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जिस प्रतिमा को खुली आंखों से देखते ही छिन जाती है रोशनी... आखिर रक्षाबंधन पर क्यों लड़ा जाता है लहू और पत्थरों का वो खौफनाक युद्ध? जानिए देवीधुरा का अनसुलझा रहस्य! जिस प्रतिमा को खुली आंखों से देखते ही छिन जाती है रोशनी... आखिर रक्षाबंधन पर क्यों लड़ा जाता है लहू और पत्थरों का वो खौफनाक युद्ध? जानिए देवीधुरा का अनसुलझा रहस्य! देवीधूरा/चम्पावत अटूट आस्था व श्रद्धा का प्रतीक देवीधुरा का आसाड़ी कौतिक मेला आज भी धूमधाम से मनाया जाता है। पवित्र पहाड़ों की गोद में स्थित माता बाराही मंदिर का अपना विशेष चमत्कारिक महत्व होने से यह क्षेत्र विशेष श्रद्धा व भक्ति का केन्द्र माना जाता है। श्रद्वा व भक्ति के इस केन्द्र के चारों ओर निहारने पर प्रकृति के विहंगम छटाओं के दर्शन व हिमाच्छादित पर्वत श्रृंखलाओं की मनोरम वादियां दिखलाई देती हैं। देवीधुरा के विहंगम छटाओं के मध्य जगत जननी महामाया का यह मंदिर घने देवदार के वृक्षों के मध्य स्थित है। इस मंदिर क्षेत्र को चाहे पौराणिक दृष्टि से देखा जाय या धार्मिक दृष्टि से, हर स्थिति में यह क्षेत्र मन मोहने में पूर्णतया सक्षम है। जगत जननी बाराही देवी का यह मंदिर अनेक रहस्यमयी कथाओं को अपने आप में समेटा हुआ है। हिमालय के आंचल में बसा हरे-भरे वृक्षों के मध्य निर्मित यह मंदिर भक्तजनों के लिए जगत माता की ओर से अनुपम भेंट है। कहा जाता है कि जो भी भक्तजन श्रद्वा पूर्वक इस दरबार में अराधना के श्रद्वा पुष्प भेंट करता है, उसके रोग, शोक, दुःख, दरिद्र एवं विपदाओं का हरण हो जाता है और अतुल ऐश्वर्य एवं सुख की प्राप्ति होती है। यहां पर श्रद्वा एवं विनयता से की गयी पूजा एवं मांगी गयी मनौती कभी भी व्यर्थ नहीं जाती है। इसलिए प्रतिवर्ष श्रावणी पूर्णिमा के दिन लाखों की संख्या में भक्तजन यहां पधारते हैं। देशी-विदेशी पर्यटक इस क्षेत्र में आकर माता बाराही देवी के मंदिर के मनोरम दृश्यों से आकर्षित होकर कई-कई दिनों तक इस क्षेत्र में विचरण करते हैं और प्राकृतिक सौन्दर्य का आनन्द लेते हैं। क्योंकि यहां के पर्वतमालाओं के चारों ओर देवदार, बांज, चीड़, काफल आदि के भरपूर वृक्ष हैं। जगदम्बिके बाराही माता का यह मंदिर श्रावणी पूर्णिमा के लिए विशेष रूप से प्रसिद्ध है। रहस्यों व किवदन्तियों से भरा इस मंदिर क्षेत्र का निर्माण कब हुआ यह आज भी रहस्य का विषय है। मंदिर की निर्मित कलाकृति तीन शिलाखण्ड व एक अलौकिक गुफा जिसके भीतर झुककर प्रवेश किया जाता है और व्याप्त शक्ति पिण्ड महान आश्चर्य का प्रतीक है। इस मंदिर में श्रावणी पूर्णिमा के दिन बग्याल युद्ध पत्थरों की एक दूसरे के ऊपर मार के लिए प्रसिद्ध है। रूद्र-चण्डी को रक्तपान से खुश करने हेतु यहां पर यह कौतिक होता है जिसे बग्वाल कौतिक भी कहते हैं, जहां समय की बदलती धारा पर अब फलों से युद्ध किया जाता है। बराह पुराण के अनुसार यहां पर पहले नरबलि प्रथा का प्रचलन था। इसी प्रथा के चलते एक बार समय के चक्रव्यूह के साथ एक दिन जब चमियाल खाम की एक वृद्ध महिला के इकलौते पौत्र की बारी आयी तो वंशनाश व मोह की व्यथा से व्याकुल होकर महामाया जगदम्बिके की प्रेरणा से उसने माता की घोर तपस्या की और तपस्या से प्रसन्न होकर नर बलि के स्थान पर माता ने अन्य विकल्प खोजने को कहा। तभी क्षेत्र के चारों खामों की सहमति पर देवी को प्रसन्न करने के लिए एक दूसरे पर पत्थरों की मार करके एक व्यक्ति के बराबर खून निकालकर देवी के गणों को तृप्त करने का निर्णय लिया गया। तभी से बग्वाल जिसे पत्थरों की मार वाला मेला भी कहते हैं, की परम्परा चली आ रही है, जो अब फलों के युद्ध के रूप में बदल चुकी है। एक अन्य कथा के अनुसार यह मेला पहले धुर्का देवी के दुर्गा मंदिर में होता था, जहां पर आज भी बग्वाल की परम्परा की स्मृति का मैदान है। लेकिन बाद में देवी इच्छा व शक्ति की महिमा से देवीधुरा के बाराही मंदिर में बग्वाल का आयोजन हुआ। किवदन्तियां या कथाएं भले ही कुछ भी हों, किन्तु पुराणों के अनुसार महान आश्चर्य यह है कि बाराही माता में वज्र के समान तेज है। तेज इतना है कि आज तक कोई भी प्राणी खुली आंखों से माता को नहीं निहार पाया, जिसने भी यह दुस्साहस किया, वह अंधा हो गया। इसलिए एक तांबे के बक्से में मां बाराही को विराजमान किया गया है। इस