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गांव में पानी पीने की समस्या है नल आने पर भी मोटर चालू होने के बाद भी इतना कम पानी आ रहा है

23 hrs ago
user_Hemraj Banjara
Hemraj Banjara
Security Guard बेगूं, चित्तौड़गढ़, राजस्थान•
23 hrs ago

गांव में पानी पीने की समस्या है नल आने पर भी मोटर चालू होने के बाद भी इतना कम पानी आ रहा है

More news from Chittorgarh and nearby areas
  • आयुष हॉस्पिटल चितौड़गढ़ में हो रहा दर्द का सफ़ल ईलाज
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    आयुष हॉस्पिटल चितौड़गढ़ में हो रहा दर्द का सफ़ल ईलाज
    user_Dr CP Patel 8302083835 आयुष हॉस्पिटल
    Dr CP Patel 8302083835 आयुष हॉस्पिटल
    Doctor Chittaurgarh, Chittorgarh•
    22 hrs ago
  • 🌹🌹🙏🙏🏻🙌🌷🌷SRI laksmipati Bhagvan Thakur Ji Maharaj Aapki Jay Ho Jay Ho Aap hi Aap Ho hari om om nmo bhagvate vasuydevay
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    🌹🌹🙏🙏🏻🙌🌷🌷SRI laksmipati Bhagvan Thakur Ji Maharaj Aapki Jay Ho Jay Ho Aap hi Aap Ho hari om om nmo bhagvate vasuydevay
    user_Kanhaiya lal Joshi
    Kanhaiya lal Joshi
    Pujari चित्तौड़गढ़, चित्तौड़गढ़, राजस्थान•
    23 hrs ago
  • रावतभाटा नगर की मुख्य सडक पर आए दिन दुर्घटना होने की खबर आम होती जा रही है जानकारी देते हुए निः वर्तमान पार्षद मनीष गिरी नें पी डब्लू डी के अधिकारी जे ई एन एवं ए ई एन के नाम तहसीलदार व नगर पालिका प्रशासक विवेक गरासिया को ज्ञापन देकर कॉलोनीवासियो की ओर से मांग की एवं कोटा बैरियर चौराहे से लेकर नया बाजार, बालाराम चौराहा, एनटीसी गेट, चारभुजा मुख्य मार्ग से होते हुए प्लांट तक जगह जगह सी सी एवं डांबर रोड पर बड़े बड़े गड्डे होने के कारण हो रही दुर्घटनाओ से अवगत करवाया. उन्हीने बताया प्लांट रोड पर हनुमान मंदिर से एन एफ सी प्लांट के मुख्य गेट के बीच 3 जगह सी सी रोड मेँ गैप बढ़ता जा रहा है जिसके कारण दो पहिया वाहन चालक आए दिन दुर्घटनाओ के शिकार हो रहे है. ऐसा ही एक जानलेवा गड्ढा श्री राम मंदिर झालर बावड़ी विद्यालय के पास ओम्कारेश्वर नगर के मोड़ पर होने की जानकारी दी जिसमे से मोटे सरिये बाहर निकलने की बात कही जिन्हे अगर जल्दी ही ठीक नही किया गया तो बड़ा हादसा हो सकता है और कीसी की जान भी जा सकती है. मनीष गिरी नें पी डब्लू डी विभाग से जल्द से जल्द एक अभियान चलाकर मुख्य सडक पर हो रहे सभी गैप को भरने एवं स्पीड ब्रेकरो की मरम्मत करवाने की मांग की.उन्हीने बताया की मुख्य सडक पर पूर्व मेँ बनाए गए प्लास्टिक फाइबर के ब्रेकर पूरी तरह खत्म हो गए है परन्तु उनकी किले स्क्रू वाहनों को पंक्चर करने का काम कर रहे है ऐसे ब्रेकरो को हटा देना चाहिए और मापदंड के अनुसार ब्रेकर बनाने चाहिए. नगरवासियो की जान का खतरा बनती जा रही इस रोड की मरम्मत के लिए ज्ञापन मनीष गिरी, लष्मी लाल धाकड़ एवं समस्त कॉलोनीवासियो, नगरवासियो की ओर से तहसीलदार विवेक गरासिया को सौपा गया.
