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सूरज दुबे जी
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- Post by सूरज दुबे जी1
- शुरू लोकल न्यूज ऐप का बड़ा खुलासा __________________________ हरदोई के शाहाबाद सीओ सर्किल इलाके में जब से सर्किल अफसर के रूप में आईपीएस आलोक राज नारायण की तैनाती हुई, तभी से अपराधों की बाढ़ में डूबते जा रहे थाना पाली, पचदेवरा और फिर कोतवाली शाहाबाद में👇 — कोतवाली पुलिस को मिली संदिग्ध बाइक — बाइक चालक से पुलिस पूंछताछ में जुटी — पत्रकार "खबर हम देंगे" का "लोगो" चस्पा — शाहाबाद के अल्लाहपुर मोहल्ले का मामला 🔴 ब्रेकिंग न्यूज़ | हरदोई हरदोई के शाहाबाद क्षेत्र से एक संदिग्ध बाइक मिलने के बाद पुलिस महकमे में हड़कंप मच गया है।👇 कोतवाली पुलिस ने अल्लाहपुर मोहल्ले से एक बाइक को संदिग्ध हालात में बरामद किया है, जिसका चालक हिरासत में लेकर पुलिस पूछताछ कर रही है। 👉 चौंकाने वाली बात यह है कि इस बाइक पर एक मीडिया संस्थान का लोगो चस्पा है।👇 चस्पा "लोगो" “पत्रकार – खबर हम देंगे” — जो कि अब खुद जांच के दायरे में आ गया है। 🔴 रजिस्ट्रेशन नंबर… एक — बाइक दो ! पुलिस की प्रारंभिक जांच में सामने आया कि बाइक का रजिस्ट्रेशन नंबर UP27 BP 3924 दो अलग-अलग अपाचे मोटरसाइकिलों पर दर्ज पाया गया। 📞 जब पुलिस चौकी जामा मस्जिद प्रभारी अनिल सिंह ने उक्त रजिस्ट्रेशन नंबर के वास्तविक मालिक से फोन पर संपर्क किया, तो पड़ोसी जनपद शाहजहांपुर में रहने वाले बाइक स्वामी ने साफ कहा— “मेरी बाइक तो इस समय मेरे घर पर खड़ी है।” इसके बाद एक ही नंबर की दो बाइकें सामने आने से पुलिस महकमे में हड़कंप मच गया। ❓ अब सवाल मीडिया लोगो पर👇 सबसे गंभीर और संवेदनशील सवाल यह है कि—👇 ❓ संदिग्ध बाइक पर मीडिया का लोगो क्यों लगाया गया? ❓ क्या पत्रकारिता की आड़ में पुलिस से बचने की कोशिश की जा रही थी? ❓ क्या यह लोगो फर्जी है या किसी ने जानबूझकर पत्रकारिता की साख को ढाल बनाया? ❓ क्या “खबर हम देंगे” नाम का इस्तेमाल अवैध गतिविधियों को कवर देने के लिए किया गया? 👉 यह मामला सिर्फ फर्जी रजिस्ट्रेशन का नहीं, बल्कि मीडिया की विश्वसनीयता के दुरुपयोग का भी बनता जा रहा है। 👮♂️ पुलिस का रुख👇 फिलहाल पुलिस— बाइक की फोरेंसिक व दस्तावेजी जांच कर रही है👇 चालक से गहन पूछताछ जारी है👇 यह पता लगाया जा रहा है कि बाइक चोरी की है या नंबर प्लेट फर्जी है? या यह किसी आपराधिक नेटवर्क से जुड़ा मामला तो नहीं है ❓ 📢 शुरू ऐप के सवाल👇 👉 पत्रकारिता पहचान है, ढाल नहीं 👉 मीडिया का लोगो कानून से ऊपर नहीं 👉 अगर लोगो फर्जी निकला, तो सख्त कार्रवाई होगी कि नहीं ❓ 🔴शुरू ऐप इस पूरे मामले पर नज़र बनाए है— जांच में जैसे-जैसे नए तथ्य सामने आएंगे, आपको सबसे पहले दिखाएंगे। रिपोर्ट —ओ.डी. दीक्षित2
- Post by Journalist,Abdheshkumar2
