन्होंने कहा कि क्षेत्र के समग्र विकास के लिए जनप्रतिनिधि और अधिकारी मिलकर कार्य करें, तभी सरकार की योजनाओं का लाभ आम जनता तक प्रभावी ढंग से पहुंच सकेगा। इस अवसर पर ब्लॉक के जनप्रतिनिधि, अधिकारी तथा बड़ी संख्या में क्षेत्र पंचायत सदस्य मौजूद रहे।1
- Post by Raj A patrakaar Sant Kabir Nagar mehdawal1
- अभी जिस हिसाब से ईरान अमेरिका इजरायल फुल स्क्रीन वार कर रहे हैं इस हिसाब से दुनिया में बहुत ही भयानक तबाही आने वाली है और सबसे पहले जितने भी हमारे मेडलिस्ट में इंडियन भाई हैं सरकार से निवेदन है कि जल्द से जल्द उनको इंडिया बुलवाया जाए जय हिंद 🇮🇳2