कुदरत की मार और घटते बागों ने छीनी आम की मिठास,किसान बेहाल पलिया कलां (खीरी)। तराई के प्रसिद्ध आम के बागों में इस बार बौर तो भरपूर नजर आ रहा है, लेकिन बागवानों के दिलों में अनजाना डर बैठा हुआ है। मौसम के बदलते मिजाज और बीते कुछ वर्षों के कड़वे अनुभवों ने किसानों की चिंता बढ़ा दी है। साल भर पसीना बहाने और हजारों की लागत लगाने के बाद भी आंधी और तूफान की आशंका अन्नदाताओं की रातों की नींद उड़ा रही है।पलिया क्षेत्र के किसानों ने अपनी व्यथा साझा करते हुए बताया कि आम की फसल अब मुनाफे का सौदा नहीं रह गई है। बागों की देखरेख, सिंचाई और दवाओं के छिड़काव पर हर साल भारी भरकम खर्च करना पड़ता है। लेकिन जब फसल तैयार होने की बारी आती है, तो तेज आंधियां और असमय बदलाव के कारण पेड़ों से बौर झड़ जाता है,जिससे पैदावार नाममात्र की रह जाती है। क्षेत्र में तेजी से कम हो रहे बागों के रकबे ने भी समस्या को और गंभीर बना दिया है। बागों की कटाई और बढ़ते शहरीकरण के कारण पर्यावरण संतुलन बिगड़ रहा है, जिसका सीधा असर फसलों की गुणवत्ता और मात्रा पर पड़ रहा है। किसानों ने अब शासन-प्रशासन से गुहार लगाई है कि बागवानी को बचाने के लिए ठोस कदम उठाए जाएं और प्राकृतिक आपदा से होने वाले नुकसान की भरपाई के लिए राहत की व्यवस्था की जाए। क्या कहते हैं किसान बाक्स बातचीत के दौरान स्थानीय किसानअफसर अली ने बताया कि"हम लोग साल भर पाई-पाई जोड़कर बागों में लगाते हैं। खाद और कीटनाशकों के दाम आसमान छू रहे हैं, लेकिन मौसम की एक मार हमारी पूरी मेहनत को मिट्टी में मिला देती है। लागत निकालना भी दूभर है।" बाक्स वही कि स्थानीय किसान जसकरण सिंह ने भी अपनी व्यथा बयान की उन्होंने कहा "क्षेत्र में पहले की तुलना में बाग बहुत कम रह गए हैं। पेड़ों की संख्या घटने से मौसम का चक्र भी बिगड़ गया है। अब न समय पर फूल टिकते हैं और न ही फल। सरकार को इस ओर ध्यान देना चाहिए।" बाक्स बागबान राजेंद्र राठौर ने भी कहा कि "आम की पैदावार अब पूरी तरह मौसम के रहमोकरम पर है। अगर तेज हवा चली तो सारा बौर जमीन पर होता है। हम चाहते हैं कि सरकार हमें राहत पहुँचाने के लिए कोई विशेष बीमा या अनुदान योजना लागू करे।
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फसल अब मुनाफे का सौदा नहीं रह गई है। बागों की देखरेख, सिंचाई और दवाओं के छिड़काव पर हर साल भारी भरकम खर्च करना पड़ता है। लेकिन जब फसल तैयार होने की बारी आती है, तो तेज आंधियां और असमय बदलाव के कारण पेड़ों से बौर झड़ जाता है,जिससे पैदावार नाममात्र की रह जाती है। क्षेत्र में तेजी से कम हो रहे बागों के रकबे ने भी समस्या को और गंभीर बना दिया है। बागों की कटाई और बढ़ते शहरीकरण के कारण पर्यावरण संतुलन बिगड़ रहा है, जिसका सीधा असर फसलों की गुणवत्ता और मात्रा पर