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    रावतभाटा नगर की मुख्य सडक पर आए दिन दुर्घटना होने की खबर आम होती जा रही है जानकारी देते हुए निः वर्तमान पार्षद मनीष गिरी नें पी डब्लू डी के अधिकारी जे ई एन एवं ए ई एन के नाम तहसीलदार व नगर पालिका प्रशासक विवेक गरासिया को ज्ञापन देकर कॉलोनीवासियो की ओर से मांग की एवं कोटा बैरियर चौराहे से लेकर नया बाजार, बालाराम चौराहा, एनटीसी गेट, चारभुजा मुख्य मार्ग से होते हुए प्लांट तक जगह जगह सी सी एवं डांबर रोड पर बड़े बड़े गड्डे होने के कारण हो रही दुर्घटनाओ से अवगत करवाया. उन्हीने बताया प्लांट रोड पर हनुमान मंदिर से एन एफ सी प्लांट के मुख्य गेट के बीच 3 जगह सी सी रोड मेँ गैप बढ़ता जा रहा है जिसके कारण दो पहिया वाहन चालक आए दिन दुर्घटनाओ के शिकार हो रहे है. ऐसा ही एक जानलेवा गड्ढा श्री राम मंदिर झालर बावड़ी विद्यालय के पास ओम्कारेश्वर नगर के मोड़ पर होने की जानकारी दी जिसमे से मोटे सरिये बाहर निकलने की बात कही जिन्हे अगर जल्दी ही ठीक नही किया गया तो बड़ा हादसा हो सकता है और कीसी की जान भी जा सकती है. मनीष गिरी नें पी डब्लू डी विभाग से जल्द से जल्द एक अभियान चलाकर मुख्य सडक पर हो रहे सभी गैप को भरने एवं स्पीड ब्रेकरो की मरम्मत करवाने की मांग की.उन्हीने बताया की मुख्य सडक पर पूर्व मेँ बनाए गए  प्लास्टिक फाइबर के ब्रेकर पूरी तरह खत्म हो गए है परन्तु उनकी किले स्क्रू वाहनों को पंक्चर करने का काम कर रहे है ऐसे ब्रेकरो को हटा देना चाहिए और मापदंड के अनुसार ब्रेकर बनाने चाहिए. नगरवासियो की जान का खतरा बनती जा रही इस रोड की मरम्मत के लिए ज्ञापन मनीष गिरी, लष्मी लाल धाकड़ एवं समस्त कॉलोनीवासियो, नगरवासियो की ओर से तहसीलदार विवेक गरासिया को सौपा गया.
    user_Pawan Mehar
    Pawan Mehar
    रिपोर्टर रावतभाटा, चित्तौड़गढ़, राजस्थान•
    24 min ago
  • vi Airtel mein hi hota hai jio mein nahin
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    vi Airtel mein hi hota hai jio mein nahin
    user_भारत कि सान
    भारत कि सान
    Farmer रावतभाटा, चित्तौड़गढ़, राजस्थान•
    28 min ago
  • इलेक्ट्रिकल बाइक हुई खराब शोरूम के आगे करी बेज्जती कोटा में
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    इलेक्ट्रिकल बाइक हुई खराब शोरूम के आगे करी बेज्जती कोटा में
    user_KUNDAL KA lal
    KUNDAL KA lal
    रावतभाटा, चित्तौड़गढ़, राजस्थान•
    2 hrs ago
  • मनासा। थाना क्षेत्र अंतर्गत हाड़ी पिपलिया गांव के पास गैस एजेंसी के समीप गुरुवार को दो मोटरसाइकिलों की आमने- सामने भिड़ंत हो गई। हादसा इतना भीषण था कि दोनों बाइक सवार युवकों की मौके पर ही मौत हो गई। प्राप्त जानकारी के अनुसार मृतकों की पहचान बबलू ढोली (गंधर्व) निवासी हाड़ी पिपलिया और प्रकाश बंजारा निवासी जोरावरपुरा के रूप में हुई है। बताया जा रहा है कि दोनों युवक अपनी- अपनी मोटरसाइकिल से जा रहे थे, तभी गैस एजेंसी के पास आमने-सामने जोरदार टक्कर हो गई। हादसे के बाद आसपास के लोगों ने तुरंत पुलिस को सूचना दी। मौके पर पहुंची मनासा पुलिस ने दोनों युवकों को अस्पताल पहुंचाया, जहां डॉक्टरों ने उन्हें मृत घोषित कर दिया। पुलिस ने शवों को पोस्टमार्टम के लिए अस्पताल भेज दिया है और मामले की जांच शुरू कर दी है।
