देश की राजनीति के केंद्र में इस समय 'वन नेशन, वन इलेक्शन' (एक देश, एक चुनाव) का मुद्दा छाया हुआ है, जिस पर संसद से लेकर सड़कों तक बहस छिड़ गई है। लखनऊ में एक तरफ जेपीसी की बैठक हो रही है, तो दूसरी तरफ विपक्ष इस प्रस्ताव का खुलकर विरोध कर रहा है। भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) और उसके सहयोगी दल इसे देशहित में बता रहे हैं, जबकि कांग्रेस, समाजवादी पार्टी और अन्य विपक्षी दल इसे संविधान की मूल भावना और संघीय ढांचे के खिलाफ मान रहे हैं। विपक्ष का आरोप है कि एक साथ चुनाव होने से राज्यों के स्थानीय मुद्दे राष्ट्रीय राजनीति के शोर में दब जाएंगे, जिससे सत्ता का केंद्रीकरण बढ़ेगा और राज्यों की स्वायत्तता प्रभावित होगी। इसके विपरीत, बीजेपी का दावा है कि इस व्यवस्था से चुनावी खर्च में कमी आएगी, विकास कार्यों में कोई रुकावट नहीं होगी और प्रशासनिक व्यवस्था को मजबूती मिलेगी। गौरतलब है कि साल 1951 से 1967 तक देश में लोकसभा और विधानसभा चुनाव साथ-साथ ही होते थे। ऐसे में अब यह बड़ा सवाल खड़ा हो गया है कि क्या आज के भारत में इस पुरानी व्यवस्था को फिर से लागू किया जा सकता है और क्या विपक्ष का यह विरोध वाकई एक लोकतांत्रिक चिंता है या महज एक राजनीतिक मजबूरी।
देश की राजनीति के केंद्र में इस समय 'वन नेशन, वन इलेक्शन' (एक देश, एक चुनाव) का मुद्दा छाया हुआ है, जिस पर संसद से लेकर सड़कों तक बहस छिड़ गई है। लखनऊ में एक तरफ जेपीसी की बैठक हो रही है, तो दूसरी तरफ विपक्ष इस प्रस्ताव का खुलकर विरोध कर रहा है। भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) और उसके सहयोगी दल इसे देशहित में बता रहे हैं, जबकि कांग्रेस, समाजवादी पार्टी और अन्य विपक्षी दल इसे संविधान की मूल भावना और संघीय ढांचे के खिलाफ मान रहे हैं। विपक्ष का आरोप है कि एक साथ चुनाव होने से राज्यों के स्थानीय मुद्दे राष्ट्रीय राजनीति के शोर में दब जाएंगे, जिससे सत्ता का केंद्रीकरण बढ़ेगा और राज्यों की स्वायत्तता प्रभावित होगी। इसके विपरीत, बीजेपी का दावा है कि इस व्यवस्था से चुनावी खर्च में कमी आएगी, विकास कार्यों में कोई रुकावट नहीं होगी और प्रशासनिक व्यवस्था को मजबूती मिलेगी। गौरतलब है कि साल 1951 से 1967 तक देश में लोकसभा और विधानसभा चुनाव साथ-साथ ही होते थे। ऐसे में अब यह बड़ा सवाल खड़ा हो गया है कि क्या आज के भारत में इस पुरानी व्यवस्था को फिर से लागू किया जा सकता है और क्या विपक्ष का यह विरोध वाकई एक लोकतांत्रिक चिंता है या महज एक राजनीतिक मजबूरी।
- उत्तर प्रदेश के प्रयागराज में नैनी क्षेत्र के महेवा स्थित टीसीआई चौराहे पर बुधवार सुबह प्रयागराज विकास प्राधिकरण (पीडीए) ने सड़क चौड़ीकरण एवं सौंदर्यीकरण अभियान के तहत अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई की। भारी पुलिस बल की मौजूदगी में चले बुलडोजर ने कई दुकानों और मकानों को ध्वस्त कर दिया। इस कार्रवाई के दौरान सुरक्षा के व्यापक इंतजाम किए गए थे और स्थिति को नियंत्रित रखने