मुंबई की झोपड़पट्टियों में चलाए गए अभियानों से महिला एवं बाल स्वास्थ्य में सुधार: 'स्नेहा' संस्था की रिपोर्ट 👉 बच्चों में शारीरिक विकास रुकने की दर 30% से घटकर सीधे 21% पर आई। 2021 से 2026 के दौरान छोटे बच्चों के स्वास्थ्य पर प्रस्तुत रिपोर्ट में यह सकारात्मक तस्वीर सामने आई। 👉 महिलाओं में एनीमिया की समस्या पर भी काफी हद तक काबू पाया गया। पिछले पांच वर्षों में यह प्रमाण 40% से घटकर सीधे 17% पर आ गया। मुंबई: 'सोसायटी फॉर न्यूट्रिशन, एजुकेशन एंड हेल्थ एक्शन' (स्नेहा) नामक गैर-सरकारी संस्था ने हाल ही में मुंबई महानगर की वंचित महिलाओं और बच्चों की स्वास्थ्य संबंधी जानकारी साझा करने के लिए एक विशेष कार्यक्रम का आयोजन किया। इस वर्ष यह कार्यक्रम 'सस्टेनिंग इम्पैक्ट थ्रू पार्टनरशिप' (साझेदारी के माध्यम से टिकाऊ प्रभाव) की थीम के तहत आयोजित किया गया था। इस अवसर पर स्वास्थ्य एवं पोषण आहार के क्षेत्र में कार्यरत सार्वजनिक संस्थाओं के प्रतिनिधी, दानदाता, शोधकर्ता, विकास संस्थाएं, स्वयंसेवी संस्थाएं और स्वयंसेवक उपस्थित रहे। कार्यक्रम में मुंबई महानगर क्षेत्र की शहरी झोपड़पट्टियों में दो दशकों के दैरान चलाए गए स्वास्थ्य अभियानों की समीक्षा की गई। कार्यक्रम में 'स्नेहा' संस्था द्वारा वर्ष 2021-22 से 2025-26 की अवधि में किए गए प्रत्यक्ष कार्यों की रिपोर्ट प्रस्तुत की गई। प्रस्तुतीकरण के माध्यम से संस्था की निरंतर सफल कार्यप्रणाली की जानकारी दी गई। संस्था द्वारा चलाए गए स्वास्थ्य अभियानों के परिणामस्वरुप बच्चों में बौनेपन की दर 30 % से घटकर 21% दर्ज की गई। गंभीर कुपोषण का प्रमाण 14% से घटकर 11% हो गया। कम वजन की समस्या 28% से घटकर 22% पर आ गई। इसके साथ ही, छोटे बच्चों के संपूर्ण टीकाकरण में उल्लेखनीय वृद्धि देखी गई। पहले संपूर्ण टीकाकरण का प्रमाण केवल 79% दर्ज किया जाता था, जो नई रिपोर्ट के अनुसार बढ़कर 93% हो गया है। बच्चों के शारीरिक और मानसिक में आने वाली बाधाओं को दूर करने में सफलता मिली, जिससे इस समस्या का प्रमाण 18% से घटकर सीधे 7% पर आ गया। महिलाओं में समय पर गर्भावस्था पंजीकरण 45% से बढ़कर 76% हो गया। संस्थागत (अस्पतालों में) सुरक्षित प्रसव में भी वृद्धि होने की जानकारी दी गई; रिपोर्ट के निष्कर्षों में यह भी बताया गया कि स्थानीय नागरिक सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं और एकीकृत बाल विकास योजना का लाभ उठा रहे हैं तथा इस भागीदारी में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। इस अवसर पर 'स्नेहा' संस्था की मुख्य कार्यकारी अधिकारी सुश्री वैनेसा डिसूधा ने कहा, “ यह कार्यक्रम केवल प्राप्त परिणामों की प्रस्तुति तक सीमित नहीं है। इसके माध्यम से हमने जो सकारात्मक परिणाम हासिल किए है, उन्हें दीर्घकाल तक बनाए रखने के लिए सरकारी और सामुदायिक साझेदारों के साथ आवश्यक पहलुओं को समझना हमारा प्रमुख उद्देश्य है। प्रत्यक्ष कार्य के साक्ष्यों एवं अनुभवों को साझा करना तथा सरकार, शैक्षणिक संस्थानों, समाज और हितधारकों के बीच संवाद बढ़ाना इस मंच का मुख्य ध्येय है। इससे भविष्य की योजनाओं के निर्माण और सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली की क्षमता बढ़ाने के व्यावहारिक मार्ग खोजे जाएंगे। संस्था, सरकारी तंत्र को सशक्त बनाने और समय-समय पर आवश्यक तकनीकी सहायता प्रदान करने पर ध्यान केंद्रित कर रही है, जिससे भविष्य में भी यह सफलता कायम रहे और इसका दायरा और अधिक व्यापक हो सके।” इस कार्यक्रम के आयोजन ने 'स्नेहा' संस्था की कार्यशैली के एक महत्वपूर्ण पड़ाव को रेखांकित किया है। प्राप्त सफलता को केवल जानकारी तर सीमित न रखते हुए, इसे सरकारी और सामुदायिक व्यवस्था में स्थायी रूप से शामिक करने के लिए संस्था प्रयासरत है। 'स्नेहा' संस्था द्वारा 'शाश्वत मॉडल' की संकल्पना लागू की जाती है, जिसके तहत स्वास्थ्य संबंधी पहलों का नेतृत्व चरणबद्ध तरीके से स्थानीय समुदाय को सौंपा जाता है। संस्थागत स्तर पर सफल उपक्रमों को स्थापित करने के लिए सार्वजनिक प्रणाली को मजबूक किया जाता है। स्थानीय समुदाय की प्रत्यक्ष भागीदारी सुनिश्चित करके तथा नगर निगमों के स्वास्थ्य विभागों एवं एकीकृत बाल विकास सेवा जैसी सरकारी प्रणालियों के साथ साझेदारी करके अपेक्षित सफलता प्राप्त की जा सकती है, यह संस्था ने अपने अभियानों के माध्यम से सिद्ध किया है। अभियानों का विस्तार होने के साथ ही प्रत्यक्ष कार्य की जिम्मेदारी प्रशिक्षित स्वयंसेवकों और सरकारी कर्मचारियों को सौंपी गई। संस्था पर निर्भर रहने के बजाय स्थानीय