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*रुद्र यज्ञ हवन अनुष्ठान - शिव कृपा प्राप्ति का सबसे शक्तिशाली वैदिक संत नरसिंह गीरी महाराज प्राइम न्यूज राजस्थान की विशेष कवरेज ब्यूरो रिपोर्ट धर्मेन्द्र कुमार सोनी कुशलगढ़ बांसवाड़ा राष्ट्रीय सनातन मानव धर्म रक्षा संघ भारत के राष्ट्रीय प्रमुख संत नरसिंह गीरी महाराज ने बताया कि हिंदू सनातन धर्म में जितने भी यज्ञ और हवन हैं, उनमें *रुद्र यज्ञ* को सबसे शक्तिशाली, सबसे पवित्र और सभी मनोकामनाओं को पूर्ण करने वाला माना गया है। कहा जाता है कि जहाँ रुद्र यज्ञ होता है, वहाँ स्वयं भगवान शिव अपने परिवार - माता पार्वती, श्री गणेश और कार्तिकेय के साथ निवास करते हैं। यह सिर्फ एक पूजा नहीं, बल्कि आत्मा की शुद्धि और ब्रह्मांड की ऊर्जा को जागृत करने का विज्ञान है। 1. रुद्र यज्ञ क्या है? रुद्र भगवान शिव का ही एक उग्र और कल्याणकारी रूप है। ऋग्वेद में रुद्र को 'रुद्राय नमः' कहकर प्रणाम किया गया है। 'रुद्र' शब्द का अर्थ है - जो रुलाता है, जो दुखों को दूर करता है और जो ज्ञान देता है। रुद्र यज्ञ में *श्री रुद्रम्* का पाठ किया जाता है, जो यजुर्वेद के रुद्राष्टाध्यायी में आता है। इसमें 11 अनुवाक (अध्याय) होते हैं। इसके दो मुख्य भाग हैं: *1. नमक चमक:* पहला भाग 'नमकम्' है, जिसमें भगवान शिव को बार-बार 'नमः' कहकर नमन किया जाता है - जैसे 'नमः शिवाय च शिवतराय च'। दूसरा भाग 'चमकम्' है, जिसमें भक्त भगवान से सब कुछ मांगता है - धन, बुद्धि, संतान, आरोग्य, मोक्ष। *2. लघु रुद्र, महारुद्र और अतिरुद्र:* - जब 11 ब्राह्मण 11 बार रुद्राष्टाध्यायी का पाठ करते हैं, तो उसे *लघु रुद्र* कहते हैं (121 पाठ)। - जब 121 ब्राह्मण 11 बार पाठ करते हैं, तो उसे *महारुद्र* कहते हैं। - जब 121 ब्राह्मण 11 दिन तक लगातार पाठ करते हैं, तो वह *अतिरुद्र महायज्ञ* कहलाता है, जो बहुत दुर्लभ है। 2. रुद्र हवन कैसे किया जाता है? - सम्पूर्ण विधि रुद्र यज्ञ एक दिन का नहीं, बल्कि कम से कम 2 से 11 दिन का अनुष्ठान होता है। इसकी विधि बहुत ही कठोर और वैदिक नियमों से बंधी है। *पहला चरण - संकल्प और वेदी निर्माण:* सबसे पहले यजमान (जिसके लिए यज्ञ हो रहा है) संकल्प लेता है। पंडित जी यजमान के नाम, गोत्र और मनोकामना का उच्चारण करते हैं। फिर उत्तर-पूर्व दिशा में मिट्टी की वेदी बनाई जाती है। वेदी पर आम की लकड़ी, गाय के गोबर के उपले रखे जाते हैं। *दूसरा चरण - शिवलिंग स्थापना और रुद्राभिषेक:* वेदी के बीच में पार्थिव शिवलिंग (मिट्टी का शिवलिंग) या नर्मदेश्वर शिवलिंग की स्थापना की जाती है। फिर 11 ब्राह्मण लगातार रुद्राष्टाध्यायी का पाठ करते हुए शिवलिंग का अभिषेक करते हैं - दूध, दही, घी, शहद, गंगाजल, बेलपत्र, भस्म और धतूरे से। *तीसरा चरण - हवन:* हर 'नमः' मंत्र के बाद हवन कुंड में आहुति दी जाती है। आहुति में तिल, जौ, घी, गुग्गल, लोहबान, आम की लकड़ी, बेलपत्र, और औषधियों का उपयोग होता है। कहा जाता है कि जब घी अग्नि में जलता है, तो उससे निकलने वाला धुआं वातावरण के बैक्टीरिया को मार देता है और सकारात्मक ऊर्जा फैलाता है। *चौथा चरण - पूर्णाहुति और भंडारा:* अंत में नारियल की पूर्णाहुति दी जाती है और ब्राह्मणों को भोजन कराकर दक्षिणा दी जाती है। यज्ञ की भस्म (विभूति) को बहुत पवित्र माना जाता है। 3. रुद्र यज्ञ क्यों कराया जाता है? - 7 बड़े लाभ शास्त्रों में कहा गया है - *"रुद्राभिषेकात् नास्ति अन्यत् श्रेष्ठम्"* अर्थात रुद्राभिषेक से श्रेष्ठ कुछ भी नहीं है। *1. ग्रह दोष शांति:* जिन लोगों की कुंडली में कालसर्प दोष, पितृदोष, शनि की साढ़ेसाती, राहु-केतु का प्रकोप हो, उनके लिए रुद्र यज्ञ रामबाण है। शिव ही सभी ग्रहों के स्वामी हैं। *2. रोग और भय से मुक्ति:* महामृत्युंजय मंत्र भी रुद्र यज्ञ का ही हिस्सा है। जो व्यक्ति लंबे समय से बीमार है, जिसे डॉक्टर जवाब दे चुके हैं, उसके स्वास्थ्य के लिए रुद्र यज्ञ कराया जाता है। *3. संतान प्राप्ति और परिवार में सुख:* जिन दंपतियों को संतान नहीं हो रही है, वे यदि श्रावण मास या महाशिवरात्रि पर रुद्र यज्ञ कराते हैं तो उन्हें शिव कृपा से संतान प्राप्ति होती है। *4. धन और व्यापार वृद्धि:* 'चमकम्' पाठ में धन-धान्य की प्रार्थना है। व्यापार में घाटा, नौकरी में रुकावट, कर्ज से मुक्ति के लिए यह यज्ञ कराया जाता है। *5. वास्तु दोष निवारण:* नया घर, दुकान या फैक्ट्री शुरू करने से पहले रुद्र यज्ञ कराने से वास्तु दोष समाप्त हो जाता है और नकारात्मक ऊर्जा दूर होती है। *6. अकाल मृत्यु से रक्षा:* भागवत पुराण में कथा है कि मार्कंडेय ऋषि ने रुद्र यज्ञ करके ही यमराज को भी हरा दिया था और अमर हो गए थे। *7. मोक्ष प्राप्ति:* अंत में यह यज्ञ मन को शांत करता है और मोक्ष का मार्ग खोलता है। 4. रुद्र यज्ञ कब कराना चाहिए? - *सावन मास (श्रावण)* - सबसे उत्तम महीना - महाशिवरात्रि - सोमवार - प्रदोष काल - ग्रहण काल के बाद - जब घर में लगातार अशुभ घटनाएं हो रही हों यज्ञ के दौरान यजमान को ब्रह्मचर्य, सात्विक भोजन और जमीन पर सोने का पालन करना चाहिए। 5. वैज्ञानिक महत्व आज विज्ञान भी मानता है कि वैदिक मंत्रों में एक विशेष ध्वनि कंपन (Sound Vibration) होता है। जब 11 ब्राह्मण एक साथ 'नमक चमक' का उच्चारण करते हैं, तो उससे उत्पन्न ध्वनि तरंगें हमारे मस्तिष्क की अल्फा तरंगों को शांत करती हैं। हवन में जलने वाला घी और औषधियां वातावरण को शुद्ध करती हैं। इसलिए रुद्र यज्ञ केवल धार्मिक ही नहीं, बल्कि मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य के लिए भी लाभदायक है। निष्कर्ष रुद्र यज्ञ एक ऐसा अनुष्ठान है जो अकेले नहीं किया जा सकता। इसके लिए विद्वान ब्राह्मणों, शुद्ध आचरण और सच्ची श्रद्धा की आवश्यकता होती है। यह यज्ञ हमें सिखाता है कि अहंकार को छोड़ो, 'नमः' कहो - अर्थात मैं कुछ नहीं, सब आप ही हैं। जब हम सच्चे मन से "ॐ नमः शिवाय" कहते हुए आहुति देते हैं, तो हमारे अंदर का रुद्र - क्रोध, लोभ, भय - जलकर भस्म हो जाता है और अंदर शिवत्व - शांति, प्रेम और कल्याण - जागृत होता है।

