एक हफ्ते में डीबी मॉल के सामने वाली पार्किंग में ही मेरे अलावा 3 और पत्रकार साथी के साथ अख्तर एंटरप्राइजेज पार्किंग के गुंडो ने बदसलूकी की थी, और जब परिवार के साथ रहता हैं तो कोई बहस नहीं करना चाहता इनसे। अगर हम अपने निजी काम से जा रहे हैं तो ₹10-20 देने में हमें कोई परहेज नहीं है लेकिन पार्किंग वसूली के नाम पर कोई भी बत्तमीजी नहीं सहेगा प्रेस वाले के साथ जब ये व्यवहार है तो पता नहीं नॉर्मल पब्लिक के साथ क्या ही करते होंगे यह तो केवल एक पार्किंग की घटना थी, फिर पूरे शहर में क्या ही रहा है भगवान ही मालिक है आप सब से निवेदन है इस प्रकार की अगर कोई घटना पिछले कुछ दिनों में हुई हो तो मुझे प्लीज बताइएगा 🙏 एक हफ्ते में डीबी मॉल के सामने वाली पार्किंग में ही मेरे अलावा 3 और पत्रकार साथी के साथ अख्तर एंटरप्राइजेज पार्किंग के गुंडो ने बदसलूकी की थी, और जब परिवार के साथ रहता हैं तो कोई बहस नहीं करना चाहता इनसे। अगर हम अपने निजी काम से जा रहे हैं तो ₹10-20 देने में हमें कोई परहेज नहीं है लेकिन पार्किंग वसूली के नाम पर कोई भी बत्तमीजी नहीं सहेगा प्रेस वाले के साथ जब ये व्यवहार है तो पता नहीं नॉर्मल पब्लिक के साथ क्या ही करते होंगे यह तो केवल एक पार्किंग की घटना थी, फिर पूरे शहर में क्या ही रहा है भगवान ही मालिक है आप सब से निवेदन है इस प्रकार की अगर कोई घटना पिछले कुछ दिनों में हुई हो तो मुझे प्लीज बताइएगा 🙏
एक हफ्ते में डीबी मॉल के सामने वाली पार्किंग में ही मेरे अलावा 3 और पत्रकार साथी के साथ अख्तर एंटरप्राइजेज पार्किंग के गुंडो ने बदसलूकी की थी, और जब परिवार के साथ रहता हैं तो कोई बहस नहीं करना चाहता इनसे। अगर हम अपने निजी काम से जा रहे हैं तो ₹10-20 देने में हमें कोई परहेज नहीं है लेकिन पार्किंग वसूली के नाम पर कोई भी बत्तमीजी नहीं सहेगा प्रेस वाले के साथ जब ये व्यवहार है तो पता नहीं नॉर्मल पब्लिक के साथ क्या ही करते होंगे यह तो केवल एक पार्किंग की घटना थी, फिर पूरे शहर में क्या ही रहा है भगवान ही मालिक है आप सब से निवेदन है इस प्रकार की अगर कोई घटना पिछले कुछ दिनों में हुई हो तो मुझे प्लीज बताइएगा 🙏 एक हफ्ते में डीबी मॉल के सामने वाली पार्किंग में ही मेरे अलावा 3 और पत्रकार साथी के साथ अख्तर एंटरप्राइजेज पार्किंग के गुंडो ने बदसलूकी की थी, और जब परिवार के साथ रहता हैं तो कोई बहस नहीं करना चाहता इनसे। अगर हम अपने निजी काम से जा रहे हैं तो ₹10-20 देने में हमें कोई परहेज नहीं है लेकिन पार्किंग वसूली के नाम पर कोई भी बत्तमीजी नहीं सहेगा प्रेस वाले के साथ जब ये व्यवहार है तो पता नहीं नॉर्मल पब्लिक के साथ क्या ही करते होंगे यह तो केवल एक पार्किंग की घटना थी, फिर पूरे शहर में क्या ही रहा है भगवान ही मालिक है आप सब से निवेदन है इस प्रकार की अगर कोई घटना पिछले कुछ दिनों में हुई हो तो मुझे प्लीज बताइएगा 🙏