- बघौली (हरदोई)। डालमियां भारत शुगर एंड इंडस्ट्रीज लिमिटेड, इकाई–गंगापुर (बघौली) में क्षेत्र के अग्रणी उद्यमियों एवं प्रगतिशील किसानों के साथ एक महत्वपूर्ण बैठक का आयोजन किया गया। बैठक का उद्देश्य क्षेत्र के विकास एवं ‘सघन गन्ना विकास कार्यक्रम’ को उद्यमियों के अनुभव और सुझावों के आधार पर नई ऊंचाइयों तक ले जाना रहा। बैठक में चीनी मिल के वरिष्ठ पदाधिकारियों ने उद्यमियों से सीधा संवाद स्थापित किया। इस दौरान गन्ने की उत्पादकता बढ़ाने, आधुनिक तकनीक के समावेश तथा उत्पादन प्रक्रिया को सुदृढ़ बनाने जैसे विषयों पर विस्तार से चर्चा की गई। कार्यक्रम में मिल के इकाई प्रमुख अतुल अग्रवाल, कुश आपरा वरिष्ठ महाप्रबंधक, गन्ना प्रमुख अनिल कुमार सिंह राठौर, सप्लाई हेड वीरेंद्र सिंह, रीजनल प्रबंधक विनोद कुमार शर्मा, उपेंद्र कुमार सिंह, रविंद्र सिंह, रोहित सिंह सहित अन्य अधिकारी उपस्थित रहे। बैठक में गन्ना उत्पादन बढ़ाने और किसानों को बेहतर तकनीकी सहयोग उपलब्ध कराने पर विशेष बल दिया गया।1
- जिला हरदोई थाना अतरौली ब्लाक कोठवा तहसील संडीला पोस्ट हरिया गांव का नाम ग्राम सभा भैंसदा शंभू नाथ मंदिर सारे भाई वीडियो को दबाकर शेयर करो कुछ कार्यक्रम यहां होना चाहिए1
- Post by Shiva Gautam1
- दो जाबाज कुश्ती में भाग लेते हुए1
- 84 कोसी परिक्रमा में गिट्टी, गड्ढे, गंदगी लेती आस्था की परीक्षा श्रद्धालुओं की राह में बिखरी प्रशासनिक पड़ी लापरवाही शाहाबाद (हरदोई)18 फरवरी। प्रदेश में धर्म, आस्था और सनातन परंपराओं के संरक्षण को सरकार अपनी पहचान बताती है। मंदिरों के विकास से लेकर धार्मिक आयोजनों के भव्य प्रचार तक, सत्ता के मंचों से बड़े-बड़े दावे किए जाते हैं। लेकिन 84 कोसी परिक्रमा की ज़मीनी तस्वीर इन दावों को कठोर सच्चाई के कटघरे में खड़ा करने के लिए काफी है। नैमिषारण्य से निकलने वाली यह पौराणिक परिक्रमा जैसे ही हरदोई जिले की सीमा में प्रवेश करती है, श्रद्धालुओं की आस्था की असली परीक्षा शुरू हो जाती है— जहाँ नंगे पांव चल रहे लोग, कंकड़-पत्थरों से भरे रास्ते, कीचड़ और जलभराव, पेयजल, शौचालय और प्राथमिक उपचार की भारी कमी जबकि यह कोई आकस्मिक आयोजन नहीं है। परिक्रमा की तिथि, मार्ग और पड़ाव वर्षों से तय हैं। हर साल शासन और प्रशासन को तैयारी का पूरा समय मिलता है। फिर भी हर साल वही बदहाली और वही मौन उदासीनता का आलम आखिर यह सब क्या है? क्या यह आस्था की सहनशीलता को समझने की कलियुगी मानसिकता तो नहीं? विचारणीय है की 84 कोसी परिक्रमा का हर श्रद्धालु इसलिए नंगे पांव नहीं चल रहा कि व्यवस्था अच्छी है, बल्कि वह इसलिए चल रहा है क्योंकि उसकी आस्था अडिग है। लेकिन क्या यही अडिग आस्था सत्ता और सिस्टम के लिए सबसे सुविधाजनक बहाना बन गई है? क्या शासन यह मान बैठा है कि श्रद्धालु छाले झेलेगा, कीचड़ में गिरेगा, अंधेरे में चलेगा और फिर भी सवाल नहीं करेगा? अगर ऐसा है, तो यह केवल प्रशासनिक शिथिलता नहीं, बल्कि यह घोर कलियुगी मानसिकता है और अब इस बिषय पर मुख्यमंत्री और प्रशासन की मनमानी पर उठते वे सवाल, जो वास्तव में टाले नहीं जा सकते किन्तु कलियुगी मानसिकता से किसी भी जिम्मेदारी को मनमाने ढंग से नाकारा जा सकता है। विचारणीय है कि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में उत्तर