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थाने के अंदर ही भिड़ गए दो सिपाही! कुर्सी से उठाकर जमीन पर पटका, जमकर हुई मारपीट; VIDEO वायरल होते ही दोनों लाइन हाजिर बाराबंकी। अनुशासन के लिए पहचाने जाने वाले पुलिस विभाग से जुड़ा एक सीसीटीवी फुटेज सामने आने के बाद हड़कंप मच गया। बड्डूपुर थाने के कार्यालय के अंदर दो सिपाहियों के बीच जमकर मारपीट हुई। मामला पुलिस अधीक्षक तक पहुंचा तो दोनों सिपाहियों को लाइन हाजिर कर दिया गया। साथ ही विभागीय जांच शुरू कर दी गई है। जानकारी के मुताबिक, सामने आया सीसीटीवी फुटेज करीब 20 दिन पुराना बताया जा रहा है। वीडियो बड्डूपुर थाना कार्यालय के अंदर का है। फुटेज में दिखाई दे रहा है कि एक सिपाही कार्यालय में कुर्सी पर बैठे दूसरे सिपाही के पास पहुंचता है और अचानक उसे जमीन पर गिराकर मारपीट शुरू कर देता है। देखते ही देखते दोनों के बीच हाथापाई होने लगती है। थाने में मौजूद अन्य पुलिसकर्मियों ने किसी तरह दोनों को अलग कराया। घटना की जानकारी पुलिस अधीक्षक अर्पित विजयवर्गीय तक पहुंचने के बाद दोनों सिपाहियों हरि बाबू और अमरीश कुमार को लाइन हाजिर कर दिया गया। बताया जा रहा है कि दोनों सिपाहियों का पहले ही बड्डूपुर थाने से अन्यत्र स्थानांतरण किया जा चुका था। वहीं, थानाध्यक्ष मनोज सोनकर ने बताया कि दोनों सिपाहियों को लाइन हाजिर कर दिया गया है और मामले की विभागीय जांच शुरू कर दी गई है।

21 hrs ago
user_फखरे आलम
फखरे आलम
नवाबगंज, बाराबंकी, उत्तर प्रदेश•
21 hrs ago

थाने के अंदर ही भिड़ गए दो सिपाही! कुर्सी से उठाकर जमीन पर पटका, जमकर हुई मारपीट; VIDEO वायरल होते ही दोनों लाइन हाजिर बाराबंकी। अनुशासन के लिए पहचाने जाने वाले पुलिस विभाग से जुड़ा एक सीसीटीवी फुटेज सामने आने के बाद हड़कंप मच गया। बड्डूपुर थाने के कार्यालय के अंदर दो सिपाहियों के बीच जमकर मारपीट हुई। मामला पुलिस अधीक्षक तक पहुंचा तो दोनों सिपाहियों को लाइन हाजिर कर दिया गया। साथ ही विभागीय जांच शुरू कर दी गई है। जानकारी के मुताबिक, सामने आया सीसीटीवी फुटेज करीब 20 दिन पुराना बताया जा रहा है। वीडियो बड्डूपुर थाना कार्यालय के अंदर का है। फुटेज में दिखाई दे रहा है कि एक सिपाही कार्यालय में कुर्सी पर बैठे दूसरे सिपाही के पास पहुंचता है और अचानक उसे जमीन पर गिराकर मारपीट शुरू कर देता है। देखते ही देखते दोनों के बीच हाथापाई होने लगती है। थाने में मौजूद अन्य पुलिसकर्मियों ने किसी तरह दोनों को अलग कराया। घटना की जानकारी पुलिस अधीक्षक अर्पित विजयवर्गीय तक पहुंचने के बाद दोनों सिपाहियों हरि बाबू और अमरीश कुमार को लाइन हाजिर कर दिया गया। बताया जा रहा है कि दोनों सिपाहियों का पहले ही बड्डूपुर थाने से अन्यत्र स्थानांतरण किया जा चुका था। वहीं, थानाध्यक्ष मनोज सोनकर ने बताया कि दोनों सिपाहियों को लाइन हाजिर कर दिया गया है और मामले की विभागीय जांच शुरू कर दी गई है।

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  • Agarwal  Tringel News Lucknow  8574663222 हिन्दी दिवस  एवं गणपति जन्मोत्सव पर डॉ. विद्यासागर उपाध्याय की दो कृतियों का भव्य लोकार्पण लखनऊ, 14 सितंबर। हिन्दी दिवस के अवसर पर उत्तर प्रदेश प्रेस क्लब, कैसरबाग, लखनऊ में 24 ग्रंथों के रचनाकार, चिंतक एवं साहित्यकार डॉ. विद्यासागर उपाध्याय की दो बहुचर्चित कृतियों—‘संक्रान्ति का संहार’ एवं ‘काल यात्रा : वेद से बर्लिन तक’—का भव्य लोकार्पण हुआ। इस अवसर पर आयोजित साहित्यिक परिचर्चा में इतिहास, भारतीय ज्ञान-परंपरा, सांस्कृतिक चेतना और आधुनिक विश्व के संदर्भ में साहित्य की भूमिका पर गंभीर विमर्श हुआ।   उत्तर प्रदेश प्रेस क्लब के खचाखच भरे‌ हाल में पेशवा बाजीराव के वंशज एवं कार्यक्रम के मुख्य अतिथि श्रीमंत राजराजेश्वर प्रभाकर नारायणराव पेशवा ने कहा कि डॉ. विद्यासागर उपाध्याय ने ‘संक्रान्ति का संहार’ के माध्यम से इतिहास के उस महत्वपूर्ण अध्याय को साहित्य के केंद्र में लाने का उल्लेखनीय कार्य किया है, जिससे पेशवा परिवार और उनके पूर्वजों की गौरवशाली ऐतिहासिक परंपरा भी गहराई से जुड़ी हुई है। उन्होंने कहा कि इतिहास के किसी व्यक्तित्व या वंश का उल्लेख इतिहास-ग्रंथों में होना एक बात है, लेकिन साहित्यकार अपनी लेखनी के माध्यम से जब उन पात्रों को संवेदना, संघर्ष और मानवीय संदर्भों के साथ समाज के सामने पुनः उपस्थित करता है, तो वह उन्हें जनस्मृति में पुनर्जीवित करने का कार्य करता है। पेशवा ने इस बात के लिए डॉ. विद्यासागर उपाध्याय के प्रति विशेष आभार व्यक्त किया कि उन्होंने अपनी लेखनी के माध्यम से उनके पूर्वजों और पेशवा परंपरा से जुड़े ऐतिहासिक पात्रों को वर्तमान समाज के सामने पुनः प्रस्तुत किया। उन्होंने डॉ. उपाध्याय की दोनों कृतियों के लिए शुभकामनाएँ देते हुए कहा कि उनकी लेखनी इतिहास और संस्कृति के उन पक्षों को समाज के सामने लाने का कार्य कर रही है, जिन पर आज गंभीर और व्यापक संवाद की आवश्यकता है। मुख्य वक्ता एवं आलोचक डॉ. रिंकी ‘मणिकर्णिका’ ने डॉ. विद्यासागर उपाध्याय के ऐतिहासिक कथा-लेखन की प्रक्रिया, उनकी रचनात्मक दृष्टि और लेखकीय साधना पर विस्तार से प्रकाश डालते हुए कहा कि ऐतिहासिक लेखन केवल घटनाओं और तिथियों को क्रमबद्ध कर देने का नाम नहीं है। इसके पीछे वर्षों का अध्ययन, ऐतिहासिक स्रोतों की खोज और पड़ताल, संदर्भों का सूक्ष्म परीक्षण, पात्रों की मानसिकता को समझना, तत्कालीन सामाजिक-राजनीतिक परिवेश का पुनर्निर्माण और इन समस्त तथ्यों को साहित्यिक संवेदना में रूपांतरित करने की कठिन साधना होती है। उन्होंने कहा कि ‘संक्रान्ति का संहार’ के पीछे डॉ. उपाध्याय की दीर्घकालिक अध्ययनशीलता, शोध-दृष्टि और लेखकीय परिश्रम स्पष्ट दिखाई देता है। ऐतिहासिक उपन्यास की सबसे बड़ी चुनौती यही है कि इतिहास की तथ्यात्मक विश्वसनीयता अक्षुण्ण रखते हुए कथा में ऐसा प्राण फूँका जाए कि पाठक केवल इतिहास पढ़े नहीं, बल्कि उसे घटित होते हुए अनुभव करे। डॉ. उपाध्याय इतिहास और साहित्य के बीच इसी जीवंत सेतु का निर्माण करते दिखाई देते हैं। ख्यातिलब्ध कथाकार महेन्द्र भीष्म ने विशेष रूप से आचार्य चतुरसेन शास्त्री की ऐतिहासिक उपन्यास परंपरा का उल्लेख करते हुए कहा कि हिन्दी साहित्य में इतिहास को विराट कथात्मकता, शोध और मानवीय संवेदना के साथ प्रस्तुत करने की जिस समृद्ध परंपरा को आचार्य चतुरसेन शास्त्री ने ऊँचाई प्रदान की, डॉ. विद्यासागर उपाध्याय उसी परंपरा को अपने समय की आवश्यकताओं और अपनी विशिष्ट वैचारिक दृष्टि के साथ आगे बढ़ाने का गंभीर प्रयास कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि चतुरसेन की परंपरा को आगे बढ़ाने का अर्थ केवल ऐतिहासिक विषयों को चुन लेना नहीं है। इसके लिए इतिहास के भीतर छिपे मनुष्य, समाज, सत्ता, संस्कृति, सभ्यता और संघर्ष के प्रश्नों को साहित्यिक गहराई के साथ पकड़ना आवश्यक है। डॉ. उपाध्याय की रचनाओं में यह प्रयास स्पष्ट रूप से दिखाई देता है।         