- एक हफ्ते में डीबी मॉल के सामने वाली पार्किंग में ही मेरे अलावा 3 और पत्रकार साथी के साथ अख्तर एंटरप्राइजेज पार्किंग के गुंडो ने बदसलूकी की थी, और जब परिवार के साथ रहता हैं तो कोई बहस नहीं करना चाहता इनसे। अगर हम अपने निजी काम से जा रहे हैं तो ₹10-20 देने में हमें कोई परहेज नहीं है लेकिन पार्किंग वसूली के नाम पर कोई भी बत्तमीजी नहीं सहेगा प्रेस वाले के साथ जब ये व्यवहार है तो पता नहीं नॉर्मल पब्लिक के साथ क्या ही करते होंगे यह तो केवल एक पार्किंग की घटना थी, फिर पूरे शहर में क्या ही रहा है भगवान ही मालिक है आप सब से निवेदन है इस प्रकार की अगर कोई घटना पिछले कुछ दिनों में हुई हो तो मुझे प्लीज बताइएगा 🙏1
- भोपाल राजधानी भोपाल को मिला नया प्रशासनिक नेतृत्व… नवागत कलेक्टर प्रियंक मिश्रा ने संभाला पदभार… आते ही जनगणना को लेकर दिया बड़ा संदेश—‘स्पीड नहीं, सही डेटा है सबसे ज्यादा जरूरी।’” एंकर राजधानी भोपाल में नए कलेक्टर के रूप में प्रियंक मिश्रा ने पदभार संभाल लिया है। पद संभालते ही उन्होंने जनगणना जैसे महत्वपूर्ण विषय पर साफ और सख्त संदेश दिया है। कलेक्टर प्रियंक मिश्रा ने कहा कि जनगणना कोई रेस नहीं है, बल्कि यह देश के भविष्य की नींव तैयार करने की प्रक्रिया है। उन्होंने स्पष्ट किया कि—आगे रहना या पीछे रहना उतना महत्वपूर्ण नहीं है, जितना कि सही और सटीक जानकारी देना।” भारत में जनगणना हर 10 साल में होती है और यह देश का सबसे बड़ा डेटा कलेक्शन अभियान माना जाता है। पिछली जनगणना 2011 में हुई थी, जबकि अगली जनगणना को डिजिटल स्वरूप में करने की तैयारी चल रही है—जिससे डेटा की सटीकता और उपयोगिता और बढ़ेगी। इस बार डिजिटल डेटा तैयार हो रहा है, और आप सभी जानते हैं कि स्टैटिस्टिक्स के आधार पर ही सरकार की नीतियां तय होती हैं।” गलत जानकारी देना सिर्फ सिस्टम को नहीं, बल्कि भविष्य की योजनाओं को भी प्रभावित करता है। कलेक्टर ने यह भी कहा कि कई बार लोग खुद को ज्यादा गरीब या ज्यादा अमीर दिखाने की कोशिश करते हैं, लेकिन जनगणना का डेटा किसी व्यक्तिगत लाभ या योजना से सीधे जुड़ा नहीं होता—यह एक नेमलेस डेटा होता है, जिसका उपयोग केवल नीति निर्माण में किया जाता हैं अपने विजन को साझा करते हुए कलेक्टर ने कहा कि वर्ष 2047 तक “विकसित भारत” का लक्ष्य सिर्फ केंद्र सरकार का नहीं, बल्कि हर शहर और हर नागरिक की जिम्मेदारी है। उन्होंने नरेंद्र मोदी के विजन और मोहन यादव के मार्गदर्शन का जिक्र करते हुए कहा कि भोपाल को देश की सबसे बेहतरीन राजधानी बनाने के लिए प्रशासन पूरी ताकत से काम करेगा। तो साफ है—राजधानी भोपाल में नए कलेक्टर के साथ प्रशासनिक सक्रियता बढ़ने वाली है। अब देखना होगा कि जनगणना जैसे बड़े अभियान में जनता कितना सहयोग करती है और भोपाल विकास की इस रफ्तार में कितना आगे निकलता है। बाईट प्रियंक मिश्रा कलेक्टर भोपाल1
- Post by शाहिद खान रिपोर्टर1
- Post by मो। शादाब पत्रकार1