बक्से में तीन खाने बताये जाते हैं जिसमें महाबाराही, महाकाली, महासरस्वती के रूप में जगदम्बिके विद्यमान हैं। महामाया जगत जननी का यह रहस्य आज तक कोई जान नहीं पाया है। अनेक पौराणिक एवं धार्मिक गाथाओं को अपने अतीत में समेटे हुए देवीधूरा मेला सैकड़ों वर्षों से श्रद्धालुओं के आकर्षण का केन्द्र बना हुआ है। हिमालय क्षेत्र सदा से ही शिव-शक्ति की उपासनाओं का केन्द्र रहा है किन्तु चमत्कारिक मान्यताओं के कारण देवीधूरा मेले का अपना अलग ही महत्व रहा है। देवीधूरा का शाब्दिक अर्थ देवी का वन है। भौगोलिक दृष्टि से देवदार, बांज, बुरांज, चीड़ आदि सुरम्य वनों से ढका यह मनमोहक स्थल है। देवीधूरा श्रावण पूर्णिमा के लिए उत्तर भारत में प्रसिद्ध है। दूर-दूर से पैदल दूरी तय कर श्रद्धालु भक्तों का सैलाब यहां उमड़ पड़ता है। उत्तर भारत में देवीधूरा वर्तमान युग में पाषाण युद्ध बग्वाल पत्थरों की एक-दूसरे के ऊपर मार के लिए प्रसिद्ध है। वैसे मध्य प्रदेश के पांढुरना एवं सरगांव के लोग लोक परम्परा के अनुसार आज भी मां चण्डी को खुश करने के लिए आपस में पत्थरों को मारकर देवी को रक्तपान कराते हैं। वहां का मेला जहां गोटमार नाम से प्रसिद्ध है, तो देवीधूरा में बग्वाल का मेला या आसाड़ी का कौतिक के नाम से विश्व प्रसिद्ध है। रक्षाबंधन के दूसरे दिन तांबे के बक्से में रखी गई मूर्तियों को स्नान कराने की अलग ही परम्परा है। गहड़वाल खाम के मुखिया के पास बक्से की चाबी रहती है, जिसे वह वर्ष में इसी दिन अन्य खामों के मुखियों को सौंपते हैं। एक पुजारी व बागड़ जाति के एक व्यक्ति की आंखों पर काली पट्टियां बांधी जाती हैं। तांबे के बक्से व पट्टी बांधे व्यक्ति के ऊपर काला कम्बल डाला जाता है। तब बक्से को खोलकर पहले मां बाराही को हाथों के सहारे दूध में स्नान कराया जाता है। बाद में इस तांबे के बक्से को भव्य रूप से सजाकर डोले में रखकर मंदिर से कुछ ही दूरी पर ऊंचाई में स्थित मुचुकन्द ऋषि के आश्रम में जुलूस के रूप में लाया जाता है। चम्पावत जनपद मुख्यालय से मात्र 57 किमी. की दूरी पर नैनीताल व अल्मोड़ा जनपद की सीमाओं से लगा यह स्थल देवीधूरा न केवल प्राकृतिक सौन्दर्य से भरपूर है अपितु ‘मां बाराही का पवित्र धाम’ होने के कारण इस स्थान का अत्यधिक धार्मिक महत्व भी है। स्वयं में असंख्य पौराणिक गाथाओं को समेटे चारों ओर से देवदार के हरे-भरे वृक्षों से घिरा, समुद्र तट से लगभग 7000 फीट की ऊंचाई पर स्थित व निकटतम रेलवे स्टेशन काठगोदाम से 125 किमी. की दूरी पर बसा देवीधूरा एक अत्यन्त रमणीय व मनोहारी स्थल है। कुमाऊंनी भाषा में धूरा का अर्थ ‘सघन वन’ है। इसी शब्द से देवीधूरा शब्द की उत्पत्ति हुई है। ‘देवी’ अर्थात ‘बाराही देवी’ और ‘धूरा’ अर्थात ‘सघन वन’, यानी वह सघन वन जहां बाराही देवी का मंदिर स्थित है। यहां से हिमालय की हिमाच्छादित पर्वत श्रृंखलाओं के साक्षात् दर्शन किये जा सकते हैं। समस्त उत्तर भारत में लोकप्रिय हो चुके बाराही मंदिर के विषय में इसी तरह की अनेक लोकगाथाएं तथा किवदन्तियां प्रचलित हैं, पर मंदिर के निर्माण के समय व तत्कालीन परिस्थितियों के विषय में आज भी निश्चित रूप से कोई तथ्य उपलब्ध नहीं हैं। तीन विशाल शिलाखण्डों के बीच स्वतः ही एक मंदिर निर्मित हुआ है, जिसमें जाने के लिए एक संकरी गुफा से होकर जाना पड़ता है। इस गुफा में अत्यन्त कठिनाई से झुककर प्रवेश करना पड़ता है व बचने का कितना ही प्रयास किया जाये, शरीर का कोई न कोई भाग पत्थरों को अवश्य छू जाता है। पर यह एक आश्चर्य का विषय है कि जब एक मोटे-तगड़े भैंसे को इसी गुफा से होकर गुजरना पड़ता है, तो वह बिना दीवारों को स्पर्श किये आराम से निकल जाता है। मंदिर की दायीं ओर विशाल पत्थर के बीच एक चौकोर गहचर है, जिसमें सपाट पत्थर पर प्राकृतिक रूप से बना हुआ शिवलिंग है। लोकगाथा के अनुसार पहले बाराही देवी की उपरोक्त प्रतिमा सोने की बनी थी। पर एक बार एक पुजारी की नीयत में खोट उत्पन्न हो गया और वह यह देखने के लिए कि मूर्ति में कितना सोना है, उस मूर्ति को तुड़वाने एक सुनार के पास ले गया। सुनार ने मूर्ति पर प्रहार करने हेतु जैसे ही हथौड़ी उठाई, वैसे ही मूर्ति से रक्त की धारा फूट पड़ी और मूर्ति अदृश्य होकर पुनः मंदिर में आ गई। कहा जाता है कि तब से उस मूर्ति को जो भी देखता है वह अंधा हो जाता है। एक सप्ताह