बीज वक्ता डॉ. जयप्रकाश तिवारी ने कहा कि डॉ. विद्यासागर उपाध्याय का उपन्यास ‘संक्रांति का संहार’ केवल पानीपत के तृतीय युद्ध की ऐतिहासिक गाथा नहीं, बल्कि इतिहास का सांस्कृतिक पुनर्मूल्यांकन है। उन्होंने विट्ठल, कल्याणी, माधव और वेणी जैसे पात्रों को इतिहास के उन गुमनाम नायकों का प्रतीक बताया, जिनके त्याग, व्रत, कला, संस्कार और बलिदान से राष्ट्र और स्वराज्य की नींव निर्मित होती है। उन्होंने ‘तमस’ और ‘उसने कहा था’ के युगबोध से इसकी तुलना करते हुए कहा कि जहाँ ‘तमस’ तटस्थता और सांस्कृतिक विघटन की चेतावनी देता है तथा ‘उसने कहा था’ वचन और व्यक्तिगत त्याग का आदर्श प्रस्तुत करता है, वहीं ‘संक्रांति का संहार’ सामूहिक राष्ट्रबोध, सांस्कृतिक अस्मिता और स्वराज्य के लिए व्रत एवं बलिदान का संदेश देता है। डॉ. तिवारी के अनुसार पानीपत यहाँ अंत नहीं, बल्कि एक युग की संक्रांति और नए युग के जन्म का प्रतीक है; इसलिए यह कृति साहित्यिक उपन्यास से आगे बढ़कर सांस्कृतिक चेतना, इतिहास-बोध और राष्ट्रधर्म का पुनर्स्मरण कराने वाला महत्वपूर्ण ग्रंथ है। उन्होंने इसे प्रत्येक घर में पढ़े और मनन किए जाने योग्य बताते हुए डॉ. विद्यासागर उपाध्याय को इस उच्चकोटि की साहित्यिक सृष्टि के लिए बधाई और साधुवाद दिया।  पूर्व मुख्य चिकित्साधिकारी एवं साहित्यकार डॉ. अनिल मिश्र ने ‘काल यात्रा : वेद से बर्लिन तक’ को भारतीय ज्ञान-परंपरा और आधुनिक विश्व के बीच का सेतु बताते हुए कहा कि आज ऐतिहासिक लेखन के सामने सबसे बड़ी चुनौती इतिहास को न तो रूखा अकादमिक विवरण बनने देना है और न ही उसे कल्पना का ऐसा आख्यान बना देना है जिसमें इतिहास की विश्वसनीयता ही समाप्त हो जाए। इन दोनों के बीच संतुलन स्थापित करना ऐतिहासिक साहित्य की वास्तविक कसौटी है और डॉ. विद्यासागर उपाध्याय की लेखकीय दृष्टि इस चुनौती को साधने की दिशा में गंभीर एवं उल्लेखनीय प्रयास है। डॉ. उपाध्याय अतीत को वर्तमान से काटकर नहीं देखते। उनकी दृष्टि में अतीत केवल बीता हुआ समय नहीं, बल्कि वर्तमान की चेतना और भविष्य की दिशा को समझने का आधार है। साहित्य उस अतीत और वर्तमान के बीच संवाद स्थापित करने का सबसे संवेदनशील माध्यम है। ‘संक्रान्ति का संहार’ और ‘काल यात्रा : वेद से बर्लिन तक’ दोनों कृतियाँ अलग-अलग विधागत धरातल पर इसी वैचारिक दृष्टि को अभिव्यक्त करती हैं। डॉ. उपाध्याय की लेखन-पद्धति में इतिहास महज पृष्ठभूमि बनकर नहीं रहता, बल्कि कथा का सक्रिय और जीवंत तत्व बन जाता है। घटनाओं के साथ तत्कालीन राजनीतिक मनःस्थिति, सामाजिक संरचना, मानवीय मनोविज्ञान, सत्ता-संघर्ष और सभ्यतागत द्वंद्व को समझने की उनकी कोशिश उनकी रचनात्मक दृष्टि को विशिष्ट बनाती है। यही वह बिंदु है जहाँ इतिहास महज विवरण न रहकर साहित्य में रूपांतरित होता है। डॉ नरेन्द्र भूषण ने‌ हिन्दी दिवस को लक्षित करते हुए हिन्दी को बोलने व लेखन में प्राथमिकता के साथ अपनाने पर बल दिया कार्यक्रम में उमेश चन्द्र दुबे, सुशील कुमार वर्मा, कुमार तरल, राजेश सिंह 'श्रेयश', डॉ इंद्रजीत तिवारी निर्भीक, डॉ ओमप्रकाश द्विवेदी, राजीव वत्सल, करुणानिधि तिवारी, डॉ विजय प्रताप आर्य, डॉ आर वी एन पाण्डेय, डॉ अनिल कुमार तिवारी,  विनोद शंकर शुक्ल, देवकीनन्दन शान्त, डॉ स्मिता मिश्रा, बलवन्त सिंह, केशरी प्रसाद शुक्ल, पंकज कृष्ण, सरोज आर्यावर्ती, मन मोहन बाराकोटी, सुरभि सिंह, पी एस सुनील अय्यर, कन्हैया लाल, सोनी शुक्ल, कुॅंवर वीर सिंह मार्तण्ड, डॉ योगेश, मंजू सक्सेना, विनय कुमार मिश्र, संजीव श्रीवास्तव, जलदूत नन्द किशोर वर्मा, रविशंकर श्रीवास्तव, प्रमोद श्रीवास्तव, आनंद सिंह, राहुल पाण्डेय, शिव नाथ सिंह, वेद प्रकाश द्विवेदी, राम लखन वर्मा, वीरेंद्र प्रताप यादव, जितेंद्र शर्मा, हिमांशु सक्सेना, राजेश यादव, रामसुतार सिंह, रोनित पाण्डेय आदि गणमान्य लोग उपस्थित रहे। कार्यक्रम के अध्यक्ष निर्भय नारायण गुप्त द्वारा अपने अध्यक्षीय वक्तव्य में डॉ विद्या सागर उपाध्याय की कृतियों को साहित्य की उपलब्धि बताते हुए  ऐतिहासिक तथ्यों को जनमानस के सम्मुख लाने पर बल दिया। उन्होंने साहित्यकारों का आह्वान किया कि आज साहित्य को लोक मंगल एवं राष्ट्र मंगल के भावों के साथ सृजित किये‌ जाने की आवश्यकता है। कार्यक्रम का सुरुचिपूर्ण संचालन विदुषी डॉ. ममता पंकज ने किया। अंत में सुप्रसिद्ध साहित्यकार  सीमा मधुरिमा ने समस्त अभ्यागतों के प्रति आभार व्यक्त किया। Sanjay Agarwal  Tringel News Lucknow  8574663222                  Sanjay Agarwal  Tringel News Lucknow  8574663222 हिन्दी दिवस  एवं गणपति जन्मोत्सव पर डॉ. विद्यासागर उपाध्याय की दो कृतियों का भव्य लोकार्पण लखनऊ, 14 सितंबर। हिन्दी दिवस के अवसर पर उत्तर प्रदेश प्रेस क्लब, कैसरबाग, लखनऊ में 24 ग्रंथों के रचनाकार, चिंतक एवं साहित्यकार डॉ. विद्यासागर उपाध्याय की दो बहुचर्चित कृतियों—‘संक्रान्ति का संहार’ एवं ‘काल यात्रा : वेद से बर्लिन तक’—का भव्य लोकार्पण हुआ। इस अवसर पर आयोजित साहित्यिक परिचर्चा में इतिहास, भारतीय ज्ञान-परंपरा, सांस्कृतिक चेतना और आधुनिक विश्व के संदर्भ में साहित्य की भूमिका पर गंभीर विमर्श हुआ। उत्तर प्रदेश प्रेस क्लब के खचाखच भरे‌ हाल में पेशवा बाजीराव के वंशज एवं कार्यक्रम के मुख्य अतिथि श्रीमंत राजराजेश्वर प्रभाकर नारायणराव पेशवा ने कहा कि डॉ. विद्यासागर उपाध्याय ने ‘संक्रान्ति का संहार’ के माध्यम से इतिहास के उस महत्वपूर्ण अध्याय को साहित्य के केंद्र में लाने का उल्लेखनीय कार्य किया है, जिससे पेशवा परिवार और उनके पूर्वजों की गौरवशाली ऐतिहासिक परंपरा भी गहराई से जुड़ी हुई है। उन्होंने कहा कि इतिहास के किसी