प्रदेश सरकार धार्मिक आयोजनों को अपनी प्राथमिकता बताती है। तो फिर—यह 84 कोसी परिक्रमा के लिए आज तक स्थायी, सुगम और सुरक्षित पथ क्यों नहीं? हर साल बजट आने के बावजूद हरदोई में वही अस्थायी इंतजाम क्यों? क्या मुख्यमंत्री कार्यालय तक यह जमीनी सच्चाई नहीं पहुंचती, या जानबूझकर अनदेखी होती है? अगर यही हाल किसी वीआईपी कार्यक्रम या सरकारी उत्सव में होता, तो क्या सिस्टम यूं ही चुप रहता? ये सवाल केवल हरदोई के नहीं हैं। ये सवाल राज्य शासन की निगरानी और संवेदना से जुड़े हैं। हरदोई प्रशासन की यह जिम्मेदारी या औपचारिकता? शाहाबाद (हरदोई)18 फरवरी। स्थानीय स्तर पर प्रशासनिक तैयारी हर साल एक ही पैटर्न पर दिखाई देती है—आखिरी समय में मिट्टी डाल दी, गड्ढों में रोड़ा भर दिया, कागजों में निरीक्षण दर्ज कर लिया। लेकिन श्रद्धालुओं की पीड़ा कागजों में दर्ज नहीं होती। पेयजल के लिए खराब हैंडपंप, महिलाओं के लिए अपर्याप्त शौचालय, स्वास्थ्य सेवाओं की कमजोरी और रात में अंधेरे रास्ते— ये सब बताते हैं कि व्यवस्था ने संवेदना को अपने एजेंडे से बाहर कर दिया है। सत्ता—शासन बनाम परिक्रमा ज़मीनी सच शाहाबाद (हरदोई) 18 फरवरी। सरकारी बयान कहते हैं कि तैयारी पूरी है लेकिन ज़मीनी सच्चाई बताती है कि “हर साल बाला हाल इस साल भी है। यही अंतर सबसे बड़ा सवाल है। अगर शासन के दावे सही हैं, तो परिक्रमा मार्ग पर चल रहा श्रद्धालु सवाल क्यों खड़े कर रहा है। भले 84 कोसी परिक्रमा केवल हरदोई या उत्तर प्रदेश का मामला नहीं बल्कि यह भारत की पौराणिक चेतना और सनातन परंपरा का हिस्सा है। अगर ऐसी परंपरा में श्रद्धालु कष्ट, पीड़ा और उपेक्षा झेले, तो सवाल राष्ट्रीय स्तर पर भी उठना स्वाभाविक हैं— यह कि क्या भारत में आस्था केवल भाषणों और मंचों तक सीमित है? क्या धार्मिक परंपराएं केवल राजनीतिक दावों का हिस्सा बन गई हैं? क्या श्रद्धालु की पीड़ा अब सिस्टम के लिए अदृश्य हो चुकी है? इसलिए सच्चाई यही है कि आस्था चल रही है, किन्तु व्यवस्था से व्यथित है। वह कहीं शिकायत कर रहा तो कहीं नहीं कर रहा, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि सब ठीक है। श्रद्धालुओं की यह चुप्पी संतोष नहीं, विवशता है। अब समय है कि शासन, प्रशासन और पूरा सिस्टम स्वयं को परिक्रमा मार्ग पर आस्था के दर्पण में देखे। नुकीली गिट्टियों से छलनी हो रहे श्रद्धालुओं के पांव शाहाबाद (हरदोई)18 फरवरी। बरौली–गोवर्धनपुर–वाजीदपुर मार्ग पर श्रद्धालुओं के पांव नुकीली गिट्टियों से छलनी होते बताए जा रहे हैं। पड़ाव स्थलों पर गंदगी, पेयजल-बिजली संकट के सूत्र मिले हैं। सूत्रों की मानें तो क्षतिग्रस्त पुल, गायब पौराणिक रास्ते… सुरक्षा और श्रद्धा दोनों पर सवाल हैं। असंतुष्ट संतों द्वारा शासन-प्रशासन से तीखे प्रश्न किए जाने के भी सूत्र मिले हैं। बताया गया है कि नैमिषारण्य से आज ही 18 फरवरी को शुरू हुई 84 कोसी परिक्रमा श्रद्धालुओं के लिए आस्था से अधिक अग्निपरीक्षा बनती दिख रही है। हरदोई जिले में परिक्रमा मार्गों और पड़ाव स्थलों की बदहाल व्यवस्थाओं ने प्रशासनिक दावों