4 hrs ago
user_Dharmendra Soni
Dharmendra Soni
कुशलगढ़, बांसवाड़ा, राजस्थान•
4 hrs ago

*रुद्र यज्ञ हवन अनुष्ठान - शिव कृपा प्राप्ति का सबसे शक्तिशाली वैदिक संत नरसिंह गीरी महाराज प्राइम न्यूज राजस्थान की विशेष कवरेज ब्यूरो रिपोर्ट धर्मेन्द्र कुमार सोनी कुशलगढ़ बांसवाड़ा राष्ट्रीय सनातन मानव धर्म रक्षा संघ भारत के राष्ट्रीय प्रमुख संत नरसिंह गीरी महाराज ने बताया कि हिंदू सनातन धर्म में जितने भी यज्ञ और हवन हैं, उनमें *रुद्र यज्ञ* को सबसे शक्तिशाली, सबसे पवित्र और सभी मनोकामनाओं को पूर्ण करने वाला माना गया है। कहा जाता है कि जहाँ रुद्र यज्ञ होता है, वहाँ स्वयं भगवान शिव अपने परिवार - माता पार्वती, श्री गणेश और कार्तिकेय के साथ निवास करते हैं। यह सिर्फ एक पूजा नहीं, बल्कि आत्मा की शुद्धि और ब्रह्मांड की ऊर्जा को जागृत करने का विज्ञान है। 1. रुद्र यज्ञ क्या है? रुद्र भगवान शिव का ही एक उग्र और कल्याणकारी रूप है। ऋग्वेद में रुद्र को 'रुद्राय नमः' कहकर प्रणाम किया गया है। 'रुद्र' शब्द का अर्थ है - जो रुलाता है, जो दुखों को दूर करता है और जो ज्ञान देता है। रुद्र यज्ञ में *श्री रुद्रम्* का पाठ किया जाता है, जो यजुर्वेद के रुद्राष्टाध्यायी में आता है। इसमें 11 अनुवाक (अध्याय) होते हैं। इसके दो मुख्य भाग हैं: *1. नमक चमक:* पहला भाग 'नमकम्' है, जिसमें भगवान शिव को बार-बार 'नमः' कहकर नमन किया जाता है - जैसे 'नमः शिवाय च शिवतराय च'। दूसरा भाग 'चमकम्' है, जिसमें भक्त भगवान से सब कुछ मांगता है - धन, बुद्धि, संतान, आरोग्य, मोक्ष। *2. लघु रुद्र, महारुद्र और अतिरुद्र:* - जब 11 ब्राह्मण 11 बार रुद्राष्टाध्यायी का पाठ करते हैं, तो उसे *लघु रुद्र* कहते हैं (121 पाठ)। - जब 121 ब्राह्मण 11 बार पाठ करते हैं, तो उसे *महारुद्र* कहते हैं। - जब 121 ब्राह्मण 11 दिन तक लगातार पाठ करते हैं, तो वह *अतिरुद्र महायज्ञ* कहलाता है, जो बहुत दुर्लभ है। 2. रुद्र हवन कैसे किया जाता है? - सम्पूर्ण विधि रुद्र यज्ञ एक दिन का नहीं, बल्कि कम से कम 2 से 11 दिन का अनुष्ठान

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होता है। इसकी विधि बहुत ही कठोर और वैदिक नियमों से बंधी है। *पहला चरण - संकल्प और वेदी निर्माण:* सबसे पहले यजमान (जिसके लिए यज्ञ हो रहा है) संकल्प लेता है। पंडित जी यजमान के नाम, गोत्र और मनोकामना का उच्चारण करते हैं। फिर उत्तर-पूर्व दिशा में मिट्टी की वेदी बनाई जाती है। वेदी पर आम की लकड़ी, गाय के गोबर के उपले रखे जाते हैं। *दूसरा चरण - शिवलिंग स्थापना और रुद्राभिषेक:* वेदी के बीच में पार्थिव शिवलिंग (मिट्टी का शिवलिंग) या नर्मदेश्वर शिवलिंग की स्थापना की जाती है। फिर 11 ब्राह्मण लगातार रुद्राष्टाध्यायी का पाठ करते हुए शिवलिंग का अभिषेक करते हैं - दूध, दही, घी, शहद, गंगाजल, बेलपत्र, भस्म और धतूरे से। *तीसरा चरण - हवन:* हर 'नमः' मंत्र के बाद हवन कुंड में आहुति दी जाती है। आहुति में तिल, जौ, घी, गुग्गल, लोहबान, आम की लकड़ी, बेलपत्र, और औषधियों का उपयोग होता है। कहा जाता है कि जब घी अग्नि में जलता है, तो उससे निकलने वाला धुआं वातावरण के बैक्टीरिया को मार देता है और सकारात्मक ऊर्जा फैलाता है। *चौथा चरण - पूर्णाहुति और भंडारा:* अंत में नारियल की पूर्णाहुति दी जाती है और ब्राह्मणों को भोजन कराकर दक्षिणा दी जाती है। यज्ञ की भस्म (विभूति) को बहुत पवित्र माना जाता है। 3. रुद्र यज्ञ क्यों कराया जाता है? - 7 बड़े लाभ शास्त्रों में कहा गया है - *"रुद्राभिषेकात् नास्ति अन्यत् श्रेष्ठम्"* अर्थात रुद्राभिषेक से श्रेष्ठ कुछ भी नहीं है। *1. ग्रह दोष शांति:* जिन लोगों की कुंडली में कालसर्प दोष, पितृदोष, शनि की साढ़ेसाती, राहु-केतु का प्रकोप हो, उनके लिए रुद्र यज्ञ रामबाण है। शिव ही सभी ग्रहों के स्वामी हैं। *2. रोग और भय से मुक्ति:* महामृत्युंजय मंत्र भी रुद्र यज्ञ का ही हिस्सा है। जो व्यक्ति लंबे समय से बीमार है, जिसे डॉक्टर जवाब दे चुके हैं, उसके स्वास्थ्य के लिए रुद्र यज्ञ कराया जाता है। *3. संतान प्राप्ति और परिवार में सुख:* जिन दंपतियों को संतान नहीं हो रही है, वे यदि श्रावण मास या

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महाशिवरात्रि पर रुद्र यज्ञ कराते हैं तो उन्हें शिव कृपा से संतान प्राप्ति होती है। *4. धन और व्यापार वृद्धि:* 'चमकम्' पाठ में धन-धान्य की प्रार्थना है। व्यापार में घाटा, नौकरी में रुकावट, कर्ज से मुक्ति के लिए यह यज्ञ कराया जाता है। *5. वास्तु दोष निवारण:* नया घर, दुकान या फैक्ट्री शुरू करने से पहले रुद्र यज्ञ कराने से वास्तु दोष समाप्त हो जाता है और नकारात्मक ऊर्जा दूर होती है। *6. अकाल मृत्यु से रक्षा:* भागवत पुराण में कथा है कि मार्कंडेय ऋषि ने रुद्र यज्ञ करके ही यमराज को भी हरा दिया था और अमर हो गए थे। *7. मोक्ष प्राप्ति:* अंत में यह यज्ञ मन को शांत करता है और मोक्ष का मार्ग खोलता है। 4. रुद्र यज्ञ कब कराना चाहिए? - *सावन मास (श्रावण)* - सबसे उत्तम महीना - महाशिवरात्रि - सोमवार - प्रदोष काल - ग्रहण काल के बाद - जब घर में लगातार अशुभ घटनाएं हो रही हों यज्ञ के दौरान यजमान को ब्रह्मचर्य, सात्विक भोजन और जमीन पर सोने का पालन करना चाहिए। 5. वैज्ञानिक महत्व आज विज्ञान भी मानता है कि वैदिक मंत्रों में एक विशेष ध्वनि कंपन (Sound Vibration) होता है। जब 11 ब्राह्मण एक साथ 'नमक चमक' का उच्चारण करते हैं, तो उससे उत्पन्न ध्वनि तरंगें हमारे मस्तिष्क की अल्फा तरंगों को शांत करती हैं। हवन में जलने वाला घी और औषधियां वातावरण को शुद्ध करती हैं। इसलिए रुद्र यज्ञ केवल धार्मिक ही नहीं, बल्कि मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य के लिए भी लाभदायक है। निष्कर्ष रुद्र यज्ञ एक ऐसा अनुष्ठान है जो अकेले नहीं किया जा सकता। इसके लिए विद्वान ब्राह्मणों, शुद्ध आचरण और सच्ची श्रद्धा की आवश्यकता होती है। यह यज्ञ हमें सिखाता है कि अहंकार को छोड़ो, 'नमः' कहो - अर्थात मैं कुछ नहीं, सब आप ही हैं। जब हम सच्चे मन से "ॐ नमः शिवाय" कहते हुए आहुति देते हैं, तो हमारे अंदर का रुद्र - क्रोध, लोभ, भय - जलकर भस्म हो जाता है और अंदर शिवत्व - शांति, प्रेम और कल्याण - जागृत होता है।

