सफेद फूलों की चादर से महकने लगा 'काला सोना', काश्तकारों ने बढ़ाई 'चौकसी'- हरनावदाशाहजी. हाड़ौती के खेतों में इन दिनों कुदरत का एक अलग ही नजारा देखने को मिल रहा है। 'काले सोने' के नाम से मशहूर अफीम की फसल अब अपने पूरे यौवन पर आने लगी है। सर्दी की ओस और हल्की सुनहरी धूप के बीच अफीम के खेतों में खिल रहे सफेद मनमोहक फूल हर किसी का मन मोह रहे हैं। लेकिन इन फूलों की खूबसूरती के पीछे किसान की कड़ी मेहनत और रात-भर का पहरा भी छुपा है। श्वेत फूलों की चादर और खुशहाली की उम्मीद- अफीम की फसल पर आए फूल इस बात का संकेत हैं कि अब फसल परिपक्वता की ओर बढ़ रही है। कुछ ही दिनों में इन फूलों की पंखुड़ियां गिर जाएंगी और हरे डोडे (फल) निकल आएंगे, जिनसे 'काला सोना' यानी अफीम का दूध निकाला जाएगा। काश्तकारों के लिए यह केवल एक फसल नहीं, बल्कि साल भर की वह उम्मीद है जिससे उनके घर की आर्थिक स्थिति तय होती है। परिंदा भी पर न मार सके, इसलिए 'चौकसी' सख्त- फसल के यौवन पर आते ही किसानों की धड़कनें भी बढ़ गई हैं। इसकी सुरक्षा के लिए काश्तकारों ने खेतों पर डेरा डालकर दिन-रात का पहरा शुरू कर दिया है। क्योंकि नीलगाय, आवारा पशु और खास तौर पर 'तोतों' (जो डोडों को काटकर ले जाते हैं) से फसल को बचाने के लिए किसानों ने खेतों पर ही झोपड़ियां बनाकर पडाव डाल दिए हैं। नेट का सुरक्षा कवच: कई प्रगतिशील किसानों ने पूरी फसल को ऊपर से जाली (नेट) से ढंक दिया है ताकि पक्षी फसल को नुकसान न पहुंचा सकें। कुछ इलाकों में तो किसान टॉर्च और लाठी लेकर रात-रात भर गश्त कर रहे हैं ताकि कीमती फसल सुरक्षित रहे। मौसम की मेहरबानी पर टिकी निगाहें- अफीम की खेती बेहद संवेदनशील होती है। किसानों का कहना है कि इस समय मौसम का साफ रहना बहुत जरूरी है। यदि अचानक बादल छाते हैं या बेमौसम बारिश होती है, तो डोडे में दूध की मात्रा कम हो सकती है और घटिया (अफीम की क्वालिटी) पर असर पड़ सकता है। फिलहाल, खिली हुई धूप को देखकर किसानों के चेहरे पर संतोष की लकीरें दिखाई दे रही हैं। विभाग की भी रहती है पैनी नजर नारकोटिक्स विभाग के कड़े नियमों के बीच हो रही इस खेती की एक-एक इंच जमीन और एक-एक ग्राम अफीम का हिसाब सरकार के पास होता है। यही कारण है कि किसान इसे अपनी संतान की तरह पालते हैं ताकि तौल के समय विभाग के मानकों पर उनकी फसल खरी उतरे और उनका लाइसेंस बरकरार रहे। "अफीम की खेती हमारे लिए किसी तपस्या से कम नहीं है। फूल आने के बाद से जब तक अफीम घर न आ जाए, हमें चैन की नींद नहीं आती।"
सफेद फूलों की चादर से महकने लगा 'काला सोना', काश्तकारों ने बढ़ाई 'चौकसी'- हरनावदाशाहजी. हाड़ौती के खेतों में इन दिनों कुदरत का एक अलग ही नजारा देखने को मिल रहा है। 