व्यक्तित्व या वंश का उल्लेख इतिहास-ग्रंथों में होना एक बात है, लेकिन साहित्यकार अपनी लेखनी के माध्यम से जब उन पात्रों को संवेदना, संघर्ष और मानवीय संदर्भों के साथ समाज के सामने पुनः उपस्थित करता है, तो वह उन्हें जनस्मृति में पुनर्जीवित करने का कार्य करता है। पेशवा ने इस बात के लिए डॉ. विद्यासागर उपाध्याय के प्रति विशेष आभार व्यक्त किया कि उन्होंने अपनी लेखनी के माध्यम से उनके पूर्वजों और पेशवा परंपरा से जुड़े ऐतिहासिक पात्रों को वर्तमान समाज के सामने पुनः प्रस्तुत किया। उन्होंने डॉ. उपाध्याय की दोनों कृतियों के लिए शुभकामनाएँ देते हुए कहा कि उनकी लेखनी इतिहास और संस्कृति के उन पक्षों को समाज के सामने लाने का कार्य कर रही है, जिन पर आज गंभीर और व्यापक संवाद की आवश्यकता है। मुख्य वक्ता एवं आलोचक डॉ. रिंकी ‘मणिकर्णिका’ ने डॉ. विद्यासागर उपाध्याय के ऐतिहासिक कथा-लेखन की प्रक्रिया, उनकी रचनात्मक दृष्टि और लेखकीय साधना पर विस्तार से प्रकाश डालते हुए कहा कि ऐतिहासिक लेखन केवल घटनाओं और तिथियों को क्रमबद्ध कर देने का नाम नहीं है। इसके पीछे वर्षों का अध्ययन, ऐतिहासिक स्रोतों की खोज और पड़ताल, संदर्भों का सूक्ष्म परीक्षण, पात्रों की मानसिकता को समझना, तत्कालीन सामाजिक-राजनीतिक परिवेश का पुनर्निर्माण और इन समस्त तथ्यों को साहित्यिक संवेदना में रूपांतरित करने की कठिन साधना होती है। उन्होंने कहा कि ‘संक्रान्ति का संहार’ के पीछे डॉ. उपाध्याय की दीर्घकालिक अध्ययनशीलता, शोध-दृष्टि और लेखकीय परिश्रम स्पष्ट दिखाई देता है। ऐतिहासिक उपन्यास की सबसे बड़ी चुनौती यही है कि इतिहास की तथ्यात्मक विश्वसनीयता अक्षुण्ण रखते हुए कथा में ऐसा प्राण फूँका जाए कि पाठक केवल इतिहास पढ़े नहीं, बल्कि उसे घटित होते हुए अनुभव करे। डॉ. उपाध्याय इतिहास और साहित्य के बीच इसी जीवंत सेतु का निर्माण करते दिखाई देते हैं। ख्यातिलब्ध कथाकार महेन्द्र भीष्म ने विशेष रूप से आचार्य चतुरसेन शास्त्री की ऐतिहासिक उपन्यास परंपरा का उल्लेख करते हुए कहा कि हिन्दी साहित्य में इतिहास को विराट कथात्मकता, शोध और मानवीय संवेदना के साथ प्रस्तुत करने की जिस समृद्ध परंपरा को आचार्य चतुरसेन शास्त्री ने ऊँचाई प्रदान की, डॉ. विद्यासागर उपाध्याय उसी परंपरा को अपने समय की आवश्यकताओं और अपनी विशिष्ट वैचारिक दृष्टि के साथ आगे बढ़ाने का गंभीर प्रयास कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि चतुरसेन की परंपरा को आगे बढ़ाने का अर्थ केवल ऐतिहासिक विषयों को चुन लेना नहीं है। इसके लिए इतिहास के भीतर छिपे मनुष्य, समाज, सत्ता, संस्कृति, सभ्यता और संघर्ष के प्रश्नों को साहित्यिक गहराई के साथ पकड़ना आवश्यक है। डॉ. उपाध्याय की रचनाओं में यह प्रयास स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। बीज वक्ता डॉ. जयप्रकाश तिवारी ने कहा कि डॉ. विद्यासागर उपाध्याय का उपन्यास ‘संक्रांति का संहार’ केवल पानीपत के तृतीय युद्ध की ऐतिहासिक गाथा नहीं, बल्कि इतिहास का सांस्कृतिक पुनर्मूल्यांकन है। उन्होंने विट्ठल, कल्याणी, माधव और वेणी जैसे पात्रों को इतिहास के उन गुमनाम नायकों का प्रतीक बताया, जिनके त्याग, व्रत, कला, संस्कार और बलिदान से राष्ट्र और स्वराज्य की नींव निर्मित होती है। उन्होंने ‘तमस’ और ‘उसने कहा था’ के युगबोध से इसकी तुलना करते हुए कहा कि जहाँ ‘तमस’ तटस्थता और सांस्कृतिक विघटन की चेतावनी देता है तथा ‘उसने कहा था’ वचन और व्यक्तिगत त्याग का आदर्श प्रस्तुत करता है, वहीं ‘संक्रांति का संहार’ सामूहिक राष्ट्रबोध, सांस्कृतिक अस्मिता और स्वराज्य के लिए व्रत एवं बलिदान का संदेश देता है। डॉ. तिवारी के अनुसार पानीपत यहाँ अंत नहीं, बल्कि एक युग की संक्रांति और नए युग के जन्म का प्रतीक है; इसलिए यह कृति साहित्यिक उपन्यास से आगे बढ़कर सांस्कृतिक चेतना, इतिहास-बोध और राष्ट्रधर्म का पुनर्स्मरण कराने वाला महत्वपूर्ण ग्रंथ है। उन्होंने इसे प्रत्येक घर में पढ़े और मनन किए जाने योग्य बताते हुए डॉ. विद्यासागर उपाध्याय को इस उच्चकोटि की साहित्यिक सृष्टि के लिए बधाई और साधुवाद दिया। पूर्व मुख्य चिकित्साधिकारी एवं साहित्यकार डॉ. अनिल मिश्र ने ‘काल यात्रा : वेद से बर्लिन तक’ को भारतीय ज्ञान-परंपरा और आधुनिक विश्व के बीच का सेतु बताते हुए कहा कि आज ऐतिहासिक लेखन के सामने सबसे बड़ी चुनौती इतिहास को न तो रूखा अकादमिक विवरण बनने देना है और न ही उसे कल्पना का ऐसा आख्यान बना देना है जिसमें इतिहास की विश्वसनीयता ही समाप्त हो जाए। इन दोनों के बीच संतुलन स्थापित करना ऐतिहासिक साहित्य की वास्तविक कसौटी है और डॉ. विद्यासागर उपाध्याय की लेखकीय दृष्टि इस चुनौती को साधने की दिशा में गंभीर एवं उल्लेखनीय प्रयास है। डॉ. उपाध्याय अतीत को वर्तमान से काटकर नहीं देखते। उनकी दृष्टि में अतीत केवल बीता हुआ समय नहीं, बल्कि वर्तमान की चेतना और भविष्य की दिशा को समझने का आधार है। साहित्य उस अतीत और वर्तमान के बीच संवाद स्थापित करने का सबसे संवेदनशील माध्यम है। ‘संक्रान्ति का संहार’ और ‘काल यात्रा : वेद से बर्लिन तक’ दोनों कृतियाँ अलग-अलग विधागत धरातल पर इसी वैचारिक दृष्टि को अभिव्यक्त करती हैं। डॉ. उपाध्याय की लेखन-पद्धति में इतिहास महज पृष्ठभूमि बनकर नहीं रहता, बल्कि कथा का सक्रिय और जीवंत तत्व बन जाता है। घटनाओं के साथ तत्कालीन राजनीतिक मनःस्थिति, सामाजिक संरचना, मानवीय मनोविज्ञान, सत्ता-संघर्ष और सभ्यतागत द्वंद्व को समझने की उनकी कोशिश उनकी रचनात्मक दृष्टि को विशिष्ट बनाती है। यही वह बिंदु है जहाँ इतिहास महज विवरण न रहकर साहित्य में रूपांतरित होता है। डॉ नरेन्द्र भूषण ने‌ हिन्दी दिवस को लक्षित करते हुए हिन्दी को बोलने व लेखन में प्राथमिकता के साथ अपनाने पर बल दिया कार्यक्रम में उमेश चन्द्र दुबे, सुशील कुमार वर्मा, कुमार तरल, राजेश सिंह 'श्रेयश', डॉ इंद्रजीत तिवारी निर्भीक, डॉ ओमप्रकाश द्विवेदी, राजीव वत्सल, करुणानिधि तिवारी, डॉ विजय प्रताप आर्य, डॉ आर वी एन पाण्डेय, डॉ अनिल कुमार तिवारी,  विनोद शंकर शुक्ल, देवकीनन्दन शान्त, डॉ स्मिता मिश्रा, बलवन्त सिंह, केशरी प्रसाद शुक्ल, पंकज कृष्ण, सरोज आर्यावर्ती, मन मोहन बाराकोटी, सुरभि सिंह, पी एस सुनील अय्यर, कन्हैया लाल, सोनी शुक्ल, कुॅंवर वीर सिंह मार्तण्ड, डॉ योगेश, मंजू सक्सेना, विनय