तक चलने वाले आषाढ़ी कौतिकी मेले की दिन-प्रतिदिन बढ़ रही प्रतिष्ठा के चलते अब जिला प्रशासन ने मेले में आने वाले श्रद्धालुओं की सुविधाओं के इंतजाम अपने हाथ में ले लिए हैं। युद्ध से पूर्व विधि-विधान तथा बाजे-गाजे के साथ की गई पूजा के बाद मंदिर के मुख्य पुजारी द्वारा किये गये शंखनाद से युद्ध प्रारम्भ होता है। युद्ध में आज तक किसी भी व्यक्ति की मौत नहीं हुई। ऐतिहासिक युद्ध में गहड़वाल खाम, लमगड़िया खाम, वालिग खाम तथा चम्याल खाम नामक कुल 4 खेमों के सैकड़ों रणबांकुरे बने योद्धा पूरब-पश्चिम में 2-2 खेमों में बंटकर मुख्य पुजारी द्वारा युद्ध रोकने की घोषणा तक युद्ध लड़ते हैं। युद्ध में बांस की बनी फरों (छतरीनुमा ढाल) को योद्धा अपनी सुरक्षा हेतु इस्तेमाल करते हैं। युद्ध में भाग लेने वाले योद्धाओं में कभी भी आपस में कोई दुश्मनी नहीं होती है। एक अन्य कथा के अनुसार कुरुक्षेत्र के मैदान में महाभारत युद्ध में भी इस क्षेत्र के लोगों द्वारा ही युद्ध किया गया था; इस परम्परा को जीवित रखने के लिए भी यह युद्ध खेला जाता है। श्रावण मास के शुक्ल पक्ष एकादशी से प्रारम्भ होकर भाद्रपद मास कृष्ण पक्ष की द्वितीया तक चलने वाले इस मेले के दौरान रक्षाबंधन के दिन होने वाले बग्वाल में देवीधुरा के आसपास के ढरांज, कोहला, कटना, स्यूड़ा, मथेला, छाना, सिलपड़, दादिनी, गवई, मौरना, जाख, अर्नपा, रिखौली, बसान, पाटी इत्यादि अनेक गांवों के ग्रामीण शामिल होते हैं। इस युद्ध में शामिल होने वाला योद्धा एक माह पूर्व से ही व्रत इत्यादि कर स्वयं को शुद्ध करता है। युद्ध में भाग लेने वाले योद्धा की पवित्रता हेतु अपनी पत्नी तक के हाथ का खाना भी खाना वर्जित होता है। योद्धा की शुद्धता ही उसे गंभीर रूप से घायल होने से बचाती है। पर्वतीय क्षेत्र में उगने वाली जहरीली बिच्छू घास से घायल हुए योद्धा का उपचार किया जाता है। युद्ध में प्रत्येक खाम का नेतृत्व सेनापति की भूमिका निभाने वाला प्रधान करता है। युद्ध लड़ रहे योद्धाओं की मदद हेतु आसपास के ग्रामीण मददगार बनकर योद्धा के रूप में खोलीखाड़ मैदान में उतरते हैं। खाम के प्रधान की नियुक्ति वंश के आधार पर की जाती है। मंदिर परिसर में चलने वाले बग्वाल को आसपास के ग्रामीण तथा शहरी क्षेत्रों में भी पूर्ण सम्मान की दृष्टि से देखा जाता है। इस दौरान यदि आसपास कहीं किसी की मौत हो जाये तो उसका दाह-संस्कार बग्वाल समाप्त होने के बाद ही किया जाता है। कालांतर में अब यहां पर पत्थरों के स्थान पर फलों और फूलों से युद्ध की परम्परा निभाई जाती है। @ रमाकांत पन्त

7 hrs ago
user_शैल शक्ति
शैल शक्ति
Local News Reporter लालकुआँ, नैनीताल, उत्तराखंड•
7 hrs ago
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जिस प्रतिमा को खुली आंखों से देखते ही छिन जाती है रोशनी... आखिर रक्षाबंधन पर क्यों लड़ा जाता है लहू और पत्थरों का वो खौफनाक युद्ध? जानिए देवीधुरा का अनसुलझा रहस्य! जिस प्रतिमा को खुली आंखों से देखते ही छिन जाती है रोशनी... आखिर रक्षाबंधन पर क्यों लड़ा जाता है लहू और पत्थरों का वो खौफनाक युद्ध? जानिए देवीधुरा का अनसुलझा रहस्य! देवीधूरा/चम्पावत अटूट आस्था व श्रद्धा का प्रतीक देवीधुरा का आसाड़ी कौतिक मेला आज भी धूमधाम से मनाया जाता है। पवित्र पहाड़ों की गोद में स्थित माता बाराही मंदिर का अपना विशेष चमत्कारिक महत्व होने से यह क्षेत्र विशेष श्रद्धा व भक्ति का केन्द्र माना जाता है। श्रद्वा व भक्ति के इस केन्द्र के चारों ओर निहारने पर प्रकृति के विहंगम छटाओं के दर्शन व हिमाच्छादित पर्वत श्रृंखलाओं की मनोरम वादियां दिखलाई देती हैं। देवीधुरा के विहंगम छटाओं के मध्य जगत जननी महामाया का यह मंदिर घने देवदार के वृक्षों के मध्य स्थित है। इस मंदिर क्षेत्र को चाहे पौराणिक दृष्टि से देखा जाय या धार्मिक दृष्टि से, हर स्थिति में यह क्षेत्र मन मोहने में पूर्णतया सक्षम है। जगत जननी बाराही देवी का यह मंदिर अनेक रहस्यमयी कथाओं को अपने आप में समेटा हुआ है। हिमालय के आंचल में बसा हरे-भरे वृक्षों के मध्य निर्मित यह मंदिर भक्तजनों के लिए जगत माता की ओर से अनुपम भेंट है। कहा जाता है कि जो भी भक्तजन श्रद्वा पूर्वक इस दरबार में अराधना के श्रद्वा पुष्प भेंट करता है, उसके रोग, शोक, दुःख, दरिद्र एवं विपदाओं का हरण हो जाता