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  • *श्रीकृष्ण जन्माष्टमी - अंधकार में जन्मा प्रकाश, कारागार में जन्मा मुक्तिदाता* संत घनश्याम दास महाराज प्राइम न्यूज राजस्थान की विशेष कवरेज ब्यूरो रिपोर्ट धर्मेन्द्र कुमार सोनी कुशलगढ़ बांसवाड़ा राजस्थान के बांसवाड़ा जिले के गढ़ी तहसील के गांव बरोडीया गांव में बने राधा कृष्ण मंदिर प्रांगण में जन्माष्टमी महोत्सव पर एक धर्मसभा में बोलते हुए कहा की ज़हां सनातन संस्कृति है वहां ईश्वर का निवास होता है संत ने कहा कि भारत में कोई भी त्योहार सिर्फ पूजा नहीं, एक पूरी जीवनशैली है। और जन्माष्टमी तो इन सबमें सबसे अनोखी है, क्योंकि यह एक ऐसे भगवान का जन्मदिन है जो भगवान होते हुए भी सबसे ज्यादा इंसान के करीब है। जो राजमहल में नहीं, जेल में जन्मा। जो युद्ध में भी बांसुरी बजाना नहीं भूला। जो गीता जैसा गंभीर ज्ञान भी मुस्कुराते हुए दे गया। राजस्थान के बांसवाड़ा जिले के गढी तहसील के 1. पृष्ठभूमि - द्वापर का अंत और अधर्म का बोझ द्वापर युग के अंतिम चरण में पृथ्वी पर पाप बहुत बढ़ गया था। कंस, जरासंध, शिशुपाल, कालयवन जैसे अत्याचारी राजा प्रजा पर अत्याचार कर रहे थे। पृथ्वी गाय का रूप लेकर ब्रह्मा जी के पास गई और बोली - "मेरा बोझ अब सहा नहीं जाता।" ब्रह्मा जी सभी देवताओं के साथ क्षीर सागर में भगवान विष्णु के पास गए। भगवान विष्णु ने कहा - "मैं जल्द ही देवकी के आठवें पुत्र के रूप में अवतार लूंगा और पृथ्वी का भार हल्का करूंगा।" इधर मथुरा में राजा उग्रसेन के पुत्र कंस ने अपने पिता को कैद कर सिंहासन हथिया लिया था। उसकी बहन देवकी का विवाह यादव कुल के वासुदेव से हुआ। 2. आकाशवाणी और कारावास विदाई के समय जब कंस स्वयं रथ हांक रहा था, तभी आकाशवाणी हुई - "हे मूर्ख कंस, जिस बहन को तू इतने प्यार से विदा कर रहा है, उसी का आठवां पुत्र तेरा वध करेगा।" कंस ने तुरंत तलवार निकाल ली। वासुदेव ने बड़ी चतुराई से कहा - "तुम्हें भय पुत्र से है, पुत्री से नहीं। मैं वचन देता हूँ, हमारे जितने पुत्र होंगे, हम तुम्हें सौंप देंगे।" दोनों को कारागार में डाल दिया गया। कंस ने एक-एक करके देवकी के 6 नवजात पुत्रों को मार दिया। सातवें गर्भ में शेषनाग (बलराम) थे, जिन्हें योगमाया ने वासुदेव की दूसरी पत्नी रोहिणी के गर्भ में पहुंचा दिया। अब प्रतीक्षा थी आठवें की। 3. वह दिव्य रात - जब भगवान जेल में आए भाद्रपद कृष्ण अष्टमी, रोहिणी नक्षत्र, आधी रात, घनघोर वर्षा। कारागार के सभी पहरेदार अचेत हो गए। बेड़ियां टूट गईं। ताले खुल गए। तभी देवकी के सामने चतुर्भुज भगवान विष्णु प्रकट हुए - शंख, चक्र, गदा, पद्म के साथ। उन्होंने कहा - "मैं ही तुम्हारा पुत्र बनकर आया हूँ। अब मुझे गोकुल पहुँचा दो।" वासुदेव ने एक टोकरी में बालक को रखा। जैसे ही वे कारागार से बाहर निकले, यमुना जी उफान पर थीं। वासुदेव जैसे-जैसे यमुना में उतरते गए, जल बढ़ता गया। तब बालकृष्ण ने अपना चरण टोकरी से बाहर निकाला और यमुना के जल को स्पर्श किया। यमुना ने तुरंत दो भागों में बंटकर रास्ता दे दिया। ऊपर शेषनाग अपने हजार फनों से छत्र बनाकर वर्षा से रक्षा करते रहे। गोकुल में नंद बाबा के घर यशोदा मैया को एक कन्या (योगमाया) हुई थी, सभी गहरी नींद में थे। वासुदेव ने बालक को यशोदा के पास सुला दिया और कन्या को लेकर वापस मथुरा कारागार में आ गए। सब कुछ पहले जैसा बंद हो गया। सुबह कंस आया। उसने कन्या को पैरों से पकड़कर पटकना चाहा, पर वह हाथ से छूटकर आकाश में चली गई और दुर्गा रूप में बोली - *"अरे मूर्ख, तुझे मारने वाला तो गोकुल में जन्म ले चुका है, वह सुरक्षित है।"* 4. गोकुल में नंदोत्सव - ब्रज में बधाई गोकुल में जब पता चला कि नंद बाबा के घर लाला हुआ है, तो पूरे ब्रज में होली-दीवाली एक साथ हो गई। ग्वालों ने दूध-दही लुटाया, गोपियों ने बधाई गीत गाए - "नंद घर आनंद भयो।" यशोदा मैया ने अपने कन्हैया को पहली बार देखा तो उनकी आंखों से आंसू बह निकले। यहीं से शुरू हुईं कृष्ण की बाल लीलाएं - 6 दिन की उम्र में पूतना का वध, 3 महीने में शकटासुर वध, माखन चोरी, यमलार्जुन उद्धार, कालिया नाग दमन, गोवर्धन लीला। 5. जन्माष्टमी का उत्सव - भारत के 5 रंग *1. मथुरा-वृंदावन:* यहाँ जन्माष्टमी पर ऐसा लगता है जैसे पूरा ब्रज ही दुल्हन बन गया हो। कृष्ण जन्मभूमि पर 21 तोपों की सलामी, पंचामृत अभिषेक और रात 12 बजे महाअभिषेक होता है। बांके बिहारी मंदिर में साल में सिर्फ इसी दिन मंगला आरती रात 12 बजे होती है। *2. द्वारका (गुजरात):* यहाँ कृष्ण राजा हैं। द्वारकाधीश मंदिर में कृष्ण को सोने के मुकुट और हीरे के हार पहनाए जाते हैं। *3. पुरी (ओडिशा):* जगन्नाथ मंदिर में कृष्ण को 56 भोग लगते हैं। *4. महाराष्ट्र की दही-हांडी:* यह सबसे जोशीला उत्सव है। कृष्ण की मटकी फोड़ लीला को जीवंत किया जाता है। 30-40 फीट ऊपर दही की मटकी बांधी जाती है, गोविंदा पथक मानव पिरामिड बनाकर उसे फोड़ते हैं। यह टीमवर्क और साहस का प्रतीक है। *5. घर-घर की झांकी:* घरों में लोग दिन भर व्रत रखते हैं। चावल के आटे से आंगन में छोटे-छोटे पैर (कन्हैया के आगमन के प्रतीक) बनाते हैं। शाम को झांकी सजाते हैं, पालने में लड्डू गोपाल को रखते हैं। रात 12 बजे शंख, घंटा, ढोल के साथ जन्म कराते हैं। फिर पंजीरी, माखन-मिश्री, धनिया पाग का भोग लगता है। 6. जन्माष्टमी हमें क्या सिखाती है? कृष्ण का पूरा जीवन एक यूनिवर्सिटी है। *क) योगेश्वर कृष्ण -* उन्होंने युद्ध के मैदान में अर्जुन को गीता का उपदेश दिया। "कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन" - कर्म करो, फल की चिंता मत करो। आज के तनाव भरे जीवन में इससे बड़ा मंत्र कोई नहीं। *ख) मित्र कृष्ण -* उन्होंने सुदामा जैसे गरीब मित्र को गले लगाया। उन्होंने सिखाया कि दोस्ती में अमीरी-गरीबी नहीं देखी जाती। *ग) प्रेमी कृष्ण -* उन्होंने गोपियों से ऐसा निस्वार्थ प्रेम किया कि आज भी प्रेम का सबसे पवित्र रूप राधा-कृष्ण का माना जाता है। *घ) बालक कृष्ण -* माखन चोरी करके उन्होंने सिखाया कि जीवन में थोड़ी शरारत, थोड़ी मस्ती भी जरूरी है। हमेशा गंभीर रहना जीवन नहीं है। निष्कर्ष जन्माष्टमी सिर्फ एक रात का उत्सव नहीं है। यह हमें याद दिलाता है कि जब भी जीवन में कंस रूपी अहंकार, लालच और भय की जेल में हम बंद हो जाते हैं, तो हमारे अंदर भी एक कृष्ण जन्म लेता है जो हमें उस जेल से बाहर निकालता है। इस जन्माष्टमी पर हम सब अपने अंदर के कंस को मारें और अपने अंदर के कृष्ण को जगाएं। अपने घर में माखन-मिश्री ही नहीं, प्रेम, हंसी और एकता भी बांटें।
