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पुलिस कस्टडी से भाग रहे रेप के आरोपियों को बीच बाजार में बड़ी मेहनत के बाद पकड़ा

4 hrs ago
user_Abhishek Pandey
Abhishek Pandey
Artist हुजूर नगर, रीवा, मध्य प्रदेश•
4 hrs ago

पुलिस कस्टडी से भाग रहे रेप के आरोपियों को बीच बाजार में बड़ी मेहनत के बाद पकड़ा

More news from मध्य प्रदेश and nearby areas
  • ढाई साल की बच्ची का हुआ अपहरण बोर में भर कर लगाए बदमास, महज छः घंटे में रीवा पुलिस ने बच्ची को किया दस्तयाब।
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    ढाई साल की बच्ची का हुआ अपहरण बोर में भर कर लगाए बदमास, महज छः घंटे में रीवा पुलिस ने बच्ची को किया दस्तयाब।
    user_Prime 24 News
    Prime 24 News
    हुजूर, रीवा, मध्य प्रदेश•
    20 hrs ago
  • मध्यप्रदेश से जुड़ी आज की बड़ी खबरें देखिए, #जनसंपर्क_खबरें मध्यप्रदेश से जुड़ी आज की बड़ी खबरें देखिए, #जनसंपर्क_खबरें 🗓️ 24 सितम्बर 2026 ➡️पॉडकास्ट पर सुनें #जनसंपर्क_खबरें 👇
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    मध्यप्रदेश से जुड़ी आज की बड़ी खबरें
देखिए, #जनसंपर्क_खबरें
मध्यप्रदेश से जुड़ी आज की बड़ी खबरें
देखिए, #जनसंपर्क_खबरें
🗓️ 24 सितम्बर 2026
➡️पॉडकास्ट पर सुनें #जनसंपर्क_खबरें
👇
    user_शेखर तिवारी
    शेखर तिवारी
    Journalist गुढ़, रीवा, मध्य प्रदेश•
    5 hrs ago
  • सतना Ak कृपालपुर पूरेनिहा बस्ती में शराब बिक्री के खिलाफ महिलाओं का हंगामा, पुलिस मौके पर सतना के कृपालपुर पूरेनिहा बस्ती में कई वर्षों से अवैध शराब बिक्री के आरोप को लेकर महिलाओं ने शिवकुमार उर्फ बेटू चौधरी के खिलाफ मोर्चा खोलते हुए जमकर हंगामा किया। घटना की सूचना मिलते ही एसडीएम और कोलगवां पुलिस मौके पर पहुंची और स्थिति संभाली। सूचना प्राप्त होते ही एसडीएम राहुल सिलाडिया, सीएसपी मनीष त्रिपाठी तथा थाना प्रभारी कोलगवा पुलिस बल के साथ तत्काल मौके पर पहुंचे। अधिकारियों की उपस्थिति में कृपालपुर स्थित संदिग्ध स्थल पर सघन चेकिंग अभियान चलाया गया। अवैध गतिविधियों एवं नशे के कारोबार पर अंकुश लगाने हेतु चलाए जा रहे अभियान के तहत प्रशासन और पुलिस की संयुक्त टीम द्वारा त्वरित व प्रभावी कार्रवाई की गई है। कृपालपुर वार्ड नंबर 16 में अवैध रूप से शराब बेचे जाने की सटीक सूचना मिलने पर प्रशासनिक व पुलिस अधिकारियों की टीम ने मौके पर दबिश देकर अवैध शराब जब्त की है।
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    सतना Ak कृपालपुर पूरेनिहा बस्ती में शराब बिक्री के खिलाफ महिलाओं का हंगामा, पुलिस मौके पर
सतना के कृपालपुर पूरेनिहा बस्ती में कई वर्षों से अवैध शराब बिक्री के आरोप को लेकर महिलाओं ने शिवकुमार उर्फ बेटू चौधरी के खिलाफ मोर्चा खोलते हुए जमकर हंगामा किया। घटना की सूचना मिलते ही एसडीएम और कोलगवां पुलिस मौके पर पहुंची और स्थिति संभाली।