है और अतुल ऐश्वर्य एवं सुख की प्राप्ति होती है। यहां पर श्रद्वा एवं विनयता से की गयी पूजा एवं मांगी गयी मनौती कभी भी व्यर्थ नहीं जाती है। इसलिए प्रतिवर्ष श्रावणी पूर्णिमा के दिन लाखों की संख्या में भक्तजन यहां पधारते हैं। देशी-विदेशी पर्यटक इस क्षेत्र में आकर माता बाराही देवी के मंदिर के मनोरम दृश्यों से आकर्षित होकर कई-कई दिनों तक इस क्षेत्र में विचरण करते हैं और प्राकृतिक सौन्दर्य का आनन्द लेते हैं। क्योंकि यहां के पर्वतमालाओं के चारों ओर देवदार, बांज, चीड़, काफल आदि के भरपूर वृक्ष हैं। जगदम्बिके बाराही माता का यह मंदिर श्रावणी पूर्णिमा के लिए विशेष रूप से प्रसिद्ध है। रहस्यों व किवदन्तियों से भरा इस मंदिर क्षेत्र का निर्माण कब हुआ यह आज भी रहस्य का विषय है। मंदिर की निर्मित कलाकृति तीन शिलाखण्ड व एक अलौकिक गुफा जिसके भीतर झुककर प्रवेश किया जाता है और व्याप्त शक्ति पिण्ड महान आश्चर्य का प्रतीक है। इस मंदिर में श्रावणी पूर्णिमा के दिन बग्याल युद्ध पत्थरों की एक दूसरे के ऊपर मार के लिए प्रसिद्ध है। रूद्र-चण्डी को रक्तपान से खुश करने हेतु यहां पर यह कौतिक होता है जिसे बग्वाल कौतिक भी कहते हैं, जहां समय की बदलती धारा पर अब फलों से युद्ध किया जाता है। बराह पुराण के अनुसार यहां पर पहले नरबलि प्रथा का प्रचलन था। इसी प्रथा के चलते एक बार समय के चक्रव्यूह के साथ एक दिन जब चमियाल खाम की एक वृद्ध महिला के इकलौते पौत्र की बारी आयी तो वंशनाश व मोह की व्यथा से व्याकुल होकर महामाया जगदम्बिके की प्रेरणा से उसने माता की घोर तपस्या की और तपस्या से प्रसन्न होकर नर बलि के स्थान पर माता ने अन्य विकल्प खोजने को कहा। तभी क्षेत्र के चारों खामों की सहमति पर देवी को प्रसन्न करने के लिए एक दूसरे पर पत्थरों की मार करके एक व्यक्ति के बराबर खून निकालकर देवी के गणों को तृप्त करने का निर्णय लिया गया। तभी से बग्वाल जिसे पत्थरों की मार वाला मेला भी कहते हैं, की परम्परा चली आ रही है, जो अब फलों के युद्ध के रूप में बदल चुकी है। एक अन्य कथा के अनुसार यह मेला पहले धुर्का देवी के दुर्गा मंदिर में होता था, जहां पर आज भी बग्वाल की परम्परा की स्मृति का मैदान है। लेकिन बाद में देवी इच्छा व शक्ति की महिमा से देवीधुरा के बाराही मंदिर में बग्वाल का आयोजन हुआ। किवदन्तियां या कथाएं भले ही कुछ भी हों, किन्तु पुराणों के अनुसार महान आश्चर्य यह है कि बाराही माता में वज्र के समान तेज है। तेज इतना है कि आज तक कोई भी प्राणी खुली आंखों से माता को नहीं निहार पाया, जिसने भी यह दुस्साहस किया, वह अंधा हो गया। इसलिए एक तांबे के बक्से में मां बाराही को विराजमान किया गया है। इस बक्से में तीन खाने बताये जाते हैं जिसमें महाबाराही, महाकाली, महासरस्वती के रूप में जगदम्बिके विद्यमान हैं। महामाया जगत जननी का यह रहस्य आज तक कोई जान नहीं पाया है। अनेक पौराणिक एवं धार्मिक गाथाओं को अपने अतीत में समेटे हुए देवीधूरा मेला सैकड़ों वर्षों से श्रद्धालुओं के आकर्षण का केन्द्र बना हुआ है। हिमालय क्षेत्र सदा से ही शिव-शक्ति की उपासनाओं का केन्द्र रहा है किन्तु चमत्कारिक मान्यताओं के कारण देवीधूरा मेले का अपना अलग ही महत्व रहा है। देवीधूरा का शाब्दिक अर्थ देवी का वन है। भौगोलिक दृष्टि से देवदार, बांज, बुरांज, चीड़ आदि सुरम्य वनों से ढका यह मनमोहक स्थल है। देवीधूरा श्रावण पूर्णिमा के लिए उत्तर भारत में प्रसिद्ध है। दूर-दूर से पैदल दूरी तय कर श्रद्धालु भक्तों का सैलाब यहां उमड़ पड़ता है। उत्तर भारत में देवीधूरा वर्तमान युग में पाषाण युद्ध बग्वाल पत्थरों की एक-दूसरे के ऊपर मार के लिए प्रसिद्ध है। वैसे मध्य प्रदेश के पांढुरना एवं सरगांव के लोग लोक परम्परा के अनुसार आज भी मां चण्डी को खुश करने के लिए आपस में पत्थरों को मारकर देवी को रक्तपान कराते हैं। वहां का मेला जहां गोटमार नाम से प्रसिद्ध है, तो देवीधूरा में बग्वाल का मेला या आसाड़ी का कौतिक के नाम से विश्व प्रसिद्ध है। रक्षाबंधन के दूसरे दिन तांबे के बक्से में रखी गई मूर्तियों को

