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"औरतें बोलना नहीं भूलतीं" औरतें बोलना नहीं भूलतीं, उन्हें चुप रहना सिखाया जाता है। धीरे-धीरे, प्यार के नाम पर, इज़्ज़त के नाम पर, और “घर की बात है” कहकर। औरतें जब पहली बार चुप होती हैं, तो कोई नहीं सुनता। जब दूसरी बार चुप होती हैं, तो सब आदत डाल लेते हैं। और जब हमेशा के लिए चुप हो जाती हैं, तो लोग कहते हैं— “बहुत सहनशील थी।” औरतें दर्द नहीं बतातीं, वे काम पूरा करती हैं। बुखार में भी रोटी गोल रहती है, आँसू नमक में घुल जाते हैं। उनके घाव डायरी में नहीं, रसोई के कोनों में छुपे होते हैं। औरतें अपने सपनों को कभी पूरा नहीं छोड़तीं, वे उन्हें धीरे-धीरे छोटा करती जाती हैं बच्चों की कॉपी में, पति की थकान में, और समाज की सुविधाओं में। औरतें जब बोलना चाहती हैं, तो पहले अपने शब्दों से माफी माँगती हैं। “शायद मेरी गलती हो…” “मैं ज़्यादा सोच रही हूँ…” “छोड़िए, रहने दीजिए…” उनके वाक्य हमेशा आधे क्यों रह जाते हैं? औरतें हँसती हैं, क्योंकि रोना महँगा पड़ता है। वे जानती हैं हर सवाल उनके चरित्र से शुरू होगा, और हर जवाब उन्हीं पर खत्म। औरतें घर बदलती हैं, नाम बदलती हैं, रिश्ते बदलती हैं लेकिन अपनी चुप्पी साथ ले जाती हैं। मायके से ससुराल तक एक ही आवाज़ सिखाई जाती है धीमी… संयमित… ज़रूरत से कम। औरतें जब बहुत थक जाती हैं, तो बीमार नहीं पड़तीं, वे खामोश पड़ती हैं। और यह खामोशी सबसे ज़्यादा खतरनाक होती है। औरतें जो बोल नहीं पातीं, वे बहुत कुछ लिख देती हैं— अपने शरीर पर, अपनी आँखों में, और अपने बच्चों के भविष्य में। वे क्रांति नहीं करतीं, वे ज़िंदगी चलाती हैं। और शायद इस दुनिया की सबसे बड़ी अदृश्य ताक़त वही हैं— जो कुछ नहीं कहतीं, लेकिन सब कुछ सहती हैं। अगर आप किसी औरत की चुप्पी सुन रहे हैं, तो समझिए— वह कुछ कह रही है। बस आपको सुनना सीखना होगा। अभी आप सुन रहे थे सुनील गुप्ता की कविता

1 hr ago
user_Sunil Gupta
Sunil Gupta
पत्रकार सीतापुर, सरगुजा, छत्तीसगढ़•
1 hr ago

"औरतें बोलना नहीं भूलतीं" औरतें बोलना नहीं भूलतीं, उन्हें चुप रहना सिखाया जाता है। धीरे-धीरे, प्यार के नाम पर, इज़्ज़त के नाम पर, और “घर की बात है” कहकर। औरतें जब पहली बार चुप होती हैं, तो कोई नहीं सुनता। जब दूसरी बार चुप होती हैं, तो सब आदत डाल लेते हैं। और जब हमेशा के लिए चुप हो जाती हैं, तो लोग कहते हैं— “बहुत सहनशील थी।” औरतें दर्द नहीं बतातीं, वे काम पूरा करती हैं। बुखार में भी रोटी गोल रहती है, आँसू नमक में घुल जाते हैं। उनके घाव डायरी में नहीं, रसोई के कोनों में छुपे होते हैं। औरतें अपने सपनों को कभी पूरा नहीं छोड़तीं, वे उन्हें धीरे-धीरे छोटा करती जाती हैं बच्चों की कॉपी में, पति की थकान में, और समाज की सुविधाओं में। औरतें जब बोलना चाहती हैं, तो पहले अपने शब्दों से माफी माँगती