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MP Aga Ruhullah Hits Out at Centre Over Budget.
Numaan Mir
MP Aga Ruhullah Hits Out at Centre Over Budget.
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- नेशनल कॉन्फ्रेंस ने अपने झूठे वादों से केवल युवाओं को ठगने का काम किया है।1
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- बालिकाओं में आत्मविश्वास जगाने वाली रानी लक्ष्मीबाई आत्मरक्षा पहल की सराहना, भटियात में विकास परियोजनाओं पर 150 करोड़ व्यय - विधानसभा अध्यक्ष कुलदीप सिंह पठानिया। चंबा, (ककीरा), फरवरी 12। विधानसभा अध्यक्ष कुलदीप सिंह पठानिया ने रानी लक्ष्मीबाई आत्मरक्षा प्रशिक्षण कार्यक्रम को बालिकाओं में आत्मविश्वास, साहस और आत्मनिर्भरता की भावना विकसित करने वाली सराहनीय पहल बताया है। उन्होंने कहा कि वर्तमान परिवेश में हर बालिका को चुनौतीपूर्ण स्थितियों से निपटने के लिए आत्मरक्षा प्रशिक्षण अनिवार्य है। कार्यक्रम का आयोजन और सम्मान। समग्र शिक्षा अभियान के तहत शस्त्रांग इंडियन मॉडर्न मार्शल आर्ट (सिम्मा) द्वारा राजकीय वरिष्ठ माध्यमिक विद्यालय ककीरा में आयोजित इस कार्यक्रम में कुलदीप सिंह पठानिया मुख्य अतिथि के रूप में शामिल हुए। उन्होंने 2025-26 सत्र में मार्शल आर्ट प्रशिक्षण प्राप्त कर चुकी बालिकाओं को सम्मानित किया। स्कूली छात्राओं ने मार्शल आर्ट प्रदर्शन के साथ सांस्कृतिक कार्यक्रम भी प्रस्तुत किए। जल शक्ति परियोजनाओं पर प्रगति। विधानसभा अध्यक्ष ने भटियात क्षेत्र के विकास कार्यों पर प्रकाश डालते हुए बताया कि जल शक्ति मंडल चुवाड़ी के अंतर्गत 350 करोड़ की विकास परियोजनाओं पर अब तक 150 करोड़ व्यय हो चुके हैं। भटियात के दूरस्थ गांवों में पेयजल आपूर्ति के लिए 125 करोड़ का प्रावधान किया गया है, जिसमें प्रथम चरण के 45 करोड़ के कार्यों को प्रशासनिक स्वीकृति मिल चुकी है। ग्राम पंचायतों ककीरा कस्बा, जरेई, तारागढ़, गडाना, चलामा, होबार, खडेड़ा और कुढ़ी में 86 करोड़ से 87 परियोजनाएं प्रगति पर हैं। अन्य विकास कार्य। ककीरा और तारागढ़-डंगोरी पेयजल योजनाओं पर 47.50 करोड़ व्यय हो रहा है। बकलोह कैंट मल निकासी योजना तथा सलोरका, कमलाड़ी, घटासनी, अपर मामुल, बस स्टैंड ककीरा और बाई का बाग में भूमि संरक्षण के लिए 12.29 करोड़ स्वीकृत हुए हैं। सड़क निर्माण में प्रतिबद्धता जताते हुए उन्होंने ककीरा, घटासनी व तारागढ़ में 12 संपर्क मार्गों पर प्रगति बताई, जिसमें 5 के FRA स्वीकृत व 7 के सर्वे पूर्ण हैं। कालाफाट, कटलू-बैल्ला व डंगाडी-बाई का बाग मार्गों की औपचारिकताएं पूरी हो रही हैं। क्षेत्रीय विकास का जिक्र। पठानिया ने कहा कि गत तीन वर्षों में सड़क, पेयजल, सिंचाई, बिजली व स्वास्थ्य सेवाओं के सुदृढ़ीकरण से क्षेत्रवासियों के जीवन में सकारात्मक बदलाव आया है। उन्होंने विद्यालय की बहुआयामी गतिविधियों के लिए 21 हजार रुपये देने की घोषणा की। प्रमुख उपस्थित लोग। कार्यक्रम में सदस्य निदेशक राज्य वन निगम कृष्ण चंद चेला, पूर्व अध्यक्ष ब्लॉक कांग्रेस विजय कंवर, पूर्व जिला उपाध्यक्ष तरुण मल्होत्रा, पूर्व महासचिव राजीव कौशल, पूर्व उपाध्यक्ष नगर पंचायत सुरेंद्र चाढ़क, उपमंडल दंडाधिकारी मनीष सोनी, डीएसपी शेर सिंह, उपनिदेशक शिक्षा विकास महाजन, वन मंडल अधिकारी रजनीश महाजन, बीडीओ अनिल गुराडा, एईएन परवेश ठाकुर, नरेंद्र चौधरी, राकेश ठाकुर, सिम्मा अध्यक्ष विक्रम सिंह थापा सहित अधिकारी, छात्र-छात्राएं व ग्रामीण उपस्थित रहे।1