कुमार मिश्र, संजीव श्रीवास्तव, जलदूत नन्द किशोर वर्मा, रविशंकर श्रीवास्तव, प्रमोद श्रीवास्तव, आनंद सिंह, राहुल पाण्डेय, शिव नाथ सिंह, वेद प्रकाश द्विवेदी, राम लखन वर्मा, वीरेंद्र प्रताप यादव, जितेंद्र शर्मा, हिमांशु सक्सेना, राजेश यादव, रामसुतार सिंह, रोनित पाण्डेय आदि गणमान्य लोग उपस्थित रहे। कार्यक्रम के अध्यक्ष निर्भय नारायण गुप्त द्वारा अपने अध्यक्षीय वक्तव्य में डॉ विद्या सागर उपाध्याय की कृतियों को साहित्य की उपलब्धि बताते हुए  ऐतिहासिक तथ्यों को जनमानस के सम्मुख लाने पर बल दिया। उन्होंने साहित्यकारों का आह्वान किया कि आज साहित्य को लोक मंगल एवं राष्ट्र मंगल के भावों के साथ सृजित किये‌ जाने की आवश्यकता है। कार्यक्रम का सुरुचिपूर्ण संचालन विदुषी डॉ. ममता पंकज ने किया। अंत में सुप्रसिद्ध साहित्यकार  सीमा मधुरिमा ने समस्त अभ्यागतों के प्रति आभार व्यक्त किया। Sanjay Agarwal  Tringel News Lucknow  8574663222
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हिन्दी दिवस  एवं गणपति जन्मोत्सव पर डॉ. विद्यासागर उपाध्याय की दो कृतियों का भव्य लोकार्पण

लखनऊ, 14 सितंबर। हिन्दी दिवस के अवसर पर उत्तर प्रदेश प्रेस क्लब, कैसरबाग, लखनऊ में 24 ग्रंथों के रचनाकार, चिंतक एवं साहित्यकार डॉ. विद्यासागर उपाध्याय की दो बहुचर्चित कृतियों—‘संक्रान्ति का संहार’ एवं ‘काल यात्रा : वेद से बर्लिन तक’—का भव्य लोकार्पण हुआ। इस अवसर पर आयोजित साहित्यिक परिचर्चा में इतिहास, भारतीय ज्ञान-परंपरा, सांस्कृतिक चेतना और आधुनिक विश्व के संदर्भ में साहित्य की भूमिका पर गंभीर विमर्श हुआ।

  उत्तर प्रदेश प्रेस क्लब के खचाखच भरे‌ हाल में पेशवा बाजीराव के वंशज एवं कार्यक्रम के मुख्य अतिथि श्रीमंत राजराजेश्वर प्रभाकर नारायणराव पेशवा ने कहा कि डॉ. विद्यासागर उपाध्याय ने ‘संक्रान्ति का संहार’ के माध्यम से इतिहास के उस महत्वपूर्ण अध्याय को साहित्य के केंद्र में लाने का उल्लेखनीय कार्य किया है, जिससे पेशवा परिवार और उनके पूर्वजों की गौरवशाली ऐतिहासिक परंपरा भी गहराई से जुड़ी हुई है। उन्होंने कहा कि इतिहास के किसी व्यक्तित्व या वंश का उल्लेख इतिहास-ग्रंथों में होना एक बात है, लेकिन साहित्यकार अपनी लेखनी के माध्यम से जब उन पात्रों को संवेदना, संघर्ष और मानवीय संदर्भों के साथ समाज के सामने पुनः उपस्थित करता है, तो वह उन्हें जनस्मृति में पुनर्जीवित करने का कार्य करता है। पेशवा ने इस बात के लिए डॉ. विद्यासागर उपाध्याय के प्रति विशेष आभार व्यक्त किया कि उन्होंने अपनी लेखनी के माध्यम से उनके पूर्वजों और पेशवा परंपरा से जुड़े ऐतिहासिक पात्रों को वर्तमान समाज के सामने पुनः प्रस्तुत किया। उन्होंने डॉ. उपाध्याय की दोनों कृतियों के लिए शुभकामनाएँ देते हुए कहा कि उनकी लेखनी इतिहास और संस्कृति के उन पक्षों को समाज के सामने लाने का कार्य कर रही है, जिन पर आज गंभीर और व्यापक संवाद की आवश्यकता है।

मुख्य वक्ता एवं आलोचक डॉ. रिंकी ‘मणिकर्णिका’ ने डॉ. विद्यासागर उपाध्याय के ऐतिहासिक कथा-लेखन की प्रक्रिया, उनकी रचनात्मक दृष्टि और लेखकीय साधना पर विस्तार से प्रकाश डालते हुए कहा कि ऐतिहासिक लेखन केवल घटनाओं और तिथियों को क्रमबद्ध कर देने का नाम नहीं है। इसके पीछे वर्षों का अध्ययन, ऐतिहासिक स्रोतों की खोज और पड़ताल, संदर्भों का सूक्ष्म परीक्षण, पात्रों की मानसिकता को समझना, तत्कालीन सामाजिक-राजनीतिक परिवेश का पुनर्निर्माण और इन समस्त तथ्यों को साहित्यिक संवेदना में रूपांतरित करने की कठिन साधना होती है। उन्होंने कहा कि ‘संक्रान्ति का संहार’ के पीछे डॉ. उपाध्याय की दीर्घकालिक अध्ययनशीलता, शोध-दृष्टि और लेखकीय परिश्रम स्पष्ट दिखाई देता है। ऐतिहासिक उपन्यास की सबसे बड़ी चुनौती यही है कि इतिहास की तथ्यात्मक विश्वसनीयता अक्षुण्ण रखते हुए कथा में ऐसा प्राण फूँका जाए कि पाठक केवल इतिहास पढ़े नहीं, बल्कि उसे घटित होते हुए अनुभव करे। डॉ. उपाध्याय इतिहास और साहित्य के बीच इसी जीवंत सेतु का निर्माण करते दिखाई देते हैं।

ख्यातिलब्ध कथाकार महेन्द्र भीष्म ने विशेष रूप से आचार्य चतुरसेन शास्त्री की ऐतिहासिक उपन्यास परंपरा का उल्लेख करते हुए कहा कि हिन्दी साहित्य में इतिहास को विराट कथात्मकता, शोध और मानवीय संवेदना के साथ प्रस्तुत करने की जिस समृद्ध परंपरा को आचार्य चतुरसेन शास्त्री ने ऊँचाई प्रदान की, डॉ. विद्यासागर उपाध्याय उसी परंपरा को अपने समय की आवश्यकताओं और अपनी विशिष्ट वैचारिक दृष्टि के साथ आगे बढ़ाने का गंभीर प्रयास कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि चतुरसेन की परंपरा को आगे बढ़ाने का अर्थ केवल ऐतिहासिक विषयों को चुन लेना नहीं है। इसके लिए इतिहास के भीतर छिपे मनुष्य, समाज, सत्ता, संस्कृति, सभ्यता और संघर्ष के प्रश्नों को साहित्यिक गहराई के साथ पकड़ना आवश्यक है। डॉ. उपाध्याय की रचनाओं में यह प्रयास स्पष्ट रूप से दिखाई देता है।


        बीज वक्ता डॉ. जयप्रकाश तिवारी ने कहा कि डॉ. विद्यासागर उपाध्याय का उपन्यास ‘संक्रांति का संहार’ केवल पानीपत के तृतीय युद्ध की ऐतिहासिक गाथा नहीं, बल्कि इतिहास का सांस्कृतिक पुनर्मूल्यांकन है। उन्होंने विट्ठल, कल्याणी, माधव और वेणी जैसे पात्रों को इतिहास के उन गुमनाम नायकों का प्रतीक बताया, जिनके त्याग, व्रत, कला, संस्कार और बलिदान से राष्ट्र और स्वराज्य की नींव निर्मित होती है। उन्होंने ‘तमस’ और ‘उसने कहा था’ के युगबोध से इसकी तुलना करते हुए कहा कि जहाँ ‘तमस’ तटस्थता और सांस्कृतिक विघटन की चेतावनी देता है तथा ‘उसने कहा था’ वचन और व्यक्तिगत त्याग का आदर्श प्रस्तुत करता है, वहीं ‘संक्रांति का संहार’ सामूहिक राष्ट्रबोध, सांस्कृतिक अस्मिता और स्वराज्य के लिए व्रत एवं बलिदान का संदेश देता है। डॉ. तिवारी के अनुसार पानीपत यहाँ अंत नहीं, बल्कि एक युग की संक्रांति और नए युग के जन्म का प्रतीक है; इसलिए यह कृति साहित्यिक उपन्यास से आगे बढ़कर सांस्कृतिक चेतना, इतिहास-बोध और राष्ट्रधर्म का पुनर्स्मरण कराने वाला महत्वपूर्ण ग्रंथ है। उन्होंने इसे प्रत्येक घर में पढ़े और मनन किए जाने योग्य बताते हुए डॉ. विद्यासागर उपाध्याय को इस उच्चकोटि की साहित्यिक सृष्टि के लिए बधाई और साधुवाद दिया।