हैं। “शायद मेरी गलती हो…” “मैं ज़्यादा सोच रही हूँ…” “छोड़िए, रहने दीजिए…” उनके वाक्य हमेशा आधे क्यों रह जाते हैं? औरतें हँसती हैं, क्योंकि रोना महँगा पड़ता है। वे जानती हैं हर सवाल उनके चरित्र से शुरू होगा, और हर जवाब उन्हीं पर खत्म। औरतें घर बदलती हैं, नाम बदलती हैं, रिश्ते बदलती हैं लेकिन अपनी चुप्पी साथ ले जाती हैं। मायके से ससुराल तक एक ही आवाज़ सिखाई जाती है धीमी… संयमित… ज़रूरत से कम। औरतें जब बहुत थक जाती हैं, तो बीमार नहीं पड़तीं, वे खामोश पड़ती हैं। और यह खामोशी सबसे ज़्यादा खतरनाक होती है। औरतें जो बोल नहीं पातीं, वे बहुत कुछ लिख देती हैं— अपने शरीर पर, अपनी आँखों में, और अपने बच्चों के भविष्य में। वे क्रांति नहीं करतीं, वे ज़िंदगी चलाती हैं। और शायद इस दुनिया की सबसे बड़ी अदृश्य ताक़त वही हैं— जो कुछ नहीं कहतीं, लेकिन सब कुछ सहती हैं। अगर आप किसी औरत की चुप्पी सुन रहे हैं, तो समझिए— वह कुछ कह रही है। बस आपको सुनना सीखना होगा। अभी आप सुन रहे थे सुनील गुप्ता की कविता

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  • औरतें बोलना नहीं भूलतीं, उन्हें चुप रहना सिखाया जाता है। धीरे-धीरे, प्यार के नाम पर, इज़्ज़त के नाम पर, और “घर की बात है” कहकर। औरतें जब पहली बार चुप होती हैं, तो कोई नहीं सुनता। जब दूसरी बार चुप होती हैं, तो सब आदत डाल लेते हैं। और जब हमेशा के लिए चुप हो जाती हैं, तो लोग कहते हैं— “बहुत सहनशील थी।” औरतें दर्द नहीं बतातीं, वे काम पूरा करती हैं। बुखार में भी रोटी गोल रहती है, आँसू नमक में घुल जाते हैं। उनके घाव डायरी में नहीं, रसोई के कोनों में छुपे होते हैं। औरतें अपने सपनों को कभी पूरा नहीं छोड़तीं, वे उन्हें धीरे-धीरे छोटा करती जाती हैं बच्चों की कॉपी में, पति की थकान में, और समाज की सुविधाओं में। औरतें जब बोलना चाहती हैं, तो पहले अपने शब्दों से माफी माँगती हैं। “शायद मेरी गलती हो…” “मैं ज़्यादा सोच रही हूँ…” “छोड़िए, रहने दीजिए…” उनके वाक्य हमेशा आधे क्यों रह जाते हैं? औरतें हँसती हैं, क्योंकि रोना महँगा पड़ता है। वे जानती हैं हर सवाल उनके चरित्र से शुरू होगा, और हर जवाब उन्हीं पर खत्म। औरतें घर बदलती हैं, नाम बदलती हैं, रिश्ते बदलती हैं लेकिन अपनी चुप्पी साथ ले जाती हैं। मायके से ससुराल तक एक ही आवाज़ सिखाई जाती है धीमी… संयमित… ज़रूरत से कम। औरतें जब बहुत थक जाती हैं, तो बीमार नहीं पड़तीं, वे खामोश पड़ती हैं। और यह खामोशी सबसे ज़्यादा खतरनाक होती है। औरतें जो बोल नहीं पातीं, वे बहुत कुछ लिख देती हैं— अपने शरीर पर, अपनी आँखों में, और अपने बच्चों के भविष्य में। वे क्रांति नहीं करतीं, वे ज़िंदगी चलाती हैं। और शायद इस दुनिया की सबसे बड़ी अदृश्य ताक़त वही हैं— जो कुछ नहीं कहतीं, लेकिन सब कुछ सहती हैं। अगर आप किसी औरत की चुप्पी सुन रहे हैं, तो समझिए— वह कुछ कह रही है। बस आपको सुनना सीखना होगा। अभी आप सुन रहे थे सुनील गुप्ता की कविता
