अरुण कुमार गुप्ता जी के प्रवचन, (भाषण) मैं पंडित जी के धोग कथा पर पुरजोर प्रहार किया गया है l भारत में सामाजिक वर्गीकरण (जिसे प्राचीन काल में वर्ण व्यवस्था कहा गया) का सबसे पहला वर्णन ऋग्वेद के 10वें मंडल के 'पुरुष सूक्त' में मिलता है। ऐतिहासिक रूप से इसकी शुरुआत लगभग 1500 ईसा पूर्व से 1000 ईसा पूर्व के बीच मानी जाती है। [1, 2, 3, 4] जिस पदानुक्रम (ऊंच-नीच) और जिन कठोर नियमों की आप बात कर रहे हैं, जहाँ ब्राह्मण (पंडित) को सबसे उच्च व पूजनीय, वैश्य और क्षत्रिय को मध्यम, और शूद्र को सबसे नीचे सेवक के रूप में दर्शाया गया है, वह मुख्य रूप से मनुस्मृति (Manusmriti) नामक ग्रंथ में विस्तार से लिखा गया है। [1, 2] इस व्यवस्था के क्रमिक विकास और ग्रंथों में इसके उल्लेख को निम्नलिखित बिंदुओं से समझा जा सकता है: 1. सबसे पहला वर्णन: ऋग्वेद (पुरुष सूक्त) ग्रंथ और समय: हिंदू धर्म के सबसे प्राचीन ग्रंथ ऋग्वेद (Rigveda) के 10वें मंडल के 90वें सूक्त, जिसे 'पुरुष सूक्त' कहा जाता है, में पहली बार चार वर्णों की उत्पत्ति का उल्लेख है। [1, 2] क्या लिखा है: इसमें एक विराट पुरुष (ब्रह्मांडीय पुरुष) की कल्पना की गई है और प्रतीकात्मक रूप से बताया गया है कि उसके मुख से ब्राह्मण, भुजाओं से क्षत्रिय, जांघों से वैश्य और पैरों से शूद्र उत्पन्न हुए। [1, 2] मूल स्वरूप: इतिहासकारों और वैदिक विद्वानों के अनुसार, ऋग्वेद के समय यह व्यवस्था जन्म पर आधारित नहीं थी, बल्कि गुण और कर्म (Profession) पर आधारित थी। समाज को सुचारू रूप से चलाने के लिए कार्यों का बंटवारा किया गया था, न कि ऊंच-नीच तय करने के लिए। [1, 2, 3, 4] 2. कठोर सामाजिक पदानुक्रम (ऊंच-नीच): मनुस्मृति ग्रंथ और समय: समय बीतने के साथ उत्तर-वैदिक काल और गुप्त काल के आते-आते यह व्यवस्था बदलने लगी। लगभग दूसरी शताब्दी ईसा पूर्व (2nd Century BCE) से दूसरी शताब्दी ईस्वी (2nd Century CE) के दौरान मनुस्मृति (Manusmriti) नाम का कानूनी/सामाजिक ग्रंथ संकलित किया गया。 [1] क्या लिखा है: मनुस्मृति में सामाजिक पदानुक्रम को कानूनी और धार्मिक रूप से बहुत कठोर बना दिया गया। इसी किताब में यह व्यवस्था दी गई कि: ब्राह्मण (उच्च वर्ण): इन्हें सबसे पवित्र, बौद्धिक मार्गदर्शक और पूजनीय माना गया क्योंकि वे धार्मिक अनुष्ठान और वेदों का अध्ययन करते थे। क्षत्रिय और वैश्य (मध्यम वर्ण): राजा/योद्धा (क्षत्रिय) और व्यापारी/किसान (वैश्य) को समाज के मध्य भाग (सुरक्षा और अर्थव्यवस्था) के रूप में रखा गया। शूद्र (निम्न वर्ण): इन्हें पदानुक्रम में सबसे नीचे रखा गया और इनका मुख्य कर्तव्य बाकी के तीन वर्णों की सेवा करना बताया गया। इन्हें वेदों के अध्ययन और कई सामाजिक अधिकारों से वंचित कर दिया गया। [1, 2, 3, 4, 5, 6] वर्ण और जाति में अंतर यह ध्यान देना जरूरी है कि मूल ग्रंथों में जिसे 'वर्ण' (चार मुख्य वर्ग) कहा गया था, वह बाद के कालखंडों में हजारों स्थानीय और जन्म-आधारित 'जातियों' (Jatis) में टूट गया। मध्यकाल और आधुनिक काल (ब्रिटिश जनगणना के दौरान) आते-आते यह व्यवस्था पूरी तरह जन्मजात और अत्यधिक भेदभावपूर्ण हो गई। भारतीय संविधान के निर्माण के समय डॉ. बी.आर. आंबेडकर और अन्य महापुरुषों ने इस भेदभाव और मनुस्मृति की इन असमान नीतियों की कड़ी आलोचना की थी।
