ड्यूटी के नाम पर अटैचमेंट का तंत्र या प्रशासनिक विवशता? 200 स्वास्थ्यकर्मियों की कार्यव्यवस्था पर अब अभिलेखों से उठेंगे सवाल ड्यूटी के नाम पर अटैचमेंट का तंत्र या प्रशासनिक विवशता? 200 स्वास्थ्यकर्मियों की कार्यव्यवस्था पर अब अभिलेखों से उठेंगे सवाल रीवा। स्वास्थ्य व्यवस्था की रीढ़ माने जाने वाले मानव संसाधन के पुनर्विन्यास को लेकर रीवा एवं मऊगंज में उठ रहे सवाल अब महज शिकायतों की फाइल तक सीमित नहीं रह गए हैं। ग्रामीण एवं दूरस्थ संस्थानों में पदस्थ डॉक्टरों, पीजीएमओ, नर्सिंग अधिकारियों और पैरामेडिकल स्टाफ को ड्यूटी, अस्थायी कार्यव्यवस्था अथवा अटैचमेंट के माध्यम से अन्य संस्थानों में लगाए जाने की कथित व्यवस्था की व्यापकता का सत्यापन अब प्रशासनिक पारदर्शिता की कसौटी बनता जा रहा है। उपलब्ध सार्वजनिक ऑडिट सामग्री भी यह रेखांकित करती है कि स्वास्थ्य संस्थानों में स्वीकृत पद और वास्तविक उपलब्ध मानव संसाधन का अंतर स्वास्थ्य सेवा-प्रबंधन का महत्वपूर्ण प्रशासनिक विषय है। प्रशासनिक आवश्यकता पर सीमित अवधि की ड्यूटी एक सामान्य व्यवस्था हो सकती है। लेकिन जब अस्थायी आदेश बार-बार नवीनीकृत हों, कर्मचारी लंबे समय तक मूल पदस्थापना से बाहर रहे और मूल संस्था में उसकी वास्तविक उपलब्धता प्रभावित हो, तब प्रश्न आदेश की वैधता से आगे बढ़कर मानव संसाधन नियोजन और प्रशासनिक नियंत्रण का हो जाता है। अब प्रत्येक मामले में यही देखना होगा कि आदेश किसने जारी किया, अवधि कितनी थी, कारण क्या था, सक्षम स्वीकृति थी या नहीं, अवधि समाप्त होने के बाद समीक्षा हुई या नहीं और मूल संस्था की कमी की भरपाई कैसे हुई? पीजीएमओ डॉक्टरों को उपस्वास्थ्य केंद्रों में लंबे समय तक ड्यूटी दिए जाने की शिकायत हो अथवा ग्रामीण संस्थानों से कर्मचारियों को शहरी संजीवनी क्लिनिकों में भेजे जाने की बात, दोनों स्थितियों का उत्तर कर्मचारीवार पदस्थापना और वास्तविक कार्यस्थल के मिलान से ही निकलेगा। कागज पर कर्मचारी ग्रामीण संस्था में पदस्थ हो और बायोमेट्रिक या ड्यूटी रोस्टर उसे लगातार किसी अन्य केंद्र में दिखाए, तो प्रशासन को यह समझना होगा कि वास्तविक सेवा-स्थल कौन-सा है और मूल पदस्थापना की उपयोगिता क्या रह गई है। अब सामने आया सबसे गंभीर आरोप- ₹50 हजार से ₹1 लाख तक की कथित रकम? इसी बीच सूत्रों के हवाले से एक अत्यंत गंभीर और अपुष्ट चर्चा सामने आ रही है कि कुछ डॉक्टरों, नर्सिंग स्टाफ एवं पैरामेडिकल कर्मचारियों को ड्यूटी के नाम पर अटैचमेंट दिलाने के लिए कथित तौर पर ₹50 हजार से लेकर ₹1 लाख तक की रकम लिए जाने की बात कही जा रही है। इस कथित लेनदेन की स्वतंत्र पुष्टि उपलब्ध नहीं है और इसे स्थापित तथ्य के रूप में नहीं माना जा सकता। लेकिन आरोप की प्रकृति ऐसी है कि इसे केवल अफवाह कहकर दरकिनार