रक्षाबंधन का आध्यात्मिक एवं वैज्ञानिक महत्व: प्रेम, सुरक्षा और संस्कार का पवित्र पर्व रक्षाबंधन केवल रेशम के धागे का त्यौहार नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति का वह पवित्र पृष्ठ है जहाँ प्रेम, सुरक्षा, कर्तव्य और मानवीय मूल्य एक साथ जुड़ते हैं। ‘रक्षा’ का अर्थ है अभयदान (सुरक्षा) और ‘बंधन’ का अर्थ है आत्मिक संबंध। श्रावण मास की पूर्णिमा को मनाया जाने वाला यह पर्व भाई-बहन के निश्चल स्नेह, अटूट विश्वास और पारिवारिक प्रतिबद्धता का शाश्वत प्रतीक है। यह पर्व केवल एक व्यक्तिगत रिश्ते तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका व्यापक दायरा हमें समाज, प्रकृति, संस्कृति और मानवता की रक्षा का संदेश देता है। *पौराणिक एवं ऐतिहासिक पृष्ठभूमि* भारतीय धार्मिक परंपरा में रक्षासूत्र का इतिहास अत्यंत प्राचीन है। अथर्ववेद से लेकर भविष्य पुराण तक में रक्षासूत्र बाँधने के विधान और इसके आध्यात्मिक महत्व का उल्लेख मिलता है। *इंद्राणी और इंद्र*: पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, देवासुर संग्राम के समय इंद्राणी (शची) ने देवराज इंद्र की विजय और सुरक्षा के लिए उनकी कलाई पर रक्षासूत्र बाँधा था। *श्रीकृष्ण और द्रौपदी*: महाभारत काल में जब श्रीकृष्ण की उंगली कट गई थी, तब द्रौपदी ने अपनी साड़ी का आँचल फाड़कर उनकी उंगली पर बाँध दिया था। इसके बदले श्रीकृष्ण ने चीरहरण के समय द्रौपदी के सम्मान की रक्षा की थी। *माता लक्ष्मी और राजा बलि*: माता लक्ष्मी ने राजा बलि को रक्षासूत्र बाँधकर भाई बनाया और पाताल लोक से भगवान विष्णु को मुक्त कराया था। यह कथाएँ सिद्ध करती हैं कि रक्षासूत्र केवल एक धागा नहीं, बल्कि विश्वास, धर्म और दायित्व की रक्षा का संकल्प है। *आध्यात्मिक महत्व: सद्गुणों और धर्म की रक्षा* रक्षाबंधन का आध्यात्मिक अर्थ केवल शारीरिक सुरक्षा तक सीमित नहीं है। यह मनुष्य को अपने भीतर के दुर्गुणों का त्याग कर सद्गुणों को अपनाने की प्रेरणा देता है। *"येन बद्धो बली राजा दानवेन्द्रो महाबलः।* *तेन त्वामपि बध्नामि रक्षे मा चल मा चल॥"* यह पौराणिक मंत्र स्मरण दिलाता है कि जिस रक्षासूत्र से महादानी राजा बलि को बाँधा गया था, उसी से हम भी इस रिश्ते को बाँधते हैं। भारतीय दर्शन का मूल सिद्धांत है *“धर्मो रक्षति रक्षितः*” (जो धर्म की रक्षा करता है, धर्म उसकी रक्षा करता है)। रक्षाबंधन नारी शक्ति के सम्मान का भी पर्व है। कलाई पर राखी बाँधने वाली बहन केवल सुरक्षा माँगने वाली नहीं, बल्कि अपने भाई के दीर्घायु और कल्याण की कामना करने वाली आध्यात्मिक शक्ति का रूप होती है। *पारंपरिक सामग्री एवं इको-फ्रेंडली राखी की पहल* *पारंपरिक एवं पवित्र सामग्री*: पारंपरिक रूप से राखी में कलावा (मौली), अक्षत (चावल), चंदन और तुलसी का प्रयोग होता है। चावल पूर्णता का, चंदन शीतलता का और तुलसी पवित्रता का प्रतीक है। इको-फ्रेंडली राखी (Seed Rakhi): आधुनिक समय में पर्यावरण संरक्षण को ध्यान में रखते हुए सूती, जूट और बीजों से बनी (सीड राखी) राखियों का चलन बढ़ा है। रक्षाबंधन के बाद इन राखियों को मिट्टी में बोकर नया पौधा उगाया जा सकता है, जो भाई-बहन के रिश्ते की तरह पनपता है। *रचनात्मक राखियां*: पुनर्चक्रण (Recycling) को बढ़ावा देने के लिए पुराने मोतियों, रेशम के धागों और फेल्ट फैब्रिक का उपयोग करके भी सुंदर राखियाँ बनाई जा रही हैं। *वैज्ञानिक एवं मनोवैज्ञानिक पक्ष* रक्षाबंधन के वैज्ञानिक और मनोवैज्ञानिक