- *इनके पाप विधायक है इस लिए ये किसी को भी गाड़ी से उड़ा देते है ?* मध्यप्रदेश की सियासत में एक बार फिर सत्ता के नशे और कानून के डर के बीच की खाई खुलकर सामने आ गई है। शिवपुरी जिले की पिछोर विधानसभा से जुड़ा हालिया मामला सिर्फ एक दुर्घटना नहीं, बल्कि उस मानसिकता का आईना है जो सत्ता के करीब आते ही खुद को कानून से ऊपर समझने लगती है। आरोप है कि भाजपा विधायक प्रीतम लोधी के पुत्र ने अपनी गाड़ी से कई लोगों को कुचल दिया, जिससे कई लोग गंभीर रूप से घायल हो गए। घटना जितनी भयावह है, उससे कहीं ज्यादा चौंकाने वाला उसका बाद का व्यवहार है। आम तौर पर ऐसे मामलों में आरोपी भयभीत होता है, छिपने की कोशिश करता है या कानून की प्रक्रिया का सामना करता है। लेकिन यहां तस्वीर उलट दिखाई देती है आरोपी का बेखौफ होकर सामान्य जीवन में लौट जाना यह सवाल खड़ा करता है कि आखिर उसे यह भरोसा कहां से मिल रहा है? क्या यह विश्वास सिर्फ इसलिए है क्योंकि उसके पिता सत्ता में हैं? यह घटना किसी एक परिवार या एक नेता की नहीं, बल्कि उस व्यवस्था की पोल खोलती है जहां “पहचान” और “पद” न्याय से बड़ा बन जाता है। जब आम आदमी सड़क पर चलता है, तो उसे ट्रैफिक नियमों से लेकर कानून की हर धारा का डर होता है। लेकिन वहीं, अगर कोई रसूखदार परिवार से आता है, तो वही सड़क उसके लिए ताकत का प्रदर्शन करने का मंच बन जाती है। सबसे गंभीर सवाल यह है कि क्या इस मामले में कानून अपना काम पूरी निष्पक्षता से करेगा? या फिर यह भी उन फाइलों में दब जाएगा, जहां बड़े नामों के सामने जांच धीमी पड़ जाती है? जनता के मन में यह संदेह यूं ही पैदा नहीं हुआ है। इससे पहले भी कई मामलों में देखा गया है कि प्रभावशाली लोगों के खिलाफ कार्रवाई या तो देर से होती है या फिर कमजोर पड़ जाती है। इस पूरे प्रकरण में पीड़ितों की स्थिति पर भी ध्यान देना जरूरी है। जिन लोगों को कुचला गया, वे किसी के परिवार के सदस्य हैं, किसी के पिता, किसी के बेटे। उनके लिए यह घटना सिर्फ एक खबर नहीं, बल्कि जिंदगी भर का दर्द बन सकती है। सवाल यह है कि क्या उन्हें न्याय मिलेगा? क्या उनके जख्मों की भरपाई सिर्फ मुआवजे से हो सकती है? राजनीति में अक्सर “जनसेवा” की बात होती है, लेकिन जब जनता ही असुरक्षित महसूस करने लगे, तो यह शब्द खोखला लगने लगता है। सत्ता का मतलब जिम्मेदारी होना चाहिए, न कि दबंगई का लाइसेंस। यदि जनप्रतिनिधियों के परिवार ही कानून तोड़ने लगें और उन पर कार्रवाई न हो, तो यह लोकतंत्र के मूल सिद्धांतों पर सीधा आघात है। यह भी गौर करने वाली बात है कि इस तरह की घटनाएं बार-बार सामने क्यों आती हैं। क्या राजनीतिक दल अपने नेताओं और उनके परिवारों के आचरण को लेकर कोई आंतरिक अनुशासन लागू करते हैं? या फिर जीत के बाद सब कुछ “मैनेज” हो जाने की मानसिकता हावी हो जाती है? समाज में कानून का सम्मान तभी बना रह सकता है जब हर व्यक्ति, चाहे वह कितना भी प्रभावशाली क्यों न हो, उसके दायरे में आए। अगर कुछ लोगों को छूट मिलती रही, तो यह संदेश जाएगा कि