करने के बजाय निष्पक्ष अभिलेखीय एवं वित्तीय जांच के दायरे में लाया जाना चाहिए, यदि शिकायतकर्ता या स्रोत इसके समर्थन में कोई दस्तावेज, भुगतान प्रमाण, संदेश, गवाह अथवा अन्य सत्यापन योग्य सामग्री प्रस्तुत करते हैं। यदि ऐसा कोई आर्थिक लेनदेन प्रमाणित होता है, तो मामला मात्र अटैचमेंट की प्रशासनिक वैधता का नहीं रहेगा, बल्कि भ्रष्टाचार, अधिकार के दुरुपयोग और प्रशासनिक प्रक्रिया की विश्वसनीयता से जुड़ा गंभीर विषय बन सकता है। जांच का केंद्र व्यक्ति नहीं, पूरी निर्णय-श्रृंखला हो! इस पूरे मामले में किसी अधिकारी को आरोप सिद्ध होने से पहले दोषी ठहराना उचित नहीं होगा। लेकिन यदि बड़ी संख्या में अटैचमेंट के आदेश जारी हुए हैं, तो निर्णय-श्रृंखला की जांच अपरिहार्य है- मांग किसने की? आवश्यकता किसने प्रमाणित की? आदेश किसने जारी किया? अवधि किसने निर्धारित की? नवीनीकरण किस आधार पर हुआ? मूल संस्था की स्थिति किसने देखी? और पूरी व्यवस्था की निगरानी किस स्तर पर हुई? इन प्रश्नों के उत्तर नोटशीट, आदेश-पत्र, बायोमेट्रिक रिकॉर्ड, ड्यूटी रोस्टर और संस्थानवार मानव संसाधन विवरण से निकाले जा सकते हैं। लगभग 200 कर्मचारियों के अटैचमेंट की सूचना यदि विभागीय अभिलेखों में प्रमाणित होती है, तो इसे व्यक्तिगत ड्यूटी आदेशों का बिखरा हुआ समूह मानना पर्याप्त नहीं होगा। तब आवश्यक होगा कि रीवा एवं मऊगंज के संपूर्ण स्वास्थ्य मानव संसाधन का एंड-टू-एंड ऑडिट कराया जाए। कितने कर्मचारी मूल पदस्थापना से बाहर हैं? कितने आदेश छह माह से अधिक पुराने हैं? कितने बार-बार नवीनीकृत हुए? कितने मामलों में मूल संस्था में वैकल्पिक व्यवस्था हुई? और ग्रामीण संस्थानों की सेवा क्षमता पर इसका क्या प्रभाव पड़ा? मामले की वास्तविकता का सबसे विश्वसनीय आधार आरोप या प्रत्यारोप नहीं, बल्कि अभिलेखीय क्रॉस-वेरिफिकेशन है। पदस्थापना आदेश बनाम ड्यूटी आदेश, ड्यूटी आदेश बनाम बायोमेट्रिक उपस्थिति, उपस्थिति बनाम वेतन रिकॉर्ड और वास्तविक कार्यस्थल बनाम स्वीकृत पद- इन सभी का मिलान होना चाहिए। यदि व्यवस्था नियमसम्मत है, तो अभिलेख उसे प्रमाणित करेंगे। यदि कहीं प्रक्रिया- विचलन है, तो वही अभिलेख उसकी परिधि और उत्तरदायित्व भी निर्धारित करेंगे। सवाल किसी एक कर्मचारी का नहीं, सवाल यह है कि क्या अस्थायी ड्यूटी आदेशों ने धीरे-धीरे मूल पदस्थापना व्यवस्था का स्थान ले लिया है? और यदि ऐसा हुआ है, तो इसकी प्रशासनिक सीमा, वैधता और जवाबदेही कौन तय करेगा? अब समय आरोपों का नहीं, रिकॉर्ड खोलने का है। क्योंकि स्वास्थ्य विभाग में मानव संसाधन की वास्तविक उपलब्धता कागज पर नहीं, उस ग्रामीण अस्पताल के दरवाजे पर दिखाई देती है जहां मरीज उपचार के लिए पहुंचता है।