समुदाय और सरकारी तंत्र की स्वायत्तता बढ़ाने वाला यह जनभागीदारी आधारित मॉडेल अत्यंत प्रभावी साबित हुआ। बड़ी संख्या में लोगों ने सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं का लाभ उठाया, जिससे माताओं और नवजात शिशुओं के स्वास्थ्य में टिकाऊ व व सकारात्मक बदलाव देखे गए। इसके अतिरिक्त, बच्चों में बौनेपन की समस्या 31% से घटकर 27% हो गई। गंभीर कुपोषण में 2% की कमी आई और यह 11% से घटकर 9% दर्द किया गया। बच्चों में कम वजन की समस्या भी धीरे-धीरे कम हो रही है; पहले यह 28% थी, जो अब घटकर 25% पर आ गई है। इस जनभागीदारी मॉडेल के कारण बच्चों का संपूर्ण टीकाकरण 84% से बढ़कर 92% हो गया तथा समय पर गर्भावस्था पंजीकरण 45% सुधारकर 64% तर पहुंच गया। 'स्नेहा' संस्था ने प्रत्यक्ष जनभागीदारी को बढ़ावा देने वाले अभियानों के साथ-साथ अन्य पहलों में भी महत्वपूर्ण योगदान दिया है। संस्था ने 'गोद ली गई आंगनवाड़ी / सक्षम आंगनवाड़ी' पहल के माध्य से एकीकृत बाल विकास सेवा के साथ भागीदारी की है। इस पहल के तहत मानकीकृत मूल्यांकन ढांचे और मार्गदर्शक मॉडेल का पालन किया गया, जिससे आंगनवाड़ी केंद्र की बुनियादी सुविधाओं, सामग्री प्रबंधन,दस्तावेजीकरण और सेवा वितरण में व्यापक सुधार देखा गया। मध्यम या उत्त दर्जा हासिल करने वाले आंगनवाड़ी केंद्रो का प्रमाण 13% से बढ़कर सीधे ५३% हो गया, जबकि अत्यंत निर्म दर्जे वाले केंद्रों का प्रमाण, जो पहले 24% था, घटकर मात्र ३% रह गया। ताजा पका हुआ भोजन, घर ले जाने हेतु पोषक आहार, पूर्व-प्राथमिक शिक्षा, बच्चों की शारीरिक वृद्धि की निगरानी और पोषण संबंधी सलाह जैसी सेवाओं के प्रति लोगों में व्यापक जागरूकता पैदा हुई है। हालांकि, इस बढ़ती जागरूकता की तुलना में सेवाओं के प्रत्यक्ष उपयोग और लाभार्थिओं की संतुष्टि में कुछ अंतर पाया गया है, जिस पर भविष्य में ध्यान केंद्रित करने हेतु चर्चा की गई। 'स्नेहा' संस्था मुंबई महानगर क्षेत्र के विभिन्न नगर निगमों के साथ मिलकर काम करती है। इन शहरों की झोपड़पट्टियों में निवास करने वाली महिलाओं और बच्चों के स्वास्थ्य सेवाओं के स्तर को सुधारने में संस्था ने महत्वपूर्ण योगदान दिया है। संस्था के प्रयासों से गर्भवती महिलाओं को गंभीर स्थिती में एक अस्पताल से दूसरे अस्पताल स्थानांतरित करने की प्रक्रिया (पेशेंट रेफरल सिस्टीम) को मजबूती मिली है। सभी नगर निगमों के साथ दीर्घकालिक सहयोग के माध्यम से यह संभव हो सका है। इसके लिए मरीजों को स्थानांतरित करने के अधिकृत मार्ग, परस्पर संवाद, प्रत्यक्ष देखरेख और प्रशासनिक जवाबदेही जैसे घटकों पर विशेष ध्यान दिया गया। स्थानीय चिकित्सा सुविधाओं और दो अस्पतालों के बीच की दूरी को ध्यान में रखकर यह नेटवर्क तैयार किया गया। वर्ष 2007 में शुरू हुई यह व्यवस्था प्रारंभ में केवल एक नगर निगम तक सीमित थी, जो 2025 तर बढ़कर 10 नगर निगमों में कार्यरत हो चुकी है। रिपोर्ट के अनुसार, स्थानांतरिक की गई महिला मरीज के निश्चित अस्पताल तर पहुँचने की पुष्टि करने का प्रमाण 2024 के 36% से बढ़कर २०२३ में ८४% हो गया है। रेफरल स्लिप (स्थानांतरण रसीद) पूरी भरने का प्रमाण 78७८% से ८९% तक पहुँच गया है। मानक चिकित्सा नियमों के अनुसार मरीज स्थानांतरण का प्रमाण 76% से सुधारकर ८७% दर्ज किया गया है। पहले जो देखरेख और दस्तावेजीकरण 'स्नेहा' संस्था करती थी, वह जिम्मेदारी अब नगर निगम के नोडल अधिकारी संभाल रहे हैं, जो सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली की स्वायत्तता और संस्थागत सशक्तीकरण को दर्शाता है। संस्था अब केवल आवश्यकतानुसार तकनीकी मार्गदर्शन और सहयोग प्रदान करती है। संस्था का व्यक्तिगत अनुभव भी इस रिपोर्ट में साझा किया गया है। किसी भी उपक्रम का स्थायित्व रातों-रात हासिल नहीं होता, बल्कि यह स्थिती और तैयारी के साथ होने वाला एक निरंतर प्रवास है। इन सफल अभियानों के माध्यम से आगामी समय में सरकारी स्वास्थ्य प्रणालियों का मजबूत करना और उन्हें सहयोग देना 'स्नेहा' संस्था का मुख्य उद्देश्य है। इस परिचर्चा में सरकारी अधिकारियों और नागरिकों को चार प्रमुख बिंदुओं पर विचार-मंथन करने का अवसर मिला: 1. उपक्रम के निर्माण के समय ही उसके दीर्घकालिक स्थायित्व का ध्यान कब रखा जाए? 2. शहरी झोपड़पट्टियों में बड़े पैमाने पर होने वाले लोगों के आवागमन के बावजूद सकारात्मक परिणामों को कैसे बनाए रखा जाए? 3. किस स्तर पर निरंतर तकनीकी सहायता का सर्वाधिक लाभ मिल सकता है? 4.सरकारी व्यवस्था को मजबूत बनाकर इस बदलाव को टिकाऊ बनाने में नागरिक कैसे योगदान दे सकते हैं?