के लिए खान चौराहे से राजपूत ढाबे तक कुछ समय के लिए यातायात भी रोक दिया गया था। ध्वस्तीकरण की इस प्रक्रिया में कई व्यापारियों का सामान भी मलबे में दब गया। प्रयागराज विकास प्राधिकरण के अधिकारियों का कहना है कि प्रभावित व्यापारियों को सड़क चौड़ीकरण और सौंदर्यीकरण कार्य के लिए काफी पहले ही नोटिस जारी कर दिए गए थे और यह पूरी कार्रवाई नियमानुसार की गई है। वहीं, कार्रवाई समाप्त होने के बाद प्रभावित व्यापारी अपने टूटे हुए मकानों और दुकानों के मलबे से घरेलू सामान, आवश्यक दस्तावेज और अन्य जरूरी सामग्री निकालते दिखाई दिए। इस दौरान कई व्यापारियों ने अपनी आजीविका छिनने और हुए नुकसान को लेकर गहरी चिंता व्यक्त की।1
- देश की राजनीति के केंद्र में इस समय 'वन नेशन, वन इलेक्शन' (एक देश, एक चुनाव) का मुद्दा छाया हुआ है, जिस पर संसद से लेकर सड़कों तक बहस छिड़ गई है। लखनऊ में एक तरफ जेपीसी की बैठक हो रही है, तो दूसरी तरफ विपक्ष इस प्रस्ताव का खुलकर विरोध कर रहा है। भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) और उसके सहयोगी दल इसे देशहित में बता रहे हैं, जबकि कांग्रेस, समाजवादी पार्टी और अन्य विपक्षी दल इसे संविधान की मूल भावना और संघीय ढांचे के खिलाफ मान रहे हैं। विपक्ष का आरोप है कि एक साथ चुनाव होने से राज्यों के स्थानीय मुद्दे राष्ट्रीय राजनीति के शोर में दब जाएंगे, जिससे सत्ता का केंद्रीकरण बढ़ेगा और राज्यों की स्वायत्तता प्रभावित होगी। इसके विपरीत, बीजेपी का दावा है कि इस व्यवस्था से चुनावी खर्च में कमी आएगी, विकास कार्यों में कोई रुकावट नहीं होगी और प्रशासनिक व्यवस्था को मजबूती मिलेगी। गौरतलब है कि साल 1951 से 1967 तक देश में लोकसभा और विधानसभा चुनाव साथ-साथ ही होते थे। ऐसे में अब यह बड़ा सवाल खड़ा हो गया है कि क्या आज के भारत में इस पुरानी व्यवस्था को फिर से लागू किया जा सकता है और क्या विपक्ष का यह विरोध वाकई एक लोकतांत्रिक चिंता है या महज एक राजनीतिक मजबूरी।1
- प्रयागराज की बारा तहसील के चिल्ला गौहानी गांव में मुख्यमंत्री के 'एक पेड़ मां के नाम' अभियान और प्रशासनिक दावों की हकीकत बयां करती तस्वीरें सामने आई हैं। ग्रामीणों ने आरोप लगाया है कि यहां वृक्षारोपण अभियान सिर्फ कागजों और फोटो खिंचवाने तक ही सीमित रह गया। अधिकारियों द्वारा केवल औपचारिकता पूरी करने के बाद सैकड़ों पौधों को जमीन में रोपने के बजाय खुले में एक ही जगह ढेर बनाकर छोड़ दिया गया, जिससे वे सूखने लगे हैं। ग्रामीणों के अनुसार, विश्व पर्यावरण दिवस के मौके पर जसरा विकास खंड की ओर से गांव में नीम, पीपल, सागौन और आंवला समेत बड़ी संख्या में पौधे भेजे गए थे। आरोप है कि अभियान के दौरान अधिकारियों ने केवल कुछ पौधे लगाकर अपनी फोटो खिंचवाई और शेष पौधों को बिना गड्ढा खोदे खुले में छोड़ दिया। कई दिनों तक धूप में पड़े रहने के कारण इन पौधों की पत्तियां मुरझा गईं और वे पूरी तरह सूखने की कगार पर पहुंच गए हैं। गांव के लोगों ने प्रशासन के उन दावों पर गंभीर सवाल उठाए