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    औरतें
बोलना नहीं भूलतीं,
उन्हें
चुप रहना
सिखाया जाता है।
धीरे-धीरे,
प्यार के नाम पर,
इज़्ज़त के नाम पर,
और
“घर की बात है”
कहकर।
औरतें
जब पहली बार
चुप होती हैं,
तो
कोई नहीं सुनता।
जब दूसरी बार
चुप होती हैं,
तो
सब आदत डाल लेते हैं।
और
जब हमेशा के लिए
चुप हो जाती हैं,
तो
लोग कहते हैं—
“बहुत सहनशील थी।”
औरतें
दर्द नहीं बतातीं,
वे
काम पूरा करती हैं।
बुखार में भी
रोटी गोल रहती है,
आँसू
नमक में घुल जाते हैं।
उनके घाव
डायरी में नहीं,
रसोई के कोनों में
छुपे होते हैं।
औरतें
अपने सपनों को
कभी
पूरा नहीं छोड़तीं,
वे
उन्हें
धीरे-धीरे
छोटा करती जाती हैं
बच्चों की कॉपी में,
पति की थकान में,
और
समाज की सुविधाओं में।
औरतें
जब बोलना चाहती हैं,
तो
पहले अपने शब्दों से
माफी माँगती हैं।
“शायद मेरी गलती हो…”
“मैं ज़्यादा सोच रही हूँ…”
“छोड़िए, रहने दीजिए…”
उनके वाक्य
हमेशा
आधे क्यों रह जाते हैं?
औरतें
हँसती हैं,
क्योंकि
रोना महँगा पड़ता है।
वे जानती हैं
हर सवाल
उनके चरित्र से शुरू होगा,
और
हर जवाब
उन्हीं पर खत्म।
औरतें
घर बदलती हैं,
नाम बदलती हैं,
रिश्ते बदलती हैं
लेकिन
अपनी चुप्पी
साथ ले जाती हैं।
मायके से ससुराल तक
एक ही आवाज़
सिखाई जाती है
धीमी…
संयमित…
ज़रूरत से कम।
औरतें
जब बहुत थक जाती हैं,
तो
बीमार नहीं पड़तीं,
वे
खामोश पड़ती हैं।
और
यह खामोशी
सबसे ज़्यादा
खतरनाक होती है।
औरतें
जो बोल नहीं पातीं,
वे
बहुत कुछ
लिख देती हैं—
अपने शरीर पर,
अपनी आँखों में,
और
अपने बच्चों के भविष्य में।
वे
क्रांति नहीं करतीं,
वे
ज़िंदगी चलाती हैं।
और
शायद
इस दुनिया की
सबसे बड़ी
अदृश्य ताक़त
वही हैं—
जो
कुछ नहीं कहतीं,
लेकिन
सब कुछ
सहती हैं।
अगर आप
किसी औरत की
चुप्पी सुन रहे हैं,
तो
समझिए—
वह
कुछ कह रही है।
बस
आपको
सुनना सीखना होगा।
अभी आप सुन रहे थे सुनील गुप्ता की कविता
    user_Sunil Gupta
    Sunil Gupta
    पत्रकार सीतापुर, सरगुजा, छत्तीसगढ़•
    1 hr ago
  • हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: शिक्षकों पर VSK ऐप का दबाव गलत, दंडात्मक कार्रवाई और अनिवार्यता पर लगाई ‘अंतरिम रोक’ छत्तीसगढ़ के सरकारी स्कूलों में शिक्षकों की उपस्थिति और निगरानी के लिए लागू किए गए ‘VSK ऐप’ को लेकर चल रहे विवाद में बिलासपुर उच्च न्यायालय ने एक अहम फैसला सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि किसी भी शिक्षक को उसकी इच्छा के विरुद्ध व्यक्तिगत मोबाइल फोन पर थर्ड-पार्टी ऐप इंस्टॉल करने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता। जस्टिस एन.