मुंबई की झोपड़पट्टियों में चलाए गए अभियानों से महिला एवं बाल स्वास्थ्य में सुधार: 'स्नेहा' संस्था की रिपोर्ट 👉 बच्चों में शारीरिक विकास रुकने की दर 30% से घटकर सीधे 21% पर आई। 2021 से 2026 के दौरान छोटे बच्चों के स्वास्थ्य पर प्रस्तुत रिपोर्ट में यह सकारात्मक तस्वीर सामने आई। 👉 महिलाओं में एनीमिया की समस्या पर भी काफी हद तक काबू पाया गया। पिछले पांच वर्षों में यह प्रमाण 40% से घटकर सीधे 17% पर आ गया। मुंबई: 'सोसायटी फॉर न्यूट्रिशन, एजुकेशन एंड हेल्थ एक्शन' (स्नेहा) नामक गैर-सरकारी संस्था ने हाल ही में मुंबई महानगर की वंचित महिलाओं और बच्चों की स्वास्थ्य संबंधी जानकारी साझा करने के लिए एक विशेष कार्यक्रम का आयोजन किया। इस वर्ष यह कार्यक्रम 'सस्टेनिंग इम्पैक्ट थ्रू पार्टनरशिप' (साझेदारी के माध्यम से टिकाऊ प्रभाव) की थीम के तहत आयोजित किया गया था। इस अवसर पर स्वास्थ्य एवं पोषण आहार के क्षेत्र में कार्यरत सार्वजनिक संस्थाओं के प्रतिनिधी, दानदाता, शोधकर्ता, विकास संस्थाएं, स्वयंसेवी संस्थाएं और स्वयंसेवक उपस्थित रहे। कार्यक्रम में मुंबई महानगर क्षेत्र की शहरी झोपड़पट्टियों में दो दशकों के दैरान चलाए गए स्वास्थ्य अभियानों की समीक्षा की गई। कार्यक्रम में 'स्नेहा' संस्था द्वारा वर्ष 2021-22 से 2025-26 की अवधि में किए गए प्रत्यक्ष कार्यों की रिपोर्ट प्रस्तुत की गई। प्रस्तुतीकरण के माध्यम से संस्था की निरंतर सफल कार्यप्रणाली की जानकारी दी गई। संस्था द्वारा चलाए गए स्वास्थ्य अभियानों के परिणामस्वरुप बच्चों में बौनेपन की दर 30 % से घटकर 21% दर्ज की गई। गंभीर कुपोषण का प्रमाण 14% से घटकर 11% हो गया। कम वजन की समस्या 28% से घटकर 22% पर आ गई। इसके साथ ही, छोटे बच्चों के संपूर्ण टीकाकरण में उल्लेखनीय वृद्धि देखी गई। पहले संपूर्ण टीकाकरण का प्रमाण केवल 79% दर्ज किया जाता था, जो नई रिपोर्ट के अनुसार बढ़कर 93% हो गया है। बच्चों के शारीरिक और मानसिक में आने वाली बाधाओं को दूर करने में सफलता मिली, जिससे इस समस्या का प्रमाण 18% से घटकर सीधे 7% पर आ गया। महिलाओं में समय पर गर्भावस्था पंजीकरण 45% से बढ़कर 76% हो गया। संस्थागत (अस्पतालों में) सुरक्षित प्रसव में भी वृद्धि होने की जानकारी दी गई; रिपोर्ट के निष्कर्षों में यह भी बताया गया कि स्थानीय नागरिक सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं और एकीकृत बाल विकास योजना का लाभ उठा रहे हैं तथा इस भागीदारी में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। इस अवसर पर 'स्नेहा' संस्था की मुख्य कार्यकारी अधिकारी सुश्री वैनेसा डिसूधा ने कहा, “ यह कार्यक्रम केवल प्राप्त परिणामों की प्रस्तुति तक सीमित नहीं है। इसके माध्यम से हमने जो सकारात्मक परिणाम हासिल किए है, उन्हें दीर्घकाल तक बनाए रखने के लिए सरकारी और सामुदायिक साझेदारों के साथ आवश्यक पहलुओं को समझना हमारा प्रमुख उद्देश्य है। प्रत्यक्ष कार्य के साक्ष्यों एवं अनुभवों को साझा करना तथा सरकार, शैक्षणिक संस्थानों, समाज और हितधारकों के बीच संवाद बढ़ाना इस मंच का मुख्य ध्येय है। इससे भविष्य की योजनाओं के निर्माण और सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली की क्षमता बढ़ाने के व्यावहारिक मार्ग खोजे जाएंगे। संस्था, सरकारी तंत्र को सशक्त बनाने और समय-समय पर आवश्यक तकनीकी सहायता प्रदान करने पर ध्यान केंद्रित कर रही है, जिससे भविष्य में भी यह सफलता कायम रहे और इसका दायरा और अधिक व्यापक हो सके।” इस कार्यक्रम के आयोजन ने 'स्नेहा' संस्था की कार्यशैली के एक महत्वपूर्ण पड़ाव को रेखांकित किया है। प्राप्त सफलता को केवल जानकारी तर सीमित न रखते हुए, इसे सरकारी और सामुदायिक व्यवस्था में स्थायी रूप से शामिक करने के लिए संस्था प्रयासरत है। 