पड़ रहा है। किसानों ने अब शासन-प्रशासन से गुहार लगाई है कि बागवानी को बचाने के लिए ठोस कदम उठाए जाएं और प्राकृतिक आपदा से होने वाले नुकसान की भरपाई के लिए राहत की व्यवस्था की जाए। क्या कहते हैं किसान बाक्स बातचीत के दौरान स्थानीय किसानअफसर अली ने बताया कि"हम लोग साल भर पाई-पाई जोड़कर बागों में लगाते हैं। खाद और कीटनाशकों के दाम आसमान छू रहे हैं, लेकिन मौसम की एक मार हमारी पूरी मेहनत को मिट्टी में मिला देती है। लागत निकालना भी दूभर है।" बाक्स वही कि स्थानीय किसान जसकरण सिंह ने भी अपनी व्यथा
बयान की उन्होंने कहा "क्षेत्र में पहले की तुलना में बाग बहुत कम रह गए हैं। पेड़ों की संख्या घटने से मौसम का चक्र भी बिगड़ गया है। अब न समय पर फूल टिकते हैं और न ही फल। सरकार को इस ओर ध्यान देना चाहिए।" बाक्स बागबान राजेंद्र राठौर ने भी कहा कि "आम की पैदावार अब पूरी तरह मौसम के रहमोकरम पर है। अगर तेज हवा चली तो सारा बौर जमीन पर होता है। हम चाहते हैं कि सरकार हमें राहत पहुँचाने के लिए कोई विशेष बीमा या अनुदान योजना लागू करे।
- Post by FH.NEWS1
- मैलानी-खीरी। दुधवा टाइगर रिजर्व के बफर जोन से एक बेहद दुखद खबर सामने आई है, जहाँ मैलानी वन्य रेंज में एक मादा बाघिन का शव संदिग्ध परिस्थितियों में मिलने से वन महकमे में हड़कंप मच गया है। जानकारी के अनुसार, यह घटना मैलानी रेंज की मौरैना बीट स्थित भीखमपुर रेलवे हाल्ट के पास की है। बुधवार सुबह करीब 9 बजे जब वन विभाग की पेट्रोलिंग टीम गश्त पर थी, तब उनकी नजर रेलवे पटरी के किनारे पड़ी लगभग 5 वर्षीय मृत बाघिन पर पड़ी।घटना की सूचना मिलते ही वन विभाग के आला अधिकारी और विशेषज्ञ दल तुरंत मौके पर पहुँच गए। अधिकारियों ने घटनास्थल का बारीकी से निरीक्षण किया और साक्ष्य जुटाने के बाद बाघिन के शव को कब्जे में लेकर मैलानी रेंज कार्यालय पहुँचाया। यहाँ विशेषज्ञ डॉक्टरों के एक पैनल द्वारा बाघिन का पोस्टमार्टम किया गया, जिसके बाद नियमानुसार शव का अंतिम संस्कार कर दिया गया। शुरुआती जांच और परिस्थितियों को देखते हुए वन विभाग बाघिन की मौत के पीछे किसी ट्रेन की टक्कर होने की आशंका जता रहा है, हालांकि वन अधिकारी अन्य सभी पहलुओं को ध्यान में रखकर मामले की गहराई से तफ्तीश कर रहे हैं। दुधवा टाइगर रिजर्व के फील्ड डायरेक्टर राजा राम मोहन ने बताया कि प्रथम दृष्टया यह मामला किसी तेज रफ्तार ट्रेन की चपेट में आने का लग रहा है, जिससे टकराकर बाघिन की मौत हुई होगी। उन्होंने स्पष्ट किया कि मौत के सटीक कारणों की पुष्टि के लिए विसरा सुरक्षित कर लिया गया है और पोस्टमार्टम रिपोर्ट का इंतजार किया जा रहा है। फिलहाल वन विभाग की टीम इस बात की भी जांच कर रही है कि घटना के समय उस ट्रैक से कौन-कौन सी ट्रेनें गुजरी थीं। सुरक्षित जंगल के भीतर बाघिन की इस तरह मौत होना वन्यजीव प्रेमियों और संरक्षण की दृष्टि से एक बड़ा झटका माना जा रहा है।4
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