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स्नान कराने की अलग ही परम्परा है। गहड़वाल खाम के मुखिया के पास बक्से की चाबी रहती है, जिसे वह वर्ष में इसी दिन अन्य खामों के मुखियों को सौंपते हैं। एक पुजारी व बागड़ जाति के एक व्यक्ति की आंखों पर काली पट्टियां बांधी जाती हैं। तांबे के बक्से व पट्टी बांधे व्यक्ति के ऊपर काला कम्बल डाला जाता है। तब बक्से को खोलकर पहले मां बाराही को हाथों के सहारे दूध में स्नान कराया जाता है। बाद में इस तांबे के बक्से को भव्य रूप से सजाकर डोले में रखकर मंदिर से कुछ ही दूरी पर ऊंचाई में स्थित मुचुकन्द ऋषि के आश्रम में जुलूस के रूप में लाया जाता है। चम्पावत जनपद मुख्यालय से मात्र 57 किमी. की दूरी पर नैनीताल व अल्मोड़ा जनपद की सीमाओं से लगा यह स्थल देवीधूरा न केवल प्राकृतिक सौन्दर्य से भरपूर है अपितु ‘मां बाराही का पवित्र धाम’ होने के कारण इस स्थान का अत्यधिक धार्मिक महत्व भी है। स्वयं में असंख्य पौराणिक गाथाओं को समेटे चारों ओर से देवदार के हरे-भरे वृक्षों से घिरा, समुद्र तट से लगभग 7000 फीट की ऊंचाई पर स्थित व निकटतम रेलवे स्टेशन काठगोदाम से 125 किमी. की दूरी पर बसा देवीधूरा एक अत्यन्त रमणीय व मनोहारी स्थल है। कुमाऊंनी भाषा में धूरा का अर्थ ‘सघन वन’ है। इसी शब्द से देवीधूरा शब्द की उत्पत्ति हुई है। ‘देवी’ अर्थात ‘बाराही देवी’ और ‘धूरा’ अर्थात ‘सघन वन’, यानी वह सघन वन जहां बाराही देवी का मंदिर स्थित है। यहां से हिमालय की हिमाच्छादित पर्वत श्रृंखलाओं के साक्षात् दर्शन किये जा सकते हैं। समस्त उत्तर भारत में लोकप्रिय हो चुके बाराही मंदिर के विषय में इसी तरह की अनेक लोकगाथाएं तथा किवदन्तियां प्रचलित हैं, पर मंदिर के निर्माण के समय व तत्कालीन परिस्थितियों के विषय में आज भी निश्चित रूप से कोई तथ्य उपलब्ध नहीं हैं। तीन विशाल शिलाखण्डों के बीच स्वतः ही एक मंदिर निर्मित हुआ है, जिसमें जाने के लिए एक संकरी गुफा से होकर जाना पड़ता है। इस गुफा में अत्यन्त कठिनाई से झुककर प्रवेश करना पड़ता है व बचने का कितना ही प्रयास किया जाये, शरीर का कोई न कोई भाग पत्थरों को अवश्य छू जाता है। पर यह एक आश्चर्य का विषय है कि जब एक मोटे-तगड़े भैंसे को इसी गुफा से होकर गुजरना पड़ता है, तो वह बिना दीवारों को स्पर्श किये आराम से निकल जाता है। मंदिर की दायीं ओर विशाल पत्थर के बीच एक चौकोर गहचर है, जिसमें सपाट पत्थर पर प्राकृतिक रूप से बना हुआ शिवलिंग है। लोकगाथा के अनुसार पहले बाराही देवी की उपरोक्त प्रतिमा सोने की बनी थी। पर एक बार एक पुजारी की नीयत में खोट उत्पन्न हो गया और वह यह देखने के लिए कि मूर्ति में कितना सोना है, उस मूर्ति को तुड़वाने एक सुनार के पास ले गया। सुनार ने मूर्ति पर प्रहार करने हेतु जैसे ही हथौड़ी उठाई, वैसे ही मूर्ति से रक्त की धारा फूट पड़ी और मूर्ति अदृश्य होकर पुनः मंदिर में आ गई। कहा जाता है कि तब से उस मूर्ति को जो भी देखता है वह अंधा हो जाता है। एक सप्ताह तक चलने वाले आषाढ़ी कौतिकी मेले की दिन-प्रतिदिन बढ़ रही प्रतिष्ठा के चलते अब जिला प्रशासन ने मेले में आने वाले श्रद्धालुओं की सुविधाओं के इंतजाम अपने हाथ में ले लिए हैं। युद्ध से पूर्व विधि-विधान तथा बाजे-गाजे के साथ की गई पूजा के बाद मंदिर के मुख्य पुजारी द्वारा किये गये शंखनाद से युद्ध प्रारम्भ होता है। युद्ध में आज तक किसी भी व्यक्ति की मौत नहीं हुई। ऐतिहासिक युद्ध में गहड़वाल खाम, लमगड़िया खाम, वालिग खाम तथा चम्याल खाम नामक कुल 4 खेमों के सैकड़ों रणबांकुरे बने योद्धा पूरब-पश्चिम में 2-2 खेमों में बंटकर मुख्य पुजारी द्वारा युद्ध रोकने की घोषणा तक युद्ध लड़ते हैं। युद्ध में बांस की बनी फरों (छतरीनुमा ढाल) को योद्धा अपनी सुरक्षा हेतु इस्तेमाल करते हैं। युद्ध में भाग लेने वाले योद्धाओं में कभी भी आपस में कोई दुश्मनी नहीं होती है। एक अन्य कथा के अनुसार कुरुक्षेत्र के मैदान में महाभारत युद्ध में भी इस क्षेत्र के लोगों द्वारा ही युद्ध किया गया था; इस परम्परा को जीवित रखने के लिए भी यह युद्ध खेला जाता है। श्रावण मास के शुक्ल पक्ष एकादशी से प्रारम्भ होकर भाद्रपद मास कृष्ण पक्ष की द्वितीया तक चलने वाले इस मेले के दौरान रक्षाबंधन के दिन होने वाले बग्वाल में देवीधुरा के आसपास के ढरांज, कोहला, कटना, स्यूड़ा, मथेला, छाना, सिलपड़, दादिनी, गवई, मौरना, जाख, अर्नपा, रिखौली, बसान, पाटी इत्यादि अनेक गांवों के ग्रामीण शामिल होते हैं। इस युद्ध में शामिल होने वाला योद्धा एक माह पूर्व से ही व्रत इत्यादि कर