'स्नेहा' संस्था द्वारा 'शाश्वत मॉडल' की संकल्पना लागू की जाती है, जिसके तहत स्वास्थ्य संबंधी पहलों का नेतृत्व चरणबद्ध तरीके से स्थानीय समुदाय को सौंपा जाता है। संस्थागत स्तर पर सफल उपक्रमों को स्थापित करने के लिए सार्वजनिक प्रणाली को मजबूक किया जाता है। स्थानीय समुदाय की प्रत्यक्ष भागीदारी सुनिश्चित करके तथा नगर निगमों के स्वास्थ्य विभागों एवं एकीकृत बाल विकास सेवा जैसी सरकारी प्रणालियों के साथ साझेदारी करके अपेक्षित सफलता प्राप्त की जा सकती है, यह संस्था ने अपने अभियानों के माध्यम से सिद्ध किया है। अभियानों का विस्तार होने के साथ ही प्रत्यक्ष कार्य की जिम्मेदारी प्रशिक्षित स्वयंसेवकों और सरकारी कर्मचारियों को सौंपी गई। संस्था पर निर्भर रहने के बजाय स्थानीय समुदाय और सरकारी तंत्र की स्वायत्तता बढ़ाने वाला यह जनभागीदारी आधारित मॉडेल अत्यंत प्रभावी साबित हुआ। बड़ी संख्या में लोगों ने सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं का लाभ उठाया, जिससे माताओं और नवजात शिशुओं के स्वास्थ्य में टिकाऊ व व सकारात्मक बदलाव देखे गए। इसके अतिरिक्त, बच्चों में बौनेपन की समस्या 31% से घटकर 27% हो गई। गंभीर कुपोषण में 2% की कमी आई और यह 11% से घटकर 9% दर्द किया गया। बच्चों में कम वजन की समस्या भी धीरे-धीरे कम हो रही है; पहले यह 28% थी, जो अब घटकर 25% पर आ गई है। इस जनभागीदारी मॉडेल के कारण बच्चों का संपूर्ण टीकाकरण 84% से बढ़कर 92% हो गया तथा समय पर गर्भावस्था पंजीकरण 45% सुधारकर 64% तर पहुंच गया। 'स्नेहा' संस्था ने प्रत्यक्ष जनभागीदारी को बढ़ावा देने वाले अभियानों के साथ-साथ अन्य पहलों में भी महत्वपूर्ण योगदान दिया है। संस्था ने 'गोद ली गई आंगनवाड़ी / सक्षम आंगनवाड़ी' पहल के माध्य से एकीकृत बाल विकास सेवा के साथ भागीदारी की है। इस पहल के तहत मानकीकृत मूल्यांकन ढांचे और मार्गदर्शक मॉडेल का पालन किया गया, जिससे आंगनवाड़ी केंद्र की बुनियादी सुविधाओं, सामग्री प्रबंधन,दस्तावेजीकरण और सेवा वितरण में व्यापक सुधार देखा गया। मध्यम या उत्त दर्जा हासिल करने वाले आंगनवाड़ी केंद्रो का प्रमाण 13% से बढ़कर सीधे ५३% हो गया, जबकि अत्यंत निर्म दर्जे वाले केंद्रों का प्रमाण, जो पहले 24% था, घटकर मात्र ३% रह गया। ताजा पका हुआ भोजन, घर ले जाने हेतु पोषक आहार, पूर्व-प्राथमिक शिक्षा, बच्चों की शारीरिक वृद्धि की निगरानी और पोषण संबंधी सलाह जैसी सेवाओं के प्रति लोगों में व्यापक जागरूकता पैदा हुई है। हालांकि, इस बढ़ती जागरूकता की तुलना में सेवाओं के प्रत्यक्ष उपयोग और लाभार्थिओं की संतुष्टि में कुछ अंतर पाया गया है, जिस पर भविष्य में ध्यान केंद्रित करने हेतु चर्चा की गई। 'स्नेहा' संस्था मुंबई महानगर क्षेत्र के विभिन्न नगर निगमों के साथ मिलकर काम करती है। इन शहरों की झोपड़पट्टियों में निवास करने वाली महिलाओं और बच्चों के स्वास्थ्य सेवाओं के स्तर को सुधारने में संस्था ने महत्वपूर्ण योगदान दिया है। संस्था के प्रयासों से गर्भवती महिलाओं को गंभीर स्थिती में एक अस्पताल से दूसरे अस्पताल स्थानांतरित करने की प्रक्रिया (पेशेंट रेफरल सिस्टीम) को मजबूती मिली है। सभी नगर निगमों के साथ दीर्घकालिक सहयोग के माध्यम से यह संभव हो सका है। इसके लिए मरीजों को स्थानांतरित करने के अधिकृत मार्ग, परस्पर संवाद, प्रत्यक्ष देखरेख और प्रशासनिक जवाबदेही जैसे घटकों पर विशेष ध्यान दिया गया। स्थानीय चिकित्सा सुविधाओं और दो अस्पतालों के बीच की दूरी को ध्यान में रखकर यह नेटवर्क तैयार किया गया। वर्ष 2007 में शुरू हुई यह व्यवस्था प्रारंभ में केवल एक नगर निगम तक सीमित थी, जो 2025 तर बढ़कर 10 नगर निगमों में कार्यरत हो चुकी है। रिपोर्ट के अनुसार, स्थानांतरिक