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चंपावत:*मुख्यमंत्री धामी ने ‘मुख्य सेवक संवाद’ में सुनी क्षेत्र की समस्याएं,
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चंपावत:*मुख्यमंत्री धामी ने ‘मुख्य सेवक संवाद’ में सुनी क्षेत्र की समस्याएं,
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- चम्पावत:*जिलाधिकारी ने 38 कृषकों को जैविक एवं प्राकृतिक खेती प्रशिक्षण के लिए गाजियाबाद किया रवाना* #thepublicmatter #champawat #uttrakhand #viralnewsupdate #latestnews1
- पिंजरे में कैद हुआ महिला पर हमला करने वाला तेंदुआ, ग्रामीणों ने ली राहत की सांस जनपद चम्पावत के विकासखंड बाराकोट क्षेत्र में पिछले दो हफ्तों से दहशत का कारण बना तेंदुआ आखिरकार वन विभाग के पिंजरे में कैद हो गया। बताया जा रहा है कि बाराकोट क्षेत्र के एक गांव में करीब 15 दिन पहले जंगल गई एक स्थानीय महिला पर तेंदुए ने जानलेवा हमला कर दिया था, जिसमें वह गंभीर रूप से घायल हो गई थी। घटना के बाद से क्षेत्र में भय का माहौल बना हुआ था और ग्रामीण लगातार तेंदुए को पकड़ने की मांग कर रहे थे। वन विभाग ने ग्रामीणों की मांग पर जंगल में पिंजरा लगाया था। रविवार सुबह करीब 3 से 4 साल का एक नर तेंदुआ पिंजरे में कैद मिला। रेंजर राजेश कुमार जोशी के अनुसार पकड़े गए तेंदुए को फिलहाल क्षीणा वन चौकी में रखा गया है, जहां से जल्द ही रेस्क्यू सेंटर भेजा जाएगा। वन विभाग की टीम में नंदा बल्लभ भट्ट, प्रकाश गिरी और रमेश त्रिवेदी सहित अन्य कर्मचारी मौजूद रहे। उल्लेखनीय है कि इससे पहले ओखलंज और च्यूरानी गांवों से भी दो तेंदुए पकड़े जा चुके हैं। तेंदुए के पकड़े जाने के बाद ग्रामीणों ने राहत की सांस ली है, हालांकि क्षेत्र में अब भी सतर्कता बरतने की अपील की जा रही है। #Champawat #Barakot #LeopardCaptured #ForestDepartment #UttarakhandNews #ChampawatNews1
- Post by द कहर न्यूज़ एजेंसी1
- अल्मोड़ा। जनपद में रविवार को लोकपर्व फूलदेई उत्साह और पारंपरिक उल्लास के साथ मनाया गया। उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्रों में चैत्र माह की संक्रांति के अवसर पर मनाया जाने वाला यह विशेष लोकपर्व प्रकृति और संस्कृति के अनूठे संगम का प्रतीक माना जाता है। बच्चों के बीच इसकी विशेष लोकप्रियता के कारण इसे बालपर्व भी कहा जाता है। फूलों की खुशबू से महकता यह पर्व चैत्र माह के पहले दिन मनाया जाता है, जो प्रायः मार्च के मध्य में पड़ता है। इस वर्ष फूलदेई का पर्व रविवार, 15 मार्च को मनाया गया। इतिहासकारों के अनुसार यह परंपरा प्राचीन काल से चली आ रही है और इसका संबंध उत्तराखंड के ग्रामीण समाज में सामूहिकता, प्रकृति के प्रति सम्मान और आपसी सद्भाव से जुड़ा है। इस दिन छोटे बच्चे सुबह जल्दी उठकर बगीचों और जंगलों से रंग-बिरंगे फूल तोड़कर लाते हैं और उन्हें गांव व कस्बों के घरों की दहलीज पर सजाते हैं। यह परंपरा घर-परिवार की सुख-समृद्धि और मंगलकामना से जुड़ी मानी जाती है। बच्चे घर-घर जाकर 'फूलदेई, छम्मा देई, दैणी द्वार भर भकार' गाकर आशीर्वाद मांगते हैं, जिसका अर्थ है कि घर में सुख-समृद्धि बनी रहे। बदले में उन्हें चावल, गुड़, पैसे या अन्य उपहार दिए जाते हैं। रात्रि में बच्चों द्वारा एकत्रित