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मोती तालाब में आर्ट ऑफ लिविंग का स्वच्छता अभियान स्वच्छ बालाघाट के लिए आगे आए स्वयंसेवक, गुरुदेव के जन्मोत्सव पर सेवा का संदेश, प्लास्टिक मुक्त मोती तालाब का लिया संकल्प
Samarpit sahu
मोती तालाब में आर्ट ऑफ लिविंग का स्वच्छता अभियान स्वच्छ बालाघाट के लिए आगे आए स्वयंसेवक, गुरुदेव के जन्मोत्सव पर सेवा का संदेश, प्लास्टिक मुक्त मोती तालाब का लिया संकल्प
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- बेटे को खोने के दर्द से उबरी भुवनेश्वरी उमरे, “लखपति दीदी” ने बदल दी पूरे गाँव क बालाघाट के लांजी जनपद के छोटे से ग्राम करेजा में रहने वाली भुवनेश्वरी उमरे की कहानी केवल एक महिला की सफलता की कहानी नहीं है, बल्कि यह संघर्ष, आत्मविश्वास और समाज परिवर्तन की ऐसी मिसाल है, जो हर ग्रामीण महिला को नई प्रेरणा देती है। सामान्य ग्रामीण परिवार से आने वाली भुवनेश्वरी उमरे की जिंदगी कभी खेती और परिवार तक ही सीमित थी। दसवीं तक शिक्षित भुवनेश्वरी अपने परिवार के साथ साधारण जीवन जी रही थीं। लेकिन अचानक आई एक ऐसी त्रासदी ने उनकी दुनिया ही बदल दी। उनके 19 वर्षीय बेटे का असमय निधन हो गया। एक माँ के लिए यह दुख असहनीय था। बेटे के जाने के बाद भुवनेश्वरी पूरी तरह टूट चुकी थीं। घर में सन्नाटा था, मन में गहरी निराशा थी और जिंदगी जैसे थम सी गई थी। परिवार और गाँव के लोग उन्हें संभालने की कोशिश करते रहे, लेकिन एक माँ के दर्द को शब्दों में बांध पाना आसान नहीं था। लेकिन कहते हैं कि मजबूत इरादे सबसे कठिन अंधेरे को भी रोशनी में बदल देते हैं। भुवनेश्वरी ने भी हार नहीं मानी। उन्होंने अपने टूटे हुए मन को फिर से संभाला और जीवन को नई दिशा देने का निर्णय लिया। इसी दौरान वे राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन (NRLM) से जुड़ीं। समूह गतिविधियों और आजीविका कार्यों ने उन्हें मानसिक रूप से मजबूत किया। धीरे-धीरे उन्होंने खुद को समाज सेवा और खेती के कार्यों में पूरी तरह समर्पित कर दिया। उन्होंने EBMKN योजना और प्राकृतिक खेती का प्रशिक्षण लिया। सीखने की लगन और मेहनत ने उन्हें जल्द ही गाँव की महिलाओं के बीच एक नई पहचान दिला दी। आज भुवनेश्वरी उमरे “कृषि सखी”, “प्राकृतिक खेती मास्टर ट्रेनर” और ग्रामीण महिलाओं की प्रेरणा बन चुकी हैं। कम्युनिटी रिसोर्स पर्सन (CRP) के रूप में कार्य करते हुए उन्होंने लगभग 250 स्व-सहायता समूहों के गठन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। वे गाँव-गाँव जाकर महिलाओं को संगठित करती हैं, उन्हें आत्मनिर्भर बनने के लिए प्रेरित करती हैं और आजीविका से जोड़ने का कार्य करती हैं। भुवनेश्वरी दीदी नियमित रूप से “कृषि पाठशाला” और “पशुपाठशाला” का आयोजन कर किसानों को जैविक एवं प्राकृतिक खेती की जानकारी देती हैं। उनके प्रयासों का असर यह हुआ कि आज उनके गाँव के अधिकांश किसान प्राकृतिक खेती की ओर बढ़ चुके हैं। उन्होंने स्वयं आटा चक्की संचालन का कार्य शुरू किया, जिससे परिवार की आय में वृद्धि हुई। इसके साथ ही वे उत्पादक समूह (PG) बनाकर महिलाओं और किसानों को सामूहिक व्यवसाय से जोड़ रही हैं। आज उनकी वार्षिक आय लगभग ढाई लाख रुपये तक पहुँच चुकी है। लेकिन उनकी सबसे बड़ी उपलब्धि केवल आर्थिक सफलता नहीं है। उनकी असली सफलता यह है कि जिस महिला ने कभी अपने बेटे को खोने के बाद जीवन से उम्मीद छोड़ दी थी, वही आज सैकड़ों महिलाओं और किसानों को जीने की नई उम्मीद दे रही है।गाँव की महिलाएँ उन्हें केवल “दीदी” नहीं, बल्कि अपने संघर्ष और सफलता की प्रेरणा मानती हैं। भुवनेश्वरी उमरे कहती हैं—“मैंने जीवन में बहुत बड़ा दुख देखा है। एक समय ऐसा था जब मुझे लगता था कि अब कुछ नहीं बचा। लेकिन आजीविका मिशन, खेती और समाज के साथ काम करने से मुझे जीने की नई ताकत मिली। आज जब गाँव की महिलाएँ आत्मनिर्भर बन रही हैं और किसान प्राकृतिक खेती अपना रहे हैं, तब लगता है कि मेरा जीवन फिर से सफल हो गया।”आज भुवनेश्वरी उमरे आत्मनिर्भर भारत, महिला सशक्तिकरण और प्राकृतिक खेती की जीवंत मिसाल बन चुकी हैं। उनकी कहानी यह संदेश देती है कि अगर दर्द को संकल्प में बदल दिया जाए, तो एक महिला पूरे गाँव की तस्वीर बदल सकती है। भुवनेश्वरी उमरे जैसी “लखपति दीदी” आज उस नए ग्रामीण भारत की पहचान हैं, जहाँ महिलाएँ अब केवल घर तक सीमित नहीं, बल्कि बदलाव की अगुवाई कर रही हैं।1
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