की गई महिला मरीज के निश्चित अस्पताल तर पहुँचने की पुष्टि करने का प्रमाण 2024 के 36% से बढ़कर २०२३ में ८४% हो गया है। रेफरल स्लिप (स्थानांतरण रसीद) पूरी भरने का प्रमाण 78७८% से ८९% तक पहुँच गया है। मानक चिकित्सा नियमों के अनुसार मरीज स्थानांतरण का प्रमाण 76% से सुधारकर ८७% दर्ज किया गया है। पहले जो देखरेख और दस्तावेजीकरण 'स्नेहा' संस्था करती थी, वह जिम्मेदारी अब नगर निगम के नोडल अधिकारी संभाल रहे हैं, जो सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली की स्वायत्तता और संस्थागत सशक्तीकरण को दर्शाता है। संस्था अब केवल आवश्यकतानुसार तकनीकी मार्गदर्शन और सहयोग प्रदान करती है। संस्था का व्यक्तिगत अनुभव भी इस रिपोर्ट में साझा किया गया है। किसी भी उपक्रम का स्थायित्व रातों-रात हासिल नहीं होता, बल्कि यह स्थिती और तैयारी के साथ होने वाला एक निरंतर प्रवास है। इन सफल अभियानों के माध्यम से आगामी समय में सरकारी स्वास्थ्य प्रणालियों का मजबूत करना और उन्हें सहयोग देना 'स्नेहा' संस्था का मुख्य उद्देश्य है। इस परिचर्चा में सरकारी अधिकारियों और नागरिकों को चार प्रमुख बिंदुओं पर विचार-मंथन करने का अवसर मिला: 1. उपक्रम के निर्माण के समय ही उसके दीर्घकालिक स्थायित्व का ध्यान कब रखा जाए? 2. शहरी झोपड़पट्टियों में बड़े पैमाने पर होने वाले लोगों के आवागमन के बावजूद सकारात्मक परिणामों को कैसे बनाए रखा जाए? 3. किस स्तर पर निरंतर तकनीकी सहायता का सर्वाधिक लाभ मिल सकता है? 4.सरकारी व्यवस्था को मजबूत बनाकर इस बदलाव को टिकाऊ बनाने में नागरिक कैसे योगदान दे सकते हैं?
- मिर्ज़ापुर पूर्व IAS दिव्या मित्तल मड़िहान क्षेत्र के रामपुर गांव में नन्हे मुन्ने बच्चों से उनके बेहतर भविष्य को पहले से ही सुदृढ़ करने का वादा करती हुई1
- मिर्ज़ापुर के विंध्याचल में युवक की हत्या की आशंका, परिजनों की न्याय की गुहार।1
- अहरौरा में निःशुल्क चिकित्सा शिविर में 233 मरीजों को मिला स्वास्थ्य लाभ जनसेवा मिशन के तहत जोड़ों के दर्द, थायराइड, लिवर-किडनी सहित कई जांचें निःशुल्क अहरौरा में निःशुल्क चिकित्सा शिविर में 233 मरीजों को मिला स्वास्थ्य लाभ जनसेवा मिशन के तहत जोड़ों के दर्द, थायराइड, लिवर-किडनी सहित कई जांचें निःशुल्क अहरौरा, मिर्जापुर। डॉ. एस. पी. पटेल, अध्यक्ष भूमि विकास बैंक लालगंज के नेतृत्व में रविवार को सब्जी मंडी के पास निर्मलवा में निःशुल्क चिकित्सा शिविर लगा। दोपहर 3 से शाम 6 बजे तक चले शिविर में 233 मरीजों का निःशुल्क उपचार हुआ। शिविर में जोड़ों के दर्द, पेट, आंख और त्वचा रोगों के मरीज अधिक मिले। चिकित्सकों ने जांच कर परामर्श और ब्रांडेड दवाएं निःशुल्क दीं। शिविर की खास बात यह रही कि बुखार से लेकर थायराइड, लीवर फंक्शन, किडनी फंक्शन, लिपिड प्रोफाइल, शुगर और हार्ट से जुड़ी 800 से 1000 रुपये तक की महंगी जांचों के लिए ब्लड सैंपल लिए गए। रिपोर्ट 1 से 2 दिन में व्हाट्सएप पर भेजी जाएगी। मरीजों को डॉक्टर की 500 से 1000 रुपये फीस और जांच का खर्च बचाकर गांव-बाजार में ही इलाज मिला। टीम में डॉ. एम. बी. शर्मा, डॉ. शालिनी सिंह पटेल, डॉ. नवेंदु पटेल, डॉ. शालिनी सिंह और डॉ. रविन्द्र पाल रहे। पैरामेडिकल टीम में संजीव प्रजापति, शिवम मौर्य, मनीष मौर्य, दीपिका भारद्वाज, अर्चना, आंचल यादव और आंचल मौर्य का सहयोग रहा। आयोजन में पूर्व नगर पालिका अध्यक्ष राजेंद्र सोनकर का विशेष सहयोग रहा। डॉ. पटेल ने कहा, यह किसी सरकारी योजना से नहीं, दो वर्षों से चल रहा जनसेवा अभियान है। दवाएं ब्रांडेड हैं, पूरा उपयोग करें। जल्दबाजी न करें, यह जीवन का प्रश्न है। जरूरतमंद तक स्वास्थ्य सेवा पहुंचाना ही उद्देश्य है। अगला शिविर अगले रविवार बाबा मंदिर पर 3 से 6 बजे लगेगा।1