ड्यूटी के नाम पर अटैचमेंट का तंत्र या प्रशासनिक विवशता? 200 स्वास्थ्यकर्मियों की कार्यव्यवस्था पर अब अभिलेखों से उठेंगे सवाल ड्यूटी के नाम पर अटैचमेंट का तंत्र या प्रशासनिक विवशता? 200 स्वास्थ्यकर्मियों की कार्यव्यवस्था पर अब अभिलेखों से उठेंगे सवाल रीवा। स्वास्थ्य व्यवस्था की रीढ़ माने जाने वाले मानव संसाधन के पुनर्विन्यास को लेकर रीवा एवं मऊगंज में उठ रहे सवाल अब महज शिकायतों की फाइल तक सीमित नहीं रह गए हैं। ग्रामीण एवं दूरस्थ संस्थानों में पदस्थ डॉक्टरों, पीजीएमओ, नर्सिंग अधिकारियों और पैरामेडिकल स्टाफ को ड्यूटी, अस्थायी कार्यव्यवस्था अथवा अटैचमेंट के माध्यम से अन्य संस्थानों में लगाए जाने की कथित व्यवस्था की व्यापकता का सत्यापन अब प्रशासनिक पारदर्शिता की कसौटी बनता जा रहा है। उपलब्ध सार्वजनिक ऑडिट सामग्री भी यह रेखांकित करती है कि स्वास्थ्य संस्थानों में स्वीकृत पद और वास्तविक उपलब्ध मानव संसाधन का अंतर स्वास्थ्य सेवा-प्रबंधन का महत्वपूर्ण प्रशासनिक विषय है। प्रशासनिक आवश्यकता पर सीमित अवधि की ड्यूटी एक सामान्य व्यवस्था हो सकती है। लेकिन जब अस्थायी आदेश बार-बार नवीनीकृत हों, कर्मचारी लंबे समय तक मूल पदस्थापना से बाहर रहे और मूल संस्था में उसकी वास्तविक उपलब्धता प्रभावित हो, तब प्रश्न आदेश की वैधता से आगे बढ़कर मानव संसाधन नियोजन और प्रशासनिक नियंत्रण का हो जाता है। अब प्रत्येक मामले में यही देखना होगा कि आदेश किसने जारी किया, अवधि कितनी थी, कारण क्या था, सक्षम स्वीकृति थी या नहीं, अवधि समाप्त होने के बाद समीक्षा हुई या नहीं और मूल संस्था की कमी की भरपाई कैसे हुई? पीजीएमओ डॉक्टरों को उपस्वास्थ्य केंद्रों में लंबे समय तक ड्यूटी दिए जाने की शिकायत हो अथवा ग्रामीण संस्थानों से कर्मचारियों को शहरी संजीवनी क्लिनिकों में भेजे जाने की बात, दोनों स्थितियों का उत्तर कर्मचारीवार पदस्थापना और वास्तविक कार्यस्थल के मिलान से ही निकलेगा। कागज पर कर्मचारी ग्रामीण संस्था में पदस्थ हो और बायोमेट्रिक या ड्यूटी रोस्टर उसे लगातार किसी अन्य केंद्र में दिखाए, तो प्रशासन को यह समझना होगा कि वास्तविक सेवा-स्थल कौन-सा है और मूल पदस्थापना की उपयोगिता क्या रह गई है। अब सामने आया सबसे गंभीर आरोप- ₹50 हजार से ₹1 लाख तक की कथित रकम? इसी बीच सूत्रों के हवाले से एक अत्यंत गंभीर और अपुष्ट चर्चा सामने आ रही है कि कुछ डॉक्टरों, नर्सिंग स्टाफ एवं पैरामेडिकल कर्मचारियों को ड्यूटी के नाम पर अटैचमेंट दिलाने के लिए कथित तौर पर ₹50 हजार से लेकर ₹1 लाख तक की रकम लिए जाने की बात कही जा रही है। इस कथित लेनदेन की स्वतंत्र पुष्टि उपलब्ध नहीं है और इसे स्थापित तथ्य के रूप में नहीं माना जा सकता। लेकिन आरोप की प्रकृति ऐसी है कि इसे केवल अफवाह कहकर दरकिनार करने के बजाय निष्पक्ष अभिलेखीय एवं वित्तीय जांच के दायरे में लाया जाना