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    *श्रीकृष्ण जन्माष्टमी - अंधकार में जन्मा प्रकाश, कारागार में जन्मा मुक्तिदाता* संत घनश्याम दास महाराज 
प्राइम न्यूज राजस्थान की विशेष कवरेज 
ब्यूरो रिपोर्ट धर्मेन्द्र कुमार सोनी कुशलगढ़ बांसवाड़ा 
राजस्थान के बांसवाड़ा जिले के गढ़ी तहसील के गांव बरोडीया गांव में बने राधा कृष्ण मंदिर प्रांगण में जन्माष्टमी महोत्सव पर एक धर्मसभा में बोलते हुए कहा की ज़हां सनातन संस्कृति है वहां ईश्वर का निवास होता है 
संत ने कहा कि 
भारत में कोई भी त्योहार सिर्फ पूजा नहीं, एक पूरी जीवनशैली है। और जन्माष्टमी तो इन सबमें सबसे अनोखी है, क्योंकि यह एक ऐसे भगवान का जन्मदिन है जो भगवान होते हुए भी सबसे ज्यादा इंसान के करीब है। जो राजमहल में नहीं, जेल में जन्मा। जो युद्ध में भी बांसुरी बजाना नहीं भूला। जो गीता जैसा गंभीर ज्ञान भी मुस्कुराते हुए दे गया।
राजस्थान के बांसवाड़ा जिले के गढी तहसील के 
1. पृष्ठभूमि - द्वापर का अंत और अधर्म का बोझ
द्वापर युग के अंतिम चरण में पृथ्वी पर पाप बहुत बढ़ गया था। कंस, जरासंध, शिशुपाल, कालयवन जैसे अत्याचारी राजा प्रजा पर अत्याचार कर रहे थे। पृथ्वी गाय का रूप लेकर ब्रह्मा जी के पास गई और बोली - "मेरा बोझ अब सहा नहीं जाता।" ब्रह्मा जी सभी देवताओं के साथ क्षीर सागर में भगवान विष्णु के पास गए। भगवान विष्णु ने कहा - "मैं जल्द ही देवकी के आठवें पुत्र के रूप में अवतार लूंगा और पृथ्वी का भार हल्का करूंगा।"
इधर मथुरा में राजा उग्रसेन के पुत्र कंस ने अपने पिता को कैद कर सिंहासन हथिया लिया था। उसकी बहन देवकी का विवाह यादव कुल के वासुदेव से हुआ।
2. आकाशवाणी और कारावास
विदाई के समय जब कंस स्वयं रथ हांक रहा था, तभी आकाशवाणी हुई - "हे मूर्ख कंस, जिस बहन को तू इतने प्यार से विदा कर रहा है, उसी का आठवां पुत्र तेरा वध करेगा।"
कंस ने तुरंत तलवार निकाल ली। वासुदेव ने बड़ी चतुराई से कहा - "तुम्हें भय पुत्र से है, पुत्री से नहीं। मैं वचन देता हूँ, हमारे जितने पुत्र होंगे, हम तुम्हें सौंप देंगे।"
दोनों को कारागार में डाल दिया गया। कंस ने एक-एक करके देवकी के 6 नवजात पुत्रों को मार दिया। सातवें गर्भ में शेषनाग (बलराम) थे, जिन्हें योगमाया ने वासुदेव की दूसरी पत्नी रोहिणी के गर्भ में पहुंचा दिया।
अब प्रतीक्षा थी आठवें की।
3. वह दिव्य रात - जब भगवान जेल में आए
भाद्रपद कृष्ण अष्टमी, रोहिणी नक्षत्र, आधी रात, घनघोर वर्षा। कारागार के सभी पहरेदार अचेत हो गए। बेड़ियां टूट गईं। ताले खुल गए।
तभी देवकी के सामने चतुर्भुज भगवान विष्णु प्रकट हुए - शंख, चक्र, गदा, पद्म के साथ। उन्होंने कहा - "मैं ही तुम्हारा पुत्र बनकर आया हूँ। अब मुझे गोकुल पहुँचा दो।"
वासुदेव ने एक टोकरी में बालक को रखा। जैसे ही वे कारागार से बाहर निकले, यमुना जी उफान पर थीं। वासुदेव जैसे-जैसे यमुना में उतरते गए, जल बढ़ता गया। तब बालकृष्ण ने अपना चरण टोकरी से बाहर निकाला और यमुना के जल को स्पर्श किया। यमुना ने तुरंत दो भागों में बंटकर रास्ता दे दिया। ऊपर शेषनाग अपने हजार फनों से छत्र बनाकर वर्षा से रक्षा करते रहे।
गोकुल में नंद बाबा के घर यशोदा मैया को एक कन्या (योगमाया) हुई थी, सभी गहरी नींद में थे। वासुदेव ने बालक को यशोदा के पास सुला दिया और कन्या को लेकर वापस मथुरा कारागार में आ गए। सब कुछ पहले जैसा बंद हो गया।
सुबह कंस आया। उसने कन्या को पैरों से पकड़कर पटकना चाहा, पर वह हाथ से छूटकर आकाश में चली गई और दुर्गा रूप में बोली - *"अरे मूर्ख, तुझे मारने वाला तो गोकुल में जन्म ले चुका है, वह सुरक्षित है।"*
4. गोकुल में नंदोत्सव - ब्रज में बधाई
गोकुल में जब पता चला कि नंद बाबा के घर लाला हुआ है, तो पूरे ब्रज में होली-दीवाली एक साथ हो गई। ग्वालों ने दूध-दही लुटाया, गोपियों ने बधाई गीत गाए - "नंद घर आनंद भयो।" यशोदा मैया ने अपने कन्हैया को पहली बार देखा तो उनकी आंखों से आंसू बह निकले।
यहीं से शुरू हुईं कृष्ण की बाल लीलाएं - 6 दिन की उम्र में पूतना का वध, 3 महीने में शकटासुर वध, माखन चोरी, यमलार्जुन उद्धार, कालिया नाग दमन, गोवर्धन लीला।
5. जन्माष्टमी का उत्सव - भारत के 5 रंग
*1. मथुरा-वृंदावन:* यहाँ जन्माष्टमी पर ऐसा लगता है जैसे पूरा ब्रज ही दुल्हन बन गया हो। कृष्ण जन्मभूमि पर 21 तोपों की सलामी, पंचामृत अभिषेक और रात 12 बजे महाअभिषेक होता है। बांके बिहारी मंदिर में साल में सिर्फ इसी दिन मंगला आरती रात 12 बजे होती है।
*2. द्वारका (गुजरात):* यहाँ कृष्ण राजा हैं। द्वारकाधीश मंदिर में कृष्ण को सोने के मुकुट और हीरे के हार पहनाए जाते हैं।
*3. पुरी (ओडिशा):* जगन्नाथ मंदिर में कृष्ण को 56 भोग लगते हैं।
*4. महाराष्ट्र की दही-हांडी:* यह सबसे जोशीला उत्सव है। कृष्ण की मटकी फोड़ लीला को जीवंत किया जाता है। 30-40 फीट ऊपर दही की मटकी बांधी जाती है, गोविंदा पथक मानव पिरामिड बनाकर उसे फोड़ते हैं। यह टीमवर्क और साहस का प्रतीक है।
*5. घर-घर की झांकी:* घरों में लोग दिन भर व्रत रखते हैं। चावल के आटे से आंगन में छोटे-छोटे पैर (कन्हैया के आगमन के प्रतीक) बनाते हैं। शाम को झांकी सजाते हैं, पालने में लड्डू गोपाल को रखते हैं। रात 12 बजे शंख, घंटा, ढोल के साथ जन्म कराते हैं। फिर पंजीरी, माखन-मिश्री, धनिया पाग का भोग लगता है।
6. जन्माष्टमी हमें क्या सिखाती है?
