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शाहाबाद में निकली पर्यावरण बचाओ रैली शाहाबाद। कस्बे में सोमवार को पर्यावरण प्राणियों द्वारा पर्यावरण बचाओ रैली निकाली गई जिसको लेकर स्थानीय स्तर पर लोगों के विरोध की आशंका के चलते मौके पर भारी संख्या में पुलिस बल तनाव किया गया था सोमवार को रैली स्थानीय नगरकोट माताजी से प्रारंभ होकर बस स्टैंड होते हुए उपखंड अधिकारी कार्यालय तक पहुंची जहां राज्यपाल के नाम का ज्ञापन उपखंड अधिकारी को सोपा गया इस अवसर पर काफी संख्या में पर्यावरण संरक्षण बचाओ समिति के पदाधिकारी तथा पर्यावरण प्रेमी मौजूद रहे। ज्ञापन के अनुसार।शाहाबाद (बारा) के सघन बनों में प्रस्तावित हाइड्रो प्रोजेक्ट हेतु होने वाले व्यापक बन-विनाश को रोकने के संबंध में ज्ञापन में कहा गया है कि शाहाबाद क्षेत्र के समस्त निवासी और पर्यावरण प्रेमी इस ज्ञापन के माध्यम से आपका ध्यान राजस्थान के 'फेफड़ों' कहे जाने वाले शाहाबाद के जंगलों पर मंडरा रहे अस्तित्व के संकट की और दिलाना चाहते हैं। यहाँ प्रस्तावित हाइड्रो प्रोजेक्ट के लिए जिस स्तर पर पेड़ों की कटाई की योजना है, वह आने वाली पीड़ियों के लिए एक पर्यावरणीय त्रासदी सिद्ध होगी। इस संदर्भ में इन बिंदुओं पर आपका ध्यान आकर्षित करने की बात कही है वृक्षों की अपूरणीय क्षतिः सरकारी आकड़ों में 1,19,000 पेड़ों की कटाई का उल्लेख है, किंतु 'भारत के जल पुरुष' और पर्यावरण विशेषज्ञों का अनुमान है कि वास्तव में यह संख्या लगभग 25 से 28 लाख के बीच है। इतनी विशाल संख्या में वृक्षों का उन्मूलन प्राकृतिक संतुलन को पूरी तरह नष्ट कर देगा। पारिस्थितिक असंतुलन, शाहाबाद का यह क्षेत्र सघन बनों और दुर्लभ जैव-विविधता से परिपूर्ण है। इन बनों का विनाश न केवल वन्यजीवों के आवास छीनेगा, बल्कि पूरे हाड़ौती क्षेत्र में सूखे, बढ़ते तापमान और जलवायु परिवर्तन के संकट को निमंत्रण देगा। जल सुरक्षा पर प्रहारः जैसा कि पर्यावरण विशेषज्ञों ने आगाह किया है, इन पेड़ों के कटने में भूजल पुनर्भरण (Groundwater Recharge) की प्रक्रिया रुक जाएगी। यह क्षेत्र के जल स्रोतों के सूखने का मुख्य कारण बनेगा, जिससे भविष्य में भीषण पेयजल संकट उत्पन होगा। जन-आक्रोश और संरक्षणः स्थानीय जनता और आदिवासी समुदाय इस वन-विनाश के विरुद्ध एकजुट है। हमारा मानना है। कि पर्यावरण की कीमत पर किया गया कोई भी विकास 'टिकाऊ' नहीं हो सकता। प्रदर्शन करियों की मांग है किः इस गंभीर विषय की संवेदनशीलता को देखते हुए आप अपने विशेषाधिकारों का प्रयोग कर इसमें हस्तक्षेप करें। पर्यावरण के हित में पेड़ों की इस भारी कटाई पर तुरंत रोक लगाई जाए। प्रोजेक्ट के लिए किसी अन्य विकल्प या बंजर भूमि का बयन करने हेतु संबंधित विभाग को निर्देशित किया जाए। हमें पूर्ण विश्वास है कि आप राजस्थान की इस प्राकृतिक विरासत और भविष्य की सुरक्षा हेतु उचित निर्णय लेंगे।