- चंबा “बजट पर बरसे सुधीर शर्मा: धर्मशाला विधायक ने चंबा में सरकार को घेरा, बोले- जनता को सिर्फ घोषणाओं का झांसा”। जिला मुख्यालय चंबा में धर्मशाला से विधायक सुधीर शर्मा ने बजट को लेकर प्रेस कॉन्फ्रेंस आयोजित की। इस दौरान उन्होंने प्रदेश सरकार पर जमकर निशाना साधते हुए बजट को जनहित से दूर बताया। सुधीर शर्मा ने कहा कि सरकार ने बजट में आम जनता को राहत देने के बजाय केवल कागजी घोषणाएं की हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि विकास कार्यों के लिए ठोस प्रावधान नहीं किए गए और कई अहम मुद्दों को नजरअंदाज किया गया है। विधायक ने कहा कि प्रदेश की जनता महंगाई, बेरोजगारी और मूलभूत सुविधाओं की कमी से परेशान है, लेकिन सरकार बजट के जरिए लोगों को गुमराह करने का प्रयास कर रही है। उन्होंने सरकार से मांग की कि बजट में किए गए वादों को जल्द जमीन पर उतारा जाए, ताकि प्रदेश के लोगों को वास्तविक लाभ मिल सके। प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान उन्होंने आगामी समय में सरकार के खिलाफ जनहित की लड़ाई को और तेज करने की बात भी कही। प्रेस कॉन्फ्रेंस सुधीर शर्मा विधायक धर्मशाला।1
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- जब परंपरा ही सुरक्षा बन जाए और विश्वास ही शक्ति: पांगी घाटी के समाल पर्व की दिव्य गाथा पांगी घाटी (चंबा): दुर्गम हिमालयी अंचल पांगी घाटी में आस्था केवल पूजा-अर्चना तक सीमित नहीं है, बल्कि वह जीवन का अभिन्न सुरक्षा कवच है। यहां सुरक्षा किसी बाहरी साधन से नहीं, बल्कि परंपराओं और विश्वासों के माध्यम से सुनिश्चित की जाती है। यही कारण है कि पांगी में मनाया जाने वाला समाल पर्व केवल एक धार्मिक उत्सव नहीं, बल्कि जनजातीय चेतना, सांस्कृतिक अस्मिता और आध्यात्मिक संरक्षण का अद्वितीय उदाहरण है। पांच दिनों तक चलने वाला यह पर्व इस वर्ष भी पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ सम्पन्न हुआ। इसकी शुरुआत शौर गांव से होती है और अंतिम आयोजन साच क्षेत्र में संपन्न होता है। विशेष बात यह है कि यह पर्व किलाड़ क्षेत्र में नहीं मनाया जाता, जो इसकी विशिष्ट सांस्कृतिक सीमा को दर्शाता है। दैवीय कन्या की लोककथा: समाल पर्व की आधारशिला समाल पर्व का मूल एक प्राचीन लोकगाथा से जुड़ा है, जो पीढ़ियों से मौखिक परंपरा के माध्यम से संजोई गई है। मान्यता है कि सैकड़ों वर्ष पूर्व साच क्षेत्र में एक परिवार में एक दैवीय कन्या का जन्म हुआ। पांगी की कठोर सर्दियों और भारी बर्फबारी के बीच वृद्ध माता-पिता के कारण घर का समस्त कार्य उसी कन्या के जिम्मे था। वह अत्यंत कर्तव्यनिष्ठ थी, पर उसकी एक शर्त थी—वह “जूठा पानी” (खाने के बर्तनों से निकला गंदा पानी) नहीं उठाएगी। एक दिन परिस्थितियोंवश उसे यह कार्य भी करना पड़ा। लोककथा कहती है कि जब वह जूठा पानी बाहर फेंकने गई, तो फिर कभी घर नहीं लौटी। परिवारजन खोजते हुए जंगल की ओर पहुंचे तो देखा कि वह एक बड़े पत्थर के नीचे बैठी है। उसने स्पष्ट शब्दों में घर लौटने से इंकार कर दिया और कहा कि