सूचना प्राप्त होते ही एसडीएम राहुल सिलाडिया, सीएसपी मनीष त्रिपाठी तथा थाना प्रभारी कोलगवा पुलिस बल के साथ तत्काल मौके पर पहुंचे। अधिकारियों की उपस्थिति में कृपालपुर स्थित संदिग्ध स्थल पर सघन चेकिंग अभियान चलाया गया।
अवैध गतिविधियों एवं नशे के कारोबार पर अंकुश लगाने हेतु चलाए जा रहे अभियान के तहत प्रशासन और पुलिस की संयुक्त टीम द्वारा त्वरित व प्रभावी कार्रवाई की गई है। कृपालपुर वार्ड नंबर 16 में अवैध रूप से शराब बेचे जाने की सटीक सूचना मिलने पर प्रशासनिक व पुलिस अधिकारियों की टीम ने मौके पर दबिश देकर अवैध शराब जब्त की है।
    user_ऋषिकेश त्रिपाठी
    ऋषिकेश त्रिपाठी
    रामपुर बघेलन, सतना, मध्य प्रदेश•
    5 hrs ago
  • भारतीय किसान संघ रीवा के आकाशवाणी केंद्र से सुभाष मिश्रा जी उर्फ मनसुख भाई जी मनगवां तहसील प्रांगड़ में किसानों की समस्याओं को लेकर किसानों के द्वारा किए गए धरना प्रदर्शन में सम्मिलित हुए किसानों को लेकर हुई कुछ बातें @mangwanrewamp
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    भारतीय किसान संघ 
रीवा के आकाशवाणी केंद्र से सुभाष मिश्रा जी उर्फ मनसुख भाई जी मनगवां तहसील प्रांगड़ में किसानों की समस्याओं को लेकर किसानों के द्वारा किए गए धरना प्रदर्शन में सम्मिलित हुए किसानों को लेकर हुई कुछ बातें 
@mangwanrewamp
    user_Ak Rewa
    Ak Rewa
    Photographer मंगवां, रीवा, मध्य प्रदेश•
    11 hrs ago
  • बेलवा में शर्म कर देने वाला मामला सामने आया बैकुंठपुर के पास विगत कई वर्षों से विजय शंकर द्विवेदी पूर्व भोले द्विवेदी रास्ता को लेकर दर भटक रहे आज तक प्रशासन द्वारा किसी भी प्रकार की कार्यवाही नहीं की गई
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    बेलवा में शर्म कर देने वाला मामला सामने आया बैकुंठपुर के पास
विगत कई वर्षों से विजय शंकर द्विवेदी पूर्व भोले द्विवेदी रास्ता को लेकर दर भटक रहे आज तक प्रशासन द्वारा किसी भी प्रकार की कार्यवाही नहीं की गई
    user_Ashish Dwivedi
    Ashish Dwivedi
    सिरमौर, रीवा, मध्य प्रदेश•
    17 hrs ago
  • श्री श्री 1008 श्री जुगल किशोर जू सरकार धाम पन्ना दिनांक 25 श्री श्री 1008 श्री जुगल किशोर जू सरकार धाम पन्ना दिनांक 25 सितंबर 2026 दिन शुक्रवार के आज के दर्शन जय जय श्री राधे हरे कृष्णा हरे कृष्णा कृष्णा हरे हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे जय श्री राधे.........
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    श्री श्री 1008 श्री जुगल किशोर जू सरकार धाम पन्ना दिनांक 25 
श्री श्री 1008 श्री जुगल किशोर जू सरकार धाम पन्ना दिनांक 25 सितंबर 2026 दिन शुक्रवार के आज के दर्शन जय जय श्री राधे हरे कृष्णा हरे कृष्णा कृष्णा हरे हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे जय श्री राधे.........