स्वयं को शुद्ध करता है। युद्ध में भाग लेने वाले योद्धा की पवित्रता हेतु अपनी पत्नी तक के हाथ का खाना भी खाना वर्जित होता है। योद्धा की शुद्धता ही उसे गंभीर रूप से घायल होने से बचाती है। पर्वतीय क्षेत्र में उगने वाली जहरीली बिच्छू घास से घायल हुए योद्धा का उपचार किया जाता है। युद्ध में प्रत्येक खाम का नेतृत्व सेनापति की भूमिका निभाने वाला प्रधान करता है। युद्ध लड़ रहे योद्धाओं की मदद हेतु आसपास के ग्रामीण मददगार बनकर योद्धा के रूप में खोलीखाड़ मैदान में उतरते हैं। खाम के प्रधान की नियुक्ति वंश के आधार पर की जाती है। मंदिर परिसर में चलने वाले बग्वाल को आसपास के ग्रामीण तथा शहरी क्षेत्रों में भी पूर्ण सम्मान की दृष्टि से देखा जाता है। इस दौरान यदि आसपास कहीं किसी की मौत हो जाये तो उसका दाह-संस्कार बग्वाल समाप्त होने के बाद ही किया जाता है। कालांतर में अब यहां पर पत्थरों के स्थान पर फलों और फूलों से युद्ध की परम्परा निभाई जाती है। @ रमाकांत पन्त

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  • उत्तराखंड के नैनीताल जिले के डॉन परेवा क्षेत्र में लंबे समय से सड़क की बदहाली और प्रशासनिक उपेक्षा से त्रस्त स्थानीय जनता का गुस्सा फूट पड़ा है, जहां ग्रामीणों ने क्षेत्र में पहुंचे क्षेत्रीय सांसद अजय भट्ट और विधायक सरिता आर्या को घेरकर सरेआम खरी-खोटी सुना दी। प्राप्त जानकारी के अनुसार, उबड़-खाबड़ और गड्डों में तब्दील हो चुके मुख्य मार्ग की दुर्दशा से नाराज ग्रामीणों ने दोनों जनप्रतिनिधियों को आड़े हाथों लेते हुए साफ कहा कि चुनाव के समय किए गए बड़े-बड़े वादे सिर्फ कागजों तक ही सीमित रह गए हैं और धरातल पर लोगों का चलना दूभर हो गया है। जनता के भारी विरोध और तीखी नोकझोंक के बीच घिरे नेताओं ने किसी तरह लोगों को शांत कराने का प्रयास किया और लोक निर्माण विभाग (PWD) के अधिकारियों को जल्द से जल्द सड़क सुदृढ़ीकरण और डामरीकरण का काम शुरू करने के कड़े निर्देश दिए, हालांकि ग्रामीणों ने मांग जल्द पूरी न होने पर आगामी समय में उग्र आंदोलन की खुली चेतावनी दी है।
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    उत्तराखंड के नैनीताल जिले के डॉन परेवा क्षेत्र में लंबे समय से सड़क की बदहाली और प्रशासनिक उपेक्षा से त्रस्त स्थानीय जनता का गुस्सा फूट पड़ा है, जहां ग्रामीणों ने क्षेत्र में पहुंचे क्षेत्रीय सांसद अजय भट्ट और विधायक सरिता आर्या को घेरकर सरेआम खरी-खोटी सुना दी। प्राप्त जानकारी के अनुसार, उबड़-खाबड़ और गड्डों में तब्दील हो चुके मुख्य मार्ग की दुर्दशा से नाराज ग्रामीणों ने दोनों जनप्रतिनिधियों को आड़े हाथों लेते हुए साफ कहा कि चुनाव के समय किए गए बड़े-बड़े वादे सिर्फ कागजों तक ही सीमित रह गए हैं और धरातल पर लोगों का चलना दूभर हो गया है। जनता के भारी विरोध और तीखी नोकझोंक के बीच घिरे नेताओं ने किसी तरह लोगों को शांत कराने का प्रयास किया और लोक निर्माण विभाग (PWD) के अधिकारियों को जल्द से जल्द सड़क सुदृढ़ीकरण और डामरीकरण का काम शुरू करने के कड़े निर्देश दिए, हालांकि ग्रामीणों ने मांग जल्द पूरी न होने पर आगामी समय में उग्र आंदोलन की खुली चेतावनी दी है।
    user_UTTARAKHAND SHAKTI NEWS
    UTTARAKHAND SHAKTI NEWS
    कालाढूंगी, नैनीताल, उत्तराखंड•
    17 hrs ago
  • बढ़ती महंगाई के खिलाफ कांग्रेस ने फूंका भाजपा सरकार का पुतला बाजपुर। बुधवार बढ़ती महंगाई के विरोध में कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने बन्नाखेड़ा चौराहे पर प्रदर्शन कर भाजपा सरकार का पुतला दहन किया। ब्लॉक अध्यक्ष पवन शर्मा के नेतृत्व में कार्यकर्ताओं ने सरकार के खिलाफ जमकर नारेबाजी की। कांग्रेस नेताओं ने कहा कि महंगाई से गरीब और मध्यम वर्ग परेशान है। उन्होंने चेतावनी दी कि महंगाई पर जल्द नियंत्रण नहीं हुआ तो कांग्रेस उग्र आंदोलन करेगी। प्रदर्शन में डीके जोशी, जसपाल सिंह बिल्लू समेत बड़ी संख्या में कार्यकर्ता मौजूद रहे।
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    बढ़ती महंगाई के खिलाफ कांग्रेस ने फूंका भाजपा सरकार का पुतला