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    मनासा। थाना क्षेत्र अंतर्गत हाड़ी पिपलिया गांव के पास गैस एजेंसी के समीप गुरुवार को दो मोटरसाइकिलों की आमने- सामने भिड़ंत हो गई। हादसा इतना भीषण था कि दोनों बाइक सवार युवकों की मौके पर ही मौत हो गई। प्राप्त जानकारी के अनुसार मृतकों की पहचान बबलू ढोली (गंधर्व) निवासी हाड़ी पिपलिया और प्रकाश बंजारा निवासी जोरावरपुरा के रूप में हुई है। बताया जा रहा है कि दोनों युवक अपनी- अपनी मोटरसाइकिल से जा रहे थे, तभी गैस एजेंसी के पास आमने-सामने जोरदार टक्कर हो गई। हादसे के बाद आसपास के लोगों ने तुरंत पुलिस को सूचना दी। मौके पर पहुंची मनासा पुलिस ने दोनों युवकों को अस्पताल पहुंचाया, जहां डॉक्टरों ने उन्हें मृत घोषित कर दिया। पुलिस ने शवों को पोस्टमार्टम के लिए अस्पताल भेज दिया है और मामले की जांच शुरू कर दी है।
    user_Rakeshsharma Rakeshsharma
    Rakeshsharma Rakeshsharma
    मनासा, नीमच, मध्य प्रदेश•
    9 hrs ago
  • चित्तौड़गढ़। राजस्थान के चंदेरिया क्षेत्र में प्रस्तावित हिंदुस्तान जिंक लिमिटेड के फर्टिलाइज़र प्लांट को लेकर विवाद लगातार गहराता जा रहा है। 10 मार्च 2026 को आजोलिया का खेड़ा स्थित सगरा माता मंदिर प्रांगण में आयोजित पर्यावरणीय जनसुनवाई के दौरान हजारों ग्रामीणों ने एकजुट होकर परियोजना का तीखा विरोध किया। प्रभावित गांवों से पहुंचे लोगों ने एक स्वर में कहा कि उन्हें ऐसा विकास स्वीकार नहीं जो उनके स्वास्थ्य, जल स्रोतों और कृषि भूमि के लिए खतरा बने। ग्रामीणों का आरोप है कि पर्यावरणीय स्वीकृति प्राप्त होने से पहले ही संयंत्र का बड़ा हिस्सा तैयार कर दिया गया है, ऐसे में जनसुनवाई की पूरी प्रक्रिया पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। कई ग्रामीणों ने इसे “जनसुनवाई नहीं, केवल औपचारिकता” बताया। उनका कहना है कि जब केंद्र स्तर पर पर्यावरण मंजूरी बार-बार अटकी हुई है, तब इस तरह की जनसुनवाई आयोजित करना केवल औपचारिकता निभाने और नियमों को दरकिनार करने की कोशिश प्रतीत होता है। भारी सुरक्षा के बीच हुई जनसुनवाई जनसुनवाई के दौरान प्रशासन ने व्यापक सुरक्षा व्यवस्था की थी। अतिरिक्त जिला पुलिस अधीक्षक, पुलिस उपाधीक्षक, निरीक्षक स्तर के अधिकारी, सैकड़ों पुलिसकर्मी, रैपिड एक्शन टास्क फोर्स के जवान तथा निजी सुरक्षा गार्ड तैनात किए गए थे। इसके बावजूद आजोलिया का खेड़ा, पुठोली, बिलिया, नगरी, धोरडिया, मूंगा का खेड़ा, सुवानिया और आसपास के आठ-दस गांवों से बड़ी संख्या में ग्रामीण जनसुनवाई स्थल पर पहुंचे और परियोजना के खिलाफ जोरदार विरोध दर्ज कराया। ग्रामीणों का आरोप है कि यह जनसुनवाई वास्तविक जनमत जानने की