कानून सिर्फ कमजोरों के लिए है। और यह स्थिति किसी भी लोकतंत्र के लिए बेहद खतरनाक होती है। आज जरूरत है एक निष्पक्ष और तेज कार्रवाई की। सिर्फ बयानबाजी से काम नहीं चलेगा। पुलिस और प्रशासन को यह साबित करना होगा कि वे किसी दबाव में नहीं हैं। अगर आरोपी दोषी है, तो उसके खिलाफ सख्त कार्रवाई होनी चाहिए चाहे वह किसी भी परिवार से क्यों न आता हो। यह मामला सिर्फ एक हादसा नहीं, बल्कि एक चेतावनी है। अगर अब भी व्यवस्था नहीं चेती, तो जनता का भरोसा पूरी तरह टूट सकता है। और जब जनता का विश्वास डगमगाता है, तो लोकतंत्र की नींव भी कमजोर पड़ जाती है। अब देखना यह है कि यह मामला भी बाकी मामलों की तरह समय के साथ ठंडा पड़ जाता है, या फिर सच में न्याय की मिसाल बनता है।1
- Post by Naved khan1
- *श्री हिंदू उत्सव समिति और संस्कृति बचाओ मंच के अध्यक्ष चंद्रशेखर तिवारी ने प्रशासन से मांग की भोपाल में भी जिस जिस जनप्रतिनिधियों को भारत माता की जय और वंदे मातरम गाने से परहेज है उन पर भी किया जाए अपराधिक प्रकरण दर्ज* 🇮🇳🇮🇳🇮🇳🇮🇳🇮🇳🇮🇳🇮🇳🇮🇳🇮🇳 *श्री हिंदू उत्सव समिति के अध्यक्ष चंद्रशेखर तिवारी ने भोपाल के जो जनप्रतिनिधि भारत माता की जय और वंदे मातरम गाने से परहेज करते हैं उन पर आपराधिक प्रकरण दर्ज करने की मांग की है चंद्रशेखर तिवारी ने कहा भारत में एक विधान एक निशान और एक प्रधान ही चलेगा जो लोग भी भारत में शरीयत के कानून के अनुसार कार्य करना चाहते हैं उन्हें भारत में रहने का अधिकार नहीं है आप यहां की खाएंगे और वहां की गाएंगे यह बर्दाश्त नहीं किया जाएगा चुनाव जीतने के लिए आप तिलक भी लगाते हैं चुनरी भी ओढते हैं किंतु जीतने के पश्चात आपको शरियत का कानून याद आ जाता है इनके खिलाफ अपराधिक प्रकरण दर्ज होना चाहिए*1
- अंबेडकर जयंती भोपाल में धूमधाम से मनाई गई इंजीनियर सोमकुवर ने देशवासियों को संविधान निर्माता डॉ भीमराव अंबेडकर जयंती की शुभकामनाएं प्रेषित की। आंबेडकर जयंती मैदान भोपाल में संविधान निर्माता डॉ भीमराव अंबेडकर जयंती धूम धाम से मनाई गई। हमारे संवाददाता ने इंजीनियर सोमकुवर से विशेष बातचीत की।4
- *इनके पाप विधायक है इस लिए ये किसी को भी गाड़ी से उड़ा देते है ?* मध्यप्रदेश की सियासत में एक बार फिर सत्ता के नशे और कानून के डर के बीच की खाई खुलकर सामने आ गई है। शिवपुरी जिले की पिछोर विधानसभा से जुड़ा हालिया मामला सिर्फ एक दुर्घटना नहीं, बल्कि उस मानसिकता का आईना है जो सत्ता के करीब आते ही खुद को कानून से ऊपर समझने लगती है। आरोप है कि भाजपा विधायक प्रीतम लोधी के पुत्र ने अपनी गाड़ी से कई लोगों को कुचल दिया, जिससे कई लोग गंभीर रूप से घायल हो गए। घटना जितनी भयावह है, उससे कहीं ज्यादा चौंकाने वाला उसका बाद का व्यवहार है। आम तौर पर ऐसे मामलों में आरोपी भयभीत होता है, छिपने की कोशिश करता है या कानून की प्रक्रिया का सामना करता है। लेकिन यहां तस्वीर उलट दिखाई देती है आरोपी का बेखौफ होकर सामान्य