के. चंद्रवंशी की एकल पीठ ने मामले की गंभीरता को देखते हुए याचिकाकर्ता शिक्षक के खिलाफ किसी भी तरह की अनुशासनात्मक कार्रवाई पर अंतरिम रोक लगा दी है। ​निजी संपत्ति और निजता का अधिकार प्रमुख आधार यह कानूनी विवाद तब शुरू हुआ जब शिक्षक कमलेश सिंह बिसेन ने सरकार के उस फरमान को चुनौती दी, जिसमें शिक्षकों के निजी मोबाइल को शासकीय कार्य के लिए उपयोग करना अनिवार्य कर दिया गया था। याचिकाकर्ता ने स्वयं कोर्ट में अपना पक्ष रखते हुए दो टूक कहा कि शिक्षकों का व्यक्तिगत मोबाइल उनकी निजी संपत्ति है, जिसे सरकार बिना सहमति के ‘ऑफिसियल टूल’ की तरह इस्तेमाल नहीं कर सकती। साथ ही, थर्ड-पार्टी ऐप से डेटा सुरक्षा और व्यक्तिगत निजता (Privacy) के उल्लंघन का गंभीर खतरा बना रहता है। ​सरकार से दो सप्ताह में मांगा जवाब हाईकोर्ट ने याचिकाकर्ता के तर्कों को प्रथम दृष्टया स्वीकार करते हुए राज्य शासन को नोटिस जारी कर 14 दिनों के भीतर विस्तृत हलफनामा पेश करने का निर्देश दिया है। अदालत ने अंतरिम राहत देते हुए कहा कि मामले की अगली सुनवाई तक याचिकाकर्ता को ऐप डाउनलोड करने के लिए बाध्य न किया जाए और न ही इस आधार पर उसके वेतन या सेवा रिकॉर्ड पर कोई प्रतिकूल प्रभाव डाला जाए। ​डिजिटल प्रशासन के दौर में मील का पत्थर कानूनी गलियारों में इस आदेश को डिजिटल प्रशासन और कर्मचारी अधिकारों के बीच संतुलन बनाने की दिशा में एक बड़ा कदम माना जा रहा है। विशेषज्ञों का कहना है कि यदि सरकार किसी ऐप को अनिवार्य करना चाहती है, तो उसे संसाधन (मोबाइल और डेटा) भी स्वयं उपलब्ध कराने चाहिए। फिलहाल यह राहत तकनीकी रूप से याचिकाकर्ता तक सीमित है, लेकिन आने वाली सुनवाई में होने वाला फैसला प्रदेश के हजारों शिक्षकों के भविष्य और कार्यप्रणाली की दिशा तय करेगा।
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    हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: शिक्षकों पर VSK ऐप का दबाव गलत, दंडात्मक कार्रवाई और अनिवार्यता पर लगाई ‘अंतरिम रोक’
छत्तीसगढ़ के सरकारी स्कूलों में शिक्षकों की उपस्थिति और निगरानी के लिए लागू किए गए ‘VSK ऐप’ को लेकर चल रहे विवाद में बिलासपुर उच्च न्यायालय ने एक अहम फैसला सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि किसी भी शिक्षक को उसकी इच्छा के विरुद्ध व्यक्तिगत मोबाइल फोन पर थर्ड-पार्टी ऐप इंस्टॉल करने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता। जस्टिस एन.के. चंद्रवंशी की एकल पीठ ने मामले की गंभीरता को देखते हुए याचिकाकर्ता शिक्षक के खिलाफ किसी भी तरह की अनुशासनात्मक कार्रवाई पर अंतरिम रोक लगा दी है।
​निजी संपत्ति और निजता का अधिकार प्रमुख आधार
यह कानूनी विवाद तब शुरू हुआ जब शिक्षक कमलेश सिंह बिसेन ने सरकार के उस फरमान को चुनौती दी, जिसमें शिक्षकों के निजी मोबाइल को शासकीय कार्य के लिए उपयोग करना अनिवार्य कर दिया गया था। याचिकाकर्ता ने स्वयं कोर्ट में अपना पक्ष रखते हुए दो टूक कहा कि शिक्षकों का व्यक्तिगत मोबाइल उनकी निजी संपत्ति है, जिसे सरकार बिना सहमति के ‘ऑफिसियल टूल’ की तरह इस्तेमाल नहीं कर सकती। साथ ही, थर्ड-पार्टी ऐप से डेटा सुरक्षा और व्यक्तिगत निजता (Privacy) के उल्लंघन का गंभीर खतरा बना रहता है।
