नेपाल की पवित्र भूमि लुंबिनी स्थित लुंबिनी बौद्ध विश्वविद्यालय में आयोजित एक अंतरराष्ट्रीय सेमिनार में पर्यावरण संरक्षण, शिक्षा और संस्कृति के समन्वय पर एक महत्वपूर्ण और प्रेरणादायक आयोजन हुआ। इस कार्यक्रम में 'वाटर वुमन' के नाम से प्रसिद्ध पर्यावरण कार्यकर्ता शिप्रा पाठक ने मुख्य वक्ता के रूप में अपने विचारों से सभी को प्रभावित किया। उत्तर प्रदेश के बदायूँ जिले के दातागंज की मूल निवासी शिप्रा पाठक ने भारत-नेपाल की साझा विरासत और प्रकृति संरक्षण पर विशेष जोर दिया। इस अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी में म्यांमार, श्रीलंका, चीन, जापान और भूटान सहित विभिन्न देशों के विद्वानों, शोधकर्ताओं और छात्रों ने भाग लिया, जिससे इसका स्वरूप वैश्विक बना। अपने संबोधन में, शिप्रा पाठक ने शिक्षा को केवल पुस्तकीय ज्ञान तक सीमित न रखते हुए इसे प्रकृति के प्रति संवेदनशीलता और नैतिक जिम्मेदारी से जोड़ने की आवश्यकता पर बल दिया। उन्होंने कहा कि शिक्षा प्रणाली में पर्यावरणीय चेतना को शामिल करने से आने वाली पीढ़ियाँ प्रकृति के संरक्षण के प्रति अधिक जागरूक होंगी। साहित्य और संस्कृति पर बोलते हुए, उन्होंने भारतीय और नेपाली साहित्य में प्रकृति को जीवन का आधार मानने और वेदों से लेकर बौद्ध ग्रंथों तक नदियों, पर्वतों और वनों को आध्यात्मिक व सांस्कृतिक प्रेरणा स्रोत बताने पर प्रकाश डाला। उन्होंने अपने अनुभवों को साझा करते हुए बताया कि उन्होंने 13 हजार किलोमीटर की पदयात्रा और 58 लाख पौधारोपण के माध्यम से पर्यावरण संरक्षण का संदेश जन-जन तक पहुँचाया है। शिप्रा पाठक भारत में गंगा और गंडक सहित सात प्रमुख नदियों के संरक्षण अभियान से भी जुड़ी हैं और लंदन की संसद के साथ-साथ जापान, हांगकांग, इंडोनेशिया, थाईलैंड और श्रीलंका जैसे देशों में भी पर्यावरण पर संवाद कर चुकी हैं। लुंबिनी की पवित्रता का उल्लेख करते हुए, उन्होंने इस भूमि की हरियाली, वायु और बौद्ध दर्शन के शांत वातावरण को मानव और प्रकृति के गहरे संबंध का प्रतीक बताया, इसे केवल एक धार्मिक केंद्र नहीं, बल्कि पर्यावरणीय चेतना का प्रतीक भी कहा। भारत और नेपाल के संबंधों पर उन्होंने कहा कि दोनों देशों की सांस्कृतिक और आध्यात्मिक विरासत एक ही स्रोत से जुड़ी है, जिसे किसी भी सीमा से अलग नहीं किया जा सकता। पर्यावरणीय संकट पर चिंता व्यक्त करते हुए, उन्होंने हिमालय के तेजी से पिघलने, गंगा, कोसी और गंडक जैसी नदियों के प्रदूषण, तथा वनों के लगातार घटते क्षेत्र को मानव सभ्यता के लिए सबसे बड़ा खतरा और गंभीर चेतावनी बताया। अपने संबोधन के अंत में, शिप्रा पाठक ने एक सकारात्मक दृष्टिकोण प्रस्तुत करते हुए भविष्य के लुंबिनी को हरियाली, स्वच्छ जल और समृद्ध वन जीवन का प्रतीक बनाने का आह्वान किया, जहाँ शिक्षा, समाज और संस्कृति मिलकर प्रकृति संरक्षण का संकल्प लें। कार्यक्रम के समापन पर, उपस्थित अंतरराष्ट्रीय प्रतिनिधियों, विद्वानों और छात्रों ने उनके विचारों की सराहना करते हुए इसे पर्यावरण, शिक्षा और संस्कृति के समन्वय का एक अत्यंत प्रेरणादायक उदाहरण बताया।
