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History created Jammu Kashmir into final Ranji trophy Clinical, Composed, and Deserved Finalists. Auqib Nabi dictated the game with a nine-wicket match haul and vital lower-order runs. Abdul Samad’s 82 shifted momentum, while Paras Dogra provided calm control. #ranjitrophy2026 #jkcricket History scripted! 🏏 Clinical, Composed, and Deserved Finalists. Auqib Nabi dictated the game with a nine-wicket match haul and vital lower-order runs. Abdul Samad’s 82 shifted momentum, while Paras Dogra provided calm control. #ranjitrophy2026 #jkcricket
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- चंबा: बोर्ड परीक्षा को लेकर डीसी मुकेश रेप्सवाल ने विद्यार्थियों को दी शुभकामनाएं, उज्ज्वल भविष्य की कामना। मोहम्मद आशिक चंबा हिमाचल प्रदेश जिला चंबा में बोर्ड परीक्षाओं के शुभारंभ को लेकर उपायुक्त चंबा मुकेश रेप्सवाल ने सभी विद्यार्थियों को हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएं दी हैं। उन्होंने कहा कि बोर्ड परीक्षाएं विद्यार्थियों के जीवन का एक महत्वपूर्ण पड़ाव होती हैं, जिसमें मेहनत, अनुशासन और आत्मविश्वास से सफलता प्राप्त की जा सकती है। उपायुक्त ने विद्यार्थियों से अपील की कि वे परीक्षा के दौरान तनावमुक्त रहकर सकारात्मक सोच के साथ परीक्षा दें और समय का सही प्रबंधन करें। उन्होंने कहा कि माता-पिता एवं शिक्षक भी बच्चों का मनोबल बढ़ाएं ताकि वे बेहतर प्रदर्शन कर सकें। डीसी मुकेश रेप्सवाल ने सभी परीक्षार्थियों के उज्ज्वल भविष्य की कामना करते हुए कहा कि प्रशासन द्वारा परीक्षा संचालन को शांतिपूर्ण एवं सुचारू ढंग से संपन्न करवाने के लिए सभी आवश्यक व्यवस्थाएं सुनिश्चित की गई हैं। उन्होंने विद्यार्थियों को संदेश दिया कि ईमानदारी और लगन से किया गया प्रयास ही सफलता की कुंजी है। बाइट डीसी चंबा मुकेश रेप्सवाल।1
- पांगी भरमौर के विधायक डॉक्टर जनक राज ने उठाया पांगी घाटी में चल रहे बिजली समस्या का मुद्दा 👇👇 Dr Janak Raj MLA Pangi Administration1
- पांगी: जनजातीय क्षेत्र पांगी इन दिनों ‘जुकारू’ पर्व की रंगत में पूरी तरह रंगा हुआ है। बर्फ की सफेद चादर ओढ़े पहाड़, ठंडी हवाओं के बीच घर-घर में जलते दीये और पारंपरिक वेशभूषा में सजे लोग इस पर्व की गरिमा को और भी भव्य बना रहे हैं। स्थानीय बोली में ‘पडीद’ कहलाने वाला यह पर्व न केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक है, बल्कि सामाजिक एकता, बड़ों के सम्मान और आपसी भाईचारे का जीवंत उत्सव भी है। ब्रह्म मुहूर्त से आरंभ होती है पर्व की पावन शुरुआत। जुकारू के दिन लोग प्रातः ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नानादि कर नए या स्वच्छ पारंपरिक वस्त्र धारण करते हैं। इसके पश्चात भगवान राजा बलि की पूजा-अर्चना की जाती है। पौराणिक मान्यता के अनुसार राजा बलि दान, त्याग और समर्पण के प्रतीक माने जाते हैं, इसलिए इस दिन उनके प्रति