5 hrs ago
user_भुवनेश भार्गव
भुवनेश भार्गव
पत्रकारिता एवं समाज सेवा Baran, Baran•
5 hrs ago

शाहाबाद में निकली पर्यावरण बचाओ रैली शाहाबाद। कस्बे में सोमवार को पर्यावरण प्राणियों द्वारा पर्यावरण बचाओ रैली निकाली गई जिसको लेकर स्थानीय स्तर पर लोगों के विरोध की आशंका के चलते मौके पर भारी संख्या में पुलिस बल तनाव किया गया था सोमवार को रैली स्थानीय नगरकोट माताजी से प्रारंभ होकर बस स्टैंड होते हुए उपखंड अधिकारी कार्यालय तक पहुंची जहां राज्यपाल के नाम का ज्ञापन उपखंड अधिकारी को सोपा गया इस अवसर पर काफी संख्या में पर्यावरण संरक्षण बचाओ समिति के पदाधिकारी तथा पर्यावरण प्रेमी मौजूद रहे। ज्ञापन के अनुसार।शाहाबाद (बारा) के सघन बनों में प्रस्तावित हाइड्रो प्रोजेक्ट हेतु होने वाले व्यापक बन-विनाश को रोकने के

संबंध में ज्ञापन में कहा गया है कि शाहाबाद क्षेत्र के समस्त निवासी और पर्यावरण प्रेमी इस ज्ञापन के माध्यम से आपका ध्यान राजस्थान के 'फेफड़ों' कहे जाने वाले शाहाबाद के जंगलों पर मंडरा रहे अस्तित्व के संकट की और दिलाना चाहते हैं। यहाँ प्रस्तावित हाइड्रो प्रोजेक्ट के लिए जिस स्तर पर पेड़ों की कटाई की योजना है, वह आने वाली पीड़ियों के लिए एक पर्यावरणीय त्रासदी सिद्ध होगी। इस संदर्भ में इन बिंदुओं पर आपका ध्यान आकर्षित करने की बात कही है वृक्षों की अपूरणीय क्षतिः सरकारी आकड़ों में 1,19,000 पेड़ों की कटाई का उल्लेख है, किंतु 'भारत के जल पुरुष' और पर्यावरण विशेषज्ञों का अनुमान

है कि वास्तव में यह संख्या लगभग 25 से 28 लाख के बीच है। इतनी विशाल संख्या में वृक्षों का उन्मूलन प्राकृतिक संतुलन को पूरी तरह नष्ट कर देगा। पारिस्थितिक असंतुलन, शाहाबाद का यह क्षेत्र सघन बनों और दुर्लभ जैव-विविधता से परिपूर्ण है। इन बनों का विनाश न केवल वन्यजीवों के आवास छीनेगा, बल्कि पूरे हाड़ौती क्षेत्र में सूखे, बढ़ते तापमान और जलवायु परिवर्तन के संकट को निमंत्रण देगा। जल सुरक्षा पर प्रहारः जैसा कि पर्यावरण विशेषज्ञों ने आगाह किया है, इन पेड़ों के कटने में भूजल पुनर्भरण (Groundwater Recharge) की प्रक्रिया रुक जाएगी। यह क्षेत्र के जल स्रोतों के सूखने का मुख्य कारण बनेगा, जिससे भविष्य में भीषण

पेयजल संकट उत्पन होगा। जन-आक्रोश और संरक्षणः स्थानीय जनता और आदिवासी समुदाय इस वन-विनाश के विरुद्ध एकजुट है। हमारा मानना है। कि पर्यावरण की कीमत पर किया गया कोई भी विकास 'टिकाऊ' नहीं हो सकता। प्रदर्शन करियों की मांग है किः इस गंभीर विषय की संवेदनशीलता को देखते हुए आप अपने विशेषाधिकारों का प्रयोग कर इसमें हस्तक्षेप करें। पर्यावरण के हित में पेड़ों की इस भारी कटाई पर तुरंत रोक लगाई जाए। प्रोजेक्ट के लिए किसी अन्य विकल्प या बंजर भूमि का बयन करने हेतु संबंधित विभाग को निर्देशित किया जाए। हमें पूर्ण विश्वास है कि आप राजस्थान की इस प्राकृतिक विरासत और भविष्य की सुरक्षा हेतु उचित निर्णय लेंगे।