नेपाल की पवित्र भूमि लुंबिनी स्थित लुंबिनी बौद्ध विश्वविद्यालय में आयोजित एक अंतरराष्ट्रीय सेमिनार में पर्यावरण संरक्षण, शिक्षा और संस्कृति के समन्वय पर एक महत्वपूर्ण और प्रेरणादायक आयोजन हुआ। इस कार्यक्रम में 'वाटर वुमन' के नाम से प्रसिद्ध पर्यावरण कार्यकर्ता शिप्रा पाठक ने मुख्य वक्ता के रूप में अपने विचारों से सभी को प्रभावित किया। उत्तर प्रदेश के बदायूँ जिले के दातागंज की मूल निवासी शिप्रा पाठक ने भारत-नेपाल की साझा विरासत और प्रकृति संरक्षण पर विशेष जोर दिया। इस अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी में म्यांमार, श्रीलंका, चीन, जापान और भूटान सहित विभिन्न देशों के विद्वानों, शोधकर्ताओं और छात्रों ने भाग लिया, जिससे इसका स्वरूप वैश्विक बना। अपने संबोधन में, शिप्रा पाठक ने शिक्षा को केवल पुस्तकीय ज्ञान तक सीमित न रखते हुए इसे प्रकृति के प्रति संवेदनशीलता और नैतिक जिम्मेदारी से जोड़ने की आवश्यकता पर बल दिया। उन्होंने कहा कि शिक्षा प्रणाली में पर्यावरणीय चेतना को शामिल करने से आने वाली पीढ़ियाँ प्रकृति
के संरक्षण के प्रति अधिक जागरूक होंगी। साहित्य और संस्कृति पर बोलते हुए, उन्होंने भारतीय और नेपाली साहित्य में प्रकृति को जीवन का आधार मानने और वेदों से लेकर बौद्ध ग्रंथों तक नदियों, पर्वतों और वनों को आध्यात्मिक व सांस्कृतिक प्रेरणा स्रोत बताने पर प्रकाश डाला। उन्होंने अपने अनुभवों को साझा करते हुए बताया कि उन्होंने 13 हजार किलोमीटर की पदयात्रा और 58 लाख पौधारोपण के माध्यम से पर्यावरण संरक्षण का संदेश जन-जन तक पहुँचाया है। शिप्रा पाठक भारत में गंगा और गंडक सहित सात प्रमुख नदियों के संरक्षण अभियान से भी जुड़ी हैं और लंदन की संसद के साथ-साथ जापान, हांगकांग, इंडोनेशिया, थाईलैंड और श्रीलंका जैसे देशों में भी पर्यावरण पर संवाद कर चुकी हैं। लुंबिनी की पवित्रता का उल्लेख करते हुए, उन्होंने इस भूमि की हरियाली, वायु और बौद्ध दर्शन के शांत वातावरण को मानव और प्रकृति के गहरे संबंध का प्रतीक बताया, इसे केवल एक धार्मिक केंद्र नहीं, बल्कि
पर्यावरणीय चेतना का प्रतीक भी कहा। भारत और नेपाल के संबंधों पर उन्होंने कहा कि दोनों देशों की सांस्कृतिक और आध्यात्मिक विरासत एक ही स्रोत से जुड़ी है, जिसे किसी भी सीमा से अलग नहीं किया जा सकता। पर्यावरणीय संकट पर चिंता व्यक्त करते हुए, उन्होंने हिमालय के तेजी से पिघलने, गंगा, कोसी और गंडक जैसी नदियों के प्रदूषण, तथा वनों के लगातार घटते क्षेत्र को मानव सभ्यता के लिए सबसे बड़ा खतरा और गंभीर चेतावनी बताया। अपने संबोधन के अंत में, शिप्रा पाठक ने एक सकारात्मक दृष्टिकोण प्रस्तुत करते हुए भविष्य के लुंबिनी को हरियाली, स्वच्छ जल और समृद्ध वन जीवन का प्रतीक बनाने का आह्वान किया, जहाँ शिक्षा, समाज और संस्कृति मिलकर प्रकृति संरक्षण का संकल्प लें। कार्यक्रम के समापन पर, उपस्थित अंतरराष्ट्रीय प्रतिनिधियों, विद्वानों और छात्रों ने उनके विचारों की सराहना करते हुए इसे पर्यावरण, शिक्षा और संस्कृति के समन्वय का एक अत्यंत प्रेरणादायक उदाहरण बताया।
- नेपाल की पवित्र भूमि लुंबिनी स्थित लुंबिनी बौद्ध विश्वविद्यालय में आयोजित एक अंतरराष्ट्रीय सेमिनार में पर्यावरण संरक्षण, शिक्षा और संस्कृति के समन्वय पर एक महत्वपूर्ण और प्रेरणादायक आयोजन हुआ। इस कार्यक्रम में 'वाटर वुमन' के नाम से प्रसिद्ध पर्यावरण कार्यकर्ता शिप्रा पाठक ने मुख्य वक्ता के रूप में अपने विचारों से सभी को प्रभावित किया। उत्तर प्रदेश के बदायूँ जिले के दातागंज की मूल निवासी शिप्रा पाठक ने भारत-नेपाल की साझा विरासत और प्रकृति संरक्षण पर विशेष जोर दिया। इस अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी में म्यांमार, श्रीलंका, चीन, जापान और भूटान सहित विभिन्न देशों के विद्वानों, शोधकर्ताओं और छात्रों ने भाग लिया, जिससे इसका स्वरूप वैश्विक बना। अपने संबोधन में, शिप्रा पाठक ने शिक्षा को केवल पुस्तकीय ज्ञान तक सीमित न रखते हुए इसे प्रकृति के प्रति संवेदनशीलता और नैतिक जिम्मेदारी से जोड़ने की आवश्यकता पर बल दिया। उन्होंने कहा कि शिक्षा प्रणाली में पर्यावरणीय चेतना को शामिल करने से आने वाली पीढ़ियाँ प्रकृति के संरक्षण के प्रति अधिक जागरूक होंगी। साहित्य और संस्कृति पर बोलते हुए, उन्होंने भारतीय और नेपाली साहित्य में प्रकृति को जीवन का आधार मानने और वेदों से लेकर बौद्ध ग्रंथों तक नदियों, पर्वतों और वनों को आध्यात्मिक व सांस्कृतिक प्रेरणा स्रोत बताने पर प्रकाश डाला। उन्होंने अपने अनुभवों को साझा करते हुए बताया कि उन्होंने 13 हजार किलोमीटर की पदयात्रा और 58 लाख पौधारोपण के माध्यम से पर्यावरण संरक्षण का संदेश जन-जन तक पहुँचाया है। शिप्रा पाठक भारत में गंगा और गंडक सहित सात प्रमुख नदियों के संरक्षण अभियान से भी जुड़ी हैं और लंदन की संसद के साथ-साथ जापान, हांगकांग, इंडोनेशिया, थाईलैंड और श्रीलंका जैसे देशों में भी पर्यावरण पर संवाद कर चुकी हैं। लुंबिनी की पवित्रता का उल्लेख करते हुए, उन्होंने इस भूमि की हरियाली, वायु और बौद्ध दर्शन के शांत वातावरण को मानव और प्रकृति के गहरे संबंध का प्रतीक बताया, इसे केवल एक धार्मिक केंद्र नहीं, बल्कि पर्यावरणीय चेतना का प्रतीक भी कहा। भारत और नेपाल के संबंधों पर उन्होंने कहा कि दोनों देशों की सांस्कृतिक और आध्यात्मिक विरासत एक ही स्रोत से जुड़ी है, जिसे किसी भी सीमा से अलग नहीं किया जा सकता। पर्यावरणीय संकट पर चिंता व्यक्त करते हुए, उन्होंने हिमालय के तेजी से पिघलने, गंगा, कोसी और गंडक जैसी नदियों के प्रदूषण, तथा वनों के लगातार घटते क्षेत्र को मानव सभ्यता के लिए सबसे बड़ा खतरा और गंभीर चेतावनी बताया। अपने संबोधन के अंत में, शिप्रा पाठक ने एक सकारात्मक दृष्टिकोण प्रस्तुत करते हुए भविष्य के लुंबिनी को हरियाली, स्वच्छ जल और समृद्ध वन जीवन का प्रतीक बनाने का आह्वान किया, जहाँ शिक्षा, समाज और संस्कृति मिलकर प्रकृति संरक्षण का संकल्प लें। कार्यक्रम के समापन पर, उपस्थित अंतरराष्ट्रीय प्रतिनिधियों, विद्वानों और छात्रों ने उनके विचारों की सराहना करते हुए इसे पर्यावरण, शिक्षा और संस्कृति के समन्वय का एक अत्यंत प्रेरणादायक उदाहरण बताया।3
- उत्तर प्रदेश के बदायूं जिले की दातागंज तहसील के बिरिया डंडी गांव में सड़क की कोई सुविधा नहीं है। यह गांव तहसील दातागंज के अंतर्गत आता है, जहाँ ग्रामीणों को आने-जाने में परेशानी का सामना करना पड़ता है।1
- बदायूं के थाना अलापुर क्षेत्र के कस्बा ककराला के पास सोमवार को एक सड़क हादसे में पांच पुलिसकर्मी घायल हो गए। यह दुर्घटना तब हुई जब सड़क पर अचानक एक कुत्ता सामने आ गया, जिसके कारण पुलिसकर्मियों की तीन बाइकें अनियंत्रित होकर फिसल गईं। जानकारी के अनुसार, सभी पुलिसकर्मी बिनावर से उसहैत की ओर जा रहे थे। हादसे में घायल पांचों पुलिसकर्मियों को तत्काल उपचार के लिए जिला अस्पताल में भर्ती कराया गया है, जहां उनका इलाज चल रहा है। डॉक्टरों के मुताबिक, सभी घायल पुलिसकर्मी खतरे से बाहर हैं। बताया गया है कि दुर्घटना के समय सभी पुलिसकर्मी हेलमेट पहने हुए थे, जिसके चलते उनकी जान बच गई और एक बड़ा हादसा टल गया। पुलिस इस मामले की जांच कर रही है।2