चाहिए, यदि शिकायतकर्ता या स्रोत इसके समर्थन में कोई दस्तावेज, भुगतान प्रमाण, संदेश, गवाह अथवा अन्य सत्यापन योग्य सामग्री प्रस्तुत करते हैं। यदि ऐसा कोई आर्थिक लेनदेन प्रमाणित होता है, तो मामला मात्र अटैचमेंट की प्रशासनिक वैधता का नहीं रहेगा, बल्कि भ्रष्टाचार, अधिकार के दुरुपयोग और प्रशासनिक प्रक्रिया की विश्वसनीयता से जुड़ा गंभीर विषय बन सकता है। जांच का केंद्र व्यक्ति नहीं, पूरी निर्णय-श्रृंखला हो! इस पूरे मामले में किसी अधिकारी को आरोप सिद्ध होने से पहले दोषी ठहराना उचित नहीं होगा। लेकिन यदि बड़ी संख्या में अटैचमेंट के आदेश जारी हुए हैं, तो निर्णय-श्रृंखला की जांच अपरिहार्य है- मांग किसने की? आवश्यकता किसने प्रमाणित की? आदेश किसने जारी किया? अवधि किसने निर्धारित की? नवीनीकरण किस आधार पर हुआ? मूल संस्था की स्थिति किसने देखी? और पूरी व्यवस्था की निगरानी किस स्तर पर हुई? इन प्रश्नों के उत्तर नोटशीट, आदेश-पत्र, बायोमेट्रिक रिकॉर्ड, ड्यूटी रोस्टर और संस्थानवार मानव संसाधन विवरण से निकाले जा सकते हैं। लगभग 200 कर्मचारियों के अटैचमेंट की सूचना यदि विभागीय अभिलेखों में प्रमाणित होती है, तो इसे व्यक्तिगत ड्यूटी आदेशों का बिखरा हुआ समूह मानना पर्याप्त नहीं होगा। तब आवश्यक होगा कि रीवा एवं मऊगंज के संपूर्ण स्वास्थ्य मानव संसाधन का एंड-टू-एंड ऑडिट कराया जाए। कितने कर्मचारी मूल पदस्थापना से बाहर हैं? कितने आदेश छह माह से अधिक पुराने हैं? कितने बार-बार नवीनीकृत हुए? कितने मामलों में मूल संस्था में वैकल्पिक व्यवस्था हुई? और ग्रामीण संस्थानों की सेवा क्षमता पर इसका क्या प्रभाव पड़ा? मामले की वास्तविकता का सबसे विश्वसनीय आधार आरोप या प्रत्यारोप नहीं, बल्कि अभिलेखीय क्रॉस-वेरिफिकेशन है। पदस्थापना आदेश बनाम ड्यूटी आदेश, ड्यूटी आदेश बनाम बायोमेट्रिक उपस्थिति, उपस्थिति बनाम वेतन रिकॉर्ड और वास्तविक कार्यस्थल बनाम स्वीकृत पद- इन सभी का मिलान होना चाहिए। यदि व्यवस्था नियमसम्मत है, तो अभिलेख उसे प्रमाणित करेंगे। यदि कहीं प्रक्रिया- विचलन है, तो वही अभिलेख उसकी परिधि और उत्तरदायित्व भी निर्धारित करेंगे। सवाल किसी एक कर्मचारी का नहीं, सवाल यह है कि क्या अस्थायी ड्यूटी आदेशों ने धीरे-धीरे मूल पदस्थापना व्यवस्था का स्थान ले लिया है? और यदि ऐसा हुआ है, तो इसकी प्रशासनिक सीमा, वैधता और जवाबदेही कौन तय करेगा? अब समय आरोपों का नहीं, रिकॉर्ड खोलने का है। क्योंकि स्वास्थ्य विभाग में मानव संसाधन की वास्तविक उपलब्धता कागज पर नहीं, उस ग्रामीण अस्पताल के दरवाजे पर दिखाई देती है जहां मरीज उपचार के लिए पहुंचता है।