- आखिर मिर्जापुर के विकास को लेकर उनकी क्या सोच है? छात्रों के हित में वे क्या काम कर रहे हैं और आगामी चुनाव को लेकर उनकी क्या राय है? आइए, जानते हैं इस खास बातचीत में। आज हमारी खास बातचीत है अधिवक्ता एवं युवा छात्र नेता आकाश सिंह से। गरीबों और असहायों की मदद से लेकर छात्र हितों की लड़ाई तक, आकाश सिंह ने समाजसेवा और युवाओं के मुद्दों पर अपनी बात रखी।1
- बच्चों के सुरक्षित भविष्य के लिए संपूर्ण टीकाकरण जरूरी, सीएमओ कार्यालय में जागरूकता एवं प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित बच्चों के सुरक्षित भविष्य के लिए संपूर्ण टीकाकरण जरूरी, सीएमओ कार्यालय में जागरूकता एवं प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित मिर्जापुर। बच्चों को गंभीर बीमारियों से बचाने और नियमित टीकाकरण के प्रति लोगों को जागरूक करने के उद्देश्य से मिर्जापुर में एक विशेष प्रशिक्षण एवं जागरूकता कार्यक्रम आयोजित किया गया। यूनिसेफ (UNICEF) एवं मंडलीय चिकित्सा विभाग के संयुक्त तत्वावधान में सीएमओ कार्यालय में आयोजित इस कार्यक्रम में स्वास्थ्य विभाग के अधिकारियों, सामाजिक संगठनों और विभिन्न धर्मों के प्रतिनिधियों ने सहभागिता की। कार्यक्रम के दौरान चिकित्सकों और स्वास्थ्य विशेषज्ञों ने संपूर्ण टीकाकरण के महत्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि बच्चों को निर्धारित समय पर टीके लगवाना बेहद आवश्यक है। नियमित टीकाकरण से पोलियो, टीबी, खसरा सहित कई गंभीर बीमारियों से बचाव में मदद मिलती है। वक्ताओं ने अभिभावकों से अपील की कि वे बच्चों के टीकाकरण में लापरवाही न बरतें और स्वास्थ्य विभाग की सलाह का पालन करें। इस अवसर पर ब्रह्माकुमारीज सेवा केंद्र की प्रभारी बीके बिंदु दीदी, बीके रूपाली, बीके नीति बहन और बीके वीरेंद्र सहित गायत्री परिवार तथा मुस्लिम समाज के मौलाना एवं अन्य सामाजिक-धार्मिक संस्थाओं के प्रतिनिधि मौजूद रहे। स्वास्थ्य क्षेत्र से मंडलीय स्वास्थ्य समन्वयक संतोष श्रीवास्तव, राहुल सिंह, कमलेश, तुलसी दास तिवारी, विष्णु मिश्रा, राजन सिंह, कोमल मौर्य और अर्चना मिश्रा सहित विभिन्न संगठनों के प्रतिनिधियों ने भी भाग लिया। कार्यक्रम में उपस्थित लोगों ने बच्चों के संपूर्ण टीकाकरण के प्रति समाज में जागरूकता बढ़ाने और इस जनकल्याणकारी अभियान में सहयोग करने का संकल्प लिया। आयोजकों के अनुसार, यह पहल बच्चों को स्वस्थ, सुरक्षित और उज्ज्वल भविष्य प्रदान करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है।4
- ऊंचा मोबाइल का टावर, ऊपर नकाब में बैठी एक लड़की और नीचे सासे थामे खड़ी सैकड़ों लोगों की भारी भीड़। पहली नजर में इस खौफनाक मंजर को देखने वाले हर शख्स को लगा कि शायद यह लड़की कोई घातक कदम उठाने आई है। पुलिस परेशान थी। प्रशासन हैरान था और नीचे खड़े घर वालों का रो-रो कर बुरा हाल था। हर कोई हाथ जोड़कर गिड़गिड़ा रहा था कि बेटी नीचे आ जाओ। लेकिन बुर्का पहने वो लड़की अपनी जिद पर अड़ी थी। मानो उसे अपनी जान की कोई परवाह ही ना हो। लेकिन जैसे ही इस हाई वोल्टेज ड्रामे की असली वजह सामने आई, वहां मौजूद पुलिस से लेकर आम लोगों तक सबके पैरों तले से जमीन खिसक गई। क्योंकि यह लड़की अपनी जान देने के लिए नहीं बल्कि शादी कराने के लिए टावर पर चढ़ी थी। दरअसल, यह पूरा हैरान कर देने वाला मामला उत्तर प्रदेश के बहराइच जिले से सामने आया है। टावर पर चढ़ी इस लड़की का नाम महक है और महक का गांव के ही नूरुद्दीन नाम के एक युवक के साथ 5 महीने से प्रेम प्रसंग चल रहा था। दोनों एक दूसरे से बेपनाह मोहब्बत करते थे और साथ जीने मरने की कसमें खा चुके थे। दोनों जल्द से जल्द निकाह करना चाहते थे। लेकिन इस प्यार की कहानी में एक बड़ा ट्विस्ट