​सरकार से दो सप्ताह में मांगा जवाब
हाईकोर्ट ने याचिकाकर्ता के तर्कों को प्रथम दृष्टया स्वीकार करते हुए राज्य शासन को नोटिस जारी कर 14 दिनों के भीतर विस्तृत हलफनामा पेश करने का निर्देश दिया है। अदालत ने अंतरिम राहत देते हुए कहा कि मामले की अगली सुनवाई तक याचिकाकर्ता को ऐप डाउनलोड करने के लिए बाध्य न किया जाए और न ही इस आधार पर उसके वेतन या सेवा रिकॉर्ड पर कोई प्रतिकूल प्रभाव डाला जाए।
​डिजिटल प्रशासन के दौर में मील का पत्थर
कानूनी गलियारों में इस आदेश को डिजिटल प्रशासन और कर्मचारी अधिकारों के बीच संतुलन बनाने की दिशा में एक बड़ा कदम माना जा रहा है। विशेषज्ञों का कहना है कि यदि सरकार किसी ऐप को अनिवार्य करना चाहती है, तो उसे संसाधन (मोबाइल और डेटा) भी स्वयं उपलब्ध कराने चाहिए। फिलहाल यह राहत तकनीकी रूप से याचिकाकर्ता तक सीमित है, लेकिन आने वाली सुनवाई में होने वाला फैसला प्रदेश के हजारों शिक्षकों के भविष्य और कार्यप्रणाली की दिशा तय करेगा।
    user_Jarif Khan
    Jarif Khan
    Journalist सीतापुर, सरगुजा, छत्तीसगढ़•
    16 hrs ago
  • Banaras mein jitne bhi Ghat hai sabka Darshan kar lo dost log,,
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    Banaras mein  jitne bhi Ghat hai sabka Darshan kar lo dost log,,
    user_Dhanesh yadav
    Dhanesh yadav
    मैनपाट, सरगुजा, छत्तीसगढ़•
    2 hrs ago
  • Post by विवेक टेंट एंड साउंड बगीचा
    1
    Post by विवेक टेंट एंड साउंड बगीचा
    user_विवेक टेंट एंड साउंड बगीचा
    विवेक टेंट एंड साउंड बगीचा
    Tent House Supplier बगीचा, जशपुर, छत्तीसगढ़•
    2 hrs ago
  • लोकेश्वर महादेव शिवरात्रि मेला शांतिपूर्ण संपन्न बनगांव बी में महाशिवरात्रि के अवसर पर आयोजित भव्य मेले में हजारों श्रद्धालु शामिल हुए। पत्थलगांव विधायक गोमती साय ने मंदिर विकास के लिए 20 लाख रुपये की घोषणा की। ग्राम प्रतिनिधियों ने भी समिति को आर्थिक सहयोग देने की घोषणा की, वहीं बागबहार पुलिस की मुस्तैदी से कार्यक्रम शांतिपूर्ण रहा। 📍 बनगांव बी | जशपुर पूरी खबर देखें – Jashpur Times
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    लोकेश्वर महादेव शिवरात्रि मेला शांतिपूर्ण संपन्न
बनगांव बी में महाशिवरात्रि के अवसर पर आयोजित भव्य मेले में हजारों श्रद्धालु शामिल हुए। पत्थलगांव विधायक गोमती साय ने मंदिर विकास के लिए 20 लाख रुपये की घोषणा की।
ग्राम प्रतिनिधियों ने भी समिति को आर्थिक सहयोग देने की घोषणा की, वहीं बागबहार पुलिस की मुस्तैदी से कार्यक्रम शांतिपूर्ण रहा।