    user_रोहित कुमार पाठक
    रोहित कुमार पाठक
    Lawyer अमरपाटन, सतना, मध्य प्रदेश•
    2 hrs ago
  • ड्यूटी के नाम पर अटैचमेंट का तंत्र या प्रशासनिक विवशता? 200 स्वास्थ्यकर्मियों की कार्यव्यवस्था पर अब अभिलेखों से उठेंगे सवाल ड्यूटी के नाम पर अटैचमेंट का तंत्र या प्रशासनिक विवशता? 200 स्वास्थ्यकर्मियों की कार्यव्यवस्था पर अब अभिलेखों से उठेंगे सवाल रीवा। स्वास्थ्य व्यवस्था की रीढ़ माने जाने वाले मानव संसाधन के पुनर्विन्यास को लेकर रीवा एवं मऊगंज में उठ रहे सवाल अब महज शिकायतों की फाइल तक सीमित नहीं रह गए हैं। ग्रामीण एवं दूरस्थ संस्थानों में पदस्थ डॉक्टरों, पीजीएमओ, नर्सिंग अधिकारियों और पैरामेडिकल स्टाफ को ड्यूटी, अस्थायी कार्यव्यवस्था अथवा अटैचमेंट के माध्यम से अन्य संस्थानों में लगाए जाने की कथित व्यवस्था की व्यापकता का सत्यापन अब प्रशासनिक पारदर्शिता की कसौटी बनता जा रहा है। उपलब्ध सार्वजनिक ऑडिट सामग्री भी यह रेखांकित करती है कि स्वास्थ्य संस्थानों में स्वीकृत पद और वास्तविक उपलब्ध मानव संसाधन का अंतर स्वास्थ्य सेवा-प्रबंधन का महत्वपूर्ण प्रशासनिक विषय है। प्रशासनिक आवश्यकता पर सीमित अवधि की ड्यूटी एक सामान्य व्यवस्था हो सकती है। लेकिन जब अस्थायी आदेश बार-बार नवीनीकृत हों, कर्मचारी लंबे समय तक मूल पदस्थापना से बाहर रहे और मूल संस्था में उसकी वास्तविक उपलब्धता प्रभावित हो, तब प्रश्न आदेश की वैधता से आगे बढ़कर मानव संसाधन नियोजन और प्रशासनिक नियंत्रण का हो जाता है। अब प्रत्येक मामले में यही देखना होगा कि आदेश किसने जारी किया, अवधि कितनी थी, कारण क्या था, सक्षम स्वीकृति थी या नहीं, अवधि समाप्त होने के बाद समीक्षा हुई या नहीं और मूल संस्था की कमी की भरपाई कैसे हुई? पीजीएमओ डॉक्टरों को उपस्वास्थ्य केंद्रों में लंबे समय तक ड्यूटी दिए जाने की शिकायत हो अथवा ग्रामीण संस्थानों से कर्मचारियों को शहरी संजीवनी क्लिनिकों में भेजे जाने की बात, दोनों स्थितियों का उत्तर कर्मचारीवार पदस्थापना और वास्तविक कार्यस्थल के मिलान से ही निकलेगा। कागज पर कर्मचारी ग्रामीण संस्था में पदस्थ हो और बायोमेट्रिक या ड्यूटी रोस्टर उसे लगातार किसी अन्य केंद्र में दिखाए, तो प्रशासन को यह समझना होगा कि वास्तविक सेवा-स्थल कौन-सा है और मूल पदस्थापना की उपयोगिता क्या रह गई है। अब सामने आया सबसे गंभीर आरोप- ₹50 हजार से ₹1 लाख तक की कथित रकम? इसी बीच सूत्रों के हवाले से एक अत्यंत गंभीर और अपुष्ट चर्चा सामने आ रही है कि कुछ डॉक्टरों, नर्सिंग स्टाफ एवं पैरामेडिकल कर्मचारियों को ड्यूटी के नाम पर अटैचमेंट दिलाने के लिए कथित तौर पर ₹50 हजार से लेकर ₹1 लाख तक की रकम लिए जाने की बात कही जा रही है। इस कथित लेनदेन की स्वतंत्र पुष्टि उपलब्ध नहीं है और इसे स्थापित तथ्य के रूप में नहीं माना जा सकता। लेकिन आरोप की प्रकृति ऐसी है कि इसे केवल अफवाह कहकर दरकिनार करने के बजाय निष्पक्ष अभिलेखीय एवं वित्तीय जांच के दायरे में लाया जाना चाहिए, यदि