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  • शाहाबाद में निकली पर्यावरण बचाओ रैली शाहाबाद। कस्बे में सोमवार को पर्यावरण प्राणियों द्वारा पर्यावरण बचाओ रैली निकाली गई जिसको लेकर स्थानीय स्तर पर लोगों के विरोध की आशंका के चलते मौके पर भारी संख्या में पुलिस बल तनाव किया गया था सोमवार को रैली स्थानीय नगरकोट माताजी से प्रारंभ होकर बस स्टैंड होते हुए उपखंड अधिकारी कार्यालय तक पहुंची जहां राज्यपाल के नाम का ज्ञापन उपखंड अधिकारी को सोपा गया इस अवसर पर काफी संख्या में पर्यावरण संरक्षण बचाओ समिति के पदाधिकारी तथा पर्यावरण प्रेमी मौजूद रहे। ज्ञापन के अनुसार।शाहाबाद (बारा) के सघन बनों में प्रस्तावित हाइड्रो प्रोजेक्ट हेतु होने वाले व्यापक बन-विनाश को रोकने के संबंध में ज्ञापन में कहा गया है कि शाहाबाद क्षेत्र के समस्त निवासी और पर्यावरण प्रेमी इस ज्ञापन के माध्यम से आपका ध्यान राजस्थान के 'फेफड़ों' कहे जाने वाले शाहाबाद के जंगलों पर मंडरा रहे अस्तित्व के संकट की और दिलाना चाहते हैं। यहाँ प्रस्तावित हाइड्रो प्रोजेक्ट के लिए जिस स्तर पर पेड़ों की कटाई की योजना है, वह आने वाली पीड़ियों के लिए एक पर्यावरणीय त्रासदी सिद्ध होगी। इस संदर्भ में इन बिंदुओं पर आपका ध्यान आकर्षित करने की बात कही है वृक्षों की अपूरणीय क्षतिः सरकारी आकड़ों में 1,19,000 पेड़ों की कटाई का उल्लेख है, किंतु 'भारत के जल पुरुष' और पर्यावरण विशेषज्ञों का अनुमान है कि वास्तव में यह संख्या लगभग 25 से 28 लाख के बीच है। इतनी विशाल संख्या में वृक्षों का उन्मूलन प्राकृतिक संतुलन को पूरी तरह नष्ट कर देगा। पारिस्थितिक असंतुलन, शाहाबाद का यह क्षेत्र सघन बनों और दुर्लभ जैव-विविधता से परिपूर्ण है। इन बनों का विनाश न केवल वन्यजीवों के आवास छीनेगा, बल्कि पूरे हाड़ौती क्षेत्र में सूखे, बढ़ते तापमान और जलवायु परिवर्तन के संकट को निमंत्रण देगा। जल सुरक्षा पर प्रहारः जैसा कि पर्यावरण विशेषज्ञों ने आगाह किया है, इन पेड़ों के कटने में भूजल पुनर्भरण (Groundwater Recharge) की प्रक्रिया रुक जाएगी। यह क्षेत्र के जल स्रोतों के सूखने का मुख्य कारण बनेगा, जिससे भविष्य में भीषण पेयजल संकट उत्पन होगा। जन-आक्रोश और संरक्षणः स्थानीय जनता और आदिवासी समुदाय इस वन-विनाश के विरुद्ध एकजुट है। हमारा मानना है। कि पर्यावरण की कीमत पर किया गया कोई भी विकास 'टिकाऊ' नहीं