बाजपुर। बुधवार बढ़ती महंगाई के विरोध में कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने बन्नाखेड़ा चौराहे पर प्रदर्शन कर भाजपा सरकार का पुतला दहन किया। ब्लॉक अध्यक्ष पवन शर्मा के नेतृत्व में कार्यकर्ताओं ने सरकार के खिलाफ जमकर नारेबाजी की। कांग्रेस नेताओं ने कहा कि महंगाई से गरीब और मध्यम वर्ग परेशान है। उन्होंने चेतावनी दी कि महंगाई पर जल्द नियंत्रण नहीं हुआ तो कांग्रेस उग्र आंदोलन करेगी। प्रदर्शन में डीके जोशी, जसपाल सिंह बिल्लू समेत बड़ी संख्या में कार्यकर्ता मौजूद रहे।
    user_LOVE SHRIVASTAV
    LOVE SHRIVASTAV
    Local News Reporter बाजपुर, उधम सिंह नगर, उत्तराखंड•
    15 hrs ago
  • स्लग - सीमांत खटीमा: 'पैगंबर-ए-इस्लाम' के जन्मदिन पर निकला विशाल जुलूस-ए-मोहम्मदी, हजारों लोग हुए शामिल स्थान - खटीमा उधम सिंह नगर रिपोर्ट - अशोक सरकार मो-9758494633 एंकर /विजुअल - ऊधम सिंह नगर के सीमांत क्षेत्र खटीमा में ईद-ए-मिलादुन्नबी का त्योहार बड़े ही अकीदत, धूमधाम और हर्षोल्लास के साथ मनाया गया। इस मुबारक मौके पर शहर में एक विशाल और भव्य जुलूस-ए-मोहम्मदी निकाला गया, जिसमें हजारों की तादाद में अकीदतमंदों ने शिरकत की। पैगंबर हजरत मोहम्मद साहब के यौम-ए-पैदाइश के मौके पर सीमांत खटीमा की सड़कें अकीदत के रंग में रंगी नजर आईं। ईद-ए-मिलादुन्नबी के अवसर पर शहर के प्रमुख मार्गों से एक भव्य जुलूस निकाला गया। हाथों में इस्लामिक परचम के साथ राष्ट्रीय ध्वज तिरंगा लिए और पैगंबर साहब की शान में नात-ओ-सलाम पढ़ते हुए हजारों लोग इस जुलूस का हिस्सा बने। जुलूस में बच्चे, नौजवान और बुजुर्ग सभी पूरे उत्साह के साथ शामिल हुए। पूरे रास्ते अमन, मोहब्बत और आपसी भाईचारे के नारों से माहौल गूंजता रहा। जगह-जगह जुलूस का स्वागत किया गया और लोगों के लिए तबर्रुक व लंगर का भी खास इंतजाम रहा। जुलूस को शांतिपूर्ण और व्यवस्थित ढंग से संपन्न कराने के लिए स्थानीय प्रशासन और पुलिस बल पूरी तरह मुस्तैद नजर आया। शहर के प्रमुख चौराहों पर सुरक्षा के कड़े इंतजाम किए गए थे, जिससे पूरा कार्यक्रम अमन और शांति के साथ संपन्न हुआ। खटीमा में निकले इस विशाल जुलूस ने न केवल मजहबी आस्था की मिसाल पेश की, बल्कि क्षेत्र में कौमी एकता और आपसी सौहार्द का एक मजबूत संदेश भी दिया। बाइट 1 - मौलाना इरफान उल हक कादरी खटीमा बाइट 2 - नासिर खान मस्जिद कमेटी बाइट 3 - आरिफ अंसारी समाजसेवी बाइट 4 - नीरज सेमवाल पुलिस क्षेत्राधिकारी
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    स्लग - सीमांत खटीमा: 'पैगंबर-ए-इस्लाम' के जन्मदिन पर निकला विशाल जुलूस-ए-मोहम्मदी, हजारों लोग हुए शामिल

स्थान - खटीमा उधम सिंह नगर 

रिपोर्ट - अशोक सरकार 
मो-9758494633


एंकर /विजुअल - ऊधम सिंह नगर के सीमांत क्षेत्र खटीमा में ईद-ए-मिलादुन्नबी का त्योहार बड़े ही अकीदत, धूमधाम और हर्षोल्लास के साथ मनाया गया। इस मुबारक मौके पर शहर में एक विशाल और भव्य जुलूस-ए-मोहम्मदी निकाला गया, जिसमें हजारों की तादाद में अकीदतमंदों ने शिरकत की।
पैगंबर हजरत मोहम्मद साहब के यौम-ए-पैदाइश के मौके पर सीमांत खटीमा की सड़कें अकीदत के रंग में रंगी नजर आईं। ईद-ए-मिलादुन्नबी के अवसर पर शहर के प्रमुख मार्गों से एक भव्य जुलूस निकाला गया। हाथों में इस्लामिक परचम के साथ राष्ट्रीय ध्वज तिरंगा लिए और पैगंबर साहब की शान में नात-ओ-सलाम पढ़ते हुए हजारों लोग इस जुलूस का हिस्सा बने।
जुलूस में बच्चे, नौजवान और बुजुर्ग सभी पूरे उत्साह के साथ शामिल हुए। पूरे रास्ते अमन, मोहब्बत और आपसी भाईचारे के नारों से माहौल गूंजता रहा। जगह-जगह जुलूस का स्वागत किया गया और लोगों के लिए तबर्रुक व लंगर का भी खास इंतजाम रहा।
जुलूस को शांतिपूर्ण और व्यवस्थित ढंग से संपन्न कराने के लिए स्थानीय प्रशासन और पुलिस बल पूरी तरह मुस्तैद नजर आया। शहर के प्रमुख चौराहों पर सुरक्षा के कड़े इंतजाम किए गए थे, जिससे पूरा कार्यक्रम अमन और शांति के साथ संपन्न हुआ।
खटीमा में निकले इस विशाल जुलूस ने न केवल मजहबी आस्था की मिसाल पेश की, बल्कि क्षेत्र में कौमी एकता और आपसी सौहार्द का एक मजबूत संदेश भी दिया।


बाइट 1 - मौलाना इरफान उल हक कादरी खटीमा 

बाइट 2 - नासिर खान मस्जिद कमेटी 

बाइट 3 - आरिफ अंसारी समाजसेवी 

बाइट 4 - नीरज सेमवाल पुलिस क्षेत्राधिकारी
    user_अशोक सरकार
    अशोक सरकार
    Khatima, Udam Singh Nagar•
    14 hrs ago