शिकायतकर्ता या स्रोत इसके समर्थन में कोई दस्तावेज, भुगतान प्रमाण, संदेश, गवाह अथवा अन्य सत्यापन योग्य सामग्री प्रस्तुत करते हैं। यदि ऐसा कोई आर्थिक लेनदेन प्रमाणित होता है, तो मामला मात्र अटैचमेंट की प्रशासनिक वैधता का नहीं रहेगा, बल्कि भ्रष्टाचार, अधिकार के दुरुपयोग और प्रशासनिक प्रक्रिया की विश्वसनीयता से जुड़ा गंभीर विषय बन सकता है। जांच का केंद्र व्यक्ति नहीं, पूरी निर्णय-श्रृंखला हो! इस पूरे मामले में किसी अधिकारी को आरोप सिद्ध होने से पहले दोषी ठहराना उचित नहीं होगा। लेकिन यदि बड़ी संख्या में अटैचमेंट के आदेश जारी हुए हैं, तो निर्णय-श्रृंखला की जांच अपरिहार्य है- मांग किसने की? आवश्यकता किसने प्रमाणित की? आदेश किसने जारी किया? अवधि किसने निर्धारित की? नवीनीकरण किस आधार पर हुआ? मूल संस्था की स्थिति किसने देखी? और पूरी व्यवस्था की निगरानी किस स्तर पर हुई? इन प्रश्नों के उत्तर नोटशीट, आदेश-पत्र, बायोमेट्रिक रिकॉर्ड, ड्यूटी रोस्टर और संस्थानवार मानव संसाधन विवरण से निकाले जा सकते हैं। लगभग 200 कर्मचारियों के अटैचमेंट की सूचना यदि विभागीय अभिलेखों में प्रमाणित होती है, तो इसे व्यक्तिगत ड्यूटी आदेशों का बिखरा हुआ समूह मानना पर्याप्त नहीं होगा। तब आवश्यक होगा कि रीवा एवं मऊगंज के संपूर्ण स्वास्थ्य मानव संसाधन का एंड-टू-एंड ऑडिट कराया जाए। कितने कर्मचारी मूल पदस्थापना से बाहर हैं? कितने आदेश छह माह से अधिक पुराने हैं? कितने बार-बार नवीनीकृत हुए? कितने मामलों में मूल संस्था में वैकल्पिक व्यवस्था हुई? और ग्रामीण संस्थानों की सेवा क्षमता पर इसका क्या प्रभाव पड़ा? मामले की वास्तविकता का सबसे विश्वसनीय आधार आरोप या प्रत्यारोप नहीं, बल्कि अभिलेखीय क्रॉस-वेरिफिकेशन है। पदस्थापना आदेश बनाम ड्यूटी आदेश, ड्यूटी आदेश बनाम बायोमेट्रिक उपस्थिति, उपस्थिति बनाम वेतन रिकॉर्ड और वास्तविक कार्यस्थल बनाम स्वीकृत पद- इन सभी का मिलान होना चाहिए। यदि व्यवस्था नियमसम्मत है, तो अभिलेख उसे प्रमाणित करेंगे। यदि कहीं प्रक्रिया- विचलन है, तो वही अभिलेख उसकी परिधि और उत्तरदायित्व भी निर्धारित करेंगे। सवाल किसी एक कर्मचारी का नहीं, सवाल यह है कि क्या अस्थायी ड्यूटी आदेशों ने धीरे-धीरे मूल पदस्थापना व्यवस्था का स्थान ले लिया है? और यदि ऐसा हुआ है, तो इसकी प्रशासनिक सीमा, वैधता और जवाबदेही कौन तय करेगा? अब समय आरोपों का नहीं, रिकॉर्ड खोलने का है। क्योंकि स्वास्थ्य विभाग में मानव संसाधन की वास्तविक उपलब्धता कागज पर नहीं, उस ग्रामीण अस्पताल के दरवाजे पर दिखाई देती है जहां मरीज उपचार के लिए पहुंचता है।
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    ड्यूटी के नाम पर अटैचमेंट का तंत्र या प्रशासनिक विवशता? 200 स्वास्थ्यकर्मियों की कार्यव्यवस्था पर अब अभिलेखों से उठेंगे सवाल


ड्यूटी के नाम पर अटैचमेंट का तंत्र या प्रशासनिक विवशता? 200 स्वास्थ्यकर्मियों की कार्यव्यवस्था पर अब अभिलेखों से उठेंगे सवाल