था। ट्विस्ट यह था कि जिससे लड़की मोहब्बत करती थी वो इस वक्त रोजी रोटी कमाने के लिए मुंबई में गया हुआ था। इस बीच महक के घर वालों ने इस रिश्ते का विरोध करना शुरू कर दिया। उन्होंने लड़की की मर्जी के खिलाफ जाकर उसकी दूसरी जगह रिश्ता तय कर दिया और उस पर शादी का दबाव बनाने लगे। जब महक को लगा कि उसकी मोहब्बत हमेशा के लिए उससे छीन जाएगी और घरवाले उसकी शादी कभी और कर देंगे तो उसने एक ऐसा आत्मघाती कदम उठाने की सोची जिसके बारे में किसी ने सपने में भी नहीं सोचा था। वो चुपके से अपने घर से निकली और दौड़ते हुए सीधे गांव के सबसे ऊंचे मोबाइल टावर पर चढ़ गई और देखते ही देखते वो टावर की चोटी पर जाकर बैठ गई। जब गांव वालों ने एक लड़की को टावर पर देखा तो पूरे इलाके में हड़कंप मच गया। पुलिस को सूचना दी गई मौके पर भारी पुलिस बल भी पहुंचा। लेकिन लड़की की बस एक ही रट थी कि अगर मेरा निकाह तुरंत नूरुद्दीन से नहीं कराया गया तो मैं यहां से कूद भी सकती हूं। घंटों तक चले इसका हाई वोल्टेज भारी मान मनोबल के बाद भी जब लड़की अपनी जिद से नहीं मानी तो पुलिस और घर वालों को समझाया गया कि इसे बातों से नीचे उतारा नहीं जा सकता। लड़की की जान बचाने के लिए मौके पर ही एक कारी साहब को बुलाया गया। पुलिस अधिकारियों ने मिलकर एक बेहद अनोखा और ऐतिहासिक रास्ता निकाला। मुंबई में बैठे उस प्रेमी को तुरंत WhatsApp पर वीडियो कॉल मिलाया गया और देखते ही देखते टावर के नीचे एक डिजिटल मंडप सज गया। इंटरनेट के जरिए बहराइच के उस गांव को सीधे मुंबई से जोड़ा गया। मौलाना ने ऑनलाइन निकाहनामा पढ़ना शुरू किया। उधर वीडियो कॉल पर मुंबई से दूल्हे ने कुबूल है कहा और इधर टावर के ऊपर बैठी दुल्हन ने भी फोन पर ही इस निकाह को मंजूरी दे दी। और जैसे ही निकाह मुकम्मल हुआ, टावर पर चढ़ी उस दुल्हन का गुस्सा और जिद शांत हो गई। वो धीरे-धीरे सुरक्षित तरीके से टावर से नीचे उतर आई। लड़की को सही सलामत नीचे देख पुलिस प्रशासन और घर वालों ने राहत की सांस ली। लेकिन लड़की महक के नीचे आते ही उसकी मां फिर से रिश्ते के खिलाफ हो गई। उन्होंने कहा कि मुझे यह रिश्ता बिल्कुल भी मंजूर नहीं है। अगर लड़की फिर भी उसी लड़के के साथ रहना चाहती है तो वह उसके घर अब जा सकती है। इसके बाद पुलिसकर्मी लड़की और उसके परिजनों को लेकर थाने पहुंची और वहां से समझाने के बाद महक को उसकी मां के साथ उसे घर भेज दिया गया। वहीं फिलहाल अब यह पूरा मामला इलाके भर में सुर्खियां बटोर रहा ऊंचा मोबाइल का टावर, ऊपर नकाब में बैठी एक लड़की और नीचे सासे थामे खड़ी सैकड़ों लोगों की भारी भीड़। पहली नजर में इस खौफनाक मंजर को देखने वाले हर शख्स को लगा कि शायद यह लड़की कोई घातक कदम उठाने आई है। पुलिस परेशान थी। प्रशासन हैरान था और नीचे खड़े घर वालों का रो-रो कर बुरा हाल था। हर कोई हाथ जोड़कर गिड़गिड़ा रहा था कि बेटी नीचे आ जाओ। लेकिन बुर्का पहने वो लड़की अपनी जिद पर अड़ी थी। मानो उसे अपनी जान की कोई परवाह ही ना हो। लेकिन जैसे ही इस हाई वोल्टेज ड्रामे की असली वजह सामने आई, वहां मौजूद पुलिस से लेकर आम लोगों तक सबके पैरों तले से जमीन खिसक गई। क्योंकि यह लड़की अपनी जान देने के लिए नहीं बल्कि शादी कराने के लिए टावर पर चढ़ी थी। दरअसल, यह पूरा हैरान कर देने वाला मामला उत्तर प्रदेश के बहराइच जिले से सामने आया है। टावर पर चढ़ी इस लड़की का नाम महक है और महक का गांव के ही नूरुद्दीन नाम के एक युवक के साथ 5 महीने से प्रेम प्रसंग चल रहा था। दोनों एक दूसरे से बेपनाह मोहब्बत करते थे और साथ जीने मरने की कसमें खा चुके थे। दोनों जल्द से जल्द निकाह करना चाहते थे। लेकिन इस प्यार की कहानी में एक बड़ा ट्विस्ट था। ट्विस्ट यह था कि जिससे लड़की मोहब्बत करती थी वो इस वक्त रोजी रोटी