'काले सोने' के नाम से मशहूर अफीम की फसल अब अपने पूरे यौवन पर आने लगी है। सर्दी की ओस और हल्की सुनहरी धूप के बीच अफीम के खेतों में खिल रहे सफेद मनमोहक फूल हर किसी का मन मोह रहे हैं। लेकिन इन फूलों की खूबसूरती के पीछे किसान की कड़ी मेहनत और रात-भर का पहरा भी छुपा है। श्वेत फूलों की चादर और खुशहाली की उम्मीद- अफीम की फसल पर आए फूल इस बात का संकेत हैं कि अब फसल परिपक्वता की ओर बढ़ रही है। कुछ ही दिनों में इन फूलों की पंखुड़ियां गिर जाएंगी और हरे डोडे (फल) निकल आएंगे, जिनसे 'काला सोना' यानी अफीम का दूध निकाला जाएगा। काश्तकारों के लिए यह केवल एक फसल नहीं, बल्कि साल भर की वह उम्मीद है जिससे उनके घर की आर्थिक स्थिति तय होती है। परिंदा भी पर न मार सके, इसलिए 'चौकसी' सख्त- फसल के यौवन पर आते ही किसानों की धड़कनें भी बढ़ गई हैं। इसकी सुरक्षा के लिए काश्तकारों ने खेतों पर डेरा डालकर दिन-रात का पहरा शुरू कर दिया है। क्योंकि नीलगाय, आवारा पशु और खास तौर पर 'तोतों' (जो डोडों को काटकर ले जाते हैं) से फसल को बचाने के लिए किसानों ने खेतों पर ही झोपड़ियां बनाकर पडाव डाल दिए हैं। नेट का सुरक्षा कवच: कई प्रगतिशील किसानों ने पूरी फसल को ऊपर से जाली (नेट) से ढंक दिया है ताकि पक्षी फसल को नुकसान न पहुंचा सकें। कुछ इलाकों में तो किसान टॉर्च और लाठी लेकर रात-रात भर गश्त कर रहे हैं ताकि कीमती फसल सुरक्षित रहे। मौसम की मेहरबानी पर टिकी निगाहें- अफीम की खेती बेहद संवेदनशील होती है। किसानों का कहना है कि इस समय मौसम का साफ रहना बहुत जरूरी है। यदि अचानक बादल छाते हैं या बेमौसम बारिश होती है, तो डोडे में दूध की मात्रा कम हो सकती है और घटिया (अफीम की क्वालिटी) पर असर पड़ सकता है। फिलहाल, खिली हुई धूप को देखकर किसानों के चेहरे पर संतोष की लकीरें दिखाई दे रही हैं। विभाग की भी रहती है पैनी नजर नारकोटिक्स विभाग के कड़े नियमों के बीच हो रही इस खेती की एक-एक इंच जमीन और एक-एक ग्राम अफीम का हिसाब सरकार के पास होता है। यही कारण है कि किसान इसे अपनी संतान की तरह पालते हैं ताकि तौल के समय विभाग के मानकों पर उनकी फसल खरी उतरे और उनका लाइसेंस बरकरार रहे। "अफीम की खेती हमारे लिए किसी तपस्या से कम नहीं है। फूल आने के बाद से जब तक अफीम घर न आ जाए, हमें चैन की नींद नहीं आती।"
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- सफेद फूलों की चादर से महकने लगा 'काला सोना', काश्तकारों ने बढ़ाई 'चौकसी'- हरनावदाशाहजी. हाड़ौती के खेतों में इन दिनों कुदरत का एक अलग ही नजारा देखने को मिल रहा है। 'काले सोने' के नाम से मशहूर अफीम की फसल अब अपने पूरे यौवन पर आने लगी है। सर्दी की ओस और हल्की सुनहरी धूप के बीच अफीम के खेतों में खिल रहे सफेद मनमोहक फूल हर किसी का मन मोह रहे हैं। लेकिन इन फूलों की खूबसूरती के पीछे किसान की कड़ी मेहनत और रात-भर का पहरा भी छुपा है। श्वेत फूलों की चादर और खुशहाली की उम्मीद- अफीम की फसल पर आए फूल इस बात का संकेत हैं कि अब फसल परिपक्वता की ओर बढ़ रही है। कुछ ही दिनों में इन फूलों की पंखुड़ियां गिर जाएंगी और हरे डोडे (फल) निकल आएंगे, जिनसे 'काला सोना' यानी अफीम का दूध निकाला जाएगा। काश्तकारों के लिए यह केवल एक फसल नहीं, बल्कि साल भर की वह उम्मीद है जिससे उनके घर की आर्थिक स्थिति तय होती है। परिंदा भी पर न मार सके, इसलिए 'चौकसी' सख्त- फसल के यौवन पर आते ही किसानों की धड़कनें