कृतज्ञता प्रकट की जाती है। राजा बलि की पूजा के उपरांत सूर्य भगवान को पुष्प अर्पित कर परिवार की सुख-शांति और समृद्धि की कामना की जाती है। जैसे ही परिवार का सदस्य पुष्प अर्पित कर घर में प्रवेश करता है, वह “शुभ” कहता है और सामने से “शगण” में उत्तर दिया जाता है। यह परंपरा घर में सकारात्मक ऊर्जा और मंगलकामना का संदेश देती है। जल देवता और ‘चूर’ की पूजा का विशेष महत्व। जुकारू के दिन पनघट से विशेष रूप से जल लाकर जल देवता की पूजा की जाती है। पहाड़ी जीवन में जल का विशेष महत्व है, इसलिए इसे जीवनदाता मानकर आभार प्रकट किया जाता है। घर का मुखिया इस दिन ‘चूर’ अर्थात हल की पूजा करता है। खेती-किसानी पांगी की जीवनरेखा रही है, और हल को समृद्धि व परिश्रम का प्रतीक माना जाता है। यह परंपरा आने वाले कृषि वर्ष के लिए शुभ संकेत मानी जाती है। जुकारू – बड़ों के सम्मान और आशीर्वाद का पर्व। ‘पडीद’ की सुबह होते ही ‘जुकारू’ की विधिवत शुरुआत होती है। जुकारू का शाब्दिक अर्थ है—बड़ों का आदर और सम्मान। घर के छोटे सदस्य बड़े-बुजुर्गों के चरण स्पर्श कर आशीर्वाद लेते हैं। बड़े उन्हें दीर्घायु, समृद्धि और सुखी जीवन का आशीर्वाद देते हैं। सर्दियों और भारी बर्फबारी के कारण कई सप्ताह तक लोग अपने घरों में सीमित रहते हैं। ऐसे में जुकारू सामाजिक मेल-मिलाप का भी अवसर बनता है। लोग एक-दूसरे के घर जाकर गले मिलते हैं और पारंपरिक शब्दों में शुभकामनाएं देते हैं—मिलते समय “तकडा थिया न” और विदा लेते समय “मठे मठे विश” कहा जाता है। सबसे पहले बड़े भाई के घर जाकर सम्मान प्रकट करना परंपरा का हिस्सा है, उसके बाद अन्य संबंधियों और गांववासियों से भेंट की जाती है। इस दिन लोग पुराने गिले-शिकवे भुलाकर नई शुरुआत का संकल्प लेते हैं। संस्कृति संरक्षण का जीवंत उदाहरण। जुकारू पर्व पांगी की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत को जीवित रखने का माध्यम है। युवा पीढ़ी भी बढ़-चढ़कर इस पर्व में भाग ले रही है, जिससे पारंपरिक रीति-रिवाजों का संरक्षण सुनिश्चित हो रहा है। महिलाएं पारंपरिक व्यंजन तैयार करती हैं और घरों में विशेष पकवान बनाए जाते हैं। पूरा क्षेत्र उत्सव के रंग में डूबा नजर आता है, और गांव-गांव में आपसी प्रेम और सद्भाव की मिसाल देखने को मिलती है। जनप्रतिनिधियों ने दी शुभकामनाएं। इस अवसर पर भरमौर-पांगी विधायक Dr. Janak Raj, एपीएमसी चेयरमैन Lalit Thakur, जिला कांग्रेस अध्यक्ष Surjit Singh Bharmouri तथा आवासीय आयुक्त पांगी Amandeep Singh ने समस्त पंगवाल समुदाय को जुकारू पर्व की हार्दिक शुभकामनाएं एवं बधाई दी है। उन्होंने कहा कि ऐसे पारंपरिक पर्व हमारी संस्कृति की आत्मा हैं और इन्हें सहेजकर रखना हम सभी की जिम्मेदारी है। पांगी न्यूज 24 भी जुकारू पर्व से जुड़ी हर गतिविधि और आयोजन की ताजा अपडेट आप तक निरंतर पहुंचाता रहेगा।1