कृष्ण का पूरा जीवन एक यूनिवर्सिटी है।
*क) योगेश्वर कृष्ण -* उन्होंने युद्ध के मैदान में अर्जुन को गीता का उपदेश दिया। "कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन" - कर्म करो, फल की चिंता मत करो। आज के तनाव भरे जीवन में इससे बड़ा मंत्र कोई नहीं।
*ख) मित्र कृष्ण -* उन्होंने सुदामा जैसे गरीब मित्र को गले लगाया। उन्होंने सिखाया कि दोस्ती में अमीरी-गरीबी नहीं देखी जाती।
*ग) प्रेमी कृष्ण -* उन्होंने गोपियों से ऐसा निस्वार्थ प्रेम किया कि आज भी प्रेम का सबसे पवित्र रूप राधा-कृष्ण का माना जाता है।
*घ) बालक कृष्ण -* माखन चोरी करके उन्होंने सिखाया कि जीवन में थोड़ी शरारत, थोड़ी मस्ती भी जरूरी है। हमेशा गंभीर रहना जीवन नहीं है।
निष्कर्ष
जन्माष्टमी सिर्फ एक रात का उत्सव नहीं है। यह हमें याद दिलाता है कि जब भी जीवन में कंस रूपी अहंकार, लालच और भय की जेल में हम बंद हो जाते हैं, तो हमारे अंदर भी एक कृष्ण जन्म लेता है जो हमें उस जेल से बाहर निकालता है।
इस जन्माष्टमी पर हम सब अपने अंदर के कंस को मारें और अपने अंदर के कृष्ण को जगाएं। अपने घर में माखन-मिश्री ही नहीं, प्रेम, हंसी और एकता भी बांटें।
    user_Dharmendra Soni
    Dharmendra Soni
    कुशलगढ़, बांसवाड़ा, राजस्थान•
    4 hrs ago
  • कुशलगढ़ की सियासत में भाजपा का बड़ा टारगेट, गजेंद्र सिंह पटेल बोले—20 के 20 वार्ड जीतेंगे कुशलगढ़, 4 सितंबर। नगर पालिका चुनाव को लेकर भाजपा ने अपनी तैयारियां तेज कर दी हैं। भाजपा के राष्ट्रीय महामंत्री एवं सांसद गजेंद्र सिंह पटेल ने ब्यूरो चीफ ललित गोलेछा से विशेष बातचीत में कुशलगढ़ में भाजपा की स्थिति मजबूत बताते हुए 20 के 20 वार्ड जीतने का लक्ष्य रखा। भंवर रोशन विला स्थित कावड़िया भवन में हुई बातचीत में पटेल ने कहा कि पिछले करीब 10 वर्षों से कुशलगढ़ नगर पालिका में भाजपा का बोर्ड है और पिछले चुनाव में 20 में से 16 वार्डों में भाजपा पार्षद विजयी हुए थे। उन्होंने दावा किया कि जनता और कार्यकर्ताओं में उत्साह को देखते हुए भाजपा लगातार तीसरी बार बोर्ड बनाकर जीत की हैट्रिक लगाएगी। सांसद ने कहा कि भाजपा का समर्पित कार्यकर्ता संगठन की सबसे बड़ी ताकत है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में केंद्र और मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा के नेतृत्व में राजस्थान सरकार जनहित एवं विकास कार्यों को गति दे रही है। उन्होंने राजस्थान के नगर पालिका और नगर परिषद चुनावों में भाजपा की ऐतिहासिक विजय का दावा करते हुए कार्यकर्ताओं से जनता का विश्वास जीतने के लिए पूरी ताकत से जुटने का आह्वान किया।
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    कुशलगढ़ की सियासत में भाजपा का बड़ा टारगेट, गजेंद्र सिंह पटेल बोले—20 के 20 वार्ड जीतेंगे
कुशलगढ़, 4 सितंबर। नगर पालिका चुनाव को लेकर भाजपा ने अपनी तैयारियां तेज कर दी हैं। भाजपा के राष्ट्रीय महामंत्री एवं सांसद गजेंद्र सिंह पटेल ने ब्यूरो चीफ ललित गोलेछा से विशेष बातचीत में कुशलगढ़ में भाजपा की स्थिति मजबूत बताते हुए 20 के 20 वार्ड जीतने का लक्ष्य रखा।
भंवर रोशन विला स्थित कावड़िया भवन में हुई बातचीत में पटेल ने कहा कि पिछले करीब 10 वर्षों से कुशलगढ़ नगर पालिका में भाजपा का बोर्ड है और पिछले चुनाव में 20 में से 16 वार्डों में भाजपा पार्षद विजयी हुए थे। उन्होंने दावा किया कि जनता और कार्यकर्ताओं में उत्साह को देखते हुए भाजपा लगातार तीसरी बार बोर्ड बनाकर जीत की हैट्रिक लगाएगी।
सांसद ने कहा कि भाजपा का समर्पित कार्यकर्ता संगठन की सबसे बड़ी ताकत है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में केंद्र और मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा के नेतृत्व में राजस्थान सरकार जनहित एवं विकास कार्यों को गति दे रही है।
उन्होंने राजस्थान के नगर पालिका और नगर परिषद चुनावों में भाजपा की ऐतिहासिक विजय का दावा करते हुए कार्यकर्ताओं से जनता का विश्वास जीतने के लिए पूरी ताकत से जुटने का आह्वान किया।
    user_गाण्डीव न्यूज नेटवर्क
    गाण्डीव न्यूज नेटवर्क
    बांसवाड़ा, बांसवाड़ा, राजस्थान•
    14 hrs ago
  • मूकनायक संपादक राजस्थान की भिलाई छ .ग से बड़ी खबर! सर्व रविदास समाज छत्तीसगढ़ के तत्वावधान में आयोजित प्रदेश स्तरीय कार्यशाला सह मनोनयन कार्यक्रम में सामाजिक एकता, शिक्षा, आरक्षण, राजनीतिक भागीदारी, आर्थिक विकास, महिला सशक्तिकरण और युवा नेतृत्व जैसे महत्वपूर्ण मुद्दों पर बड़ा मंथन हुआ। कार्यक्रम की सबसे बड़ी पहल रही—नशामुक्त समाज और दहेजमुक्त समाज बनाने का सामूहिक संकल्प। 🚫🍺 🚫💰 साथ ही प्रदेश, संभाग, जिला और ब्लॉक स्तर पर नई जिम्मेदारियां सौंपकर संगठन को मजबूत करने का संदेश दिया गया। श्री ध्रुव कुमार मिर्धा, श्री प्रकाश महोबिया, श्री विजय मेहरा सहित समाज के अनेक पदाधिकारी एवं प्रतिनिधि कार्यक्रम में उपस्थित रहे। अब सवाल सिर्फ संकल्प का नहीं— संकल्प को गांव-गांव और परिवार-परिवार तक पहुंचाने का है। 📍 भिलाई, छत्तीसगढ़ से मूकनायक न्यूज़ की विशेष रिपोर्ट 🎙️ एंकर एवं प्रस्तुति — रामलाल यादव, संपादक राजस्थान जय गुरु रविदास जी | जय संविधान मूकनायक न्यूज पर खबरो एवं विज्ञापन हेतु संपर्क करे :8209466503
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    मूकनायक संपादक राजस्थान की भिलाई छ .ग से बड़ी खबर! 