रीवा। स्वास्थ्य व्यवस्था की रीढ़ माने जाने वाले मानव संसाधन के पुनर्विन्यास को लेकर रीवा एवं मऊगंज में उठ रहे सवाल अब महज शिकायतों की फाइल तक सीमित नहीं रह गए हैं। ग्रामीण एवं दूरस्थ संस्थानों में पदस्थ डॉक्टरों, पीजीएमओ, नर्सिंग अधिकारियों और पैरामेडिकल स्टाफ को ड्यूटी, अस्थायी कार्यव्यवस्था अथवा अटैचमेंट के माध्यम से अन्य संस्थानों में लगाए जाने की कथित व्यवस्था की व्यापकता का सत्यापन अब प्रशासनिक पारदर्शिता की कसौटी बनता जा रहा है। उपलब्ध सार्वजनिक ऑडिट सामग्री भी यह रेखांकित करती है कि स्वास्थ्य संस्थानों में स्वीकृत पद और वास्तविक उपलब्ध मानव संसाधन का अंतर स्वास्थ्य सेवा-प्रबंधन का महत्वपूर्ण प्रशासनिक विषय है। 
प्रशासनिक आवश्यकता पर सीमित अवधि की ड्यूटी एक सामान्य व्यवस्था हो सकती है। लेकिन जब अस्थायी आदेश बार-बार नवीनीकृत हों, कर्मचारी लंबे समय तक मूल पदस्थापना से बाहर रहे और मूल संस्था में उसकी वास्तविक उपलब्धता प्रभावित हो, तब प्रश्न आदेश की वैधता से आगे बढ़कर मानव संसाधन नियोजन और प्रशासनिक नियंत्रण का हो जाता है। अब प्रत्येक मामले में यही देखना होगा कि आदेश किसने जारी किया, अवधि कितनी थी, कारण क्या था, सक्षम स्वीकृति थी या नहीं, अवधि समाप्त होने के बाद समीक्षा हुई या नहीं और मूल संस्था की कमी की भरपाई कैसे हुई?
पीजीएमओ डॉक्टरों को उपस्वास्थ्य केंद्रों में लंबे समय तक ड्यूटी दिए जाने की शिकायत हो अथवा ग्रामीण संस्थानों से कर्मचारियों को शहरी संजीवनी क्लिनिकों में भेजे जाने की बात, दोनों स्थितियों का उत्तर कर्मचारीवार पदस्थापना और वास्तविक कार्यस्थल के मिलान से ही निकलेगा। कागज पर कर्मचारी ग्रामीण संस्था में पदस्थ हो और बायोमेट्रिक या ड्यूटी रोस्टर उसे लगातार किसी अन्य केंद्र में दिखाए, तो प्रशासन को यह समझना होगा कि वास्तविक सेवा-स्थल कौन-सा है और मूल पदस्थापना की उपयोगिता क्या रह गई है।
अब सामने आया सबसे गंभीर आरोप- ₹50 हजार से ₹1 लाख तक की कथित रकम?
इसी बीच सूत्रों के हवाले से एक अत्यंत गंभीर और अपुष्ट चर्चा सामने आ रही है कि कुछ डॉक्टरों, नर्सिंग स्टाफ एवं पैरामेडिकल कर्मचारियों को ड्यूटी के नाम पर अटैचमेंट दिलाने के लिए कथित तौर पर ₹50 हजार से लेकर ₹1 लाख तक की रकम लिए जाने की बात कही जा रही है। इस कथित लेनदेन की स्वतंत्र पुष्टि उपलब्ध नहीं है और इसे स्थापित तथ्य के रूप में नहीं माना जा सकता। लेकिन आरोप की प्रकृति ऐसी है कि इसे केवल अफवाह कहकर दरकिनार करने के बजाय निष्पक्ष अभिलेखीय एवं वित्तीय जांच के दायरे में लाया जाना चाहिए, यदि शिकायतकर्ता या स्रोत इसके समर्थन में कोई दस्तावेज, भुगतान प्रमाण, संदेश, गवाह अथवा अन्य सत्यापन योग्य सामग्री प्रस्तुत करते हैं। यदि ऐसा कोई आर्थिक लेनदेन प्रमाणित होता है, तो मामला मात्र अटैचमेंट की प्रशासनिक वैधता का नहीं रहेगा, बल्कि भ्रष्टाचार, अधिकार के दुरुपयोग और प्रशासनिक प्रक्रिया की विश्वसनीयता से जुड़ा गंभीर विषय बन सकता है।
जांच का केंद्र व्यक्ति नहीं, पूरी निर्णय-श्रृंखला हो!