- किलाड़ (पांगी घाटी): जनजातीय क्षेत्र पांगी घाटी में बुधवार को पंगवाल समुदाय का प्रमुख लोकपर्व ‘जुकारू’ एवं ‘पड़ीद’ पूरे हर्षोल्लास और पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ मनाया गया। अमावस्या की रात्रि को ‘सिल्ल’ के रूप में जुकारू उत्सव की शुरुआत होती है, जबकि अमावस्या के अगले दिन चंद्रमा की प्रथम तिथि को पड़ीद मनाया जाता है। यह दिन विशेष रूप से पितरों को समर्पित माना जाता है। सूर्य अर्घ्य से होता है पड़ीद का शुभारंभ पड़ीद के दिन प्रातःकाल स्नान के पश्चात लोग भगवान सूर्य को अर्घ्य देकर पर्व का शुभारंभ करते हैं। इसके बाद छोटे सदस्य घर के बड़ों के चरण स्पर्श कर आशीर्वाद लेते हैं। चरण स्पर्श से पहले ‘जेवरा’ के फूल एक-दूसरे को भेंट करने की परंपरा निभाई जाती है। जेवरा गेहूं या मक्की के दानों से तैयार की गई कोमल कलियां होती हैं, जिन्हें जुकारू से लगभग 10–15 दिन पूर्व विशेष विधि से उगाया जाता है। घर का मुखिया ‘राजावली’ के समक्ष माथा टेककर प्रार्थना करता है कि समस्त नकारात्मक शक्तियां नाग लोक को प्रस्थान करें और धरती पर सुख-शांति बनी रहे। पितरों की पूजा और सूर्य अर्घ्य के बाद पशुधन को भी पकवान खिलाकर जुकारू किया जाता है। घर लौटते समय शुभ वचन कहे जाते हैं, जिनका उत्तर गृहलक्ष्मी ‘शगुन’ के रूप में देती हैं। पारिवारिक मिलन और सामूहिक उत्सव पर्व के अवसर पर पूरा परिवार एक-दूसरे के चरण स्पर्श कर गले मिलता है। घर में तैयार घी मंडे और अन्य पारंपरिक व्यंजन परोसे जाते हैं। इसके बाद परिवार के सदस्य, गृहस्वामिनी को छोड़कर, भोजपत्र में पकवान सजाकर गांव के सबसे बुजुर्ग व्यक्ति के घर ‘जुकारू भेंट’ लेकर जाते हैं। जेवरा के फूल अर्पित कर आशीर्वाद लिया जाता है। मेजबान परिवार अतिथियों का स्वागत पारंपरिक पकवानों, मांस और स्थानीय पेय से करता है। किलाड़ में रात दो बजे से परंपरा पांगी मुख्यालय किलाड़ में पड़ीद उत्सव की शुरुआत रात दो बजे से ही हो जाती है। प्रातःकाल लोग समीपवर्ती प्राचीन शिव मंदिर में भगवान भोलेनाथ और नाग देवता को जुकारू भेंट अर्पित करते हैं। परंपरा के अनुसार, मंदिर में पूजा के बाद चौकी किलाड़ स्थित ऐतिहासिक राजकोठी में जाकर राजा को भी जुकारू भेंट किया जाता है। यह परंपरा राजतंत्र काल से चली आ रही है। मान्यता है कि पूर्व समय में धरवास और किरयूनी क्षेत्र के लोग भी इस अवसर पर किलाड़ पहुंचते थे, किंतु एक बार भारी हिमपात के कारण वे शामिल नहीं हो सके। तब से किलाड़ के लोगों ने इस परंपरा को अपने स्तर पर निरंतर बनाए रखा है। जेवरा फूल का विशेष महत्व जुकारू पर्व में ‘जेवरा’ का विशेष धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व है। माघ पूर्णिमा के तीसरे दिन मिट्टी में भेड़-बकरियों के बारीक गोबर को मिलाकर उसमें गेहूं और मक्की के बीज डाले जाते हैं। लगभग 10–12 दिनों में तैयार हुई इन कलियों का उपयोग 12 दिनों तक फूल के रूप में किया जाता है। स्थानीय पुजारी जयराम के अनुसार, जेवरा की कलियां जितनी अच्छी और शीघ्र तैयार होती हैं, उसे आने वाले वर्ष में अच्छी फसल का संकेत माना जाता है। पड़ीद के दिन सूर्य भगवान को भोग लगाने के बाद बड़ों का आशीर्वाद लिया जाता है। पौराणिक और लोकमान्यताएं जुकारू पर्व से जुड़ी एक पौराणिक