की पोल खोल दी है। दूर-दराज और देश–विदेश से आए श्रद्धालु, जो नंगे पांव परिक्रमा करते हैं, उन्हें गिट्टी, गड्ढों और अव्यवस्थाओं से जूझना पड़ रहा है। परिक्रमा मार्ग पर पड़ी गिट्टी पर चलती श्रद्धा शाहाबाद (हरदोई)18 फरवरी। बताया गया है कि बरौली, गोवर्धनपुर और वाजीदपुर मार्ग पर सड़क चौड़ीकरण के नाम पर महीनों पहले डाली गई नुकीली गिट्टियां अब तक जस की तस पड़ी हैं। यही मार्ग रामादल के साथ परिक्रमार्थियों का मुख्य रास्ता है। नंगे पांव चल रहे साधु-संतों और श्रद्धालुओं के लिए यह रास्ता असहनीय पीड़ा का कारण बन रहा है। स्थानीय लोगों का कहना है कि निरीक्षण तो हुए, पर सुधार कागजों से आगे नहीं बढ़ा। सीतापुर–हरदोई संपर्क मार्ग पर बड़े-बड़े गड्ढे केवल “खानापूर्ति” के तौर पर पत्थर डालकर भरे गए हैं, जो किसी भी समय हादसे को न्योता दे सकते हैं। वहीं साखिन पड़ाव से द्रोणाचार्य घाट तक का पौराणिक मार्ग देखरेख के अभाव में लगभग गायब हो चुका है। परिक्रमा पड़ावों पर डामाडोल इंतजाम शाहाबाद (हरदोई)18 फरवरी। बताया गया है कि हरैया, कोथावां, नगवां और गिरधरपुर–उमरारी जैसे प्रमुख पड़ावों पर व्यवस्थाएं चरमराई हुई हैं। हरैया पड़ाव पर गोमती नदी के स्नान घाट पर जलकुंभी का अंबार लगा है। श्रद्धालु पवित्र स्नान के लिए जूझ रहे हैं। कई स्थानों पर पेयजल संकट और अस्थाई बिजली आपूर्ति ने परेशानी और बढ़ा दी है। कोथावां में पड़ाव भूमि पर अतिक्रमण की शिकायतें हैं, लेकिन प्रशासनिक सुस्ती के चलते अब तक ठोस कार्रवाई नहीं हो सकी। सुरक्षा भी भगवान भरोसे बताई गई है। टड़ियावां क्षेत्र में जनकापुर–बहादुरपुर के बीच नहर की पुलिया की टूटी रेलिंग गंभीर खतरा बताई गई है। आदेशों के बावजूद मरम्मत न होना प्रशासन की निष्क्रियता पर सवाल खड़े करता है। यही कारण है कि संतों का आक्रोश, सवालों की बौछार हो रही है क्योंकि सूत्र बताते हैं कि व्यवस्थाओं की बदहाली से आहत विख्यात कथावाचक अनिल शास्त्री ने इस वर्ष स्वयं परिक्रमा न करने का ऐलान कर दिया। उन्होंने कहा कि पिछले वर्षों में अतिक्रमण और अव्यवस्थाओं की शिकायतें की गईं, आश्वासन मिले, पर जमीन पर बदलाव नहीं दिखा। संतों का कहना है कि जब सरकार परिक्रमा को अंतरराष्ट्रीय महत्व का बताती है, तो फिर श्रद्धालुओं को मूलभूत सुविधाओं के लिए क्यों तरसना पड़ रहा है? हालांकि प्रशासन की कागजी चमक की चर्चा यह है कि प्रशासन मंदिरों में सीसीटीवी, दुकानों पर पाबंदी और सफाई ड्यूटी के दावे कर रहा है, लेकिन हकीकत यह है कि सुविधाएं पिछले वर्षों से भी अधिक चुनौतीपूर्ण हो गई हैं। श्रद्धालुओं का सवाल है—क्या आस्था के इस महापर्व में व्यवस्थाएं सिर्फ फाइलों तक सीमित रहेंगी? नंगे पांव चल रहे श्रद्धालुओं की पीड़ा की जिम्मेदारी कौन लेगा? 84 कोसी परिक्रमा का पौराणिक और आध्यात्मिक महत्व देश–विदेश में माना जाता है। पर हरदोई में मौजूदा हालात यह सोचने पर मजबूर करते हैं कि क्या शासन-प्रशासन आस्था के इस सैलाब के लिए वास्तव में तैयार है, या फिर श्रद्धालुओं की परीक्षा लेने को ही व्यवस्था मान लिया गया है?4