दोनों पहलू हमारे जीवन पर गहरा असर डालते हैं: *आयुर्वेदिक एवं शारीरिक पक्ष*: कलाई के मुख्य बिंदुओं (Accupressure points) पर रक्षासूत्र बाँधने से शरीर में ऊर्जा का प्रवाह संतुलित रहता है। यद्यपि आधुनिक विज्ञान राखी से रोगों के उपचार के दावे को पूर्णतः प्रमाणित नहीं करता, लेकिन कलावा बाँधने से सकारात्मक ऊर्जा का संचार अवश्य माना गया है। *मनोवैज्ञानिक एवं सामाजिक पक्ष*: आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में यह पर्व परिवार को एक साथ लाता है। एक-दूसरे को समय देना, उपहारों का आदान-प्रदान और भावनात्मक जुड़ाव मानसिक तनाव को कम करता है। यह पर्व व्यक्ति को भावनात्मक सुरक्षा (Emotional Security) प्रदान करता है। *सामाजिक समरसता और आधुनिक प्रासंगिकता* समय के साथ रक्षाबंधन का स्वरूप और व्यापक हुआ है: बहनें सीमाओं पर तैनात देश के सैनिकों, पुलिसकर्मियों और सामाजिक कार्यकर्ताओं को राखी बाँधकर उनके योगदान के प्रति आभार व्यक्त करती हैं। कई संस्थाएँ अनाथ बच्चों और वृद्धों के साथ राखी मनाकर समाज में बंधुत्व और समरसता का प्रसार करती हैं। आज के भौतिकवादी युग में जहाँ महँगे उपहारों को प्राथमिकता दी जाने लगी है, रक्षाबंधन हमें याद दिलाता है कि मूल्य उपहार का नहीं, भाव का होता है। रक्षाबंधन केवल एक दिन का उत्सव नहीं, बल्कि जीवन भर निभाए जाने वाले संस्कारों का संकल्प है। यह पर्व हमें सिखाता है कि हमें न केवल अपनों की, बल्कि सत्य, धर्म, प्रकृति, नारी-सम्मान और मानवता की भी रक्षा करनी चाहिए। आइए, इस रक्षाबंधन पर हम अपनी जड़ों से जुड़ें, पर्यावरण का सम्मान करें और समाज में प्रेम एवं सौहार्द फैलाने का संकल्प लें। आप सभी को रक्षाबंधन की हार्दिक शुभकामनाएं!
रक्षाबंधन का आध्यात्मिक एवं वैज्ञानिक महत्व: प्रेम, सुरक्षा और संस्कार का पवित्र पर्व रक्षाबंधन केवल रेशम के धागे का त्यौहार नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति का वह पवित्र पृष्ठ है जहाँ प्रेम, सुरक्षा, कर्तव्य और मानवीय मूल्य एक साथ जुड़ते हैं। ‘रक्षा’ का अर्थ है अभयदान (सुरक्षा) और ‘बंधन’ का अर्थ है आत्मिक संबंध। श्रावण मास की पूर्णिमा को मनाया जाने वाला यह पर्व भाई-बहन के निश्चल स्नेह, अटूट विश्वास और पारिवारिक प्रतिबद्धता का शाश्वत प्रतीक है। यह पर्व केवल एक व्यक्तिगत रिश्ते तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका व्यापक दायरा हमें समाज, प्रकृति, संस्कृति और मानवता की रक्षा का संदेश देता है। *पौराणिक एवं ऐतिहासिक पृष्ठभूमि* भारतीय धार्मिक परंपरा में रक्षासूत्र का इतिहास अत्यंत प्राचीन है। अथर्ववेद से लेकर भविष्य पुराण तक में रक्षासूत्र बाँधने के विधान और इसके आध्यात्मिक महत्व का उल्लेख मिलता है। *इंद्राणी और इंद्र*: पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, देवासुर संग्राम के समय इंद्राणी (शची) ने देवराज इंद्र की विजय और सुरक्षा के लिए उनकी कलाई पर रक्षासूत्र बाँधा था। *श्रीकृष्ण और द्रौपदी*: महाभारत काल में जब श्रीकृष्ण की उंगली कट गई थी, तब द्रौपदी ने अपनी साड़ी का आँचल फाड़कर उनकी उंगली पर बाँध दिया था। इसके बदले श्रीकृष्ण ने चीरहरण के समय द्रौपदी के सम्मान की रक्षा की थी। *माता लक्ष्मी और राजा बलि*: माता लक्ष्मी ने राजा बलि को रक्षासूत्र बाँधकर भाई बनाया और पाताल लोक से भगवान विष्णु को मुक्त कराया था। यह कथाएँ सिद्ध करती हैं कि रक्षासूत्र केवल एक धागा नहीं, बल्कि विश्वास, धर्म और दायित्व की रक्षा का संकल्प है। *आध्यात्मिक महत्व: सद्गुणों और धर्म की रक्षा* रक्षाबंधन का आध्यात्मिक अर्थ केवल शारीरिक सुरक्षा तक सीमित नहीं है। यह मनुष्य को अपने भीतर के दुर्गुणों का त्याग कर सद्गुणों को अपनाने की प्रेरणा देता है। *"येन बद्धो बली राजा दानवेन्द्रो महाबलः।