 पूर्व मुख्य चिकित्साधिकारी एवं साहित्यकार डॉ. अनिल मिश्र ने ‘काल यात्रा : वेद से बर्लिन तक’ को भारतीय ज्ञान-परंपरा और आधुनिक विश्व के बीच का सेतु बताते हुए कहा कि आज ऐतिहासिक लेखन के सामने सबसे बड़ी चुनौती इतिहास को न तो रूखा अकादमिक विवरण बनने देना है और न ही उसे कल्पना का ऐसा आख्यान बना देना है जिसमें इतिहास की विश्वसनीयता ही समाप्त हो जाए। इन दोनों के बीच संतुलन स्थापित करना ऐतिहासिक साहित्य की वास्तविक कसौटी है और डॉ. विद्यासागर उपाध्याय की लेखकीय दृष्टि इस चुनौती को साधने की दिशा में गंभीर एवं उल्लेखनीय प्रयास है। डॉ. उपाध्याय अतीत को वर्तमान से काटकर नहीं देखते। उनकी दृष्टि में अतीत केवल बीता हुआ समय नहीं, बल्कि वर्तमान की चेतना और भविष्य की दिशा को समझने का आधार है। साहित्य उस अतीत और वर्तमान के बीच संवाद स्थापित करने का सबसे संवेदनशील माध्यम है। ‘संक्रान्ति का संहार’ और ‘काल यात्रा : वेद से बर्लिन तक’ दोनों कृतियाँ अलग-अलग विधागत धरातल पर इसी वैचारिक दृष्टि को अभिव्यक्त करती हैं। डॉ. उपाध्याय की लेखन-पद्धति में इतिहास महज पृष्ठभूमि बनकर नहीं रहता, बल्कि कथा का सक्रिय और जीवंत तत्व बन जाता है। घटनाओं के साथ तत्कालीन राजनीतिक मनःस्थिति, सामाजिक संरचना, मानवीय मनोविज्ञान, सत्ता-संघर्ष और सभ्यतागत द्वंद्व को समझने की उनकी कोशिश उनकी रचनात्मक दृष्टि को विशिष्ट बनाती है। यही वह बिंदु है जहाँ इतिहास महज विवरण न रहकर साहित्य में रूपांतरित होता है। डॉ नरेन्द्र भूषण ने‌ हिन्दी दिवस को लक्षित करते हुए हिन्दी को बोलने व लेखन में प्राथमिकता के साथ अपनाने पर बल दिया

कार्यक्रम में उमेश चन्द्र दुबे, सुशील कुमार वर्मा, कुमार तरल, राजेश सिंह 'श्रेयश', डॉ इंद्रजीत तिवारी निर्भीक, डॉ ओमप्रकाश द्विवेदी, राजीव वत्सल, करुणानिधि तिवारी, डॉ विजय प्रताप आर्य, डॉ आर वी एन पाण्डेय, डॉ अनिल कुमार तिवारी,  विनोद शंकर शुक्ल, देवकीनन्दन शान्त, डॉ स्मिता मिश्रा, बलवन्त सिंह, केशरी प्रसाद शुक्ल, पंकज कृष्ण, सरोज आर्यावर्ती, मन मोहन बाराकोटी, सुरभि सिंह, पी एस सुनील अय्यर, कन्हैया लाल, सोनी शुक्ल, कुॅंवर वीर सिंह मार्तण्ड, डॉ योगेश, मंजू सक्सेना, विनय कुमार मिश्र, संजीव श्रीवास्तव, जलदूत नन्द किशोर वर्मा, रविशंकर श्रीवास्तव, प्रमोद श्रीवास्तव, आनंद सिंह, राहुल पाण्डेय, शिव नाथ सिंह, वेद प्रकाश द्विवेदी, राम लखन वर्मा, वीरेंद्र प्रताप यादव, जितेंद्र शर्मा, हिमांशु सक्सेना, राजेश यादव, रामसुतार सिंह, रोनित पाण्डेय आदि गणमान्य लोग उपस्थित रहे।
कार्यक्रम के अध्यक्ष निर्भय नारायण गुप्त द्वारा अपने अध्यक्षीय वक्तव्य में डॉ विद्या सागर उपाध्याय की कृतियों को साहित्य की उपलब्धि बताते हुए  ऐतिहासिक तथ्यों को जनमानस के सम्मुख लाने पर बल दिया। उन्होंने साहित्यकारों का आह्वान किया कि आज साहित्य को लोक मंगल एवं राष्ट्र मंगल के भावों के साथ सृजित किये‌ जाने की आवश्यकता है। कार्यक्रम का सुरुचिपूर्ण संचालन विदुषी डॉ. ममता पंकज ने किया। अंत में सुप्रसिद्ध साहित्यकार  सीमा मधुरिमा ने समस्त अभ्यागतों के प्रति आभार व्यक्त किया।

Sanjay Agarwal 

Tringel News Lucknow 

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Sanjay Agarwal 
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हिन्दी दिवस  एवं गणपति जन्मोत्सव पर डॉ. विद्यासागर उपाध्याय की दो कृतियों का भव्य लोकार्पण
लखनऊ, 14 सितंबर। हिन्दी दिवस के अवसर पर उत्तर प्रदेश प्रेस क्लब, कैसरबाग, लखनऊ में 24 ग्रंथों के रचनाकार, चिंतक एवं साहित्यकार डॉ. विद्यासागर उपाध्याय की दो बहुचर्चित कृतियों—‘संक्रान्ति का संहार’ एवं ‘काल यात्रा : वेद से बर्लिन तक’—का भव्य लोकार्पण हुआ। इस अवसर पर आयोजित साहित्यिक परिचर्चा में इतिहास, भारतीय ज्ञान-परंपरा, सांस्कृतिक चेतना और आधुनिक विश्व के संदर्भ में साहित्य की भूमिका पर गंभीर विमर्श हुआ।
उत्तर प्रदेश प्रेस क्लब के खचाखच भरे‌ हाल में पेशवा बाजीराव के वंशज एवं कार्यक्रम के मुख्य अतिथि श्रीमंत राजराजेश्वर प्रभाकर नारायणराव पेशवा ने कहा कि डॉ. विद्यासागर उपाध्याय ने ‘संक्रान्ति का संहार’ के माध्यम से इतिहास के उस महत्वपूर्ण अध्याय को साहित्य के केंद्र में लाने का उल्लेखनीय कार्य किया है, जिससे पेशवा परिवार और उनके पूर्वजों की गौरवशाली ऐतिहासिक परंपरा भी गहराई से जुड़ी हुई है। उन्होंने कहा कि इतिहास के किसी व्यक्तित्व या वंश का उल्लेख इतिहास-ग्रंथों में होना एक बात है, लेकिन साहित्यकार अपनी लेखनी के माध्यम से जब उन पात्रों को संवेदना, संघर्ष और मानवीय संदर्भों के साथ समाज के सामने पुनः उपस्थित करता है, तो वह उन्हें जनस्मृति में पुनर्जीवित करने का कार्य करता है। पेशवा ने इस बात के लिए डॉ. विद्यासागर उपाध्याय के प्रति विशेष आभार व्यक्त किया कि उन्होंने अपनी लेखनी के माध्यम से उनके पूर्वजों और पेशवा परंपरा से जुड़े ऐतिहासिक पात्रों को वर्तमान समाज के सामने पुनः प्रस्तुत किया। उन्होंने डॉ. उपाध्याय की दोनों कृतियों के लिए शुभकामनाएँ देते हुए कहा कि उनकी लेखनी इतिहास और संस्कृति के उन पक्षों को समाज के सामने लाने का कार्य कर रही है, जिन पर आज गंभीर और व्यापक संवाद की आवश्यकता है।
मुख्य वक्ता एवं आलोचक डॉ. रिंकी ‘मणिकर्णिका’ ने डॉ. विद्यासागर उपाध्याय के ऐतिहासिक कथा-लेखन की प्रक्रिया, उनकी रचनात्मक दृष्टि और लेखकीय साधना पर विस्तार से प्रकाश डालते हुए कहा कि ऐतिहासिक लेखन केवल घटनाओं और तिथियों को क्रमबद्ध कर देने का नाम नहीं है। इसके पीछे वर्षों का अध्ययन, ऐतिहासिक स्रोतों की खोज और पड़ताल, संदर्भों का सूक्ष्म परीक्षण, पात्रों की मानसिकता को समझना, तत्कालीन सामाजिक-राजनीतिक परिवेश का पुनर्निर्माण और इन समस्त तथ्यों को साहित्यिक संवेदना में रूपांतरित करने की कठिन साधना होती है। उन्होंने कहा कि ‘संक्रान्ति का संहार’ के पीछे डॉ. उपाध्याय की दीर्घकालिक अध्ययनशीलता, शोध-दृष्टि और लेखकीय परिश्रम स्पष्ट दिखाई देता है। ऐतिहासिक उपन्यास की सबसे बड़ी चुनौती यही है कि इतिहास की तथ्यात्मक विश्वसनीयता अक्षुण्ण रखते हुए कथा में ऐसा प्राण फूँका जाए कि पाठक केवल इतिहास पढ़े नहीं, बल्कि उसे घटित होते हुए अनुभव करे। डॉ. उपाध्याय इतिहास और साहित्य के बीच इसी जीवंत सेतु का निर्माण करते दिखाई देते हैं।