कथा के अनुसार, भगवान विष्णु ने वामन अवतार में महादानी राजा बलि से तीन पग भूमि मांगी थी। राजा बलि के त्याग से प्रसन्न होकर भगवान ने वरदान दिया कि माघ और फाल्गुन मास की विशेष अमावस्याओं पर पृथ्वी पर उनकी पूजा होगी। पांगी का जुकारू पर्व इसी मान्यता से जुड़ा माना जाता है। एक अन्य लोककथा के अनुसार, क्षेत्र में राणा और ठाकुरों के बीच लंबे समय तक संघर्ष रहता था। आपसी वैमनस्य को समाप्त करने और सामाजिक मेल-मिलाप को बढ़ावा देने के लिए वर्ष में कुछ विशेष दिन आपसी मिलन के लिए निर्धारित किए गए, जिन्हें बाद में ‘जुकारू’ नाम दिया गया। कुछ लोग यह भी मानते हैं कि कड़ाके की सर्दियों में सामाजिक संपर्क सीमित होने के कारण, विशेषकर विवाहित बेटियों को मायके आने का अवसर देने के उद्देश्य से यह पर्व प्रारंभ हुआ। आस्था, संस्कृति और एकता का प्रतीक जुकारू और पड़ीद केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि पंगवाल समुदाय की सांस्कृतिक पहचान, पारिवारिक एकता और सामाजिक समरसता के प्रतीक हैं। पितरों की श्रद्धा, देव पूजन, पारिवारिक मिलन और सामूहिक उत्सव की यह परंपरा आज भी पांगी घाटी की सांस्कृतिक विरासत को जीवंत बनाए हुए है। लेख एवं प्रस्तुति कृष्ण चंद राणा लेखक देवभूमि पांगी दर्शन एवं सम्पादक पांगी न्यूज़ टुडे। #पांगीघाटी #किलाड़ #जुकारू #पड़ीद #पंगवालसमुदाय #जनजातीयसंस्कृति #हिमाचलप्रदेश #हिमाचलकीसंस्कृति #लोकपर्व #पारंपरिकत्योहार #देवसंस्कृति #सूर्यअर्घ्य #पितृसमर्पण #संस्कृतिकीझलक #IncredibleHimachal लेख एवं प्रस्तुति कृष्ण चंद राणा लेखक देवभूमि पांगी दर्शन एवं सम्पादक पांगी न्यूज़ टुडे।1
- j&k bank lone khanshib1
- "Announcement by the Central Ruet-e-Hilal Committee: The Ramadan crescent has been sighted across the country."1
- चंबा: उपमंडल स्तर पर पहुंचे सेब के पौधे, बर्फबारी के बाद बागवानों को मिली बड़ी राहत। मोहम्मद आशिक चंबा हिमाचल प्रदेश जिले के विभिन्न उपमंडलों में सेब के पौधों की खेप पहुंचने से बागवानों के चेहरे खिल उठे हैं। हाल ही में हुई बर्फबारी के बाद जहां मौसम में ठंड बढ़ गई थी, वहीं अब सेब के पौधे समय पर उपलब्ध होने से बागवानी कार्यों को गति मिल गई है। जानकारी के अनुसार कृषि एवं बागवानी विभाग द्वारा उपमंडल स्तर पर सेब के उन्नत किस्मों के पौधे उपलब्ध करवाए गए हैं, जिससे स्थानीय बागवानों को बाहर जाने की जरूरत नहीं पड़ेगी। पौधों के वितरण की प्रक्रिया भी शुरू कर दी गई है ताकि अधिक से अधिक किसानों और बागवानों को इसका लाभ मिल सके। बागवानों का कहना है कि बर्फबारी के बाद भूमि में पर्याप्त नमी होने के कारण पौधारोपण के लिए यह समय बेहद उपयुक्त है। ऐसे में पौधों की समय पर आपूर्ति से उत्पादन बढ़ाने में मदद मिलेगी और भविष्य में आर्थिक रूप से भी लाभ होगा। विभागीय अधिकारियों ने बताया कि इस वर्ष बागवानी को प्रोत्साहन देने के उद्देश्य से सेब सहित अन्य फलदार पौधों की उपलब्धता सुनिश्चित की गई है। साथ ही बागवानों को तकनीकी मार्गदर्शन भी दिया जा रहा है ताकि पौधारोपण सही तरीके से किया जा सके। सेब के पौधे पहुंचने से क्षेत्र में बागवानी गतिविधियां तेज होंगी और बागवानों को बेहतर उत्पादन की उम्मीद जगी है। बाइट डॉ प्रमोद शाह उद्यान उपनिदेशक चंबा।1