इस पूरे मामले में किसी अधिकारी को आरोप सिद्ध होने से पहले दोषी ठहराना उचित नहीं होगा। लेकिन यदि बड़ी संख्या में अटैचमेंट के आदेश जारी हुए हैं, तो निर्णय-श्रृंखला की जांच अपरिहार्य है- मांग किसने की? आवश्यकता किसने प्रमाणित की? आदेश किसने जारी किया? अवधि किसने निर्धारित की? नवीनीकरण किस आधार पर हुआ? मूल संस्था की स्थिति किसने देखी? और पूरी व्यवस्था की निगरानी किस स्तर पर हुई? इन प्रश्नों के उत्तर नोटशीट, आदेश-पत्र, बायोमेट्रिक रिकॉर्ड, ड्यूटी रोस्टर और संस्थानवार मानव संसाधन विवरण से निकाले जा सकते हैं।
लगभग 200 कर्मचारियों के अटैचमेंट की सूचना यदि विभागीय अभिलेखों में प्रमाणित होती है, तो इसे व्यक्तिगत ड्यूटी आदेशों का बिखरा हुआ समूह मानना पर्याप्त नहीं होगा। तब आवश्यक होगा कि रीवा एवं मऊगंज के संपूर्ण स्वास्थ्य मानव संसाधन का एंड-टू-एंड ऑडिट कराया जाए। कितने कर्मचारी मूल पदस्थापना से बाहर हैं? कितने आदेश छह माह से अधिक पुराने हैं? कितने बार-बार नवीनीकृत हुए? कितने मामलों में मूल संस्था में वैकल्पिक व्यवस्था हुई? और ग्रामीण संस्थानों की सेवा क्षमता पर इसका क्या प्रभाव पड़ा?
मामले की वास्तविकता का सबसे विश्वसनीय आधार आरोप या प्रत्यारोप नहीं, बल्कि अभिलेखीय क्रॉस-वेरिफिकेशन है। पदस्थापना आदेश बनाम ड्यूटी आदेश, ड्यूटी आदेश बनाम बायोमेट्रिक उपस्थिति, उपस्थिति बनाम वेतन रिकॉर्ड और वास्तविक कार्यस्थल बनाम स्वीकृत पद- इन सभी का मिलान होना चाहिए। यदि व्यवस्था नियमसम्मत है, तो अभिलेख उसे प्रमाणित करेंगे। यदि कहीं प्रक्रिया- विचलन है, तो वही अभिलेख उसकी परिधि और उत्तरदायित्व भी निर्धारित करेंगे। सवाल किसी एक कर्मचारी का नहीं, सवाल यह है कि क्या अस्थायी ड्यूटी आदेशों ने धीरे-धीरे मूल पदस्थापना व्यवस्था का स्थान ले लिया है? और यदि ऐसा हुआ है, तो इसकी प्रशासनिक सीमा, वैधता और जवाबदेही कौन तय करेगा? अब समय आरोपों का नहीं, रिकॉर्ड खोलने का है।  क्योंकि स्वास्थ्य विभाग में मानव संसाधन की वास्तविक उपलब्धता कागज पर नहीं, उस ग्रामीण अस्पताल के दरवाजे पर दिखाई देती है जहां मरीज उपचार के लिए पहुंचता है।
    user_Abhishek Pandey
    Abhishek Pandey
    Artist हुजूर नगर, रीवा, मध्य प्रदेश•
    11 hrs ago
  • पुलिस कस्टडी से भाग रहे रेप के आरोपियों को बीच बाजार में बड़ी मेहनत के बाद पकड़ा
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    पुलिस कस्टडी से भाग रहे रेप के आरोपियों को बीच बाजार में बड़ी मेहनत के बाद पकड़ा
    user_Abhishek Pandey
    Abhishek Pandey
    Artist हुजूर नगर, रीवा, मध्य प्रदेश•
    4 hrs ago
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