जीवन में लौट जाना यह सवाल खड़ा करता है कि आखिर उसे यह भरोसा कहां से मिल रहा है? क्या यह विश्वास सिर्फ इसलिए है क्योंकि उसके पिता सत्ता में हैं? यह घटना किसी एक परिवार या एक नेता की नहीं, बल्कि उस व्यवस्था की पोल खोलती है जहां “पहचान” और “पद” न्याय से बड़ा बन जाता है। जब आम आदमी सड़क पर चलता है, तो उसे ट्रैफिक नियमों से लेकर कानून की हर धारा का डर होता है। लेकिन वहीं, अगर कोई रसूखदार परिवार से आता है, तो वही सड़क उसके लिए ताकत का प्रदर्शन करने का मंच बन जाती है। सबसे गंभीर सवाल यह है कि क्या इस मामले में कानून अपना काम पूरी निष्पक्षता से करेगा? या फिर यह भी उन फाइलों में दब जाएगा, जहां बड़े नामों के सामने जांच धीमी पड़ जाती है? जनता के मन में यह संदेह यूं ही पैदा नहीं हुआ है। इससे पहले भी कई मामलों में देखा गया है कि प्रभावशाली लोगों के खिलाफ कार्रवाई या तो देर से होती है या फिर कमजोर पड़ जाती है। इस पूरे प्रकरण में पीड़ितों की स्थिति पर भी ध्यान देना जरूरी है। जिन लोगों को कुचला गया, वे किसी के परिवार के सदस्य हैं, किसी के पिता, किसी के बेटे। उनके लिए यह घटना सिर्फ एक खबर नहीं, बल्कि जिंदगी भर का दर्द बन सकती है। सवाल यह है कि क्या उन्हें न्याय मिलेगा? क्या उनके जख्मों की भरपाई सिर्फ मुआवजे से हो सकती है? राजनीति में अक्सर “जनसेवा” की बात होती है, लेकिन जब जनता ही असुरक्षित महसूस करने लगे, तो यह शब्द खोखला लगने लगता है। सत्ता का मतलब जिम्मेदारी होना चाहिए, न कि दबंगई का लाइसेंस। यदि जनप्रतिनिधियों के परिवार ही कानून तोड़ने लगें और उन पर कार्रवाई न हो, तो यह लोकतंत्र के मूल सिद्धांतों पर सीधा आघात है। यह भी गौर करने वाली बात है कि इस तरह की घटनाएं बार-बार सामने क्यों आती हैं। क्या राजनीतिक दल अपने नेताओं और उनके परिवारों के आचरण को लेकर कोई आंतरिक अनुशासन लागू करते हैं? या फिर जीत के बाद सब कुछ “मैनेज” हो जाने की मानसिकता हावी हो जाती है? समाज में कानून का सम्मान तभी बना रह सकता है जब हर व्यक्ति, चाहे वह कितना भी प्रभावशाली क्यों न हो, उसके दायरे में आए। अगर कुछ लोगों को छूट मिलती रही, तो यह संदेश जाएगा कि कानून सिर्फ कमजोरों के लिए है। और यह स्थिति किसी भी लोकतंत्र के लिए बेहद खतरनाक होती है। आज जरूरत है एक निष्पक्ष और तेज कार्रवाई की। सिर्फ बयानबाजी से काम नहीं चलेगा। पुलिस और प्रशासन को यह साबित करना होगा कि वे किसी दबाव में नहीं हैं। अगर आरोपी दोषी है, तो उसके खिलाफ सख्त कार्रवाई होनी चाहिए चाहे वह किसी भी परिवार से क्यों न आता हो। यह मामला सिर्फ एक हादसा नहीं, बल्कि एक चेतावनी है। अगर अब भी व्यवस्था नहीं चेती, तो जनता का भरोसा पूरी तरह टूट सकता है। और जब जनता का विश्वास डगमगाता है, तो लोकतंत्र की नींव भी कमजोर पड़ जाती है। अब देखना यह है कि यह मामला भी बाकी मामलों की तरह समय के साथ ठंडा पड़ जाता है, या फिर सच में न्याय की मिसाल बनता है।1