📍 बनगांव बी | जशपुर
पूरी खबर देखें – Jashpur Times
    user_Ibnul khan
    Ibnul khan
    Media house कांसबेल, जशपुर, छत्तीसगढ़•
    4 hrs ago
  • दिन प्रतिदिन ठगी सामने आ रही हैं की लोग कलेक्टर बन कर लोगों को ठग कर पैसा लिए जा रहे है आखिर ऐसे क्यू
    1
    दिन प्रतिदिन ठगी सामने आ रही हैं की लोग कलेक्टर बन कर लोगों को ठग कर पैसा लिए जा रहे है आखिर ऐसे क्यू
    user_हमर जशपुर
    हमर जशपुर
    Bagicha, Jashpur•
    9 hrs ago
  • Post by ANGAD YADAV
    1
    Post by ANGAD YADAV
    user_ANGAD YADAV
    ANGAD YADAV
    सन्ना, जशपुर, छत्तीसगढ़•
    6 hrs ago
  • अंबिकापुर | 18 फरवरी 2026 सरगुजा जिले के थाना गांधीनगर क्षेत्र में सूने मकान से हुई चोरी के मामले में पुलिस ने बड़ी कार्रवाई करते हुए खरीददार आरोपी सहित कुल चार आरोपियों को गिरफ्तार किया है। आरोपियों के कब्जे से सोने-चांदी के जेवरात समेत लगभग 1 लाख 30 हजार रुपये का सामान जब्त किया गया है। पुलिस के अनुसार, प्रार्थी अनिल कुमार दास परिवार सहित बाहर दर्शन पर गए थे, इसी दौरान अज्ञात चोरों ने उनके घर का ताला तोड़कर चोरी की वारदात को अंजाम दिया। प्रकरण दर्ज कर विवेचना के दौरान पुलिस ने तीन आरोपियों को हिरासत में लेकर पूछताछ की, जिन्होंने चोरी करना स्वीकार किया। उनकी निशानदेही पर चोरी का सामान बरामद किया गया। जांच में सामने आया कि चोरी किए गए जेवर अंबिकापुर के एक सर्राफा व्यापारी को बेचे गए थे। इसके बाद जेवर खरीदने वाले दुकानदार को भी गिरफ्तार किया गया। सभी आरोपियों को न्यायिक अभिरक्षा में भेज दिया गया है।
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    अंबिकापुर | 18 फरवरी 2026
सरगुजा जिले के थाना गांधीनगर क्षेत्र में सूने मकान से हुई चोरी के मामले में पुलिस ने बड़ी कार्रवाई करते हुए खरीददार आरोपी सहित कुल चार आरोपियों को गिरफ्तार किया है। आरोपियों के कब्जे से सोने-चांदी के जेवरात समेत लगभग 1 लाख 30 हजार रुपये का सामान जब्त किया गया है।
पुलिस के अनुसार, प्रार्थी अनिल कुमार दास परिवार सहित बाहर दर्शन पर गए थे, इसी दौरान अज्ञात चोरों ने उनके घर का ताला तोड़कर चोरी की वारदात को अंजाम दिया। प्रकरण दर्ज कर विवेचना के दौरान पुलिस ने तीन आरोपियों को हिरासत में लेकर पूछताछ की, जिन्होंने चोरी करना स्वीकार किया। उनकी निशानदेही पर चोरी का सामान बरामद किया गया।
जांच में सामने आया कि चोरी किए गए जेवर अंबिकापुर के एक सर्राफा व्यापारी को बेचे गए थे। इसके बाद जेवर खरीदने वाले दुकानदार को भी गिरफ्तार किया गया। सभी आरोपियों को न्यायिक अभिरक्षा में भेज दिया गया है।
    user_Sunil Gupta
    Sunil Gupta
    पत्रकार सीतापुर, सरगुजा, छत्तीसगढ़•
    14 hrs ago
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