ख्यातिलब्ध कथाकार महेन्द्र भीष्म ने विशेष रूप से आचार्य चतुरसेन शास्त्री की ऐतिहासिक उपन्यास परंपरा का उल्लेख करते हुए कहा कि हिन्दी साहित्य में इतिहास को विराट कथात्मकता, शोध और मानवीय संवेदना के साथ प्रस्तुत करने की जिस समृद्ध परंपरा को आचार्य चतुरसेन शास्त्री ने ऊँचाई प्रदान की, डॉ. विद्यासागर उपाध्याय उसी परंपरा को अपने समय की आवश्यकताओं और अपनी विशिष्ट वैचारिक दृष्टि के साथ आगे बढ़ाने का गंभीर प्रयास कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि चतुरसेन की परंपरा को आगे बढ़ाने का अर्थ केवल ऐतिहासिक विषयों को चुन लेना नहीं है। इसके लिए इतिहास के भीतर छिपे मनुष्य, समाज, सत्ता, संस्कृति, सभ्यता और संघर्ष के प्रश्नों को साहित्यिक गहराई के साथ पकड़ना आवश्यक है। डॉ. उपाध्याय की रचनाओं में यह प्रयास स्पष्ट रूप से दिखाई देता है।
बीज वक्ता डॉ. जयप्रकाश तिवारी ने कहा कि डॉ. विद्यासागर उपाध्याय का उपन्यास ‘संक्रांति का संहार’ केवल पानीपत के तृतीय युद्ध की ऐतिहासिक गाथा नहीं, बल्कि इतिहास का सांस्कृतिक पुनर्मूल्यांकन है। उन्होंने विट्ठल, कल्याणी, माधव और वेणी जैसे पात्रों को इतिहास के उन गुमनाम नायकों का प्रतीक बताया, जिनके त्याग, व्रत, कला, संस्कार और बलिदान से राष्ट्र और स्वराज्य की नींव निर्मित होती है। उन्होंने ‘तमस’ और ‘उसने कहा था’ के युगबोध से इसकी तुलना करते हुए कहा कि जहाँ ‘तमस’ तटस्थता और सांस्कृतिक विघटन की चेतावनी देता है तथा ‘उसने कहा था’ वचन और व्यक्तिगत त्याग का आदर्श प्रस्तुत करता है, वहीं ‘संक्रांति का संहार’ सामूहिक राष्ट्रबोध, सांस्कृतिक अस्मिता और स्वराज्य के लिए व्रत एवं बलिदान का संदेश देता है। डॉ. तिवारी के अनुसार पानीपत यहाँ अंत नहीं, बल्कि एक युग की संक्रांति और नए युग के जन्म का प्रतीक है; इसलिए यह कृति साहित्यिक उपन्यास से आगे बढ़कर सांस्कृतिक चेतना, इतिहास-बोध और राष्ट्रधर्म का पुनर्स्मरण कराने वाला महत्वपूर्ण ग्रंथ है। उन्होंने इसे प्रत्येक घर में पढ़े और मनन किए जाने योग्य बताते हुए डॉ. विद्यासागर उपाध्याय को इस उच्चकोटि की साहित्यिक सृष्टि के लिए बधाई और साधुवाद दिया।
पूर्व मुख्य चिकित्साधिकारी एवं साहित्यकार डॉ. अनिल मिश्र ने ‘काल यात्रा : वेद से बर्लिन तक’ को भारतीय ज्ञान-परंपरा और आधुनिक विश्व के बीच का सेतु बताते हुए कहा कि आज ऐतिहासिक लेखन के सामने सबसे बड़ी चुनौती इतिहास को न तो रूखा अकादमिक विवरण बनने देना है और न ही उसे कल्पना का ऐसा आख्यान बना देना है जिसमें इतिहास की विश्वसनीयता ही समाप्त हो जाए। इन दोनों के बीच संतुलन स्थापित करना ऐतिहासिक साहित्य की वास्तविक कसौटी है और डॉ. विद्यासागर उपाध्याय की लेखकीय दृष्टि इस चुनौती को साधने की दिशा में गंभीर एवं उल्लेखनीय प्रयास है। डॉ. उपाध्याय अतीत को वर्तमान से काटकर नहीं देखते। उनकी दृष्टि में अतीत केवल बीता हुआ समय नहीं, बल्कि वर्तमान की चेतना और भविष्य की दिशा को समझने का आधार है। साहित्य उस अतीत और वर्तमान के बीच संवाद स्थापित करने का सबसे संवेदनशील माध्यम है। ‘संक्रान्ति का संहार’ और ‘काल यात्रा : वेद से बर्लिन तक’ दोनों कृतियाँ अलग-अलग विधागत धरातल पर इसी वैचारिक दृष्टि को अभिव्यक्त करती हैं। डॉ. उपाध्याय की लेखन-पद्धति में इतिहास महज पृष्ठभूमि बनकर नहीं रहता, बल्कि कथा का सक्रिय और जीवंत तत्व बन जाता है। घटनाओं के साथ तत्कालीन राजनीतिक मनःस्थिति, सामाजिक संरचना, मानवीय मनोविज्ञान, सत्ता-संघर्ष और सभ्यतागत द्वंद्व को समझने की उनकी कोशिश उनकी रचनात्मक दृष्टि को विशिष्ट बनाती है। यही वह बिंदु है जहाँ इतिहास महज विवरण न रहकर साहित्य में रूपांतरित होता है। डॉ नरेन्द्र भूषण ने‌ हिन्दी दिवस को लक्षित करते हुए हिन्दी को बोलने व लेखन में प्राथमिकता के साथ अपनाने पर बल दिया
कार्यक्रम में उमेश चन्द्र दुबे, सुशील कुमार वर्मा, कुमार तरल, राजेश सिंह 'श्रेयश', डॉ इंद्रजीत तिवारी निर्भीक, डॉ ओमप्रकाश द्विवेदी, राजीव वत्सल, करुणानिधि तिवारी, डॉ विजय प्रताप आर्य, डॉ आर वी एन पाण्डेय, डॉ अनिल कुमार तिवारी,  विनोद शंकर शुक्ल, देवकीनन्दन शान्त, डॉ स्मिता मिश्रा, बलवन्त सिंह, केशरी प्रसाद शुक्ल, पंकज कृष्ण, सरोज आर्यावर्ती, मन मोहन बाराकोटी, सुरभि सिंह, पी एस सुनील अय्यर, कन्हैया लाल, सोनी शुक्ल, कुॅंवर वीर सिंह मार्तण्ड, डॉ योगेश, मंजू सक्सेना, विनय कुमार मिश्र, संजीव श्रीवास्तव, जलदूत नन्द किशोर वर्मा, रविशंकर श्रीवास्तव, प्रमोद श्रीवास्तव, आनंद सिंह, राहुल पाण्डेय, शिव नाथ सिंह, वेद प्रकाश द्विवेदी, राम लखन वर्मा, वीरेंद्र प्रताप यादव, जितेंद्र शर्मा, हिमांशु सक्सेना, राजेश यादव, रामसुतार सिंह, रोनित पाण्डेय आदि गणमान्य लोग उपस्थित रहे।
कार्यक्रम के अध्यक्ष निर्भय नारायण गुप्त द्वारा अपने अध्यक्षीय वक्तव्य में डॉ विद्या सागर उपाध्याय की कृतियों को साहित्य की उपलब्धि बताते हुए  ऐतिहासिक तथ्यों को जनमानस के सम्मुख लाने पर बल दिया। उन्होंने साहित्यकारों का आह्वान किया कि आज साहित्य को लोक मंगल एवं राष्ट्र मंगल के भावों के साथ सृजित किये‌ जाने की आवश्यकता है। कार्यक्रम का सुरुचिपूर्ण संचालन विदुषी डॉ. ममता पंकज ने किया। अंत में सुप्रसिद्ध साहित्यकार  सीमा मधुरिमा ने समस्त अभ्यागतों के प्रति आभार व्यक्त किया।
Sanjay Agarwal 
Tringel News Lucknow 
8574663222
    user_Reporter Sanjay Agrawal
    Reporter Sanjay Agrawal
    Local News Reporter सदर, लखनऊ, उत्तर प्रदेश•
    1 hr ago
  • *सांसद चन्द्रशेखर आजाद के काफिले पर पथराव के प्रकरण में भीम आर्मी ने सौंपा ज्ञापन* राहुल रावत की रिपोर्ट बाराबंकी। बर्तन कारोबारी श्री विनोद कुमार साहनी हत्याकांड के पीड़ित परिवार से मुलाकात के लिए गोंडा जा रहे नगीना लोकसभा क्षेत्र के सांसद एवं आजाद समाज पार्टी (कांशीराम) के राष्ट्रीय अध्यक्ष माननीय श्री एडवोकेट चन्द्रशेखर आजाद जी को जनपद बाराबंकी के रामनगर क्षेत्र स्थित बुढ़वल में पुलिस द्वारा रोके जाने के दौरान उनके काफिले पर पथराव किए जाने की घटना के संबंध में भीम आर्मी बाराबंकी के नेतृत्व में आज गन्ना दफ्तर, बाराबंकी में जिलाधिकारी महोदय के माध्यम से महामहिम राज्यपाल महोदया, उत्तर प्रदेश, लखनऊ के नाम ज्ञापन सौंपा गया।