- *अमहिया पुलिस की बड़ी कार्यवाही* *रीवा संजय गांधी अस्पताल एवं सुपर स्पेशलिस्ट अस्पताल से मोटर सायकल चोरी करने वाले आरोपी गिरफ्तार , 04 मोटर सायकल बरामद,* पुलिस अधीक्षक रीवा श्री डॉक्टर गुरकरन सिंह ,अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक रीवा श्रीमती भावना मरावी के निर्देशन में तथा नगर पुलिस अधीक्षक रीवा श्री आलोक वर्मा के मार्गदर्शन में थाना प्रभारी अमहिया निरीक्षक मनोज कुमार गौतम ने चोरों को पकड़ने के लिए टीम का गठन कर थाना स्टाफ के साथ मिलकर संजय गांधी अस्पताल एवं सुपर स्पेशलिस्ट अस्पताल से मोटर सायकल चोरी करने वाले आरोपीयो को गिरफ्तार कर मोटर सायकल बरामद किया। *घटना का विवरणः-* 1. दिनांक 02.09.026 को फरियादी मुकेश तिवारी पिता संपत प्रसाद तिवारी निवासी बिडवा थाना चोरहटा रीवा ने थाना उपस्थित आकर रिपोर्ट दर्ज कराई कि मैं अपनी मोटर साइकिल आरटीआर अपाची से रोज की तरह संजय गांधी अस्पताल ड्यूटी आया था अपनी मोटर साइकिल सुपर स्पेशलिटी हॉस्पिटल परिसर में खड़ा करके अंदर ड्यूटी चला गया था बाद ड्यूटी वापस आया तो देखा की मेरी मोटर साइकिल जिस जगह खड़ी किया था वहाँ नहीं थी कोई अज्ञात चोर चुरा ले गया था। 2. दिनांक 11.09.026 को फरियादी दिनेश साकेत पिता शिवनाथ साकेत निवासी गोदरी थाना मनगवा रीवा ने थाना उपस्थित आकर रिपोर्ट दर्ज कराई कि मैं अपनी मोटर सायकल हीरो स्प्लेंडर से अपने रिश्तेदार को संजय गांधी अस्पताल इलाज कराने गया था अपनी मोटर साइकिल को अस्पताल के मेन गेट के पास खड़ी करके अंदर इलाज कराने चला गया था बाद इलाज वापस आया तो देखा कि जिस जगह पर मैंने अपनी मोटर साइकिल खड़ी किया था वहाँ नहीं थी कोई अज्ञात चोर चुरा ले गया था। उपरोक्त दोनों रिपोर्ट पर थाना अमहिया रीवा में अपराध पंजीबद्ध किया जाकर विवेचना दौरान आरोपी गया प्रसाद केवट पिता रामखेलावन केवट उम्र 19 वर्ष निवासी काकलपुर थाना रामपुर बघेलान जिला सतना एवं दीपक केवट पिता नागेन्द्र केवट उम्र 19 वर्ष निवासी बड़ी गोरगी थाना गुढ़ जिला रीवा को दस्तयाब कर पूछताछ की गई तो उक्त दोनों आरोपीयो द्वारा अपने पास मोटर सायकल रखना स्वीकार किया एवं 02 और मोटर सायकल बरामद कराए, जिससे आरोपीयो को मामले मे गिरफ्तार किया गया व माननीय न्यायालय के समक्ष पेश किया गया। *जप्त मशरूका 04 नग मोटर सायकल* *अपची कीमती 90000/-* *पल्सर कीमती 80000/-* *02 स्प्लेंडर कीमती 120000/-* *कुल कीमती - 290000/- रु* *महत्वपूर्ण भूमिकाः*- *थाना प्रभारी निरीक्षक मनोज कुमार गौतम, सउनि मनोज प्रजापति ,प्र आर केमला प्रसाद, मप्रआर. शबाना बेगम,आर विकाश तिवारी,आर अनुज सिंह ,आर शंकरदत्त, योगेश सिंह की सराहनीय भूमिका रही।*2
- ढाई साल की बच्ची का हुआ अपहरण बोर में भर कर लगाए बदमास, महज छः घंटे में रीवा पुलिस ने बच्ची को किया दस्तयाब।1
- मध्यप्रदेश से जुड़ी आज की बड़ी खबरें देखिए, #जनसंपर्क_खबरें मध्यप्रदेश से जुड़ी आज की बड़ी खबरें देखिए, #जनसंपर्क_खबरें 🗓️ 24 सितम्बर 2026 ➡️पॉडकास्ट पर सुनें #जनसंपर्क_खबरें 👇1