प्रक्रिया नहीं बल्कि पहले से तय परियोजना को औपचारिक मंजूरी दिलाने का प्रयास है। आरोप: बिना मंजूरी 70 प्रतिशत निर्माण जनसुनवाई के दौरान ग्रामीणों ने दावा किया कि प्रस्तावित फर्टिलाइज़र संयंत्र का लगभग 70 प्रतिशत निर्माण पहले ही किया जा चुका है, जबकि परियोजना को अभी तक पर्यावरणीय स्वीकृति प्राप्त नहीं हुई है। ग्रामीणों का सवाल है कि यदि निर्माण पहले ही हो चुका है तो जनसुनवाई का उद्देश्य क्या रह जाता है। उनके अनुसार यह पूरी प्रक्रिया “सुनवाई” से अधिक “औपचारिकता” बनकर रह गई है। पर्यावरण कानूनों का संभावित उल्लंघन? पर्यावरण विशेषज्ञों के अनुसार किसी भी बड़े औद्योगिक प्रोजेक्ट के लिए पहले पर्यावरण प्रभाव आकलन (EIA) रिपोर्ट तैयार होती है, इसके बाद सार्वजनिक जनसुनवाई, विशेषज्ञ समिति की समीक्षा और अंत में पर्यावरणीय मंजूरी दी जाती है। भारत में पर्यावरण संरक्षण से जुड़े प्रमुख कानूनों में Environment Protection Act 1986 और EIA Notification 2006 शामिल हैं। इन नियमों के अनुसार किसी भी बड़े औद्योगिक प्रोजेक्ट का निर्माण कार्य पर्यावरणीय मंजूरी मिलने के बाद ही शुरू किया जा सकता है। यदि इससे पहले निर्माण किया जाता है तो यह गंभीर नियम उल्लंघन माना जा सकता है। ऐसे मामलों की सुनवाई के लिए देश में National Green Tribunal (NGT) की स्थापना की गई है, जो पर्यावरणीय नियमों के उल्लंघन पर परियोजनाओं को रोकने या मुआवजा लगाने जैसे आदेश दे सकता है। 39 लोगों ने रखी अपनी बात, अधिकांश ने किया विरोध जनसुनवाई के दौरान कुल 39 लोगों ने अपनी बात रखी, जिनमें से 33 लोगों ने प्रस्तावित संयंत्र का विरोध किया, जबकि 6 लोगों ने परियोजना के समर्थन में अपनी राय व्यक्त की। विरोध करने वाले ग्रामीणों ने कहा कि क्षेत्र में पहले से संचालित औद्योगिक इकाइयों के कारण वायु और जल प्रदूषण की समस्या गंभीर हो चुकी है और नया संयंत्र लगने से स्थिति और खराब हो सकती है। प्रदूषण के आरोप: पशुओं की मौत और बढ़ती बीमारियां जनसुनवाई में ग्रामीणों ने आरोप लगाया कि चंदेरिया क्षेत्र में पहले से संचालित औद्योगिक इकाइयों के कारण वायु और जल प्रदूषण का स्तर काफी बढ़ चुका है। ग्रामीणों का कहना है कि पिछले कई वर्षों में जहरीली गैसों और रासायनिक प्रभाव के कारण हजारों गाय-भैंसों की मौत हो चुकी है। कई लोगों ने यह भी आरोप लगाया कि क्षेत्र में कैंसर, लकवा, त्वचा रोग और अन्य गंभीर बीमारियों के मामले बढ़ रहे हैं। कुछ किसानों ने दावा किया कि प्रदूषण के कारण उनकी जमीन की उर्वरता कम हो रही है और कई कुओं तथा तालाबों का पानी पीने योग्य नहीं रहा। ग्रामीणों की चुनौती: “अधिकारी हमारे गांव का पानी पीकर दिखाएं” जनसुनवाई के दौरान ग्रामीणों ने प्रशासन और कंपनी अधिकारियों को खुली चुनौती देते हुए कहा कि यदि क्षेत्र का पानी सुरक्षित है तो अधिकारी गांव के कुओं और तालाबों से लाया गया पानी पीकर दिखाएं। ग्रामीणों के अनुसार इस चुनौती को स्वीकार करने के लिए कोई भी अधिकारी आगे नहीं आया। ग्राम सभाओं ने दर्ज कराया विरोध प्रस्ताव