हो सकता। प्रदर्शन करियों की मांग है किः इस गंभीर विषय की संवेदनशीलता को देखते हुए आप अपने विशेषाधिकारों का प्रयोग कर इसमें हस्तक्षेप करें। पर्यावरण के हित में पेड़ों की इस भारी कटाई पर तुरंत रोक लगाई जाए। प्रोजेक्ट के लिए किसी अन्य विकल्प या बंजर भूमि का बयन करने हेतु संबंधित विभाग को निर्देशित किया जाए। हमें पूर्ण विश्वास है कि आप राजस्थान की इस प्राकृतिक विरासत और भविष्य की सुरक्षा हेतु उचित निर्णय लेंगे।
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    शाहाबाद में निकली पर्यावरण बचाओ रैली शाहाबाद। कस्बे में सोमवार को पर्यावरण प्राणियों द्वारा पर्यावरण बचाओ रैली निकाली गई जिसको लेकर स्थानीय स्तर पर लोगों के विरोध की आशंका के चलते मौके पर भारी संख्या में पुलिस बल तनाव किया गया था सोमवार को रैली स्थानीय नगरकोट माताजी से प्रारंभ होकर बस स्टैंड होते हुए उपखंड अधिकारी कार्यालय तक पहुंची जहां राज्यपाल के नाम का ज्ञापन उपखंड अधिकारी को सोपा गया इस अवसर पर काफी संख्या में पर्यावरण संरक्षण बचाओ समिति के पदाधिकारी तथा पर्यावरण प्रेमी मौजूद रहे।
ज्ञापन के अनुसार।शाहाबाद (बारा) के सघन बनों में प्रस्तावित हाइड्रो प्रोजेक्ट हेतु होने वाले व्यापक बन-विनाश को रोकने के संबंध में ज्ञापन में कहा गया है कि शाहाबाद क्षेत्र के समस्त निवासी और पर्यावरण प्रेमी इस ज्ञापन के माध्यम से आपका ध्यान राजस्थान के 'फेफड़ों' कहे जाने वाले शाहाबाद के जंगलों पर मंडरा रहे अस्तित्व के संकट की और दिलाना चाहते हैं। यहाँ प्रस्तावित हाइड्रो प्रोजेक्ट के लिए जिस स्तर पर पेड़ों की कटाई की योजना है, वह आने वाली पीड़ियों के लिए एक पर्यावरणीय त्रासदी सिद्ध होगी।
इस संदर्भ में इन बिंदुओं पर आपका ध्यान आकर्षित करने की बात कही है 
वृक्षों की अपूरणीय क्षतिः सरकारी आकड़ों में 1,19,000 पेड़ों की कटाई का उल्लेख है, किंतु 'भारत के जल पुरुष' और पर्यावरण विशेषज्ञों का अनुमान है कि वास्तव में यह संख्या लगभग 25 से 28 लाख के बीच है। इतनी विशाल संख्या में वृक्षों का उन्मूलन प्राकृतिक संतुलन को पूरी तरह नष्ट कर देगा।
पारिस्थितिक असंतुलन, शाहाबाद का यह क्षेत्र सघन बनों और दुर्लभ जैव-विविधता से परिपूर्ण है। इन बनों का विनाश न केवल वन्यजीवों के आवास छीनेगा, बल्कि पूरे हाड़ौती क्षेत्र में सूखे, बढ़ते तापमान और जलवायु परिवर्तन के संकट को निमंत्रण देगा।
जल सुरक्षा पर प्रहारः जैसा कि पर्यावरण विशेषज्ञों ने आगाह किया है, इन पेड़ों के कटने में भूजल पुनर्भरण
(Groundwater Recharge) की प्रक्रिया रुक जाएगी। यह क्षेत्र के जल स्रोतों के सूखने का मुख्य कारण बनेगा, जिससे भविष्य में भीषण पेयजल संकट उत्पन होगा।