भी बढ़ गई हैं। इसकी सुरक्षा के लिए काश्तकारों ने खेतों पर डेरा डालकर दिन-रात का पहरा शुरू कर दिया है। क्योंकि नीलगाय, आवारा पशु और खास तौर पर 'तोतों' (जो डोडों को काटकर ले जाते हैं) से फसल को बचाने के लिए किसानों ने खेतों पर ही झोपड़ियां बनाकर पडाव डाल दिए हैं। नेट का सुरक्षा कवच: कई प्रगतिशील किसानों ने पूरी फसल को ऊपर से जाली (नेट) से ढंक दिया है ताकि पक्षी फसल को नुकसान न पहुंचा सकें। कुछ इलाकों में तो किसान टॉर्च और लाठी लेकर रात-रात भर गश्त कर रहे हैं ताकि कीमती फसल सुरक्षित रहे। मौसम की मेहरबानी पर टिकी निगाहें- अफीम की खेती बेहद संवेदनशील होती है। किसानों का कहना है कि इस समय मौसम का साफ रहना बहुत जरूरी है। यदि अचानक बादल छाते हैं या बेमौसम बारिश होती है, तो डोडे में दूध की मात्रा कम हो सकती है और घटिया (अफीम की क्वालिटी) पर असर पड़ सकता है। फिलहाल, खिली हुई धूप को देखकर किसानों के चेहरे पर संतोष की लकीरें दिखाई दे रही हैं। विभाग की भी रहती है पैनी नजर नारकोटिक्स विभाग के कड़े नियमों के बीच हो रही इस खेती की एक-एक इंच जमीन और एक-एक ग्राम अफीम का हिसाब सरकार के पास होता है। यही कारण है कि किसान इसे अपनी संतान की तरह पालते हैं ताकि तौल के समय विभाग के मानकों पर उनकी फसल खरी उतरे और उनका लाइसेंस बरकरार रहे। "अफीम की खेती हमारे लिए किसी तपस्या से कम नहीं है। फूल आने के बाद से जब तक अफीम घर न आ जाए, हमें चैन की नींद नहीं आती।"1
- शाहाबाद में निकली पर्यावरण बचाओ रैली शाहाबाद। कस्बे में सोमवार को पर्यावरण प्राणियों द्वारा पर्यावरण बचाओ रैली निकाली गई जिसको लेकर स्थानीय स्तर पर लोगों के विरोध की आशंका के चलते मौके पर भारी संख्या में पुलिस बल तनाव किया गया था सोमवार को रैली स्थानीय नगरकोट माताजी से प्रारंभ होकर बस स्टैंड होते हुए उपखंड अधिकारी कार्यालय तक पहुंची जहां राज्यपाल के नाम का ज्ञापन उपखंड अधिकारी को सोपा गया इस अवसर पर काफी संख्या में पर्यावरण संरक्षण बचाओ समिति के पदाधिकारी तथा पर्यावरण प्रेमी मौजूद रहे। ज्ञापन के अनुसार।शाहाबाद (बारा) के सघन बनों में प्रस्तावित हाइड्रो प्रोजेक्ट हेतु होने वाले व्यापक बन-विनाश को रोकने के संबंध में ज्ञापन में कहा गया है कि शाहाबाद क्षेत्र के समस्त निवासी और पर्यावरण प्रेमी इस ज्ञापन के माध्यम से आपका ध्यान राजस्थान के 'फेफड़ों' कहे जाने वाले शाहाबाद के जंगलों पर मंडरा रहे अस्तित्व के संकट की और दिलाना चाहते हैं। यहाँ प्रस्तावित हाइड्रो प्रोजेक्ट के लिए जिस स्तर पर पेड़ों की कटाई की योजना है, वह आने वाली पीड़ियों के लिए एक पर्यावरणीय त्रासदी सिद्ध होगी। इस संदर्भ में इन बिंदुओं पर आपका ध्यान आकर्षित करने की बात कही है वृक्षों की अपूरणीय क्षतिः सरकारी आकड़ों में 1,19,000 पेड़ों की कटाई का उल्लेख है, किंतु 'भारत के जल पुरुष' और पर्यावरण विशेषज्ञों का अनुमान है कि वास्तव में यह संख्या लगभग 25 से 28 लाख के बीच है। इतनी विशाल संख्या में वृक्षों का उन्मूलन प्राकृतिक संतुलन को पूरी तरह नष्ट कर देगा। पारिस्थितिक