हैं, जिसमें जिले में 82 लाख के लक्ष्य के मुकाबले 90 लाख से अधिक पौधे लगाने की बात कही गई थी। ग्रामीणों का कहना है कि पौधारोपण के नाम पर केवल फोटो खिंचवाकर छोड़ देने से सरकारी धन और अभियान दोनों का उद्देश्य विफल हो जाएगा। ग्रामीणों ने इस पूरे मामले की निष्पक्ष जांच कराने, जिले में हुए पौधारोपण का भौतिक सत्यापन व प्रत्येक पौधे की जियो टैगिंग कराने और जिम्मेदार अधिकारियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई करने की मांग की है।1
- प्रयागराज में सड़क सुरक्षित नहीं होने की बात कही गई है।1
- प्रयागराज के नैनी स्टेशन रोड पर नगर निगम की लापरवाही के चलते स्ट्रीट लाइट के खंभे में करंट उतरने से स्थानीय लोगों में भारी आक्रोश है। महाकुंभ के दौरान नैनी क्षेत्र में सड़क चौड़ीकरण एवं सौंदर्यीकरण कार्य के तहत ये स्ट्रीट लाइट के खंभे लगाए गए थे, जिनमें करंट उतर रहा है। नैनी स्टेशन के सामने स्ट्रीट लाइट के खंभे में करंट आने की खबर और वीडियो वायरल होने के बाद नगर निगम के कर्मचारी मौके पर पहुंचे, लेकिन वे सिर्फ खानापूर्ति करके चले गए। स्थानीय दुकानदारों ने बताया कि सूचना मिलने पर बिजली विभाग के कर्मचारियों ने मौके पर पहुंचकर एहतियात के तौर पर संबंधित खंभे की केबल काटकर विद्युत आपूर्ति बंद कर दी और चले गए। स्थानीय लोगों ने नगर निगम से खंभे में आ रहे करंट की इस समस्या का शीघ्र एवं स्थायी समाधान कराने की मांग की है, ताकि भविष्य में किसी भी प्रकार की दुर्घटना से बचा जा सके।1
- प्रयागराज के सराय ममरेज थाना क्षेत्र के अंतर्गत हिग्गत बहार में जमीन के एक टुकड़े को लेकर दो पक्षों के बीच हिंसक झड़प का मामला सामने आया है। पीड़ित अजय प्रकाश उर्फ आसाराम के अनुसार, उन्होंने और विपक्षी पक्ष ने एक ही जमीन का बैनामा (रजिस्ट्री) कराया है और दोनों का अपना-अपना कब्जा है। विवाद तब बढ़ा जब विपक्षी पक्ष ने पूरी जमीन पर अवैध रूप से कब्जा करने की नीयत से वहां धान बोने और मिट्टी गोड़ने का प्रयास किया। जब अजय प्रकाश की पत्नी ने उन्हें रोकने की कोशिश की, तो आरोपी विजय उर्फ कृष्णा ने उनके साथ गाली-गलौज और अभद्र व्यवहार किया। वहीं, बीच-बचाव करने आई पीड़ित की मां के साथ भी आरोपियों ने मारपीट की कोशिश की। इस घटना के बाद पीड़ित ने सराय ममरेज थाने में एफआईआर दर्ज कराई थी, जिस पर कार्रवाई करते हुए पुलिस ने आरोपियों को हिरासत में ले लिया था। लेकिन अगले ही दिन शाम करीब 9 बजे जैसे ही आरोपी अजय और धर्मेंद्र थाने से छूटे, उन्होंने पुलिस को चुनौती देते हुए पीड़ित के घर पर धावा बोल दिया। आरोपियों ने "पुलिस हमारे लिए जीरो है" कहते हुए रात के अंधेरे में सरिए और अन्य हथियारों से मारपीट शुरू कर दी। पीड़ित की चाची के शोर मचाने के बाद आरोपी वहां से पीछे हटे। पीड़ित ने बताया कि आरोपियों के बुलंद हौसलों के कारण अब उनके परिवार को जान का खतरा बना हुआ है, जिसके चलते उन्होंने थाने में दोबारा प्रार्थना पत्र देकर नई एफआईआर दर्ज करने और सख्त कार्रवाई की मांग की है।1