- Dr. B. R. Ambedkar Retired Employees And Senior Citizen Association ने उपायुक्त को सौंपा ज्ञापन सुरेंद्र ठाकुर चंबा: 18 फरवरी डॉ. बी. आर. आंबेडकर रिटायर्ड एम्प्लॉइज एंड सीनियर सिटीजन एसोसिएशन, चंबा (हिमाचल प्रदेश) ने अनुसूचित जाति एवं जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 के तहत एक मामले में सख्त कार्रवाई की मांग को लेकर उपायुक्त चंबा के माध्यम से ज्ञापन सौंपा है। ज्ञापन में एसोसिएशन ने आरोप लगाया है कि एक व्यक्ति द्वारा सोशल मीडिया पर आपत्तिजनक टिप्पणी/पोस्ट साझा कर अनुसूचित जाति समाज की भावनाओं को ठेस पहुंचाई गई है। संगठन ने इसे गंभीर मामला बताते हुए संबंधित धाराओं के अंतर्गत प्राथमिकी दर्ज कर कानूनी कार्रवाई सुनिश्चित करने की मांग की है। एसोसिएशन के पदाधिकारियों ने कहा कि संविधान लागू होने के दशकों बाद भी इस प्रकार की घटनाएं चिंताजनक हैं और समाज में सौहार्द बनाए रखने के लिए कानून का सख्ती से पालन होना आवश्यक है। उन्होंने प्रशासन से निष्पक्ष जांच कर दोषी के खिलाफ कड़ी कार्रवाई करने का आग्रह किया है। संगठन ने चेतावनी दी है कि यदि समय रहते उचित कार्रवाई नहीं की गई तो वे आगामी रणनीति पर विचार करेंगे।1
- हिम संदेश जनजातीय क्षेत्र पांगी घाटी इन दिनों पूर्णतः हिमाच्छादित है। चारों ओर बर्फ की सफेद चादर ओढ़े पहाड़, शांत वातावरण और ठंडी हवाओं के बीच जब लोक संस्कृति की मधुर गूंज सुनाई देती है, तो यह संकेत होता है पांगी के ऐतिहासिक और पारंपरिक ‘सिहल–जुकारू’ पर्व का। यह पर्व केवल एक त्योहार नहीं, बल्कि पंगवाला समाज की सांस्कृतिक पहचान, आस्था और सामूहिक एकता का जीवंत प्रतीक है। फागुन मास की अमावस्या को मनाया जाने वाला यह पर्व तीन प्रमुख चरणों सिलह, पड़ीद और मांगल में संपन्न होता है। सदियों से चली आ रही यह परंपरा आज भी उतनी ही श्रद्धा और उत्साह के साथ निभाई जाती है, जितनी पूर्वजों के समय में निभाई जाती थी। तैयारियों में झलकती है लोक संस्कृति की छटा। ‘सिहल–जुकारू’ की तैयारियां कई दिन पूर्व आरंभ हो जाती हैं। घरों की विशेष साफ-सफाई की जाती है, दीवारों पर पारंपरिक लोक शैली में चित्रांकन और लिखावट की जाती है। यह लिखावट केवल सजावट नहीं, बल्कि सांस्कृतिक अभिव्यक्ति का माध्यम है। घरों में विशेष पकवान ‘मंण्डे’ बनाए जाते हैं, साथ ही अन्य पारंपरिक व्यंजन भी तैयार किए जाते हैं। महिलाएं और बुजुर्ग पारंपरिक रीति-रिवाजों को निभाते हुए बच्चों को इनकी महत्ता समझाते हैं, जिससे नई पीढ़ी भी अपनी जड़ों से जुड़ी रहे। ‘सिलह’ : आस्था और अनुशासन का दिन। पहले दिन ‘सिलह’ मनाया जाता है। इस दिन घरों में बलिराज के चित्र बनाए जाते हैं और रात्रि में उनकी विधिवत पूजा की जाती है। दिन में बनाए गए सभी पकवान तथा एक दीपक राजा बलि के चित्र के समक्ष अर्पित किए जाते हैं। इस दिन चरखा