* *तेन त्वामपि बध्नामि रक्षे मा चल मा चल॥"* यह पौराणिक मंत्र स्मरण दिलाता है कि जिस रक्षासूत्र से महादानी राजा बलि को बाँधा गया था, उसी से हम भी इस रिश्ते को बाँधते हैं। भारतीय दर्शन का मूल सिद्धांत है *“धर्मो रक्षति रक्षितः*” (जो धर्म की रक्षा करता है, धर्म उसकी रक्षा करता है)। रक्षाबंधन नारी शक्ति के सम्मान का भी पर्व है। कलाई पर राखी बाँधने वाली बहन केवल सुरक्षा माँगने वाली नहीं, बल्कि अपने भाई के दीर्घायु और कल्याण की कामना करने वाली आध्यात्मिक शक्ति का रूप होती है। *पारंपरिक सामग्री एवं इको-फ्रेंडली राखी की पहल* *पारंपरिक एवं पवित्र सामग्री*: पारंपरिक रूप से राखी में कलावा (मौली), अक्षत (चावल), चंदन और तुलसी का प्रयोग होता है। चावल पूर्णता का, चंदन शीतलता का और तुलसी पवित्रता का प्रतीक है। इको-फ्रेंडली राखी (Seed Rakhi): आधुनिक समय में पर्यावरण संरक्षण को ध्यान में रखते हुए सूती, जूट और बीजों से बनी (सीड राखी) राखियों का चलन बढ़ा है। रक्षाबंधन के बाद इन राखियों को मिट्टी में बोकर नया पौधा उगाया जा सकता है, जो भाई-बहन के रिश्ते की तरह पनपता है। *रचनात्मक राखियां*: पुनर्चक्रण (Recycling) को बढ़ावा देने के लिए पुराने मोतियों, रेशम के धागों और फेल्ट फैब्रिक का उपयोग करके भी सुंदर राखियाँ बनाई जा रही हैं। *वैज्ञानिक एवं मनोवैज्ञानिक पक्ष* रक्षाबंधन के वैज्ञानिक और मनोवैज्ञानिक दोनों पहलू हमारे जीवन पर गहरा असर डालते हैं: *आयुर्वेदिक एवं शारीरिक पक्ष*: कलाई के मुख्य बिंदुओं (Accupressure points) पर रक्षासूत्र बाँधने से शरीर में ऊर्जा का प्रवाह संतुलित रहता है। यद्यपि आधुनिक विज्ञान राखी से रोगों के उपचार के दावे को पूर्णतः प्रमाणित नहीं करता, लेकिन कलावा बाँधने से सकारात्मक ऊर्जा का संचार अवश्य माना गया है। *मनोवैज्ञानिक एवं सामाजिक पक्ष*: आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में यह पर्व परिवार को एक साथ लाता है। एक-दूसरे को समय देना, उपहारों का आदान-प्रदान और भावनात्मक जुड़ाव मानसिक तनाव को कम करता है। यह पर्व व्यक्ति को भावनात्मक सुरक्षा (Emotional Security) प्रदान करता है। *सामाजिक समरसता और आधुनिक प्रासंगिकता* समय के साथ रक्षाबंधन का स्वरूप और व्यापक हुआ है: बहनें सीमाओं पर तैनात देश के सैनिकों, पुलिसकर्मियों और सामाजिक कार्यकर्ताओं को राखी बाँधकर उनके योगदान के प्रति आभार व्यक्त करती हैं। कई संस्थाएँ अनाथ बच्चों और वृद्धों के साथ राखी मनाकर समाज में बंधुत्व और समरसता का प्रसार करती हैं। आज के भौतिकवादी युग में जहाँ महँगे उपहारों को प्राथमिकता दी जाने लगी है, रक्षाबंधन हमें याद दिलाता है कि मूल्य उपहार का नहीं, भाव का होता है। रक्षाबंधन केवल एक दिन का उत्सव नहीं, बल्कि जीवन भर निभाए जाने वाले संस्कारों का संकल्प है। यह पर्व हमें सिखाता है कि हमें न केवल अपनों की, बल्कि सत्य, धर्म, प्रकृति, नारी-सम्मान और मानवता की भी रक्षा करनी चाहिए। आइए, इस रक्षाबंधन पर हम अपनी जड़ों से जुड़ें, पर्यावरण का सम्मान करें और समाज में प्रेम एवं सौहार्द फैलाने का संकल्प लें। आप सभी को रक्षाबंधन की हार्दिक शुभकामनाएं!