असंतुलन, शाहाबाद का यह क्षेत्र सघन बनों और दुर्लभ जैव-विविधता से परिपूर्ण है। इन बनों का विनाश न केवल वन्यजीवों के आवास छीनेगा, बल्कि पूरे हाड़ौती क्षेत्र में सूखे, बढ़ते तापमान और जलवायु परिवर्तन के संकट को निमंत्रण देगा। जल सुरक्षा पर प्रहारः जैसा कि पर्यावरण विशेषज्ञों ने आगाह किया है, इन पेड़ों के कटने में भूजल पुनर्भरण (Groundwater Recharge) की प्रक्रिया रुक जाएगी। यह क्षेत्र के जल स्रोतों के सूखने का मुख्य कारण बनेगा, जिससे भविष्य में भीषण पेयजल संकट उत्पन होगा। जन-आक्रोश और संरक्षणः स्थानीय जनता और आदिवासी समुदाय इस वन-विनाश के विरुद्ध एकजुट है। हमारा मानना है। कि पर्यावरण की कीमत पर किया गया कोई भी विकास 'टिकाऊ' नहीं हो सकता। प्रदर्शन करियों की मांग है किः इस गंभीर विषय की संवेदनशीलता को देखते हुए आप अपने विशेषाधिकारों का प्रयोग कर इसमें हस्तक्षेप करें। पर्यावरण के हित में पेड़ों की इस भारी कटाई पर तुरंत रोक लगाई जाए। प्रोजेक्ट के लिए किसी अन्य विकल्प या बंजर भूमि का बयन करने हेतु संबंधित विभाग को निर्देशित किया जाए। हमें पूर्ण विश्वास है कि आप राजस्थान की इस प्राकृतिक विरासत और भविष्य की सुरक्षा हेतु उचित निर्णय लेंगे।4
- ग्राम पंचायत बड़ी ukawad tahsil madhusudangarh jila Guna श्मशान घाट रास्ता1
- अगर कोई शराब या दारू पीकर उत्पाद गांव में मचाता है तो उसे पंचायत ₹5000 ले सकती है तो सावधान होजाए1
- Post by Ajit Meena1
- 11 ग्राम स्मैक से साथ तस्कर गिरफ्तार पिड़ावा, पुलिस ने मादक पदार्थ की तस्करी पर कार्यवाही करते हुए अवैध मादक पदार्थ स्मैक के साथ एक तस्कर को गिरफ्तार किया है। एसपी अमित कुमार ने बताया कि जिले मादक पदार्थों की तस्करी के खिलाफ चलाए जा रहे अभियान के तहत ए एसपी भागचंद मीणा के निर्देशन और पिड़ावा पुलिस उपाधीक्षक पूजा नागर के सुपर विजन में पिड़ावा थानाधिकारी रामपाल यादव के नेतृत्व में गठित टीम ने धरोनिया चौकी पर नाकाबंदी के दौरान बाइक सवार गर्दन खेड़ी निवासी मांगीलाल पिता मनोहर लाल दांगी के पास से 11 ग्राम स्मैक बरामद कर उसे एनडीपीएस एक्ट में गिरफ्तार कर बाइक जब्त की है।कार्यवाही में कांस्टेबल हरदयाल, सांवरिया, कुलदीप, लोकेश कुमार, रामप्रकाश, राहुल सामरिया,राजेंद्र कुमार शामिल रहे।1
- भव्य हिन्दू सम्मेलन गरिमामय वातावरण में सम्पन्न हरनावदाशाहजी. सनातन संस्कृति के मूल्यों को सुदृढ़ करने तथा समाज में एकता और जागरूकता के संदेश के बीच रविवार को कोटडा भगवान में उत्साह,अनुशासन एवं सामाजिक समरसता के साथ भव्य हिन्दू सम्मेलन सम्पन्न हुआ। इस दौरान कथावाचक भूपेन्द्र ने सम्बोधित किया। कार्यक्रम के मुख्य वक्ता सुरेन्द्र नागर ने अपने प्रभावशाली उद्बोधन में हिन्दू समाज के संगठन, संस्कार और सामाजिक उत्तरदायित्व पर विस्तार से प्रकाश डालते हुए युवाओं से सक्रिय भूमिका निभाने का आह्वान किया। सम्मेलन में बड़ी संख्या में मातृशक्ति एवं युवा उपस्थित रहे। कार्यक्रम के अंत में भारत माता की आरती के साथ संयोजक बद्रीलाल द्वारा अतिथियों का आभार व्यक्त किया।2