कातना बंद कर दिया जाता है और सभी लोग संयम और श्रद्धा के साथ दिन व्यतीत करते हैं। लोक मान्यता के अनुसार इस दिन अनुशासन और शुद्धता का विशेष महत्व है। पौराणिक कथा के अनुसार भगवान विष्णु के परम भक्त प्रह्लाद के पोते राजा बलि ने अपने पराक्रम से तीनों लोकों पर विजय प्राप्त कर ली थी। तब भगवान विष्णु को वामन अवतार धारण करना पड़ा। राजा बलि ने वामन को तीन पग भूमि दान में दी, जिससे प्रसन्न होकर विष्णु ने उन्हें वरदान दिया कि वर्ष में एक दिन पृथ्वी लोक में उनकी पूजा की जाएगी। इसी विश्वास के साथ पांगी घाटी के लोग आज भी राजा बलि की पूजा-अर्चना करते हैं। ‘पड़ीद’ : सम्मान, संस्कार और सामाजिक एकता दूसरा दिन ‘पड़ीद’ का होता है। प्रातः ब्रह्ममुहूर्त में उठकर लोग स्नान करते हैं और राजा बलि के समक्ष नतमस्तक होते हैं। घर के छोटे सदस्य बड़े-बुजुर्गों के चरण स्पर्श कर आशीर्वाद प्राप्त करते हैं। यह परंपरा पारिवारिक मूल्यों और सम्मान की भावना को सुदृढ़ करती है। पनघट से जल लाकर अर्पित किया जाता है और जल देवता की पूजा की जाती है। घर का मुखिया ‘चूर’ (हल चलाने के औजार) की पूजा करता है, जो कृषि प्रधान जीवनशैली का प्रतीक है। इससे यह स्पष्ट होता है कि यह पर्व केवल धार्मिक ही नहीं, बल्कि प्रकृति और कृषि से जुड़ा उत्सव भी है। ‘जुकारू’ : मिलन, प्रेम और भाईचारे का उत्सव। ‘पड़ीद’ की सुबह से ही ‘जुकारू’ आरंभ हो जाता है। ‘जुकारू’ शब्द का अर्थ है—बड़ों का आदर और परस्पर सम्मान। सर्दियों में भारी बर्फबारी के कारण महीनों तक लोग अपने घरों में सीमित रहते हैं। जब मौसम कुछ अनुकूल होता है, तो इस पर्व के माध्यम से लोग एक-दूसरे के घर जाकर गले मिलते हैं और शुभकामनाएं देते हैं। लोग एक-दूसरे से मिलते समय ‘तकड़ा थिया न’ कहकर कुशल-क्षेम पूछते हैं और विदा लेते समय ‘मठे-मठे विश’ कहते हैं। सबसे पहले बड़े भाई या परिवार के वरिष्ठ सदस्य के घर जाकर सम्मान प्रकट करने की परंपरा आज भी पूरी श्रद्धा के साथ निभाई जाती है। यह दिन सामाजिक मेल-मिलाप, आपसी मनमुटाव दूर करने और रिश्तों को सुदृढ़ करने का अवसर भी होता है। सांस्कृतिक धरोहर का संरक्षण आवश्यक। ‘सिहल–जुकारू’ पर्व पांगी घाटी की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत का जीवंत प्रतीक है। आधुनिकता के इस दौर में भी जिस प्रकार स्थानीय लोग अपनी परंपराओं को सहेजकर रखे हुए हैं, वह सराहनीय है। यह पर्व नई पीढ़ी को अपनी संस्कृति, लोककथाओं और सामाजिक मूल्यों से जोड़ने का सशक्त माध्यम बन रहा है। यह केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि सामाजिक समरसता, प्रकृति के प्रति सम्मान और पारिवारिक एकता का संदेश देने वाला महोत्सव है। पांगी न्यूज 24 की ओर से पांगी की आन, बान और शान को संजोने वाले इस पावन पर्व ‘सिहल–जुकारू’ की समस्त पांगीवासियों को हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएं। यह त्योहार हमारी संस्कृति, परंपराओं और भाईचारे की अद्भुत मिसाल बना रहे और आने वाली पीढ़ियों को अपनी जड़ों से जोड़े रखे — यही कामना है।1