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रंका चुतरू पंचायत के बीडीसी आसीफ आलम गरीब बेटीयों के शादी में बन रहे है रहनुमा
Sunil singh
रंका चुतरू पंचायत के बीडीसी आसीफ आलम गरीब बेटीयों के शादी में बन रहे है रहनुमा
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- बलरामपुर में फिर उजागर हुई अफीम की खेती: दूरस्थ पंचायतों में बाहरी लोगों का नेटवर्क, जांच की मांग तेज बलरामपुर। जिले में अवैध अफीम की खेती का मामला एक बार फिर सामने आया है। इस बार मामला करौंदा थाना क्षेत्र के तुरा पानी पंचायत का है, जहां पहाड़ियों की तराई में बसे एक सुदूर गांव में बड़े पैमाने पर अफीम की खेती किए जाने की जानकारी मिली है। यह गांव झारखंड सीमा से महज करीब 500 मीटर की दूरी पर स्थित है और यहां तक पहुंचना भी काफी मुश्किल माना जाता है। बताया जा रहा है कि यह गांव पूरी तरह ग्रामीण और आदिवासी क्षेत्र में आता है, जहां आज तक विकास की खास पहुंच नहीं है। यहां के लोगों को आज भी सड़क, स्वास्थ्य और अन्य मूलभूत सुविधाओं के लिए काफी संघर्ष करना पड़ता है। इसी दूरस्थता और प्रशासनिक पहुंच की कमी का फायदा उठाकर बाहरी क्षेत्र से आए कुछ लोगों ने ग्रामीणों को झांसे में लेकर जमीन लीज पर ली और वहां अफीम की खेती शुरू कर दी। स्थानीय ग्रामीणों का कहना है कि उन्हें इस बात की बिल्कुल भी जानकारी नहीं थी कि उनके इलाके में अफीम की खेती की जा रही है। आसपास के खेतों में काम करने वाले किसानों ने बताया कि जिन लोगों ने खेती की थी, उन्होंने इसे मसाले की फसल बताकर लगाया था। खेत के बगल में गेहूं की खेती करने वाले एक किसान ने बताया कि “हमें तो आज तक पता ही नहीं था कि यह अफीम है। उसने हमें बताया था कि यह कोई मसाले की खेती है।” ग्रामीणों का आरोप है कि भोले-भाले आदिवासियों को बहला-फुसलाकर उनकी जमीन लीज पर ली गई और उसके बाद बड़े पैमाने पर अफीम की खेती की गई। यह भी आशंका जताई जा रही है कि इस पूरे मामले में बाहरी लोगों का एक संगठित नेटवर्क काम कर रहा है, जो दूर-दराज के इलाकों को निशाना बनाकर अवैध खेती करा रहा है। गौरतलब है कि हाल ही में बलरामपुर जिले के समरी थाना क्षेत्र में भी अवैध अफीम की खेती को लेकर कार्रवाई की गई थी। उस कार्रवाई में भी बड़ी मात्रा में अफीम के पौधे नष्ट किए गए थे। अब करौंदा थाना क्षेत्र के तुरा पानी पंचायत में इसी तरह का मामला सामने आने के बाद कई सवाल खड़े हो गए हैं। स्थानीय लोगों और जानकारों का मानना है कि यदि इन मामलों की बारीकी से जांच की जाए तो संभव है कि अलग-अलग क्षेत्रों में सामने आए इन मामलों के पीछे एक ही गिरोह या नेटवर्क का हाथ हो। सीमावर्ती और दुर्गम इलाकों का फायदा उठाकर ऐसे लोग लंबे समय से इस तरह की गतिविधियों को अंजाम दे रहे हों, इससे इनकार नहीं किया जा सकता। अब जरूरत इस बात की है कि प्रशासन इन सभी मामलों को जोड़कर व्यापक स्तर पर जांच करे, ताकि यह साफ हो सके कि आखिर अवैध अफीम की खेती का यह नेटवर्क कितना बड़ा है और इसमें किन-किन लोगों की भूमिका है। स्थानीय लोगों ने भी प्रशासन से मांग की है कि क्षेत्र में लगातार निगरानी बढ़ाई जाए और ऐसे मामलों पर सख्त कार्रवाई की जाए, ताकि भविष्य में भोले-भाले ग्रामीणों को इस तरह के अवैध कामों में इस्तेमाल न किया जा सके।1
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