जन-आक्रोश और संरक्षणः स्थानीय जनता और आदिवासी समुदाय इस वन-विनाश के विरुद्ध एकजुट है। हमारा मानना है। कि पर्यावरण की कीमत पर किया गया कोई भी विकास 'टिकाऊ' नहीं हो सकता।
प्रदर्शन करियों की मांग है किः इस गंभीर विषय की संवेदनशीलता को देखते हुए आप अपने विशेषाधिकारों का प्रयोग कर इसमें हस्तक्षेप करें।
पर्यावरण के हित में पेड़ों की इस भारी कटाई पर तुरंत रोक लगाई जाए।
प्रोजेक्ट के लिए किसी अन्य विकल्प या बंजर भूमि का बयन करने हेतु संबंधित विभाग को निर्देशित किया जाए।
हमें पूर्ण विश्वास है कि आप राजस्थान की इस प्राकृतिक विरासत और भविष्य की सुरक्षा हेतु उचित निर्णय लेंगे।
    user_भुवनेश भार्गव
    भुवनेश भार्गव
    पत्रकारिता एवं समाज सेवा Baran, Baran•
    5 hrs ago
  • Post by Ajit Meena
    1
    Post by Ajit Meena
    user_Ajit Meena
    Ajit Meena
    अंता, बारां, राजस्थान•
    14 hrs ago
  • Osho death celebration at home chhipabarod
    1
    Osho death celebration at home chhipabarod
    user_Jagdish Chandra Sharma
    Jagdish Chandra Sharma
    Dancer छिपाबड़ौद, बारां, राजस्थान•
    6 hrs ago
  • सफेद फूलों की चादर से महकने लगा 'काला सोना', काश्तकारों ने बढ़ाई 'चौकसी'- हरनावदाशाहजी. हाड़ौती के खेतों में इन दिनों कुदरत का एक अलग ही नजारा देखने को मिल रहा है। 'काले सोने' के नाम से मशहूर अफीम की फसल अब अपने पूरे यौवन पर आने लगी है। सर्दी की ओस और हल्की सुनहरी धूप के बीच अफीम के खेतों में खिल रहे सफेद मनमोहक फूल हर किसी का मन मोह रहे हैं। लेकिन इन फूलों की खूबसूरती के पीछे किसान की कड़ी मेहनत और रात-भर का पहरा भी छुपा है। श्वेत फूलों की चादर और खुशहाली की उम्मीद- अफीम की फसल पर आए फूल इस बात का संकेत हैं कि अब फसल परिपक्वता की ओर बढ़ रही है। कुछ ही दिनों में इन फूलों की पंखुड़ियां गिर जाएंगी और हरे डोडे (फल) निकल आएंगे, जिनसे 'काला सोना' यानी अफीम का दूध निकाला जाएगा। काश्तकारों के लिए यह केवल एक फसल नहीं, बल्कि साल भर की वह उम्मीद है जिससे उनके घर की आर्थिक स्थिति तय होती है। परिंदा भी पर न मार सके, इसलिए 'चौकसी' सख्त- फसल के यौवन पर आते ही किसानों की धड़कनें भी बढ़ गई हैं। इसकी सुरक्षा के लिए काश्तकारों ने खेतों पर डेरा डालकर दिन-रात का पहरा शुरू कर दिया है। क्योंकि नीलगाय, आवारा पशु और खास तौर पर 'तोतों' (जो डोडों को काटकर ले जाते हैं) से फसल को बचाने के लिए किसानों ने खेतों पर ही झोपड़ियां बनाकर पडाव डाल दिए हैं। नेट का सुरक्षा कवच: कई प्रगतिशील किसानों ने पूरी फसल को ऊपर से जाली (नेट) से ढंक दिया है ताकि पक्षी फसल को नुकसान न पहुंचा सकें। कुछ इलाकों में तो किसान टॉर्च और लाठी लेकर रात-रात भर गश्त