आजोलिया का खेड़ा और पुठोली ग्राम पंचायतों द्वारा आयोजित विशेष ग्राम सभाओं में पारित विरोध प्रस्ताव को भी जनसुनवाई के रिकॉर्ड में शामिल किया गया। ग्रामीणों का कहना है कि इन प्रस्तावों से स्पष्ट है कि प्रभावित गांवों की सामूहिक राय इस परियोजना के खिलाफ है। ‘प्रायोजित समर्थन’ के आरोप जनसुनवाई के दौरान कुछ ग्रामीणों ने कंपनी प्रबंधन पर यह आरोप भी लगाया कि विरोध को कम दिखाने के लिए कुछ लोगों को पैसे देकर समर्थन में बोलने के लिए खड़ा किया गया। इस आरोप को लेकर कार्यक्रम स्थल पर कुछ समय के लिए तनावपूर्ण स्थिति भी बन गई। “हमें विकास नहीं, सुरक्षित जीवन चाहिए” कंपनी की ओर से बताया गया कि लगभग 2700 करोड़ रुपये के निवेश से बनने वाले इस संयंत्र से हजारों लोगों को प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रोजगार मिल सकता है और किसानों को उर्वरक उपलब्ध कराने में मदद मिलेगी। हालांकि ग्रामीणों ने इन दावों को खारिज करते हुए कहा कि उन्हें ऐसा विकास स्वीकार नहीं जो उनके स्वास्थ्य, पशुधन और कृषि भूमि के लिए खतरा बन जाए। ग्रामीणों का कहना था कि यदि नया संयंत्र स्थापित होता है तो क्षेत्र में प्रदूषण और बढ़ने का खतरा है। कई ग्रामीणों ने कहा कि उन्हें रोजगार या विकास के नाम पर ऐसा उद्योग स्वीकार नहीं जो उनके जीवन, जल, जंगल और जमीन के लिए खतरा बने। उनका कहना था—“हमें विकास नहीं, शुद्ध हवा और पानी चाहिए।” पहले भी विवाद में रहा प्रोजेक्ट यह परियोजना पहले भी विवादों में रह चुकी है। पूर्व में राज्य के मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा के प्रस्तावित दौरे और भूमिपूजन कार्यक्रम को भी विवाद के बाद रद्द करना पड़ा था। ग्रामीणों का आरोप है कि उस समय भी परियोजना से जुड़ी पूरी जानकारी सार्वजनिक नहीं की गई थी। “सुनवाई का अधिकार” और प्राकृतिक न्याय कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि पर्यावरणीय परियोजनाओं में जनसुनवाई केवल औपचारिक प्रक्रिया नहीं होती, बल्कि यह नागरिकों के “सुनवाई के अधिकार” से जुड़ी होती है। भारत के संविधान के अनुच्छेद 14 और 21 के आधार पर प्राकृतिक न्याय का सिद्धांत लागू होता है, जिसमें दोनों पक्षों को सुनने का सिद्धांत शामिल है। इसका उद्देश्य किसी भी न्यायिक या प्रशासनिक निर्णय में निष्पक्षता सुनिश्चित करना है। यदि किसी परियोजना में जनसुनवाई से पहले ही निर्माण हो चुका हो तो पूरी प्रक्रिया की निष्पक्षता पर प्रश्न उठना स्वाभाविक है। कंपनी का पक्ष कंपनी की ओर से जारी प्रेस नोट में दावा किया गया कि जनसुनवाई के दौरान ग्रामीणों और जनप्रतिनिधियों ने रोजगार, कौशल विकास, पर्यावरण संरक्षण और सामाजिक विकास से जुड़े सुझाव दिए तथा परियोजना को क्षेत्र के विकास के लिए महत्वपूर्ण बताया। हालांकि विरोध कर रहे ग्रामीणों ने इस दावे को पूरी तरह खारिज करते हुए कहा कि वास्तविक स्थिति को दबाने की कोशिश की जा रही है। उग्र आंदोलन की चेतावनी क्षेत्र के युवाओं और ग्रामीणों ने प्रशासन को चेतावनी दी है कि यदि इस