- रक्षाबंधन पर लड़की ने अपने मंगेतर को बुलाया और धोखे बांध दी राखी1
- शुरू एप का दिखा असर सड़क पर गड्ढा बना था गिट्टी डालकर मरम्मत कार्य प्रारंभ। जनपद जौनपुर तहसील केराकत के विकास खंड मुफ्तीगंज के बेलांव देवकली मार्ग पर, शुरू एप का दिखा असर सड़क पर गड्ढा बना था गिट्टी डालकर मरम्मत कार्य प्रारंभ। आप लोगो को बतादे कि देवकली बेलांव मार्ग पर सड़क गड्ढे में, तब्दील था। जो बीते महिने खबर प्रकाशित किया गया था। शुरू एप के माध्यम से जो खबर का दिखा असर। वही बीते साम को सड़क जो गड्ढे में, तब्दील था। गड्ढे को गिट्टी द्वारा पाटा जा रहा है, तथा सड़क की मरम्मत कार्य सुचारू रूप से प्रारंभ हो चुका है। वही स्थानीय लोगों ने शुरू एप को जनपद जौनपुर महोदया जिलाधिकारी को धन्यवाद ज्ञापित किये।2
- BigNews:भेड़िया बाजार का गड्ढा दे रहा मौ#त को दावत|बरदह-बूढ़नपुर मार्ग बदहाल आजमगढ़ मे सड़क का हाल BigNews:भेड़िया बाजार का गड्ढा दे रहा मौ#त को दावत|बरदह-बूढ़नपुर मार्ग बदहाल आजमगढ़ मे सड़क का हाल1
- जौनपुर में लगातार मूसलाधार बारिश होने से सई नदी जल में बढ़ोतरी जारी है जौनपुर में लगातार बारिश होने से सई उफ़ान पर1
- रक्षाबंधन से पहले बहन के इकलौते भाई की विषैले जंतु के काटने से हुई मौत घर में मचा कोहराम रक्षाबंधन से पहले बहन के इकलौते भाई की विषैले जंतु के काटने से हुई मौत घर में मचा कोहराम अहरौला। क्षेत्र के बहेरा गांव में सोमवार की रात जहरीले जंतु के काटने से इलाज के लिए ले जाते समय किशोर की रास्ते में मौत हो गई जिसे परिजनों में कोहराम मचा हुआ है सूचना पर पुलिस ने शव को पंचनामा के बाद पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया। बताते चलें बहेरा गांव निवासी अंकुश चौहान (12) पुत्र धर्मेंद्र चौहान सोमवार रात में खा पीकर अपनी मां और बहन के साथ एक कमरे में सो गया अचानक रात के 11:00 बजे जब उसकी नींद खुली तो उसके पैरों झंझनाहट के साथ फटने लगा और पेट में दर्द उठ रहा था अंकुश ने बगल में सोई अपनी मां को यह बात बताई तो मां ने गैस की समस्या समझ कर गैस की दवा लाकर दे दी रात में 2:00 बजे के बाद उसकी तबीयत बिगड़ने लगी और मुंह से झाग भी निकलने लगा और पेट पूरी तरह से अकड गया परिजनों में कोहराम मच गया इलाज को अतरौलिया सौ सैय्या अस्पताल ले जाते समय रास्ते में मौत हो गई। घर के अगल-बगल झाड़ झंकार और उसी घर में उपला रखा गया था जिसमें परिजनों ने जहरीले जंतु के काटने से मौत की बात कही है और मृतक अंकुश चौहान कक्षा 8 का छात्र था और अपने बहन का अकेला भाई था रक्षाबंधन से पहले भाई के मौत से छोटी बहन का रोरोकर बुरा हाल है मां भी दहाड़े मारकर रोने से बुरा हाल है परिजन किसी तरह मां को समझने में लगे हुए थे।थानाध्यक्ष अहरौला मंतोष कुमार सिंह ने बताया कि शव का पंचनामा कर कर पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया गया है मां ने सांप से काटने की बात तहरीर में लिखकर दी है।2