कमाने के लिए मुंबई में गया हुआ था। इस बीच महक के घर वालों ने इस रिश्ते का विरोध करना शुरू कर दिया। उन्होंने लड़की की मर्जी के खिलाफ जाकर उसकी दूसरी जगह रिश्ता तय कर दिया और उस पर शादी का दबाव बनाने लगे। जब महक को लगा कि उसकी मोहब्बत हमेशा के लिए उससे छीन जाएगी और घरवाले उसकी शादी कभी और कर देंगे तो उसने एक ऐसा आत्मघाती कदम उठाने की सोची जिसके बारे में किसी ने सपने में भी नहीं सोचा था। वो चुपके से अपने घर से निकली और दौड़ते हुए सीधे गांव के सबसे ऊंचे मोबाइल टावर पर चढ़ गई और देखते ही देखते वो टावर की चोटी पर जाकर बैठ गई। जब गांव वालों ने एक लड़की को टावर पर देखा तो पूरे इलाके में हड़कंप मच गया। पुलिस को सूचना दी गई मौके पर भारी पुलिस बल भी पहुंचा। लेकिन लड़की की बस एक ही रट थी कि अगर मेरा निकाह तुरंत नूरुद्दीन से नहीं कराया गया तो मैं यहां से कूद भी सकती हूं। घंटों तक चले इसका हाई वोल्टेज भारी मान मनोबल के बाद भी जब लड़की अपनी जिद से नहीं मानी तो पुलिस और घर वालों को समझाया गया कि इसे बातों से नीचे उतारा नहीं जा सकता। लड़की की जान बचाने के लिए मौके पर ही एक कारी साहब को बुलाया गया। पुलिस अधिकारियों ने मिलकर एक बेहद अनोखा और ऐतिहासिक रास्ता निकाला। मुंबई में बैठे उस प्रेमी को तुरंत WhatsApp पर वीडियो कॉल मिलाया गया और देखते ही देखते टावर के नीचे एक डिजिटल मंडप सज गया। इंटरनेट के जरिए बहराइच के उस गांव को सीधे मुंबई से जोड़ा गया। मौलाना ने ऑनलाइन निकाहनामा पढ़ना शुरू किया। उधर वीडियो कॉल पर मुंबई से दूल्हे ने कुबूल है कहा और इधर टावर के ऊपर बैठी दुल्हन ने भी फोन पर ही इस निकाह को मंजूरी दे दी। और जैसे ही निकाह मुकम्मल हुआ, टावर पर चढ़ी उस दुल्हन का गुस्सा और जिद शांत हो गई। वो धीरे-धीरे सुरक्षित तरीके से टावर से नीचे उतर आई। लड़की को सही सलामत नीचे देख पुलिस प्रशासन और घर वालों ने राहत की सांस ली। लेकिन लड़की महक के नीचे आते ही उसकी मां फिर से रिश्ते के खिलाफ हो गई। उन्होंने कहा कि मुझे यह रिश्ता बिल्कुल भी मंजूर नहीं है। अगर लड़की फिर भी उसी लड़के के साथ रहना चाहती है तो वह उसके घर अब जा सकती है। इसके बाद पुलिसकर्मी लड़की और उसके परिजनों को लेकर थाने पहुंची और वहां से समझाने के बाद महक को उसकी मां के साथ उसे घर भेज दिया गया। वहीं फिलहाल अब यह पूरा मामला इलाके भर में सुर्खियां बटोर रहा1
- *मिर्जापुर: पूर्व DM दिव्या मित्तल का जनसंपर्क अभियान तेज, बलेहरा मोड़ से होते हुए पटेहरा ब्लॉक के लिए रवाना हुई* *मिर्जापुर।* पूर्व जिलाधिकारी मिर्जापुर एवं जन नीति भारत पार्टी की राष्ट्रीय अध्यक्ष IAS दिव्या मित्तल का जनसंपर्क कार्यक्रम मंगलवार को बलेहरा मोड़ से शुरू होकर पटेहरा ब्लॉक की तरफ रवाना हुआ। इस दौरान स्थानीय लोगों ने पूर्व DM को रोककर अपनी समस्याएं बताईं। ग्रामीणों ने मुख्य रूप से गांव में पानी की किल्लत, बिजली की आंख मिचौली और सरकारी स्कूलों की बदहाली का मुद्दा उठाया। समस्याएं सुनकर दिव्या मित्तल ने कहा कि - "प्रशासन में रहते हुए मैंने मिर्जापुर की समस्याओं को करीब से देखा है। जनता की ये बुनियादी समस्याएं हैं, इनका समाधान मेरी पहली प्राथमिकता होगी।" उन्होंने मौके पर ही संबंधित समस्याओं के निवारण का आश्वासन दिया और कार्यकर्ताओं से कहा कि हर गांव की समस्या को लिखित रूप में नोट किया जाए। इस मौके पर बलेहरा मोड़ पर अवधेश तिवारी, भोलानाथ तिवारी, राजू तिवारी, शुभम तिवारी, अंकुर तिवारी, हर्षित तिवारी, अमरनाथ दुबे, पिंटू दुबे, आशुतोष चौबे, रोहित दुबे एवं अवनीश यादव सहित सैकड़ों कार्यकर्ता और ग्रामीण मौजूद रहे। मंजय वर्मा की रिपोर्ट4
- मिर्ज़ापुर में विजिलेंस टीम पर महिलाओं से अभद्रता का आरोप, ज़िलाधिकारी से शिकायत।1