- डाटागंज, बदायूँ में स्थानीय लोगों द्वारा यह बताया जा रहा है कि एक रास्ते का मरम्मत कार्य सही ढंग से नहीं हो रहा है। इस स्थिति के कारण लोगों को समस्या का सामना करना पड़ रहा है।1
- बदायूं जनपद के दातागंज क्षेत्र के नूरपुर गाँव में घूरे की ज़मीन को लेकर हुए विवाद में एक महिला से गंभीर रूप से मारपीट का मामला सामने आया है। इस घटना का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल होने के बाद पुलिस ने संज्ञान लिया और मामले की जांच शुरू कर दी है। मारपीट में महिला गंभीर रूप से घायल हो गई, जिसे उपचार के लिए अस्पताल में भर्ती कराया गया है। यह घटना शनिवार सुबह करीब 9 बजे की बताई जा रही है, जिसका वायरल वीडियो कई लोगों को एक महिला को घेरकर पीटते हुए दिखा रहा है। घटना के बाद घायल महिला के परिजन उसे तत्काल कोतवाली लेकर पहुँचे और पुलिस को जानकारी दी। मारपीट में घायल महिला को तुरंत दातागंज सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र (सीएचसी) में भर्ती कराया गया, जहाँ उसका उपचार जारी है। परिजनों ने शनिवार को ही दातागंज पुलिस को लिखित तहरीर देकर कार्रवाई की मांग की थी, जिसके बाद गाँव में तनाव का माहौल बताया जा रहा है। रविवार को जब इस घटना का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुआ, तब पुलिस सक्रिय हुई। मामले की गंभीरता को देखते हुए जांच तेज़ कर दी गई है और स्थानीय पुलिस टीम को घटनास्थल की जानकारी जुटाने के लिए भेजा गया है। दातागंज कोतवाली प्रभारी वेदपाल सिंह ने बताया कि मामले की जांच के लिए दारोगा को मौके पर भेजा गया है और पूरे प्रकरण की जानकारी जुटाई जा रही है, जिसके बाद दोषियों के खिलाफ नियमानुसार सख्त कार्रवाई की जाएगी।1
- बरेली के बारादरी थाना क्षेत्र के श्यामगंज में चाइनीज मांझे से एक युवक के घायल होने की सूचना सामने आई है। इस घटना पर एसएसपी बरेली अनुराग आर्य ने अपनी प्रतिक्रिया दी है। एसएसपी ने स्पष्ट किया कि चाइनीज मांझा पूरी तरह से प्रतिबंधित है। उन्होंने इस मामले की जांच के आदेश जारी कर दिए हैं। इसके साथ ही, उन्होंने यह भी कहा कि प्रतिबंध के बावजूद मांझा बेचने वाले दुकानदारों को चिन्हित किया जाएगा, उनके खिलाफ एफआईआर दर्ज कर कड़ी कार्रवाई की जाएगी। पुलिस टीमों को बाजारों में लगातार चेकिंग करने के निर्देश भी दिए गए हैं।1
- पेंटर दीपक बिल्सी की ओर से देबांश मराठा का हार्दिक अभिनंदन किया गया है।1
- बरेली के श्यामगंज फ्लाईओवर पर एक दुखद घटना में गन्ना मंत्री संजय गंगवार के भतीजे और ब्लॉक प्रमुख अजय सिंह गंगवार के 15 वर्षीय बेटे वीर सिंह गंगवार का गला चाइनीज मांझे की चपेट में आने से गंभीर रूप से कट गया। स्कूटी पर सवार वीर इस हादसे के बाद अनियंत्रित होकर गिर पड़े। उन्हें तत्काल एक निजी अस्पताल में भर्ती कराया गया है, जहाँ उनकी स्थिति चिंताजनक बनी हुई है। इस घटना की जानकारी मिलते ही मंत्री संजय गंगवार पीलीभीत से बरेली पहुँचे। उन्होंने इस बात पर गहरी चिंता जताई कि चाइनीज मांझा प्रतिबंधित होने के बावजूद अभी भी बाजार में बेचा जा रहा है। मंत्री ने कहा कि वह इस मामले में जिलाधिकारी (DM) और वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक (SSP) से बातचीत करेंगे और उनके खिलाफ सख्त कार्रवाई के निर्देश देंगे।1