अरुण कुमार गुप्ता जी के प्रवचन, (भाषण) मैं पंडित जी के धोग कथा पर पुरजोर प्रहार किया गया है l भारत में सामाजिक वर्गीकरण (जिसे प्राचीन काल में वर्ण व्यवस्था कहा गया) का सबसे पहला वर्णन ऋग्वेद के 10वें मंडल के 'पुरुष सूक्त' में मिलता है। ऐतिहासिक रूप से इसकी शुरुआत लगभग 1500 ईसा पूर्व से 1000 ईसा पूर्व के बीच मानी जाती है। [1, 2, 3, 4] जिस पदानुक्रम (ऊंच-नीच) और जिन कठोर नियमों की आप बात कर रहे हैं, जहाँ ब्राह्मण (पंडित) को सबसे उच्च व पूजनीय, वैश्य और क्षत्रिय को मध्यम, और शूद्र को सबसे नीचे सेवक के रूप में दर्शाया गया है, वह मुख्य रूप से मनुस्मृति (Manusmriti) नामक ग्रंथ में विस्तार से लिखा गया है। [1, 2] इस व्यवस्था के क्रमिक विकास और ग्रंथों में इसके उल्लेख को निम्नलिखित बिंदुओं से समझा जा सकता है: 1. सबसे पहला वर्णन: ऋग्वेद (पुरुष सूक्त) ग्रंथ और समय: हिंदू धर्म के सबसे प्राचीन ग्रंथ ऋग्वेद (Rigveda) के 10वें मंडल के 90वें सूक्त, जिसे 'पुरुष सूक्त' कहा जाता है, में पहली बार चार वर्णों की उत्पत्ति का उल्लेख है। [1, 2] क्या लिखा है: इसमें एक विराट पुरुष (ब्रह्मांडीय पुरुष) की कल्पना की गई है और प्रतीकात्मक रूप से बताया गया है कि उसके मुख से ब्राह्मण, भुजाओं से क्षत्रिय, जांघों से वैश्य और पैरों से शूद्र उत्पन्न हुए। [1, 2] मूल स्वरूप: इतिहासकारों और वैदिक विद्वानों के अनुसार, ऋग्वेद के समय यह व्यवस्था जन्म पर आधारित नहीं थी, बल्कि गुण और कर्म (Profession) पर आधारित थी। समाज को सुचारू रूप से चलाने के लिए कार्यों का बंटवारा किया गया था, न कि ऊंच-नीच तय करने के लिए। [1, 2, 3, 4] 2. कठोर सामाजिक पदानुक्रम (ऊंच-नीच): मनुस्मृति ग्रंथ और समय: समय बीतने के साथ उत्तर-वैदिक काल और गुप्त काल के आते-आते यह व्यवस्था बदलने लगी। लगभग दूसरी शताब्दी ईसा पूर्व (2nd Century BCE) से दूसरी शताब्दी ईस्वी (2nd Century CE) के दौरान मनुस्मृति (Manusmriti) नाम का कानूनी/सामाजिक ग्रंथ संकलित किया गया。 [1] क्या लिखा है: मनुस्मृति में सामाजिक पदानुक्रम को कानूनी और धार्मिक रूप से बहुत कठोर बना दिया गया। इसी किताब में यह व्यवस्था दी गई कि: ब्राह्मण (उच्च वर्ण): इन्हें सबसे पवित्र, बौद्धिक मार्गदर्शक और पूजनीय माना गया क्योंकि वे धार्मिक अनुष्ठान और वेदों का अध्ययन करते थे। क्षत्रिय और वैश्य (मध्यम वर्ण): राजा/योद्धा (क्षत्रिय) और व्यापारी/किसान (वैश्य) को समाज के मध्य भाग (सुरक्षा और अर्थव्यवस्था) के रूप में रखा गया। शूद्र (निम्न वर्ण): इन्हें पदानुक्रम में सबसे नीचे रखा गया और इनका मुख्य कर्तव्य बाकी के तीन वर्णों की सेवा करना बताया गया। इन्हें वेदों के अध्ययन और कई सामाजिक अधिकारों से वंचित कर दिया गया। [1, 2, 3, 4, 5, 6] वर्ण और जाति में अंतर यह ध्यान देना जरूरी है कि मूल ग्रंथों में जिसे 'वर्ण' (चार मुख्य वर्ग) कहा गया था, वह बाद के कालखंडों में हजारों स्थानीय और जन्म-आधारित 'जातियों' (Jatis) में टूट गया। मध्यकाल और आधुनिक काल (ब्रिटिश जनगणना के दौरान) आते-आते यह व्यवस्था पूरी तरह जन्मजात और अत्यधिक भेदभावपूर्ण हो गई। भारतीय संविधान के निर्माण के समय डॉ. बी.आर. आंबेडकर और अन्य महापुरुषों ने इस भेदभाव और मनुस्मृति की इन असमान नीतियों की कड़ी आलोचना की थी।
- बिहार में बाढ़ आने के कारण शत्रुघन कुमार यादव उर्फ खेसारी लाल यादव बिहार में बाढ़ से पीड़ित लोगों के लिए मदद करते हुए1