अब उसका निवास वही स्थान है। परिवारजन कुछ समय तक उसे भोजन पहुंचाते रहे। एक दिन बर्फबारी और वृद्धावस्था के कारण वे स्वयं नहीं जा सके और एक युवक को भेजा। किंवदंती के अनुसार उस युवक ने दुष्कर्म का प्रयास किया। तब उस दैवीय कन्या ने पक्षी का रूप धारण किया और वहां से उड़कर कुल्लू के भेखली नामक स्थान पर जा बसी। आज भी वहां उसका भव्य मंदिर विद्यमान है। लोक-मान्यता है कि समाल पर्व के दौरान एक दिन वह दैवीय शक्ति अपने मूल गांव लौटती है, और उसके अगले दिन साच क्षेत्र में समाल पर्व का मुख्य आयोजन होता है। अनुष्ठानिक ज्यामिति: जब घर बनते हैं जीवित सुरक्षा कवच समाल पर्व के दौरान पांगी के जनजातीय घर आध्यात्मिक किले में परिवर्तित हो जाते हैं। घरों के मुख्य द्वार, खिड़कियों, सीढ़ियों और प्रवेश मार्गों पर विशेष पवित्र चिह्न बनाए जाते हैं। इन चिह्नों के निर्माण में उपयोग होता है: चोक – सफेद पत्थर का चूर्ण कांटेदार जंगली गुलाब की टहनियां – नकारात्मक शक्तियों से रक्षा का प्रतीक शाशो – पवित्र सफेद पत्थरों का समूह, जिससे प्राचीनकाल में अग्नि प्रज्वलित की जाती थी कैली – मिट्टी या चूने का लेप इन प्रतीकों को फर्श से छत तक जाने वाले मार्गों और प्रत्येक दहलीज पर अंकित किया जाता है। यह मात्र सजावट नहीं, बल्कि एक अनुष्ठानिक प्रक्रिया है। हर आकृति का एक आध्यात्मिक अर्थ है, भले ही उसका आकार गांव-गांव में भिन्न हो। स्थानीय विश्वास के अनुसार ये चिह्न: राक्षसी और नकारात्मक ऊर्जाओं को घर में प्रवेश से रोकते हैं घर और परिवेश की पवित्रता बनाए रखते हैं प्रकृति-देवताओं और पूर्वजों का आशीर्वाद आमंत्रित करते हैं यह परंपरा “अनुष्ठानिक ज्यामिति” का जीवंत उदाहरण है—एक ऐसी मौन भाषा, जो पुस्तकों में नहीं, बल्कि पीढ़ियों की स्मृति में सुरक्षित है। सांस्कृतिक पहचान और सामुदायिक एकता समाल पर्व केवल आध्यात्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि सामुदायिक एकजुटता का प्रतीक भी है। पांच दिनों तक गांवों में विशेष आयोजन होते हैं, पारंपरिक व्यंजन बनाए जाते हैं और सामूहिक सहभागिता के माध्यम से लोक परंपराओं को जीवित रखा जाता है। यह पर्व जनजातीय समाज को उनकी जड़ों से जोड़ता है। आधुनिकता और वैश्वीकरण के दौर में जहां कई परंपराएं लुप्त होती जा रही हैं, वहीं पांगी घाटी ने अपनी सांस्कृतिक विरासत को न केवल सुरक्षित रखा है, बल्कि उसे दैनिक जीवन का हिस्सा बनाया है। आस्था जो दीवारों पर उकेरी जाती है पांगी की यह परंपरा यह संदेश देती है कि सांस्कृतिक विरासत केवल संग्रहालयों या शोधग्रंथों में नहीं बसती। यहां आस्था दीवारों पर उकेरी जाती है, दहलीजों पर अंकित की जाती है और जीवन के हर आयाम में जिया जाती है। पत्थर, कांटे, राख और मिट्टी—ये साधारण तत्व मिलकर असाधारण आध्यात्मिक संरचना का निर्माण करते हैं। यह एक ऐसा विश्वास है, जो सुरक्षा का आश्वासन देता है और सामुदायिक आत्मविश्वास को सुदृढ़ करता है। निष्कर्ष समाल पर्व पांगी घाटी की जनजातीय विरासत, पूर्वजों की ज्ञान-परंपरा और पर्वतीय विश्वास की अमिट छाप है। यह पर्व हमें याद दिलाता है कि जब परंपरा जीवित रहती है, तो समाज सुरक्षित और सशक्त बना रहता है। पांगी में परंपरा केवल अतीत नहीं—वह वर्तमान की शक्ति और भविष्य की सुरक्षा है।1