कर रहे हैं ताकि कीमती फसल सुरक्षित रहे। मौसम की मेहरबानी पर टिकी निगाहें- अफीम की खेती बेहद संवेदनशील होती है। किसानों का कहना है कि इस समय मौसम का साफ रहना बहुत जरूरी है। यदि अचानक बादल छाते हैं या बेमौसम बारिश होती है, तो डोडे में दूध की मात्रा कम हो सकती है और घटिया (अफीम की क्वालिटी) पर असर पड़ सकता है। फिलहाल, खिली हुई धूप को देखकर किसानों के चेहरे पर संतोष की लकीरें दिखाई दे रही हैं। विभाग की भी रहती है पैनी नजर नारकोटिक्स विभाग के कड़े नियमों के बीच हो रही इस खेती की एक-एक इंच जमीन और एक-एक ग्राम अफीम का हिसाब सरकार के पास होता है। यही कारण है कि किसान इसे अपनी संतान की तरह पालते हैं ताकि तौल के समय विभाग के मानकों पर उनकी फसल खरी उतरे और उनका लाइसेंस बरकरार रहे। "अफीम की खेती हमारे लिए किसी तपस्या से कम नहीं है। फूल आने के बाद से जब तक अफीम घर न आ जाए, हमें चैन की नींद नहीं आती।"
    1
    सफेद फूलों की चादर से महकने लगा 'काला सोना',
काश्तकारों ने बढ़ाई 'चौकसी'-
हरनावदाशाहजी. 
हाड़ौती के खेतों में इन दिनों कुदरत का एक अलग ही नजारा देखने को मिल रहा है। 'काले सोने' के नाम से मशहूर अफीम की फसल अब अपने पूरे यौवन पर आने लगी है। सर्दी की ओस और हल्की सुनहरी धूप के बीच अफीम के खेतों में खिल रहे सफेद मनमोहक फूल हर किसी का मन मोह रहे हैं। लेकिन इन फूलों की खूबसूरती के पीछे किसान की कड़ी मेहनत और रात-भर का पहरा भी छुपा है।
श्वेत फूलों की चादर और खुशहाली की उम्मीद-
अफीम की फसल पर आए फूल इस बात का संकेत हैं कि अब फसल परिपक्वता की ओर बढ़ रही है। कुछ ही दिनों में इन फूलों की पंखुड़ियां गिर जाएंगी और हरे डोडे (फल) निकल आएंगे, जिनसे 'काला सोना' यानी अफीम का दूध निकाला जाएगा। काश्तकारों के लिए यह केवल एक फसल नहीं, बल्कि साल भर की वह उम्मीद है जिससे उनके घर की आर्थिक स्थिति तय होती है।
परिंदा भी पर न मार सके, इसलिए 'चौकसी' सख्त-
फसल के यौवन पर आते ही किसानों की धड़कनें भी बढ़ गई हैं। इसकी सुरक्षा के लिए काश्तकारों ने खेतों पर डेरा डालकर दिन-रात का पहरा शुरू कर दिया है।
क्योंकि नीलगाय, आवारा पशु और खास तौर पर 'तोतों' (जो डोडों को काटकर ले जाते हैं) से फसल को बचाने के लिए किसानों ने खेतों पर ही झोपड़ियां बनाकर पडाव डाल दिए हैं।
नेट का सुरक्षा कवच: कई प्रगतिशील किसानों ने पूरी फसल को ऊपर से जाली (नेट) से ढंक दिया है ताकि पक्षी फसल को नुकसान न पहुंचा सकें।
कुछ इलाकों में तो किसान टॉर्च और लाठी लेकर रात-रात भर गश्त कर रहे हैं ताकि कीमती फसल सुरक्षित रहे।
मौसम की मेहरबानी पर टिकी निगाहें-