विवादित जनसुनवाई के आधार पर परियोजना को मंजूरी दी गई तो व्यापक जनआंदोलन शुरू किया जाएगा। ग्रामीणों ने कहा कि वे अपने गांवों के अस्तित्व और आने वाली पीढ़ियों के भविष्य की रक्षा के लिए आर-पार की लड़ाई लड़ने को तैयार हैं। बड़ा सवाल: पर्यावरण पहले या औद्योगिक विस्तार? चित्तौड़गढ़ में उठे इस विवाद ने एक बड़ा प्रश्न खड़ा कर दिया है—क्या औद्योगिक विकास के नाम पर पर्यावरणीय नियमों और स्थानीय समुदायों की चिंताओं को नजरअंदाज किया जा सकता है? अब निगाहें प्रशासन, पर्यावरण मंत्रालय और न्यायिक संस्थाओं पर हैं कि वे जनसुनवाई में उठे सवालों और आरोपों की जांच कर क्या निर्णय लेते हैं।
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    चित्तौड़गढ़। राजस्थान के चंदेरिया क्षेत्र में प्रस्तावित हिंदुस्तान जिंक लिमिटेड के फर्टिलाइज़र प्लांट को लेकर विवाद लगातार गहराता जा रहा है। 10 मार्च 2026 को आजोलिया का खेड़ा स्थित सगरा माता मंदिर प्रांगण में आयोजित पर्यावरणीय जनसुनवाई के दौरान हजारों ग्रामीणों ने एकजुट होकर परियोजना का तीखा विरोध किया। प्रभावित गांवों से पहुंचे लोगों ने एक स्वर में कहा कि उन्हें ऐसा विकास स्वीकार नहीं जो उनके स्वास्थ्य, जल स्रोतों और कृषि भूमि के लिए खतरा बने।
ग्रामीणों का आरोप है कि पर्यावरणीय स्वीकृति प्राप्त होने से पहले ही संयंत्र का बड़ा हिस्सा तैयार कर दिया गया है, ऐसे में जनसुनवाई की पूरी प्रक्रिया पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। कई ग्रामीणों ने इसे “जनसुनवाई नहीं, केवल औपचारिकता” बताया। उनका कहना है कि जब केंद्र स्तर पर पर्यावरण मंजूरी बार-बार अटकी हुई है, तब इस तरह की जनसुनवाई आयोजित करना केवल औपचारिकता निभाने और नियमों को दरकिनार करने की कोशिश प्रतीत होता है।
भारी सुरक्षा के बीच हुई जनसुनवाई
जनसुनवाई के दौरान प्रशासन ने व्यापक सुरक्षा व्यवस्था की थी। अतिरिक्त जिला पुलिस अधीक्षक, पुलिस उपाधीक्षक, निरीक्षक स्तर के अधिकारी, सैकड़ों पुलिसकर्मी, रैपिड एक्शन टास्क फोर्स के जवान तथा निजी सुरक्षा गार्ड तैनात किए गए थे। इसके बावजूद आजोलिया का खेड़ा, पुठोली, बिलिया, नगरी, धोरडिया, मूंगा का खेड़ा, सुवानिया और आसपास के आठ-दस गांवों से बड़ी संख्या में ग्रामीण जनसुनवाई स्थल पर पहुंचे और परियोजना के खिलाफ जोरदार विरोध दर्ज कराया। ग्रामीणों का आरोप है कि यह जनसुनवाई वास्तविक जनमत जानने की प्रक्रिया नहीं बल्कि पहले से तय परियोजना को औपचारिक मंजूरी दिलाने का प्रयास है।
आरोप: बिना मंजूरी 70 प्रतिशत निर्माण
जनसुनवाई के दौरान ग्रामीणों ने दावा किया कि प्रस्तावित फर्टिलाइज़र संयंत्र का लगभग 70 प्रतिशत निर्माण पहले ही किया जा चुका है, जबकि परियोजना को अभी तक पर्यावरणीय स्वीकृति प्राप्त नहीं हुई है। ग्रामीणों का सवाल है कि यदि निर्माण पहले ही हो चुका है तो जनसुनवाई का उद्देश्य क्या रह जाता है। उनके अनुसार यह पूरी प्रक्रिया “सुनवाई” से अधिक “औपचारिकता” बनकर रह गई है।
पर्यावरण कानूनों का संभावित उल्लंघन?