सर्व रविदास समाज छत्तीसगढ़ के तत्वावधान में आयोजित प्रदेश स्तरीय कार्यशाला सह मनोनयन कार्यक्रम में सामाजिक एकता, शिक्षा, आरक्षण, राजनीतिक भागीदारी, आर्थिक विकास, महिला सशक्तिकरण और युवा नेतृत्व जैसे महत्वपूर्ण मुद्दों पर बड़ा मंथन हुआ।
कार्यक्रम की सबसे बड़ी पहल रही—नशामुक्त समाज और दहेजमुक्त समाज बनाने का सामूहिक संकल्प। 🚫🍺 🚫💰
साथ ही प्रदेश, संभाग, जिला और ब्लॉक स्तर पर नई जिम्मेदारियां सौंपकर संगठन को मजबूत करने का संदेश दिया गया।
श्री ध्रुव कुमार मिर्धा, श्री प्रकाश महोबिया, श्री विजय मेहरा सहित समाज के अनेक पदाधिकारी एवं प्रतिनिधि कार्यक्रम में उपस्थित रहे।
अब सवाल सिर्फ संकल्प का नहीं—
संकल्प को गांव-गांव और परिवार-परिवार तक पहुंचाने का है।
📍 भिलाई, छत्तीसगढ़ से मूकनायक न्यूज़ की विशेष रिपोर्ट
🎙️ एंकर एवं प्रस्तुति — रामलाल यादव, संपादक राजस्थान
जय गुरु रविदास जी | जय संविधान
मूकनायक न्यूज पर खबरो एवं विज्ञापन हेतु संपर्क करे :8209466503
    user_Chief editor Rajasthan
    Chief editor Rajasthan
    Media company बांसवाड़ा, बांसवाड़ा, राजस्थान•
    17 hrs ago
  • सालमगढ मे बड़े धूमधाम से कृष्णा जन्माष्टमी का पावन पर्व मनाया गया सालमगढ मे बड़े धूमधाम से मनाया जा रहा है कृष्णा जन्माष्टमी का पावन पर्व श्री चारभुजा मंदिर,राम मंदिर, सांवलियाजी सेठ मंदिर को लाइटीग से सजाया गया श्री चारभुजा नाथ मंदिर में भजन कीर्तन का आयोजन किया गया, सांवलियाजी सेठ मंदिर पर ग्रामीणों द्वारा मटकी फोड़ कार्यक्रम का आयोजन किया गया दलोट रोड भैरवनाथ मंदिर के पास शिवालय पर मटकी फोड़ कार्यक्रम का आयोजन हेंताश चौधरी द्वारा रखा गया
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    सालमगढ मे बड़े धूमधाम से कृष्णा जन्माष्टमी का पावन पर्व मनाया गया 
सालमगढ मे बड़े धूमधाम से मनाया जा रहा है कृष्णा जन्माष्टमी का पावन पर्व श्री चारभुजा मंदिर,राम मंदिर, सांवलियाजी सेठ मंदिर को लाइटीग से सजाया गया श्री चारभुजा नाथ मंदिर में भजन कीर्तन का आयोजन किया गया, सांवलियाजी सेठ मंदिर पर ग्रामीणों द्वारा मटकी फोड़ कार्यक्रम का आयोजन किया गया दलोट रोड भैरवनाथ मंदिर के पास शिवालय पर मटकी फोड़ कार्यक्रम का आयोजन हेंताश चौधरी द्वारा रखा गया
    user_User3132
    User3132
    दलोट, प्रतापगढ़, राजस्थान•
    2 hrs ago
  • कांग्रेस ने वार्ड नं. 23 को ही क्यों चुना नपा अध्यक्ष के उम्मीदवार के रुप में जानिए वजह... नगर पालिका चुनाव 2026 पर खास खबर नगर पालिका चुनाव 2026 को लेकर सियासत लगातार गरमाती जा रही है। भाजपा और कांग्रेस दोनों ही चुनावी मैदान में जोर-शोर से प्रचार अभियान में जुटी हुई हैं। इसी बीच कांग्रेस ने नगर पालिका अध्यक्ष पद के लिए अपना चेहरा घोषित कर दिया है। कांग्रेस ने भूमिका पांचाल को वार्ड नंबर 23 से प्रत्याशी बनाया है और उन्हें नगर पालिका अध्यक्ष पद के लिए अपना चेहरा घोषित किया है। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यही है कि आखिर कांग्रेस ने भूमिका पांचाल पर ही भरोसा क्यों जताया और वार्ड नंबर 23 से उन्हें टिकट देने के पीछे पार्टी की क्या रणनीति है? क्या भूमिका पांचाल की राजनीतिक और सामाजिक सक्रियता, संगठन में पकड़ और स्थानीय स्तर पर उनकी मजबूत पहचान उनके चयन की वजह बनी है, या फिर कांग्रेस ने इस फैसले के जरिए किसी खास राजनीतिक और सामाजिक समीकरण को साधने की कोशिश की है? आखिर भूमिका पांचाल को अध्यक्ष पद का चेहरा बनाने के पीछे कांग्रेस की क्या सोच है और चुनाव को लेकर पार्टी की रणनीति क्या है? इन्हीं तमाम सवालों को लेकर नगर कांग्रेस अध्यक्ष ललित पांचाल से हुई खास मुलाकात में हमने जानने की कोशिश की कि कांग्रेस ने भूमिका पांचाल को ही नगर पालिका अध्यक्ष पद के लिए क्यों चुना, वार्ड नंबर 23 से उनकी उम्मीदवारी के पीछे क्या वजह है और आगामी नगर पालिका चुनाव में कांग्रेस भाजपा को किस तरह चुनौती देने की तैयारी कर रही है। देखिए नगर कांग्रेस अध्यक्ष ललित पांचाल से हुई खास बातचीत और जानिए भूमिका पांचाल को अध्यक्ष पद का चेहरा बनाने के पीछे की पूरी कहानी।
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    कांग्रेस ने वार्ड नं. 23 को ही क्यों चुना नपा अध्यक्ष के उम्मीदवार के रुप में जानिए वजह... 
नगर पालिका चुनाव 2026 पर खास खबर
नगर पालिका चुनाव 2026 को लेकर सियासत लगातार गरमाती जा रही है। भाजपा और कांग्रेस दोनों ही चुनावी मैदान में जोर-शोर से प्रचार अभियान में जुटी हुई हैं। इसी बीच कांग्रेस ने नगर पालिका अध्यक्ष पद के लिए अपना चेहरा घोषित कर दिया है। कांग्रेस ने भूमिका पांचाल को वार्ड नंबर 23 से प्रत्याशी बनाया है और उन्हें नगर पालिका अध्यक्ष पद के लिए अपना चेहरा घोषित किया है। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यही है कि आखिर कांग्रेस ने भूमिका पांचाल पर ही भरोसा क्यों जताया और वार्ड नंबर 23 से उन्हें टिकट देने के पीछे पार्टी की क्या रणनीति है? क्या भूमिका पांचाल की राजनीतिक और सामाजिक सक्रियता, संगठन में पकड़ और स्थानीय स्तर पर उनकी मजबूत पहचान उनके चयन की वजह बनी है, या फिर कांग्रेस ने इस फैसले के जरिए किसी खास राजनीतिक और सामाजिक समीकरण को साधने की कोशिश की है? आखिर भूमिका पांचाल को अध्यक्ष पद का चेहरा बनाने के पीछे कांग्रेस की क्या सोच है और चुनाव को लेकर पार्टी की रणनीति क्या है? इन्हीं तमाम सवालों को लेकर नगर कांग्रेस अध्यक्ष ललित पांचाल से हुई खास मुलाकात में हमने जानने की कोशिश की कि कांग्रेस ने भूमिका पांचाल को ही नगर पालिका अध्यक्ष पद के लिए क्यों चुना, वार्ड नंबर 23 से उनकी उम्मीदवारी के पीछे क्या वजह है और आगामी नगर पालिका चुनाव में कांग्रेस भाजपा को किस तरह चुनौती देने की तैयारी कर रही है। देखिए नगर कांग्रेस अध्यक्ष ललित पांचाल से हुई खास बातचीत और जानिए भूमिका पांचाल को अध्यक्ष पद का चेहरा बनाने के पीछे की पूरी कहानी।
    user_Sagwara live news
    Sagwara live news
    Local News Reporter सागवाड़ा, डूंगरपुर, राजस्थान•
    3 hrs ago