- सतना Ak कृपालपुर पूरेनिहा बस्ती में शराब बिक्री के खिलाफ महिलाओं का हंगामा, पुलिस मौके पर सतना के कृपालपुर पूरेनिहा बस्ती में कई वर्षों से अवैध शराब बिक्री के आरोप को लेकर महिलाओं ने शिवकुमार उर्फ बेटू चौधरी के खिलाफ मोर्चा खोलते हुए जमकर हंगामा किया। घटना की सूचना मिलते ही एसडीएम और कोलगवां पुलिस मौके पर पहुंची और स्थिति संभाली। सूचना प्राप्त होते ही एसडीएम राहुल सिलाडिया, सीएसपी मनीष त्रिपाठी तथा थाना प्रभारी कोलगवा पुलिस बल के साथ तत्काल मौके पर पहुंचे। अधिकारियों की उपस्थिति में कृपालपुर स्थित संदिग्ध स्थल पर सघन चेकिंग अभियान चलाया गया। अवैध गतिविधियों एवं नशे के कारोबार पर अंकुश लगाने हेतु चलाए जा रहे अभियान के तहत प्रशासन और पुलिस की संयुक्त टीम द्वारा त्वरित व प्रभावी कार्रवाई की गई है। कृपालपुर वार्ड नंबर 16 में अवैध रूप से शराब बेचे जाने की सटीक सूचना मिलने पर प्रशासनिक व पुलिस अधिकारियों की टीम ने मौके पर दबिश देकर अवैध शराब जब्त की है।4
- भारतीय किसान संघ रीवा के आकाशवाणी केंद्र से सुभाष मिश्रा जी उर्फ मनसुख भाई जी मनगवां तहसील प्रांगड़ में किसानों की समस्याओं को लेकर किसानों के द्वारा किए गए धरना प्रदर्शन में सम्मिलित हुए किसानों को लेकर हुई कुछ बातें @mangwanrewamp1
- संवाददाता के.के. कुशवाहा मनिकवार (रीवा): सरस्वती शिशु मंदिर मनिकवार में 25 सितंबर 2026 को 'नमामि भारतम्' कार्यक्रम का आयोजन हुआ, जो राष्ट्रीय गीत 'वंदे मातरम्' के 150वें वर्ष एक साथ एक लय एक स्वर सामूहिक वंदे मातरम ठीक 11:00 संपन्न हुआ। यह कार्यक्रम नई पीढ़ी में राष्ट्रप्रेम, सांस्कृतिक चेतना और राष्ट्रगीत के इतिहास के प्रति निष्ठा जागृत करने के उद्देश्य से आयोजित किया गया। कार्यक्रम की शुरुआत प्रातः 09:30 बजे दीप प्रज्ज्वलन से हुई, जिसके बाद वाणी वंदना, अतिथि स्वागत, प्रस्तावना, प्रश्न मंच प्रतियोगिता और सांस्कृतिक नृत्य नाटिका प्रस्तुत की गई। कार्यक्रम में श्री शिवेंद्र त्रिपाठी (सह विभाग कार्यवाह, RSS, रीवा) मुख्य वक्ता के रूप में उपस्थित रहे और उन्होंने ओजस्वी उद्बोधन दिया। श्री रामजी गोस्वामी जी ने मार्गदर्शन किया जबकि अध्यक्ष/पर्यवेक्षक के रूप में श्री रामप्रकाश पटेल, संयोजक श्री संजीव कुमार मिश्रा एवं सह-संयोजक सुश्री स्नेहा त्रिपाठी, साक्षी श्री वरुणेंद्र मणि त्रिपाठी (सरपंच, अहिरगाँव) और प्राचार्य प्रभारी ने सत्यापन किया। कार्यक्रम का समापन वंदे मातरम् के सामूहिक गान से हुआ, जिसमें विद्यालय परिवार, प्राचार्य, आचार्य, पुराने छात्र, सर्वोत्तम शिक्षा बाल कल्याण समिति के पदाधिकारी, अभिभावक और मीडिया बंधु सहित 388 की संख्या में गणमान्य उपस्थित रहे।3
