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होली को लेकर प्रशासन अलर्ट, पंजवारा बाजार में निकाला गया फ्लैग मार्च होली को लेकर प्रशासन अलर्ट, पंजवारा बाजार में निकाला गया फ्लैग मार्च
Bikash Kumar
होली को लेकर प्रशासन अलर्ट, पंजवारा बाजार में निकाला गया फ्लैग मार्च होली को लेकर प्रशासन अलर्ट, पंजवारा बाजार में निकाला गया फ्लैग मार्च
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- चैती दुर्गा मोतीहाट पूजा कमिटी के अध्यक्ष प्रखंड विकास पदाधिकारी गोपाल कुमार गुप्ता सर्व सम्मति से बनाए गए l1
- Post by N.k.choudhary1
- बिहार बांका- जिले के कटोरिया प्रखंड के जयपुर थाना क्षेत्र के कोल्हासार गांव में सोमवार को बिजली के जर्जर तार से निकली चिंगारी ने बड़ी आगलगी की घटना को जन्म दे दिया। जानकारी के अनुसार बिजली पोल से झूल रहे जर्जर तार तेज पछुआ हवा के कारण आपस में सट गए, जिससे निकली चिंगारी नीचे रखे पुआल की टाल तक पहुंच गई और देखते ही देखते आग फैल गई। इस घटना में चार पुआल की टाल और दो गोशाला पूरी तरह जलकर राख हो गई। आगलगी से किसान जगदीश यादव, सिताबी यादव, अमिन यादव, चनरू यादव और किशन यादव को हजारों रुपये का नुकसान हुआ है।1
- बांका बिहार अमरपुर प्रखंड डुमरामा1
- होली से पूर्व अमरपुर के गांवों में खेली गई ‘दुरखेड़ी’, मिट्टी के गर्दे से सराबोर हुए लोग़ अमरपुर प्रखंड क्षेत्र के कई गांवों में होली से पूर्व पारंपरिक ‘दुरखेड़ी’ उत्साह और उमंग के साथ खेली गई। इस लोक परंपरा में दुरखेड़ी को जलाया नहीं जाता, बल्कि लोग आपस में मिट्टी से बने ‘गर्दे’ (मिट्टी के ढेले/गोल आकार) को एक-दूसरे पर लगाकर और फेंककर पर्व की शुरुआत करते हैं। सुबह से ही गांव के चौक-चौराहों और खुले मैदानों में युवक, बच्चे और बुजुर्ग जुटने लगे। तालाब और खेतों की मिट्टी से तैयार गर्दों को लेकर लोग एक-दूसरे पर हंसी-ठिठोली के साथ लगाते रहे। देखते ही देखते पूरा माहौल मस्ती और उल्लास से भर गया। परंपरा के अनुसार दुरखेड़ी खेलना आपसी मनमुटाव भुलाकर प्रेम और भाईचारे का संदेश देने का प्रतीक माना जाता है। ग्रामीणों ने बताया कि यह परंपरा पीढ़ियों से चली आ रही है। पहले गांव के बुजुर्ग इसकी शुरुआत करते हैं, उसके बाद युवा और बच्चे इसमें शामिल होते हैं। कई जगहों पर ढोल-नगाड़े और फगुआ गीतों की धुन पर लोग नाचते-गाते नजर आए। दुरखेड़ी के साथ ही अमरपुर क्षेत्र में होली का रंग और गहरा हो गया है। गांवों में अबीर-गुलाल की तैयारियां शुरू हो चुकी हैं और फगुआ की टोलियां घर-घर जाकर गीत गा रही हैं। ग्रामीणों का कहना है कि दुरखेड़ी केवल एक खेल नहीं, बल्कि सामाजिक एकता और परंपरा को जीवित रखने का माध्यम है।1
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