  • सीमलवाड़ा में भव्य रूप से मनाया गया जन्माष्टमी महोत्सव सीमलवाड़ा में जन्माष्टमी महोत्सव को लेकर युवाओं, बच्चों और महिलाओं में खासा उत्साह देखने को मिला। आयोजन को भव्य एवं शानदार बनाने के लिए पिछले सात दिनों से युवाओं की टोलियों ने घर-घर पहुंचकर लोगों से अधिक से अधिक संख्या में कार्यक्रम में शामिल होकर इसे सफल बनाने का आह्वान किया। इसी का परिणाम रहा कि आज सीमलवाड़ा प्रांगण में हजारों की संख्या में श्रद्धालु एवं आमजन एकत्रित हुए। कमेटी की ओर से विशेष रोशनी, आतिशबाजी सहित आकर्षक कार्यक्रमों का आयोजन किया गया। नासिक से मंगाए गए विशेष ढोल की धुन पर युवाओं की टोलियां महादेव मंदिर से जुलूस के रूप में रवाना हुईं। जुलूस ब्राह्मणवाड़ी, महाजनवाड़ी एवं मंडली रोड होते हुए विभिन्न स्थानों पर दही-हांडी फोड़ते हुए मुख्य दही-हांडी स्थल, के पास पहुंचा। मुख्य स्थल पर गरबा-रास का आयोजन किया गया, जिसमें बड़ी संख्या में युवाओं एवं महिलाओं ने उत्साहपूर्वक भाग लिया। इसके बाद दही-हांडी फोड़ने के लिए युवाओं ने कई प्रयास किए। करीब चार से पांच प्रयासों के बाद आखिरकार दही-हांडी फोड़ने में सफलता हासिल हुई, जिसके बाद पूरा परिसर जयकारों से गूंज उठा। कार्यक्रम के समापन पर राष्ट्रगान हुआ और तत्पश्चात उपस्थित श्रद्धालुओं को प्रसाद वितरित किया गया। पूरे आयोजन में युवाओं और आमजन का उत्साह देखते ही बन रहा था।
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    सीमलवाड़ा में भव्य रूप से मनाया गया जन्माष्टमी महोत्सव
सीमलवाड़ा में जन्माष्टमी महोत्सव को लेकर युवाओं, बच्चों और महिलाओं में खासा उत्साह देखने को मिला। आयोजन को भव्य एवं शानदार बनाने के लिए पिछले सात दिनों से युवाओं की टोलियों ने घर-घर पहुंचकर लोगों से अधिक से अधिक संख्या में कार्यक्रम में शामिल होकर इसे सफल बनाने का आह्वान किया।
इसी का परिणाम रहा कि आज सीमलवाड़ा प्रांगण में हजारों की संख्या में श्रद्धालु एवं आमजन एकत्रित हुए। कमेटी की ओर से विशेष रोशनी, आतिशबाजी सहित आकर्षक कार्यक्रमों का आयोजन किया गया।
नासिक से मंगाए गए विशेष ढोल की धुन पर युवाओं की टोलियां महादेव मंदिर से जुलूस के रूप में रवाना हुईं। जुलूस ब्राह्मणवाड़ी, महाजनवाड़ी एवं मंडली रोड होते हुए विभिन्न स्थानों पर दही-हांडी फोड़ते हुए मुख्य दही-हांडी स्थल, के पास पहुंचा।
मुख्य स्थल पर गरबा-रास का आयोजन किया गया, जिसमें बड़ी संख्या में युवाओं एवं महिलाओं ने उत्साहपूर्वक भाग लिया। इसके बाद दही-हांडी फोड़ने के लिए युवाओं ने कई प्रयास किए। करीब चार से पांच प्रयासों के बाद आखिरकार दही-हांडी फोड़ने में सफलता हासिल हुई, जिसके बाद पूरा परिसर जयकारों से गूंज उठा।
कार्यक्रम के समापन पर राष्ट्रगान हुआ और तत्पश्चात उपस्थित श्रद्धालुओं को प्रसाद वितरित किया गया। पूरे आयोजन में युवाओं और आमजन का उत्साह देखते ही बन रहा था।
    user_संजय भोई
    संजय भोई
    सीमलवाड़ा, डूंगरपुर, राजस्थान•
    32 min ago
  • श्रीगोवर्धननाथ जी सेवा समिति की नई कार्यकारिणी गठित, दिनेश पंड्या अध्यक्ष श्री गोवर्धननाथ जी सेवा समिति (त्रिमेस), घम्बोला की साधारण सभा की बैठक शुक्रवार को आयोजित हुई। बैठक में समिति के दो वर्ष का कार्यकाल पूर्ण होने के बाद चुनाव संबंधी चर्चा की गई। उपस्थित सदस्यों की सहमति से राजेश्वर पंड्या को चुनाव अधिकारी नामित किया गया। बैठक में उपस्थित सदस्यों ने सर्वसम्मति से नई कार्यकारिणी का गठन किया। इसमें दिनेश चंद्र पंड्या को अध्यक्ष, कन्हैयालाल पंड्या को उपाध्यक्ष, रजनीकांत पंड्या को सचिव, नंदकिशोर भट्ट को सहसचिव तथा भानुप्रसाद पंड्या को कोषाध्यक्ष सदस्य हँसमुख भट्ट को बनाया गया। वहीं कार्यकारिणी सदस्य के रूप में किरीट पंड्या के स्थान पर रमेशचंद्र पंड्या को सदस्य बनाया गया। पूर्व सदस्य देवीलाल मेहता के निधन के बाद उनके स्थान पर परिवार की ओर से विपिन मेहता को सदस्य नामित किया गया। बैठक में समिति के पदाधिकारियों एवं सदस्यों ने नई कार्यकारिणी को शुभकामनाएं दीं तथा समिति के सेवा कार्यों को आगे बढ़ाने पर चर्चा की। इस दौरान प्रदीप पंड्या,राजेंद्र शर्मा,सुभाष पंड्या, सुरेश पंड्या उपस्थित रहे।
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    श्रीगोवर्धननाथ जी सेवा समिति की नई कार्यकारिणी गठित, दिनेश पंड्या अध्यक्ष
श्री गोवर्धननाथ जी सेवा समिति (त्रिमेस), घम्बोला की साधारण सभा की बैठक शुक्रवार को आयोजित हुई। बैठक में समिति के दो वर्ष का कार्यकाल पूर्ण होने के बाद चुनाव संबंधी चर्चा की गई। उपस्थित सदस्यों की सहमति से राजेश्वर पंड्या को चुनाव अधिकारी नामित किया गया। बैठक में उपस्थित सदस्यों ने सर्वसम्मति से नई कार्यकारिणी का गठन किया। इसमें दिनेश चंद्र पंड्या को अध्यक्ष, कन्हैयालाल पंड्या को उपाध्यक्ष, रजनीकांत पंड्या को सचिव, नंदकिशोर भट्ट को सहसचिव तथा भानुप्रसाद पंड्या को कोषाध्यक्ष सदस्य हँसमुख  भट्ट को बनाया गया।
वहीं कार्यकारिणी सदस्य के रूप में किरीट पंड्या के स्थान पर रमेशचंद्र पंड्या को सदस्य बनाया गया। पूर्व सदस्य देवीलाल मेहता के निधन के बाद उनके स्थान पर परिवार की ओर से विपिन मेहता को सदस्य नामित किया गया। बैठक में समिति के पदाधिकारियों एवं सदस्यों ने नई कार्यकारिणी को शुभकामनाएं दीं तथा समिति के सेवा कार्यों को आगे बढ़ाने पर चर्चा की। इस दौरान प्रदीप पंड्या,राजेंद्र शर्मा,सुभाष पंड्या, सुरेश पंड्या  उपस्थित रहे।
    user_मुकेश कुमार आर. पंड्या
    मुकेश कुमार आर. पंड्या
    Local News Reporter सीमलवाड़ा, डूंगरपुर, राजस्थान•
    2 hrs ago