पर्यावरण विशेषज्ञों के अनुसार किसी भी बड़े औद्योगिक प्रोजेक्ट के लिए पहले पर्यावरण प्रभाव आकलन (EIA) रिपोर्ट तैयार होती है, इसके बाद सार्वजनिक जनसुनवाई, विशेषज्ञ समिति की समीक्षा और अंत में पर्यावरणीय मंजूरी दी जाती है।
भारत में पर्यावरण संरक्षण से जुड़े प्रमुख कानूनों में Environment Protection Act 1986 और EIA Notification 2006 शामिल हैं। इन नियमों के अनुसार किसी भी बड़े औद्योगिक प्रोजेक्ट का निर्माण कार्य पर्यावरणीय मंजूरी मिलने के बाद ही शुरू किया जा सकता है। यदि इससे पहले निर्माण किया जाता है तो यह गंभीर नियम उल्लंघन माना जा सकता है।
ऐसे मामलों की सुनवाई के लिए देश में National Green Tribunal (NGT) की स्थापना की गई है, जो पर्यावरणीय नियमों के उल्लंघन पर परियोजनाओं को रोकने या मुआवजा लगाने जैसे आदेश दे सकता है।
39 लोगों ने रखी अपनी बात, अधिकांश ने किया विरोध
जनसुनवाई के दौरान कुल 39 लोगों ने अपनी बात रखी, जिनमें से 33 लोगों ने प्रस्तावित संयंत्र का विरोध किया, जबकि 6 लोगों ने परियोजना के समर्थन में अपनी राय व्यक्त की। विरोध करने वाले ग्रामीणों ने कहा कि क्षेत्र में पहले से संचालित औद्योगिक इकाइयों के कारण वायु और जल प्रदूषण की समस्या गंभीर हो चुकी है और नया संयंत्र लगने से स्थिति और खराब हो सकती है।
प्रदूषण के आरोप: पशुओं की मौत और बढ़ती बीमारियां
जनसुनवाई में ग्रामीणों ने आरोप लगाया कि चंदेरिया क्षेत्र में पहले से संचालित औद्योगिक इकाइयों के कारण वायु और जल प्रदूषण का स्तर काफी बढ़ चुका है। ग्रामीणों का कहना है कि पिछले कई वर्षों में जहरीली गैसों और रासायनिक प्रभाव के कारण हजारों गाय-भैंसों की मौत हो चुकी है।
कई लोगों ने यह भी आरोप लगाया कि क्षेत्र में कैंसर, लकवा, त्वचा रोग और अन्य गंभीर बीमारियों के मामले बढ़ रहे हैं। कुछ किसानों ने दावा किया कि प्रदूषण के कारण उनकी जमीन की उर्वरता कम हो रही है और कई कुओं तथा तालाबों का पानी पीने योग्य नहीं रहा।
ग्रामीणों की चुनौती: “अधिकारी हमारे गांव का पानी पीकर दिखाएं”
जनसुनवाई के दौरान ग्रामीणों ने प्रशासन और कंपनी अधिकारियों को खुली चुनौती देते हुए कहा कि यदि क्षेत्र का पानी सुरक्षित है तो अधिकारी गांव के कुओं और तालाबों से लाया गया पानी पीकर दिखाएं। ग्रामीणों के अनुसार इस चुनौती को स्वीकार करने के लिए कोई भी अधिकारी आगे नहीं आया।
ग्राम सभाओं ने दर्ज कराया विरोध प्रस्ताव
आजोलिया का खेड़ा और पुठोली ग्राम पंचायतों द्वारा आयोजित विशेष ग्राम सभाओं में पारित विरोध प्रस्ताव को भी जनसुनवाई के रिकॉर्ड में शामिल किया गया। ग्रामीणों का कहना है कि इन प्रस्तावों से स्पष्ट है कि प्रभावित गांवों की सामूहिक राय इस परियोजना के खिलाफ है।
‘प्रायोजित समर्थन’ के आरोप
जनसुनवाई के दौरान कुछ ग्रामीणों ने कंपनी प्रबंधन पर यह आरोप भी लगाया कि विरोध को कम दिखाने के लिए कुछ लोगों को पैसे देकर समर्थन में बोलने के लिए खड़ा किया गया। इस आरोप को लेकर कार्यक्रम स्थल पर कुछ समय के लिए तनावपूर्ण स्थिति भी बन गई।
“हमें विकास नहीं, सुरक्षित जीवन चाहिए”
कंपनी की ओर से बताया गया कि लगभग 2700 करोड़ रुपये के निवेश से बनने वाले इस संयंत्र से हजारों लोगों को प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रोजगार मिल सकता है और किसानों को उर्वरक उपलब्ध कराने में मदद मिलेगी।