- अनपरा में भव्य दुर्गा पूजा की तैयारियां जोरों पर, 17 अक्टूबर से शुरू होगा महोत्सव अनपरा में भव्य दुर्गा पूजा की तैयारियां जोरों पर, 17 अक्टूबर से शुरू होगा महोत्सव1
- उड़ीसा से बिहार जा रहा था गांजा, बलरामपुर में पुलिस ने पकड़ी 50 लाख से ज्यादा की खेप1
- बलरामपुर जिला प्रसाशन नै किया श्रमदान सेंदुर नदी घाट का की किया गया सफाई बलरामपुर जिला प्रसाशन नै किया श्रमदान सेंदुर नदी घाट का की किया गया सफाई1
- वाड्रफ नगर में चल रहे काले धंधा को उजागर करने वाले आदित्य दुबे /विक्रमादित्य दुबे पे कुछ और नहीं 151 के धारे में अंदर करवाकर जो कि झूठा केश मामला कुछ और हैं दबाने की कोशिश की जा रही क्या पुलिस भी कुछ दोगला पत्रकार का दे रही। साथ कानून पर से उठता भरोसा। अगर पत्रकारिता करने की सजा यह है तो जनता की खबर को गांजा इंजेक्शन कोरेक्स वनरेक्स या तो गलत अपराध के फर्जी वन पट्टा का मैटर उठा कर गलत किया हुं एक बार आप मेरा बैक date का केश तो देखिए2
- रोहतास: 35 घंटे के बाद समाप्त हुआ जन सुराज का आमरण अनशन, DM के आश्वासन पर तोड़ा अनशन-- तोराब नियाजी!!1
- कृषि पशुपालन गव्य एवं मत्स्य विभाग द्वारा संचालित योजनाओं की समीक्षा बैठक गुरुवार की दोपहर 2:00 बजे उपायुक्त संदीप कुमार ने लातेहार समाहरणालय में किया। आयोजित बैठक के दौरान उपायुक्त संदीप कुमार ने संबंधित विभागों द्वारा संचालित योजनाओं की अध्ययन प्रगति की जानकारी लेते हुए निर्धारित समय अवधि में लक्ष्य प्राप्ति का निर्देश दिया।1
- मदनपुर में बिहार चिकित्सा व जनस्वास्थ्य कर्मचारी संघ का प्रखंड स्तरीय चुनाव, अध्यक्ष बने रामाशीष मदनपुर सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्र परिसर में स्थित प्रशिक्षण भवन में गुरुवार को बिहार चिकित्सा एवं जन स्वास्थ्य कर्मचारी संघ के प्रखंड स्तरीय कमेटी का चुनाव हुआ। जिसमें संघ के प्रखंड अध्यक्ष पद के लिए सर्वसम्मति से प्रधान सहायक रामाशीष कुमार को चुनाव किया गया। प्रस्ताव बृजनंदन सिंह ने लाया।जिसका समर्थन सत्येन्द्र कुमार ने किया। उपाध्यक्ष अंकिता कुमारी, अनुज्ञा कुमारी, मंत्री अनिल कुमार सिंह, संयुक्त मंत्री मो इम्तेयाज आलम, आरती कुमारी, कोषाध्यक्ष राजेश कुमार मिश्रा, कार्यालय मंत्री सत्येंद्र कुमार, सहायक कोषाध्यक्ष आर्यन राज, जिला प्रतिनिधि विकेश कुमार सिंह व नीलम कुमारी ,अनु कुमारी चुने गए हैं। कार्यकारिणी सदस्यों में पंकज कुमार लेखापाल, ओमप्रकाश गुप्ता बीसीएम,फ़ैज़ अकरम जान,लोकेश वर्मा, मार्लिंन मिंज, सुनीता कुमारी,वीणा कुमारी ,वर्षा मुखर्जी,रंजु कुमारी, प्रीति कुमारी शामिल हैं। नव चयनित संघ नेताओं ने कहा कि किसी भी समस्या के समाधान के लिए तत्पर रहेंगे।1
- झारखंड में मुख्यमंत्री मंईया सम्मान योजना भी बंद हो जाएगा : रामप्रवेश यादव रूपेश कुमार, लातेहार : राष्ट्रीय जनता दल के जिलाध्यक्ष रामप्रवेश यादव ने कहा कि खनिज संपदा पर राज्य के हिस्से को समाप्त किए जाने से झारखंड को राजस्व का बड़ा नुकसान होगा। झारखंड गरीब और आदिवासी बहुल राज्य है। खनिज से मिलने वाले राजस्व का उपयोग जनहित और विकास कार्यों में होता है। राजस्व में कमी का सीधा असर राज्य के विकास पर पड़ेगा। वहीं झारखंड में मुख्यमंत्री मंईया सम्मान योजना भी बंद हो जाएगा।2