चावल और गुड़ से पारंपरिक पकवान ‘सेई’ बनाया जाता है। फूलदेई पर्व की जड़ें उत्तराखंड की कृषि परंपराओं से भी जुड़ी हुई हैं। यह त्योहार वसंत ऋतु के आगमन का प्रतीक माना जाता है, जब पेड़-पौधे नई कोंपलों और फूलों से लद जाते हैं। घरों की चौखट पर फूल सजाने का अर्थ प्रकृति का स्वागत करना और परिवार की खुशहाली की कामना करना होता है। रविवार सुबह ठंड के मौसम के साथ हल्की बारिश के छींटे भी पड़े। इसके बावजूद अल्मोड़ा में फूलदेई के दिन बच्चों में खासा उत्साह देखने को मिला। बच्चे एक घर से दूसरे घर जाकर दहलीज पर फूल डालते हुए 'फूलदेई, छम्मा देई' गाते नजर आए और पूरे क्षेत्र में पर्व का उल्लास दिखाई दिया।1
- हिन्दू नव वर्ष और चैत्र मास आगमन के अवसर पर नगर पालिका चिलियानौला की ओर से रविवार की देर शाम यहां चौमूथान मंदिर परिसर के निर्माणाधीन पार्क में झोड़ा गायन का आयोजन हुआ। पारम्परिक संस्कृति को बचाने और युवा पीढ़ी को जागरूक करने के उद्देश्य से झोड़ा गायन का आयोजन हुआ, जिसमें क्षेत्र की महिलाओं ने बड़ी संख्या में भागीदारी की। पालिकाध्यक्ष अरुण रावत ने कहा कि भविष्य में इस आयोजन को वृहद रूप दिया जाएगा। सभासद सुंदर कुवार्बी ने बताया कि शार्ट नोटिस में महिलाएं पहुंच गई यह प्राचीन परम्परा को लेकर उनके उत्साह को दर्शाता है। यहां व्यापार मंडल अध्यक्ष कमलेश बोरा, ललित बिष्ट, हरीश सिंह देव, धर्मेंद्र सिंह अधिकारी सहित पालिका कि महिलाओं ने सहयोग किया।1
- Post by Peshkar1
- विडियो देखें - नेताप्रतिपक्ष यशपाल आर्य (बाजपुर विधायक) उत्तराखण्ड के विकास की सबसे बड़ी चुनौती पलायन है। पहाड़ के हजारों गांव खाली हो चुके हैं और कई गांव ऐसे हैं जो पूरी तरह निर्जन हो गए हैं। यदि सरकार वास्तव में राज्य के संतुलित विकास के प्रति गंभीर होती, तो इस बजट में - पहाड़ी क्षेत्रों में रोजगार सृजन, - स्थानीय कृषि और बागवानी को बढ़ावा, - ग्रामीण पर्यटन का विकास, - छोटे उद्योगों को प्रोत्साहन जैसे विषयों पर विशेष ध्यान दिया जाता, लेकिन इस बजट में इन मुद्दों पर अपेक्षित गंभीरता दिखाई नहीं देती। बजट भाषण में गांवों के विकास की बड़ी-बड़ी बातें की गई हैं। यह कहा गया है कि गांवों को मजबूत करके उत्तराखण्ड को मजबूत बनाया जा रहा है और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को सशक्त करने के लिए सरकार कई योजनाएं चला रही है लेकिन यदि हम जमीनी सच्चाई को देखें तो तस्वीर बिल्कुल अलग दिखाई देती है। वास्तविकता यह है कि विशेष रूप से पर्वतीय क्षेत्रों के गांव शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार जैसी मूलभूत सुविधाओं के अभाव में लगातार खाली होते जा रहे हैं। उत्तराखण्ड की सबसे बड़ी चुनौती पलायन है। वर्षों से यह विषय इस सदन में उठता रहा है कि पहाड़ के गांव तेजी से खाली हो रहे हैं और लोगों को मजबूरी में अपने गांव छोड़कर शहरों की ओर जाना पड़ रहा है। आज स्थिति यह है कि - पहाड़ के कई गांव निर्जन होते जा रहे हैं, - हजारों गांवों में आबादी बहुत कम रह गई है, - कई गांव ऐसे भी हैं जहां अब स्थायी रूप से लोग रह ही नहीं गए हैं। यह केवल एक सामाजिक समस्या नहीं है, बल्कि यह राज्य के संतुलित विकास के लिए भी एक गंभीर चुनौती है।1
- चंपावत:*एसीएलएस एम्बुलेंस को दिखाई हरी झंडी,1