अफीम की खेती बेहद संवेदनशील होती है। किसानों का कहना है कि इस समय मौसम का साफ रहना बहुत जरूरी है। यदि अचानक बादल छाते हैं या बेमौसम बारिश होती है, तो डोडे में दूध की मात्रा कम हो सकती है और घटिया (अफीम की क्वालिटी) पर असर पड़ सकता है। फिलहाल, खिली हुई धूप को देखकर किसानों के चेहरे पर संतोष की लकीरें दिखाई दे रही हैं।
विभाग की भी रहती है पैनी नजर
नारकोटिक्स विभाग के कड़े नियमों के बीच हो रही इस खेती की एक-एक इंच जमीन और एक-एक ग्राम अफीम का हिसाब सरकार के पास होता है। यही कारण है कि किसान इसे अपनी संतान की तरह पालते हैं ताकि तौल के समय विभाग के मानकों पर उनकी फसल खरी उतरे और उनका लाइसेंस बरकरार रहे।
"अफीम की खेती हमारे लिए किसी तपस्या से कम नहीं है। फूल आने के बाद से जब तक अफीम घर न आ जाए, हमें चैन की नींद नहीं आती।"
    user_Pramod jain
    Pramod jain
    Journalist Chhipabarod, Baran•
    7 hrs ago
  • Post by Ramdas Kushvah
    1
    Post by Ramdas Kushvah
    user_Ramdas Kushvah
    Ramdas Kushvah
    छुर्च•
    26 min ago
  • हिस्ट्रीशीटर आदिल मिर्जा का अवैध निर्माण ध्वस्त -गैर मुमकिन बावड़ी किस्म की सरकारी भूमि पर अतिक्रमण कर बना था मकान -पुलिस जाब्ते की मौजदूगी में कार्रवाई सम्पन्न सांगोद/ कोटा। नगर पालिका सांगोद ने रविवार को अमृतखेड़ी क्षेत्र में सरकारी भूमि पर बने अवैध निर्माण के खिलाफ सख्त कार्रवाई करते हुए हिस्ट्रीशीटर आदिल मिर्जा के मकान को ध्वस्त कर दिया। पुलिस जाप्ते की कड़ी मौजूदगी में यह कार्रवाई शांति पूर्वक संपन्न हुई। नगर पालिका प्रशासन द्वारा अमृतखेड़ी स्थित खसरा संख्या 335 पर बने अवैध मकान को रविवार को ध्वस्त किया गया। यह मकान गैर मुमकिन बावड़ी किस्म की सरकारी भूमि पर अतिक्रमण कर बनाया गया था, जो प्रतिबंधित श्रेणी में आती है। पालिका प्रशासन ने पूर्व में अतिक्रमी को 16 जनवरी तक स्वेच्छा से अतिक्रमण हटाने के निर्देश दिए थे। लेकिन निर्धारित समयावधि में अतिक्रमण नहीं हटाए जाने पर यह कार्रवाई की गई। दंडनीय अपराध की श्रेणी में आता है अतिक्रमण प्रशासनिक सूत्रों के अनुसार तहसील कार्यालय की ओर से भी अतिक्रमी को तीन दिन का अतिरिक्त समय दिया गया था। जांच में यह तथ्य सामने आया कि उक्त भूमि पर निर्माण राजस्थान हाई कोर्ट के अब्दुल रहमान बनाम स्टेट आफ राजस्थान एवं अन्य प्रकरण के तहत प्रतिबंधित है और ऐसी भूमि पर अतिक्रमण दंडनीय अपराध की श्रेणी में आता है। ड्रोन से की गई निगरानी करीब 10 हजार स्क्वायर फीट क्षेत्र में बने आलीशान मकान को ध्वस्त करने की कार्रवाई के दौरान उपखंड अधिकारी, तहसीलदार और नगर पालिका के अधिशासी अधिकारी मौके पर मौजूद रहे। सुरक्षा व्यवस्था के मद्देनजर ड्रोन के माध्यम से निगरानी की गई। इसी मार्ग पर अन्य व्यक्तियों द्वारा किए गए अतिक्रमणों को भी चिन्हित कर ध्वस्त किया गया। साथ ही इसी श्रेणी के अन्य अतिक्रमण कर्ताओं को नोटिस जारी किए जाने की जानकारी भी सामने आई है।