  • अमरिया में ईद मिलादुन्नबी पर उमड़ा जनसैलाब, हजारों लोगों ने निकाला जुलूसे मोहम्मदी
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    अमरिया में ईद मिलादुन्नबी पर उमड़ा जनसैलाब, हजारों लोगों ने निकाला जुलूसे मोहम्मदी
    user_MOHD ARIF
    MOHD ARIF
    अमरिया, पीलीभीत, उत्तर प्रदेश•
    16 hrs ago
  • बीसलपुर में जुलूस-ए-मोहम्मदी, पुलिस बल रहा तैनात। बैंड-बाजों के साथ निकले जुलूस में धार्मिक नारों की गूंज रही। बीसलपुर क्षेत्र के ग्राम चुर्रासकतपुर मुस्लिम समुदाय ने पैगंबर हजरत मोहम्मद साहब का जन्मोत्सव (यौमे पैदाइश) अकीदत के साथ मनाया। इस अवसर पर महादेवा, अभयपुर, चेना, नकटी, मीरपुर, बाहानपुर, रिछोला सबल, चुर्रासकतपुर, शायर, राजुपुर कुंडरी और मूसेली समेत दर्जनों गांवों से जुलूस निकाला गया। बैंड-बाजों के साथ निकले जुलूस में धार्मिक नारों की गूंज रही। उलेमाओं ने भाईचारा, गरीबों की मदद और नेकी के रास्ते पर चलने का संदेश दिया। जगह-जगह लोगों ने जुलूस का स्वागत कर फल और मिठाइयां बांटीं गई। सुरक्षा को लेकर भारी पुलिस बल तैनात रहा। चौकी प्रभारी अंकित यादव ने बताया कि जुलूस शांतिपूर्ण ढंग से संपन्न हुआ और पुलिस ने पहले ही मार्गों का निरीक्षण कर सुरक्षा व्यवस्था सुनिश्चित की थी।
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    बीसलपुर में जुलूस-ए-मोहम्मदी, पुलिस बल रहा तैनात। 

बैंड-बाजों के साथ निकले जुलूस में धार्मिक नारों की गूंज रही।

बीसलपुर क्षेत्र के ग्राम चुर्रासकतपुर मुस्लिम समुदाय ने पैगंबर हजरत मोहम्मद साहब का जन्मोत्सव (यौमे पैदाइश) अकीदत के साथ मनाया। इस अवसर पर महादेवा, अभयपुर, चेना, नकटी, मीरपुर, बाहानपुर, रिछोला सबल, चुर्रासकतपुर, शायर, राजुपुर कुंडरी और मूसेली समेत दर्जनों गांवों से जुलूस निकाला गया। बैंड-बाजों के साथ निकले जुलूस में धार्मिक नारों की गूंज रही।
उलेमाओं ने भाईचारा, गरीबों की मदद और नेकी के रास्ते पर चलने का संदेश दिया। जगह-जगह लोगों ने जुलूस का स्वागत कर फल और मिठाइयां बांटीं गई। 
सुरक्षा को लेकर भारी पुलिस बल तैनात रहा। चौकी प्रभारी अंकित यादव ने बताया कि जुलूस शांतिपूर्ण ढंग से संपन्न हुआ और पुलिस ने पहले ही मार्गों का निरीक्षण कर सुरक्षा व्यवस्था सुनिश्चित की थी।
    user_संदीप मिश्रा
    संदीप मिश्रा
    पीलीभीत, पीलीभीत, उत्तर प्रदेश•
    28 min ago
  • स्कूल से चोरी लैपटॉप और नकदी के साथ दो शातिर चोर गिरफ्तार रामनगर पुलिस ने सीसीटीवी और सर्विलांस की मदद से किया खुलासा, चोरी का सामान बरामद रामनगर। थाना रामनगर क्षेत्र में स्कूल से लैपटॉप और नकदी चोरी के मामले का पुलिस ने खुलासा करते हुए दो आरोपियों को गिरफ्तार किया है। पुलिस ने आरोपियों के कब्जे से चोरी का लैपटॉप, चार्जर, नकदी, ब्लूटूथ स्पीकर और वारदात में ताला तोड़ने के लिए इस्तेमाल किया गया पाना बरामद किया है। जानकारी के अनुसार, 20 अगस्त 2026 को कानिया निवासी कैलाश चन्द्र पाण्डेय ने थाना रामनगर में शिकायत दर्ज कराई थी कि उनके स्कूल से लैपटॉप और करीब 10 हजार रुपये की नकदी चोरी हो गई है। शिकायत के आधार पर थाना रामनगर में FIR संख्या 261/26 के तहत धारा 331 (4)/305(ए) BNS में मुकदमा दर्ज किया गया।
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    स्कूल से चोरी लैपटॉप और नकदी के साथ दो शातिर चोर गिरफ्तार रामनगर पुलिस ने सीसीटीवी और सर्विलांस की मदद से किया खुलासा, चोरी का सामान बरामद रामनगर। थाना रामनगर क्षेत्र में स्कूल से लैपटॉप और नकदी चोरी के मामले का पुलिस ने खुलासा करते हुए दो आरोपियों को गिरफ्तार किया है। पुलिस ने आरोपियों के कब्जे से चोरी का लैपटॉप, चार्जर, नकदी, ब्लूटूथ स्पीकर और वारदात में ताला तोड़ने के लिए इस्तेमाल किया गया पाना बरामद किया है। जानकारी के अनुसार, 20 अगस्त 2026 को कानिया निवासी कैलाश चन्द्र पाण्डेय ने थाना रामनगर में शिकायत दर्ज कराई थी कि उनके स्कूल से लैपटॉप और करीब 10 हजार रुपये की नकदी चोरी हो गई है। शिकायत के आधार पर थाना रामनगर में FIR संख्या 261/26 के तहत धारा 331 (4)/305(ए) BNS में मुकदमा दर्ज किया गया।
    user_UTTARAKHAND SHAKTI NEWS
    UTTARAKHAND SHAKTI NEWS
    कालाढूंगी, नैनीताल, उत्तराखंड•
    17 hrs ago
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