- ड्यूटी के नाम पर अटैचमेंट का तंत्र या प्रशासनिक विवशता? 200 स्वास्थ्यकर्मियों की कार्यव्यवस्था पर अब अभिलेखों से उठेंगे सवाल ड्यूटी के नाम पर अटैचमेंट का तंत्र या प्रशासनिक विवशता? 200 स्वास्थ्यकर्मियों की कार्यव्यवस्था पर अब अभिलेखों से उठेंगे सवाल रीवा। स्वास्थ्य व्यवस्था की रीढ़ माने जाने वाले मानव संसाधन के पुनर्विन्यास को लेकर रीवा एवं मऊगंज में उठ रहे सवाल अब महज शिकायतों की फाइल तक सीमित नहीं रह गए हैं। ग्रामीण एवं दूरस्थ संस्थानों में पदस्थ डॉक्टरों, पीजीएमओ, नर्सिंग अधिकारियों और पैरामेडिकल स्टाफ को ड्यूटी, अस्थायी कार्यव्यवस्था अथवा अटैचमेंट के माध्यम से अन्य संस्थानों में लगाए जाने की कथित व्यवस्था की व्यापकता का सत्यापन अब प्रशासनिक पारदर्शिता की कसौटी बनता जा रहा है। उपलब्ध सार्वजनिक ऑडिट सामग्री भी यह रेखांकित करती है कि स्वास्थ्य संस्थानों में स्वीकृत पद और वास्तविक उपलब्ध मानव संसाधन का अंतर स्वास्थ्य सेवा-प्रबंधन का महत्वपूर्ण प्रशासनिक विषय है। प्रशासनिक आवश्यकता पर सीमित अवधि की ड्यूटी एक सामान्य व्यवस्था हो सकती है। लेकिन जब अस्थायी आदेश बार-बार नवीनीकृत हों, कर्मचारी लंबे समय तक मूल पदस्थापना से बाहर रहे और मूल संस्था में उसकी वास्तविक उपलब्धता प्रभावित हो, तब प्रश्न आदेश की वैधता से आगे बढ़कर मानव संसाधन नियोजन और प्रशासनिक नियंत्रण का हो जाता है। अब प्रत्येक मामले में यही देखना होगा कि आदेश किसने जारी किया, अवधि कितनी थी, कारण क्या था, सक्षम स्वीकृति थी या नहीं, अवधि समाप्त होने के बाद समीक्षा हुई या नहीं और मूल संस्था की कमी की भरपाई कैसे हुई? पीजीएमओ डॉक्टरों को उपस्वास्थ्य केंद्रों में लंबे समय तक ड्यूटी दिए जाने की शिकायत हो अथवा ग्रामीण संस्थानों से कर्मचारियों को शहरी संजीवनी क्लिनिकों में भेजे जाने की बात, दोनों स्थितियों का उत्तर कर्मचारीवार पदस्थापना और वास्तविक कार्यस्थल के मिलान से ही निकलेगा। कागज पर कर्मचारी ग्रामीण संस्था में पदस्थ हो और बायोमेट्रिक या ड्यूटी रोस्टर उसे लगातार किसी अन्य केंद्र में दिखाए, तो प्रशासन को यह समझना होगा कि वास्तविक सेवा-स्थल कौन-सा है और मूल पदस्थापना की उपयोगिता क्या रह गई है। अब सामने आया सबसे गंभीर आरोप- ₹50 हजार से ₹1 लाख तक की कथित रकम? इसी बीच सूत्रों के हवाले से एक अत्यंत गंभीर और अपुष्ट चर्चा सामने आ रही है कि कुछ डॉक्टरों, नर्सिंग स्टाफ एवं पैरामेडिकल कर्मचारियों को ड्यूटी के नाम पर अटैचमेंट दिलाने के लिए कथित तौर पर ₹50 हजार से लेकर ₹1 लाख तक की रकम लिए जाने की बात कही जा रही है। इस कथित लेनदेन की स्वतंत्र पुष्टि उपलब्ध नहीं है और इसे स्थापित तथ्य के रूप में नहीं माना जा सकता। लेकिन आरोप की प्रकृति ऐसी है कि इसे केवल अफवाह कहकर दरकिनार करने के बजाय