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    हिस्ट्रीशीटर आदिल मिर्जा का अवैध निर्माण ध्वस्त
-गैर मुमकिन बावड़ी किस्म की सरकारी भूमि पर अतिक्रमण कर बना था मकान
-पुलिस जाब्ते की मौजदूगी में कार्रवाई सम्पन्न
सांगोद/ कोटा।
नगर पालिका सांगोद ने रविवार को अमृतखेड़ी क्षेत्र में सरकारी भूमि पर बने अवैध निर्माण के खिलाफ सख्त कार्रवाई करते हुए हिस्ट्रीशीटर आदिल मिर्जा के मकान को ध्वस्त कर दिया। पुलिस जाप्ते की कड़ी मौजूदगी में यह कार्रवाई शांति पूर्वक संपन्न हुई।
नगर पालिका प्रशासन द्वारा अमृतखेड़ी स्थित खसरा संख्या 335 पर बने अवैध मकान को रविवार को ध्वस्त किया गया। यह मकान गैर मुमकिन बावड़ी किस्म की सरकारी भूमि पर अतिक्रमण कर बनाया गया था, जो प्रतिबंधित श्रेणी में आती है। पालिका प्रशासन ने पूर्व में अतिक्रमी को 16 जनवरी तक स्वेच्छा से अतिक्रमण हटाने के निर्देश दिए थे। लेकिन निर्धारित समयावधि में अतिक्रमण नहीं हटाए जाने पर यह कार्रवाई की गई।
दंडनीय अपराध की श्रेणी में आता है अतिक्रमण
प्रशासनिक सूत्रों के अनुसार तहसील कार्यालय की ओर से भी अतिक्रमी को तीन दिन का अतिरिक्त समय दिया गया था। जांच में यह तथ्य सामने आया कि उक्त भूमि पर निर्माण राजस्थान हाई कोर्ट के अब्दुल रहमान बनाम स्टेट आफ राजस्थान एवं अन्य प्रकरण के तहत प्रतिबंधित है और ऐसी भूमि पर अतिक्रमण दंडनीय अपराध की श्रेणी में आता है।
ड्रोन से की गई निगरानी
करीब 10 हजार स्क्वायर फीट क्षेत्र में बने आलीशान मकान को ध्वस्त करने की कार्रवाई के दौरान उपखंड अधिकारी, तहसीलदार और नगर पालिका के अधिशासी अधिकारी मौके पर मौजूद रहे। सुरक्षा व्यवस्था के मद्देनजर ड्रोन के माध्यम से निगरानी की गई। इसी मार्ग पर अन्य व्यक्तियों द्वारा किए गए अतिक्रमणों को भी चिन्हित कर ध्वस्त किया गया। साथ ही इसी श्रेणी के अन्य अतिक्रमण कर्ताओं को नोटिस जारी किए जाने की जानकारी भी सामने आई है।
    user_Ahmed Siraj Farooqi
    Ahmed Siraj Farooqi
    Journalist लाडपुरा, कोटा, राजस्थान•
    4 hrs ago
  • कोटा भामाशाह मंडी बाजार भाव देखिए रोजाना फॉलो जरूर करें।।
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    कोटा भामाशाह मंडी बाजार भाव देखिए रोजाना फॉलो जरूर करें।।
    user_Pawan Malav
    Pawan Malav
    Grain Exporter लाडपुरा, कोटा, राजस्थान•
    6 hrs ago
  • Post by Ajit Meena
    1
    Post by Ajit Meena
    user_Ajit Meena
    Ajit Meena
    अंता, बारां, राजस्थान•
    15 hrs ago
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