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    *सांसद चन्द्रशेखर आजाद के काफिले पर पथराव के प्रकरण में भीम आर्मी ने सौंपा ज्ञापन* राहुल रावत की रिपोर्ट 
बाराबंकी। बर्तन कारोबारी श्री विनोद कुमार साहनी हत्याकांड के पीड़ित परिवार से मुलाकात के लिए गोंडा जा रहे नगीना लोकसभा क्षेत्र के सांसद एवं आजाद समाज पार्टी (कांशीराम) के राष्ट्रीय अध्यक्ष माननीय श्री एडवोकेट चन्द्रशेखर आजाद जी को जनपद बाराबंकी के रामनगर क्षेत्र स्थित बुढ़वल में पुलिस द्वारा रोके जाने के दौरान उनके काफिले पर पथराव किए जाने की घटना के संबंध में भीम आर्मी बाराबंकी के नेतृत्व में आज गन्ना दफ्तर, बाराबंकी में जिलाधिकारी महोदय के माध्यम से महामहिम राज्यपाल महोदया, उत्तर प्रदेश, लखनऊ के नाम ज्ञापन सौंपा गया।
    user_राहुल कुमार
    राहुल कुमार
    Court reporter फतेहपुर, बाराबंकी, उत्तर प्रदेश•
    2 hrs ago
  • लखनऊ के माल इलाके में एक युवक का अवैध असलहे से फायरिंग करते हुए वीडियो हुआ वायरल , वायरल वीडियो में दिख रहा युवक संतोष रावत बताया जा रहा है 📍 लखनऊ के माल इलाके में एक युवक का अवैध असलहे से फायरिंग करते हुए वीडियो हुआ वायरल , वायरल वीडियो में दिख रहा युवक संतोष रावत बताया जा रहा है 📍
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    लखनऊ के माल इलाके में एक युवक का अवैध असलहे से फायरिंग करते हुए वीडियो हुआ वायरल , वायरल वीडियो में दिख रहा युवक संतोष रावत बताया जा रहा है 📍
लखनऊ के माल इलाके में एक युवक का अवैध असलहे से फायरिंग करते हुए वीडियो हुआ वायरल , वायरल वीडियो में दिख रहा युवक संतोष रावत बताया जा रहा है 📍
    user_Journalist Himanshu Garg
    Journalist Himanshu Garg
    Local News Reporter सदर, लखनऊ, उत्तर प्रदेश•
    2 hrs ago
  • इंडिया लाइव न्यूज़:- अंकित कुमार, के साथ देखें ताजा अपडेट लखनऊ विश्वविद्यालय में सुरक्षा कर्मियों पर संकट, नौकरी जाने से महिला गार्ड का छलका दर्द लखनऊ विश्वविद्यालय में सुरक्षा कर्मियों पर संकट, नौकरी जाने से महिला गार्ड का छलका दर्द बिना पूर्व सूचना हटाए जाने का आरोप, परिवार चलाने की चिंता में रो पड़ी महिला सुरक्षाकर्मी; न्याय की गुहार इंडिया लाइव न्यूज़ | क्राइम डेस्क | लखनऊ रिपोर्ट: अंकित कुमार लखनऊ विश्वविद्यालय से सुरक्षा कर्मियों की नौकरी जाने का मामला अब तूल पकड़ता दिखाई दे रहा है। विश्वविद्यालय परिसर में वर्षों से सुरक्षा व्यवस्था संभाल रहे कई कर्मचारियों को अचानक ड्यूटी से हटाए जाने का मामला सामने आया है। कर्मचारियों की संख्या को लेकर अलग-अलग रिपोर्टों में करीब 40 से लेकर लगभग 100 सुरक्षाकर्मियों के प्रभावित होने की बात कही गई है। कर्मचारियों का आरोप है कि उन्हें बिना किसी पूर्व लिखित सूचना या नोटिस के अचानक काम से हटा दिया गया, जिसके बाद उनके सामने रोजी-रोटी का संकट खड़ा हो गया है। कैमरे के सामने छलका महिला सुरक्षाकर्मी का दर्द मामले से जुड़ा एक वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से चर्चा में है। वीडियो में नौकरी से हटाई गई एक महिला सुरक्षाकर्मी भावुक होकर अपनी पीड़ा बताती नजर आ रही हैं। महिला का कहना है कि उन्होंने लंबे समय तक विश्वविद्यालय में पूरी जिम्मेदारी के साथ काम किया, लेकिन अचानक नौकरी चले जाने से परिवार की आर्थिक स्थिति पर बड़ा असर पड़ेगा। उनका सवाल है कि नौकरी नहीं रही तो घर का खर्च और बच्चों की पढ़ाई कैसे चलेगी? महिला सुरक्षाकर्मी ने विश्वविद्यालय प्रशासन के साथ-साथ कुलसचिव और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से न्याय की गुहार लगाई है।
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    इंडिया लाइव न्यूज़:- अंकित कुमार, के साथ देखें ताजा अपडेट 
लखनऊ विश्वविद्यालय में सुरक्षा कर्मियों पर संकट, नौकरी जाने से महिला गार्ड का छलका दर्द
लखनऊ विश्वविद्यालय में सुरक्षा कर्मियों पर संकट, नौकरी जाने से महिला गार्ड का छलका दर्द
बिना पूर्व सूचना हटाए जाने का आरोप, परिवार चलाने की चिंता में रो पड़ी महिला सुरक्षाकर्मी; न्याय की गुहार
इंडिया लाइव न्यूज़ | क्राइम डेस्क | लखनऊ
रिपोर्ट: अंकित कुमार
लखनऊ विश्वविद्यालय से सुरक्षा कर्मियों की नौकरी जाने का मामला अब तूल पकड़ता दिखाई दे रहा है। विश्वविद्यालय परिसर में वर्षों से सुरक्षा व्यवस्था संभाल रहे कई कर्मचारियों को अचानक ड्यूटी से हटाए जाने का मामला सामने आया है। कर्मचारियों की संख्या को लेकर अलग-अलग रिपोर्टों में करीब 40 से लेकर लगभग 100 सुरक्षाकर्मियों के प्रभावित होने की बात कही गई है।
कर्मचारियों का आरोप है कि उन्हें बिना किसी पूर्व लिखित सूचना या नोटिस के अचानक काम से हटा दिया गया, जिसके बाद उनके सामने रोजी-रोटी का संकट खड़ा हो गया है।
कैमरे के सामने छलका महिला सुरक्षाकर्मी का दर्द
मामले से जुड़ा एक वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से चर्चा में है। वीडियो में नौकरी से हटाई गई एक महिला सुरक्षाकर्मी भावुक होकर अपनी पीड़ा बताती नजर आ रही हैं।
महिला का कहना है कि उन्होंने लंबे समय तक विश्वविद्यालय में पूरी जिम्मेदारी के साथ काम किया, लेकिन अचानक नौकरी चले जाने से परिवार की आर्थिक स्थिति पर बड़ा असर पड़ेगा। उनका सवाल है कि नौकरी नहीं रही तो घर का खर्च और बच्चों की पढ़ाई कैसे चलेगी?
महिला सुरक्षाकर्मी ने विश्वविद्यालय प्रशासन के साथ-साथ कुलसचिव और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से न्याय की गुहार लगाई है।
    user_अंकित कुमार
    अंकित कुमार
    Social worker बख्शी का तालाब, लखनऊ, उत्तर प्रदेश•
    2 hrs ago
  • मुंबई के जुहू स्थित प्रसिद्ध रेस्टोरेंट के बाहर स्पॉट हुई , शर्लिन चोपड़ा! मुंबई -शर्लिन चोपड़ा हाल ही में मुंबई के जुहू स्थित प्रसिद्ध रेस्टोरेंट 'चिन चिन चू' ,#ChinChinChu के बाहर स्पॉट हुई ,जहाँ उन्होंने एक बेहद ग्लैमरस और बोल्ड ग्रीन साटन ड्रेस पहनी हुई थी। इस दौरान बिंदास अंदाज में हमेशा की तरह दिए दमदार पोज। #BollywoodGossip #highlights2026 #followerseveryone #nishafakecase #RPT #RakeshPandey #character #Mumbai #highlightsfollowers #viralphotopost #BreakingNewsUpdate #SherlynChopra
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    मुंबई के जुहू स्थित प्रसिद्ध रेस्टोरेंट 
के बाहर स्पॉट हुई , शर्लिन चोपड़ा!