निष्पक्ष अभिलेखीय एवं वित्तीय जांच के दायरे में लाया जाना चाहिए, यदि शिकायतकर्ता या स्रोत इसके समर्थन में कोई दस्तावेज, भुगतान प्रमाण, संदेश, गवाह अथवा अन्य सत्यापन योग्य सामग्री प्रस्तुत करते हैं। यदि ऐसा कोई आर्थिक लेनदेन प्रमाणित होता है, तो मामला मात्र अटैचमेंट की प्रशासनिक वैधता का नहीं रहेगा, बल्कि भ्रष्टाचार, अधिकार के दुरुपयोग और प्रशासनिक प्रक्रिया की विश्वसनीयता से जुड़ा गंभीर विषय बन सकता है। जांच का केंद्र व्यक्ति नहीं, पूरी निर्णय-श्रृंखला हो! इस पूरे मामले में किसी अधिकारी को आरोप सिद्ध होने से पहले दोषी ठहराना उचित नहीं होगा। लेकिन यदि बड़ी संख्या में अटैचमेंट के आदेश जारी हुए हैं, तो निर्णय-श्रृंखला की जांच अपरिहार्य है- मांग किसने की? आवश्यकता किसने प्रमाणित की? आदेश किसने जारी किया? अवधि किसने निर्धारित की? नवीनीकरण किस आधार पर हुआ? मूल संस्था की स्थिति किसने देखी? और पूरी व्यवस्था की निगरानी किस स्तर पर हुई? इन प्रश्नों के उत्तर नोटशीट, आदेश-पत्र, बायोमेट्रिक रिकॉर्ड, ड्यूटी रोस्टर और संस्थानवार मानव संसाधन विवरण से निकाले जा सकते हैं। लगभग 200 कर्मचारियों के अटैचमेंट की सूचना यदि विभागीय अभिलेखों में प्रमाणित होती है, तो इसे व्यक्तिगत ड्यूटी आदेशों का बिखरा हुआ समूह मानना पर्याप्त नहीं होगा। तब आवश्यक होगा कि रीवा एवं मऊगंज के संपूर्ण स्वास्थ्य मानव संसाधन का एंड-टू-एंड ऑडिट कराया जाए। कितने कर्मचारी मूल पदस्थापना से बाहर हैं? कितने आदेश छह माह से अधिक पुराने हैं? कितने बार-बार नवीनीकृत हुए? कितने मामलों में मूल संस्था में वैकल्पिक व्यवस्था हुई? और ग्रामीण संस्थानों की सेवा क्षमता पर इसका क्या प्रभाव पड़ा? मामले की वास्तविकता का सबसे विश्वसनीय आधार आरोप या प्रत्यारोप नहीं, बल्कि अभिलेखीय क्रॉस-वेरिफिकेशन है। पदस्थापना आदेश बनाम ड्यूटी आदेश, ड्यूटी आदेश बनाम बायोमेट्रिक उपस्थिति, उपस्थिति बनाम वेतन रिकॉर्ड और वास्तविक कार्यस्थल बनाम स्वीकृत पद- इन सभी का मिलान होना चाहिए। यदि व्यवस्था नियमसम्मत है, तो अभिलेख उसे प्रमाणित करेंगे। यदि कहीं प्रक्रिया- विचलन है, तो वही अभिलेख उसकी परिधि और उत्तरदायित्व भी निर्धारित करेंगे। सवाल किसी एक कर्मचारी का नहीं, सवाल यह है कि क्या अस्थायी ड्यूटी आदेशों ने धीरे-धीरे मूल पदस्थापना व्यवस्था का स्थान ले लिया है? और यदि ऐसा हुआ है, तो इसकी प्रशासनिक सीमा, वैधता और जवाबदेही कौन तय करेगा? अब समय आरोपों का नहीं, रिकॉर्ड खोलने का है। क्योंकि स्वास्थ्य विभाग में मानव संसाधन की वास्तविक उपलब्धता कागज पर नहीं, उस ग्रामीण अस्पताल के दरवाजे पर दिखाई देती है जहां मरीज उपचार के लिए पहुंचता है।1
- पुलिस कस्टडी से भाग रहे रेप के आरोपियों को बीच बाजार में बड़ी मेहनत के बाद पकड़ा1