  • मोबाइल के युग में संस्कार व संस्कृति: खोती पहचान और आधुनिक चुनौतियाँ प्रख्यात संत रुद्रसेखर महाराज प्राइम न्यूज राजस्थान ब्यूरो रिपोर्ट धर्मेन्द्र कुमार सोनी कुशलगढ़ बांसवाड़ा राजस्थान के बांसवाड़ा जिले के गढ़ी तहसील के गांव सुजाजी का गडा के बरोडीया में जन्माष्टमी महोत्सव पर धर्म सभा को संबोधित करते हुए कहा कि आज हम एक ऐसे डिजिटल युग में जी रहे हैं जहाँ तकनीक हमारी बुनियादी ज़रूरतों का हिस्सा बन चुकी है। स्मार्टफोन आज हर व्यक्ति की हथेली में समाया हुआ एक ऐसा संसार है, जिसने पूरी दुनिया को एक क्लिक पर ला खड़ा किया है। मनोरंजन, शिक्षा और व्यापार के क्षेत्र में मोबाइल क्रांति ने अभूतपूर्व प्रगति की है। लेकिन इस तकनीकी विकास की एक भारी कीमत हमारे संस्कार और संस्कृति को चुकानी पड़ रही है। आज की युवा पीढ़ी और बच्चे मोबाइल स्क्रीन में इस कदर खो चुके हैं कि वे अपनी समृद्ध सांस्कृतिक विरासत और नैतिक मूल्यों से दूर होते जा रहे हैं। प्राचीन काल से ही भारतीय संस्कृति में 'अतिथि देवो भव:', बड़ों का आदर, संयुक्त परिवार की परंपरा और आपसी संवाद को सर्वोपरि माना गया है। लेकिन मोबाइल के इस युग में मानवीय संवेदनाएँ और आपसी संवाद सिमट कर रह गए हैं। एक ही घर में रहने वाले सदस्य एक साथ बैठकर बात करने के बजाय अपने-अपने मोबाइल फोन में व्यस्त रहते हैं। त्योहारों और उत्सवों की रौनक, जो कभी सामूहिक उल्लास का प्रतीक हुआ करती थी, अब केवल सोशल मीडिया स्टेटस और रील्स तक सीमित होकर रह गई है। लोग सीधे मिलने के बजाय केवल मैसेज भेजकर अपने कर्तव्यों की इतिश्री समझ लेते हैं। इस डिजिटल लत का सबसे गहरा और चिंताजनक प्रभाव हमारी नई पीढ़ी के संस्कारों पर पड़ रहा है। बच्चे बचपन से ही मोबाइल के आदी हो रहे हैं, जिसके कारण वे दादा-दादी या नाना-नानी की उन कहानियों से महरुम हैं जो उन्हें जीवन के नैतिक मूल्य सिखाती थीं। सहनशीलता, धैर्य, त्याग और सहभागिता जैसे संस्कार, जो कभी परिवार के बीच रहकर सीखे जाते थे, अब एकाकीपन और इंटरनेट के वर्चुअल वर्ल्ड में कहीं खो गए हैं। सोशल मीडिया पर चल रही अंधाधुंध प्रतिस्पर्धा और रील्स बनाने की होड़ में युवा पीढ़ी शालीनता और मर्यादा की सीमाएं लांघ रही है, जो हमारी संस्कृति के बिल्कुल विपरीत है। इसके अतिरिक्त, मोबाइल के अत्यधिक उपयोग ने हमारी भाषा, पहनावे और जीवनशैली को भी प्रभावित किया है। पश्चिमी संस्कृति का अंधानुकरण और इंटरनेट पर परोसी जा रही अनियंत्रित सामग्री हमारे पारंपरिक मूल्यों को कमजोर कर रही है। लोग अपनी मातृभाषा और लोक कलाओं को भूलकर एक आभासी और दिखावे की दुनिया को अपना रहे हैं। निष्कर्ष के तौर पर, मोबाइल फोन अपने आप में बुरा नहीं है, यह आधुनिक विज्ञान का एक बेहतरीन उपहार है। समस्या इसके अनियंत्रित उपयोग और हमारी निर्भरता में है। यदि हम अपनी संस्कृति और संस्कारों को बचाना चाहते हैं, तो हमें तकनीक और परंपरा के बीच एक संतुलन बनाना होगा। परिवारों में डिजिटल डिटॉक्स (कुछ समय के लिए मोबाइल से दूरी) की आदत डालनी होगी और बच्चों को गैजेट्स के बजाय अपने इतिहास, त्योहारों और पारिवारिक मूल्यों से जोड़ना होगा। विकास ज़रूरी है, लेकिन अपनी जड़ों को खोकर पाया गया विकास कभी भी कल्याणकारी नहीं हो सकता। यदि आप इस आर्टिकल में कुछ बदलाव करना चाहते हैं, तो मुझे बता सकते हैं:
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    मोबाइल के युग में संस्कार व संस्कृति: खोती पहचान और आधुनिक चुनौतियाँ 
प्रख्यात संत रुद्रसेखर महाराज 
प्राइम न्यूज राजस्थान 
ब्यूरो रिपोर्ट धर्मेन्द्र कुमार सोनी कुशलगढ़ बांसवाड़ा 
राजस्थान के बांसवाड़ा जिले के गढ़ी तहसील के गांव सुजाजी का गडा के बरोडीया में जन्माष्टमी महोत्सव पर धर्म सभा को संबोधित करते हुए कहा कि 
आज हम एक ऐसे डिजिटल युग में जी रहे हैं जहाँ तकनीक हमारी बुनियादी ज़रूरतों का हिस्सा बन चुकी है। स्मार्टफोन आज हर व्यक्ति की हथेली में समाया हुआ एक ऐसा संसार है, जिसने पूरी दुनिया को एक क्लिक पर ला खड़ा किया है। मनोरंजन, शिक्षा और व्यापार के क्षेत्र में मोबाइल क्रांति ने अभूतपूर्व प्रगति की है। लेकिन इस तकनीकी विकास की एक भारी कीमत हमारे संस्कार और संस्कृति को चुकानी पड़ रही है। आज की युवा पीढ़ी और बच्चे मोबाइल स्क्रीन में इस कदर खो चुके हैं कि वे अपनी समृद्ध सांस्कृतिक विरासत और नैतिक मूल्यों से दूर होते जा रहे हैं। 
प्राचीन काल से ही भारतीय संस्कृति में 'अतिथि देवो भव:', बड़ों का आदर, संयुक्त परिवार की परंपरा और आपसी संवाद को सर्वोपरि माना गया है। लेकिन मोबाइल के इस युग में मानवीय संवेदनाएँ और आपसी संवाद सिमट कर रह गए हैं। एक ही घर में रहने वाले सदस्य एक साथ बैठकर बात करने के बजाय अपने-अपने मोबाइल फोन में व्यस्त रहते हैं। त्योहारों और उत्सवों की रौनक, जो कभी सामूहिक उल्लास का प्रतीक हुआ करती थी, अब केवल सोशल मीडिया स्टेटस और रील्स तक सीमित होकर रह गई है। लोग सीधे मिलने के बजाय केवल मैसेज भेजकर अपने कर्तव्यों की इतिश्री समझ लेते हैं। 
इस डिजिटल लत का सबसे गहरा और चिंताजनक प्रभाव हमारी नई पीढ़ी के संस्कारों पर पड़ रहा है। बच्चे बचपन से ही मोबाइल के आदी हो रहे हैं, जिसके कारण वे दादा-दादी या नाना-नानी की उन कहानियों से महरुम हैं जो उन्हें जीवन के नैतिक मूल्य सिखाती थीं। सहनशीलता, धैर्य, त्याग और सहभागिता जैसे संस्कार, जो कभी परिवार के बीच रहकर सीखे जाते थे, अब एकाकीपन और इंटरनेट के वर्चुअल वर्ल्ड में कहीं खो गए हैं। सोशल मीडिया पर चल रही अंधाधुंध प्रतिस्पर्धा और रील्स बनाने की होड़ में युवा पीढ़ी शालीनता और मर्यादा की सीमाएं लांघ रही है, जो हमारी संस्कृति के बिल्कुल विपरीत है। 
इसके अतिरिक्त, मोबाइल के अत्यधिक उपयोग ने हमारी भाषा, पहनावे और जीवनशैली को भी प्रभावित किया है। पश्चिमी संस्कृति का अंधानुकरण और इंटरनेट पर परोसी जा रही अनियंत्रित सामग्री हमारे पारंपरिक मूल्यों को कमजोर कर रही है। लोग अपनी मातृभाषा और लोक कलाओं को भूलकर एक आभासी और दिखावे की दुनिया को अपना रहे हैं। 
निष्कर्ष के तौर पर, मोबाइल फोन अपने आप में बुरा नहीं है, यह आधुनिक विज्ञान का एक बेहतरीन उपहार है। समस्या इसके अनियंत्रित उपयोग और हमारी निर्भरता में है। यदि हम अपनी संस्कृति और संस्कारों को बचाना चाहते हैं, तो हमें तकनीक और परंपरा के बीच एक संतुलन बनाना होगा। परिवारों में डिजिटल डिटॉक्स (कुछ समय के लिए मोबाइल से दूरी) की आदत डालनी होगी और बच्चों को गैजेट्स के बजाय अपने इतिहास, त्योहारों और पारिवारिक मूल्यों से जोड़ना होगा। विकास ज़रूरी है, लेकिन अपनी जड़ों को खोकर पाया गया विकास कभी भी कल्याणकारी नहीं हो सकता। 
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    user_Dharmendra Soni
    Dharmendra Soni
    कुशलगढ़, बांसवाड़ा, राजस्थान•
    4 hrs ago
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