मुंबई -शर्लिन चोपड़ा हाल ही में मुंबई के जुहू स्थित प्रसिद्ध रेस्टोरेंट 'चिन चिन चू' ,#ChinChinChu के बाहर स्पॉट हुई ,जहाँ उन्होंने एक बेहद ग्लैमरस और बोल्ड ग्रीन साटन ड्रेस पहनी हुई थी। इस दौरान बिंदास अंदाज में हमेशा की तरह दिए दमदार पोज। 
#BollywoodGossip #highlights2026 #followerseveryone #nishafakecase #RPT #RakeshPandey #character  #Mumbai #highlightsfollowers #viralphotopost  #BreakingNewsUpdate #SherlynChopra
    user_AmanTv
    AmanTv
    Archive सदर, लखनऊ, उत्तर प्रदेश•
    2 hrs ago
  • राजधानी लखनऊ सिर्फ एलडीए ही नहीं पुलिस भी करा रही है अवैध निर्माण. बिल्डिंग बनने के समय महीनों पहले जेई ने तहरीर, जब बिल्डिंग की दुकानें बन गईं, बिक गईं... उच्च स्तर पर फोटो समेत शिकायत हुई तब अमीनाबाद थाने में दर्ज कर ली गई एफआईआर... पुलिस ने खूब लिया लाभ... मामला अमीनाबाद थाने के लाटूश रोड पर विद्यांत कॉलेज के सामने एलडीए द्वारा सील करके पुलिस अभिरक्षा में सौंपी गई बिल्डिंग का है ... अब सील की गई बिल्डिंग बनकर तैयार हो गई है... जब काम चल रहा था तब एलडीए के जेई, पुलिस को तहरी देते रहे, फोन करते रहेलेकिन....काम चलता रहा.. जब आपसी बंदरबांट से बिल्डिंग बन गई, दुकानें बन गईं तब जनता अदालत और अधिकारियों से शिकायत हुई तब बीती 12 सितंबर को बिल्डर फैज़ान के खिलाफ je की शिक़ायत पर एफआईआर दर्ज कर ली/
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    राजधानी लखनऊ सिर्फ एलडीए ही नहीं पुलिस भी करा रही है अवैध निर्माण.
बिल्डिंग बनने के समय महीनों पहले जेई ने तहरीर, जब बिल्डिंग की दुकानें बन गईं, बिक गईं... उच्च स्तर पर फोटो समेत शिकायत हुई तब अमीनाबाद थाने में दर्ज कर ली गई एफआईआर... पुलिस ने खूब लिया लाभ...
मामला अमीनाबाद थाने के लाटूश रोड पर विद्यांत कॉलेज के सामने एलडीए द्वारा सील करके पुलिस अभिरक्षा में सौंपी गई बिल्डिंग का है ... अब सील की गई बिल्डिंग बनकर तैयार हो गई है... जब काम चल रहा था तब एलडीए के जेई, पुलिस को तहरी देते रहे, फोन करते रहेलेकिन....काम चलता रहा.. जब आपसी बंदरबांट से बिल्डिंग बन गई, दुकानें बन गईं तब जनता अदालत और अधिकारियों से शिकायत हुई तब बीती 12 सितंबर को बिल्डर फैज़ान के खिलाफ je की शिक़ायत पर एफआईआर दर्ज कर ली/
    user_Khabro Ki Paini Najar News New
    Khabro Ki Paini Najar News New
    Advertising agency बख्शी का तालाब, लखनऊ, उत्तर प्रदेश•
    2 hrs ago
  • लखनऊ के थाना तालकटोरा क्षेत्र स्थित बालाजी मंदिर के पास लंबा जाम लगने से राहगीरों और वाहन चालकों को भारी परेशानी का सामना करना पड़ रहा है।
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    लखनऊ के थाना तालकटोरा क्षेत्र स्थित बालाजी मंदिर के पास लंबा जाम लगने से राहगीरों और वाहन चालकों को भारी परेशानी का सामना करना पड़ रहा है।
    user_Journalist Himanshu Garg
    Journalist Himanshu Garg
    Local News Reporter सदर, लखनऊ, उत्तर प्रदेश•
    2 hrs ago
  • सुशांत गोल्फ सिटी के खुर्दही बाजार के पास 14 चक्का ट्रक समेत नकदी लूट ले जाने का आरोप सुशांत गोल्फ सिटी के खुर्दही बाजार के पास 14 चक्का ट्रक समेत नकदी लूट ले जाने का आरोप*। *बुधवार देर रात ट्रक चालक फूलचंद पाठक ट्रांसपोर्टनगर से हैदरगढ़ जा रहे थे* *खुर्दही पहुंचते ही दो गाड़ियों से आए बदमाशों ने उन्हें घेर लिया।* *मारपीट कर ट्रक और रुपये लूटकर ले जाने का आरोप।* *पीड़ित पक्ष एचसीएल चौकी पहुंचा, आरोप है दिनभर बैठाए रखा गया, कार्रवाई नहीं हुई।* *ट्रांसपोर्ट की ओर से चंद्रप्रकाश दीक्षित ने एसीपी गोसाईंगंज ऋषभ यादव से की शिकायत*
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    सुशांत गोल्फ सिटी के खुर्दही बाजार के पास 14 चक्का ट्रक समेत नकदी लूट ले जाने का आरोप
सुशांत गोल्फ सिटी के खुर्दही बाजार के पास 14 चक्का ट्रक समेत नकदी लूट ले जाने का आरोप*।
*बुधवार देर रात ट्रक चालक फूलचंद पाठक ट्रांसपोर्टनगर से हैदरगढ़ जा रहे थे*
*खुर्दही पहुंचते ही दो गाड़ियों से आए बदमाशों ने उन्हें घेर लिया।*
*मारपीट कर ट्रक और रुपये लूटकर ले जाने का आरोप।*
*पीड़ित पक्ष एचसीएल चौकी पहुंचा, आरोप है दिनभर बैठाए रखा गया, कार्रवाई नहीं हुई।*
*ट्रांसपोर्ट की ओर से चंद्रप्रकाश दीक्षित ने एसीपी गोसाईंगंज ऋषभ यादव से की शिकायत*
    user_NATIONAL INDIA TV
    NATIONAL INDIA TV
    Local News Reporter बख्शी का तालाब, लखनऊ, उत्तर प्रदेश•
    3 hrs ago
  • चलती बस के पीछे लटककर सफर करता दिखा युवक, वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल 🚨 BREAKING NEWS 🚨 लखनऊ की यातायात पुलिस को खुलेआम चुनौती! चलती बस के पीछे लटककर सफर करता दिखा युवक, वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल लखनऊ। राजधानी में यातायात व्यवस्था को दुरुस्त करने के लिए डीसीपी ट्रैफिक रवीना त्यागी लगातार अभियान चला रही हैं, वहीं दूसरी ओर यातायात नियमों की खुलेआम धज्जियां उड़ाने का मामला सामने आया है। बिठौली ओवरब्रिज के पास चलती बस के पीछे लटककर एक व्यक्ति के सफर करने का वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहा है। वायरल वीडियो में व्यक्ति बस के पिछले हिस्से को पकड़कर जान जोखिम में डालते हुए यात्रा करता दिखाई दे रहा है। ऐसे खतरनाक तरीके से सफर करना न सिर्फ यातायात नियमों की अनदेखी है, बल्कि किसी बड़े हादसे को भी न्योता दे सकता है। वीडियो सामने आने के बाद अब देखना होगा कि यातायात पुलिस इस मामले में क्या कार्रवाई करती है।
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    चलती बस के पीछे लटककर सफर करता दिखा युवक, वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल
🚨 BREAKING NEWS 🚨
लखनऊ की यातायात पुलिस को खुलेआम चुनौती!
चलती बस के पीछे लटककर सफर करता दिखा युवक, वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल
लखनऊ। राजधानी में यातायात व्यवस्था को दुरुस्त करने के लिए डीसीपी ट्रैफिक रवीना त्यागी लगातार अभियान चला रही हैं, वहीं दूसरी ओर यातायात नियमों की खुलेआम धज्जियां उड़ाने का मामला सामने आया है।
बिठौली ओवरब्रिज के पास चलती बस के पीछे लटककर एक व्यक्ति के सफर करने का वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहा है। वायरल वीडियो में व्यक्ति बस के पिछले हिस्से को पकड़कर जान जोखिम में डालते हुए यात्रा करता दिखाई दे रहा है।
ऐसे खतरनाक तरीके से सफर करना न सिर्फ यातायात नियमों की अनदेखी है, बल्कि किसी बड़े हादसे को भी न्योता दे सकता है। 
वीडियो सामने आने के बाद अब देखना होगा कि यातायात पुलिस इस मामले में क्या कार्रवाई करती है।
    user_Sameer Safder naqvi
    Sameer Safder naqvi
    Video Creator सदर, लखनऊ, उत्तर प्रदेश•
    3 hrs ago
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