हालांकि ग्रामीणों ने इन दावों को खारिज करते हुए कहा कि उन्हें ऐसा विकास स्वीकार नहीं जो उनके स्वास्थ्य, पशुधन और कृषि भूमि के लिए खतरा बन जाए। ग्रामीणों का कहना था कि यदि नया संयंत्र स्थापित होता है तो क्षेत्र में प्रदूषण और बढ़ने का खतरा है। कई ग्रामीणों ने कहा कि उन्हें रोजगार या विकास के नाम पर ऐसा उद्योग स्वीकार नहीं जो उनके जीवन, जल, जंगल और जमीन के लिए खतरा बने। उनका कहना था—“हमें विकास नहीं, शुद्ध हवा और पानी चाहिए।”
पहले भी विवाद में रहा प्रोजेक्ट
यह परियोजना पहले भी विवादों में रह चुकी है। पूर्व में राज्य के मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा के प्रस्तावित दौरे और भूमिपूजन कार्यक्रम को भी विवाद के बाद रद्द करना पड़ा था। ग्रामीणों का आरोप है कि उस समय भी परियोजना से जुड़ी पूरी जानकारी सार्वजनिक नहीं की गई थी।
“सुनवाई का अधिकार” और प्राकृतिक न्याय
कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि पर्यावरणीय परियोजनाओं में जनसुनवाई केवल औपचारिक प्रक्रिया नहीं होती, बल्कि यह नागरिकों के “सुनवाई के अधिकार” से जुड़ी होती है। भारत के संविधान के अनुच्छेद 14 और 21 के आधार पर प्राकृतिक न्याय का सिद्धांत लागू होता है, जिसमें दोनों पक्षों को सुनने का सिद्धांत शामिल है। इसका उद्देश्य किसी भी न्यायिक या प्रशासनिक निर्णय में निष्पक्षता सुनिश्चित करना है।
यदि किसी परियोजना में जनसुनवाई से पहले ही निर्माण हो चुका हो तो पूरी प्रक्रिया की निष्पक्षता पर प्रश्न उठना स्वाभाविक है।
कंपनी का पक्ष
कंपनी की ओर से जारी प्रेस नोट में दावा किया गया कि जनसुनवाई के दौरान ग्रामीणों और जनप्रतिनिधियों ने रोजगार, कौशल विकास, पर्यावरण संरक्षण और सामाजिक विकास से जुड़े सुझाव दिए तथा परियोजना को क्षेत्र के विकास के लिए महत्वपूर्ण बताया। हालांकि विरोध कर रहे ग्रामीणों ने इस दावे को पूरी तरह खारिज करते हुए कहा कि वास्तविक स्थिति को दबाने की कोशिश की जा रही है।
उग्र आंदोलन की चेतावनी
क्षेत्र के युवाओं और ग्रामीणों ने प्रशासन को चेतावनी दी है कि यदि इस विवादित जनसुनवाई के आधार पर परियोजना को मंजूरी दी गई तो व्यापक जनआंदोलन शुरू किया जाएगा। ग्रामीणों ने कहा कि वे अपने गांवों के अस्तित्व और आने वाली पीढ़ियों के भविष्य की रक्षा के लिए आर-पार की लड़ाई लड़ने को तैयार हैं।
बड़ा सवाल: पर्यावरण पहले या औद्योगिक विस्तार?
चित्तौड़गढ़ में उठे इस विवाद ने एक बड़ा प्रश्न खड़ा कर दिया है—क्या औद्योगिक विकास के नाम पर पर्यावरणीय नियमों और स्थानीय समुदायों की चिंताओं को नजरअंदाज किया जा सकता है?
अब निगाहें प्रशासन, पर्यावरण मंत्रालय और न्यायिक संस्थाओं पर हैं कि वे जनसुनवाई में उठे सवालों और आरोपों की जांच कर क्या निर्णय लेते हैं।
    user_Alert Nation News
    Alert Nation News
    चित्तौड़गढ़, चित्तौड़गढ़, राजस्थान•
    12 hrs ago
  • Post by Dev karan Mali
    1
    Post by Dev karan Mali
    user_Dev karan Mali
    Dev karan Mali
    Court reporter भीलवाड़ा, भीलवाड़ा, राजस्थान•
    12 hrs ago
  • Post by Narendra kumar Regar
    1
    Post by Narendra kumar Regar
    user_Narendra kumar Regar
    Narendra kumar Regar
    Physiotherapist भीलवाड़ा, भीलवाड़ा, राजस्थान•
    21 hrs ago
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