- मेढ़ा बाजार में शांति से निकला ईद मिलादुन्नबी का जुलूस। बदलापुर तहसील क्षेत्र के मेढ़ा बाजार में बारावफात जश्न-ए-ईद मिलादुन्नबी का पर्व बुधवार को पारंपरिक उल्लास और आपसी सौहार्द के साथ मनाया गया। इस अवसर पर हर वर्ष की भांति इस वर्ष भी निर्धारित मार्ग से जुलूस शांतिपूर्ण ढंग से निकाला गया। जुलूस में बड़ी संख्या में लोगों ने भाग लेकर पैगंबर हजरत मोहम्मद साहब की पैदाइश की खुशी मनाई। जुलूस के दौरान क्षेत्र में आपसी भाईचारे और सौहार्द का माहौल बना रहा। लोगों ने अनुशासन के साथ निर्धारित मार्ग का पालन किया। आयोजन में क्षेत्र के जनप्रतिनिधियों, धर्मगुरुओं, शिक्षकों तथा गणमान्य नागरिकों ने भी सहभागिता की और लोगों को शांति एवं सद्भाव बनाए रखने का संदेश दिया। इस मौके पर मोहम्मद रेहान, हकीम, रफीक, महमूद, अली रजा, फकरे आलम, सकील और आफताब समेत बड़ी संख्या में स्थानीय लोग मौजूद रहे। जुलूस के दौरान किसी प्रकार की अप्रिय घटना सामने नहीं आई। आयोजकों ने पर्व को शांतिपूर्ण एवं सौहार्दपूर्ण वातावरण में संपन्न कराने में सहयोग देने वाले सभी लोगों का आभार जताया। स्थानीय लोगों ने कहा कि ऐसे धार्मिक आयोजन समाज में प्रेम, भाईचारा और एकता का संदेश देते हैं। पर्व को लेकर पूरे क्षेत्र में उत्साह का माहौल देखने को मिला।3
- महिला(अधिवक्ता की मां)से सोने की सिकरी लूटने वाले दोनों आरोपियों को पुलिस ने मुठभेड़ के बाद गिरफ्तार कर लिया था *चेन स्नेचिंग के दोनों आरोपी के खिलाफ पीड़िता ने की जमानत न कराने की अपील* वाराणसी के लालपुर-पांडेयपुर थाना क्षेत्र के रमरेपुर में वृद्ध महिला(अधिवक्ता की मां)से सोने की सिकरी लूटने वाले दोनों आरोपियों को पुलिस ने मुठभेड़ के बाद गिरफ्तार कर लिया था।एक आरोपी प्रद्युम्न मल उर्फ प्रतीक के पैर में गोली लगी थी।पुलिस ने दोनों के पास से दो तमंचे,कारतूस,75 हजार रुपये नकद,पीली धातु और मोबाइल बरामद किए गए थे।पीड़िता सुनैना सिंह ने वीडियो जारी कर अधिवक्ताओं से आरोपियों की पैरवी और जमानत न कराने की भावुक अपील की है।1
- रामेश्वर घाट पर गोमती नदी बढ़ी हुई है जो दस सीडी डूब चुका है। जनपद जौनपुर तहसील केराकत के नरहन स्थित रामेश्वर घाट पर, रामेश्वर घाट पर गोमती नदी बढ़ी हुई है जो दस सीडी डूब चुका है। आप लोगो को बतादे कि केराकत तहसील के नरहन स्थित रामेश्वर घाट गोमती नदी पूर्ण रूप से बढ़ चुका है। और जो गोमती नदी तट घाट पर सीड़ी जो बना हुआ है। करीब दस सीड़ी डूब चुका है। और जो कूड़ा दान बना हुआ है, व भी डूब चुका है। बीते दो दिन पहले रात्रि में बरसात हुआ, उसी तरह बरसात हुआ तो, यह सब जो सीड़ी दिखाई दे रहा है, डूब सकता है।2