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भूदड़ का बास की जनता ने रखी अपनी बात, अब अगले सरपंच से क्या हैं उम्मीदें?

3 hrs ago
user_Voice of Labour
Voice of Labour
Alwar, Rajasthan•
3 hrs ago

भूदड़ का बास की जनता ने रखी अपनी बात, अब अगले सरपंच से क्या हैं उम्मीदें?

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  • भूदड़ का बास की जनता ने रखी अपनी बात, अब अगले सरपंच से क्या हैं उम्मीदें?
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    भूदड़ का बास की जनता ने रखी अपनी बात, अब अगले सरपंच से क्या हैं उम्मीदें?
    user_Voice of Labour
    Voice of Labour
    Alwar, Rajasthan•
    3 hrs ago
  • भिवाड़ी में फर्जी सीआईए अधिकारी बनकर मेडिकल संचालक से ₹1 लाख की फिरौती वसूलने वाले दो इनामी आरोपी गिरफ्तार भिवाड़ी पुलिस ने वांछित अपराधियों के खिलाफ चलाए जा रहे विशेष अभियान के तहत बड़ी कार्रवाई करते हुए फर्जी सीआईए हरियाणा पुलिस अधिकारी बनकर मेडिकल स्टोर संचालक से फिरौती वसूलने के मामले में दो इनामी आरोपियों को गिरफ्तार किया है। पुलिस थाना भिवाड़ी फैज तृतीय की टीम ने ₹15 हजार के इनामी संजू पुत्र राजेंद्र गुर्जर तथा ₹5 हजार के इनामी सागर पुत्र राजेंद्र गुर्जर को गिरफ्तार किया। दोनों आरोपी जिंदा मोहल्ला, भिवाड़ी गांव के निवासी बताए गए हैं। पुलिस के अनुसार 12 जुलाई 2026 को पांच युवक ग्रे रंग की स्विफ्ट कार से सांथलका स्थित मेडिकल स्टोर पहुंचे थे। आरोपियों ने खुद को हरियाणा सीआईए पुलिस अधिकारी बताते हुए संचालक पर नशीली दवाओं की अवैध बिक्री का आरोप लगाया और कार्रवाई के नाम पर उसे जबरन कार में बैठा लिया। इसके बाद आरोपियों ने सुनसान स्थान पर ले जाकर मेडिकल संचालक को झूठे मामले में फंसाने की धमकी देते हुए ₹10 लाख की फिरौती मांगी। भयभीत पीड़ित ने आरोपियों द्वारा बताए गए यूपीआई खाते में पहले ₹10 हजार और फिर ₹90 हजार, कुल ₹1 लाख ऑनलाइन ट्रांसफर किए। मामले में पुलिस ने पहले मोहित और हर्ष को गिरफ्तार किया था। इसके बाद ₹10 हजार के इनामी अनिल और ₹25 हजार के इनामी दीपक उर्फ हन्नी को भी गिरफ्तार किया जा चुका है। अब संजू और सागर की गिरफ्तारी से मामले में पुलिस की कार्रवाई आगे बढ़ी है। पुलिस अन्य फरार आरोपियों की तलाश में लगातार दबिश दे रही है।
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    भिवाड़ी में फर्जी सीआईए अधिकारी बनकर मेडिकल संचालक से ₹1 लाख की फिरौती वसूलने वाले दो इनामी आरोपी गिरफ्तार
भिवाड़ी पुलिस ने वांछित अपराधियों के खिलाफ चलाए जा रहे विशेष अभियान के तहत बड़ी कार्रवाई करते हुए फर्जी सीआईए हरियाणा पुलिस अधिकारी बनकर मेडिकल स्टोर संचालक से फिरौती वसूलने के मामले में दो इनामी आरोपियों को गिरफ्तार किया है।
पुलिस थाना भिवाड़ी फैज तृतीय की टीम ने ₹15 हजार के इनामी संजू पुत्र राजेंद्र गुर्जर तथा ₹5 हजार के इनामी सागर पुत्र राजेंद्र गुर्जर को गिरफ्तार किया। दोनों आरोपी जिंदा मोहल्ला, भिवाड़ी गांव के निवासी बताए गए हैं।
पुलिस के अनुसार 12 जुलाई 2026 को पांच युवक ग्रे रंग की स्विफ्ट कार से सांथलका स्थित मेडिकल स्टोर पहुंचे थे। आरोपियों ने खुद को हरियाणा सीआईए पुलिस अधिकारी बताते हुए संचालक पर नशीली दवाओं की अवैध बिक्री का आरोप लगाया और कार्रवाई के नाम पर उसे जबरन कार में बैठा लिया।
इसके बाद आरोपियों ने सुनसान स्थान पर ले जाकर मेडिकल संचालक को झूठे मामले में फंसाने की धमकी देते हुए ₹10 लाख की फिरौती मांगी। भयभीत पीड़ित ने आरोपियों द्वारा बताए गए यूपीआई खाते में पहले ₹10 हजार और फिर ₹90 हजार, कुल ₹1 लाख ऑनलाइन ट्रांसफर किए।
मामले में पुलिस ने पहले मोहित और हर्ष को गिरफ्तार किया था। इसके बाद ₹10 हजार के इनामी अनिल और ₹25 हजार के इनामी दीपक उर्फ हन्नी को भी गिरफ्तार किया जा चुका है। अब संजू और सागर की गिरफ्तारी से मामले में पुलिस की कार्रवाई आगे बढ़ी है। पुलिस अन्य फरार आरोपियों की तलाश में लगातार दबिश दे रही है।
    user_Neeraj Maheshwari
    Neeraj Maheshwari
    Reporters राजगढ़, अलवर, राजस्थान•
    6 hrs ago
  • *हत्यारे प्रभाकरण को राजीव गांधी ने खुद दी बुलेटप्रूफ जैकेट:* सेना के हेलिकॉप्टर से गुपचुप पहुंचा था दिल्ली, बेटे राहुल से मंगवाकर गिफ्ट दी एक खास रिपोर्ट: जून 1985 का एक दिन। दिल्ली का पांच सितारा अशोका होटल। समय- दोपहर के करीब 2 बजे। होटल की पांचवीं मंजिल पर अचानक हलचल बढ़ गई। गलियारे को एसपीजी जवानों ने घेर लिया। आने-जाने वाले हर शख्स पर नजर। सबसे ज्यादा सुरक्षा कमरा नंबर- 518 के आसपास। तभी एसपीजी के घेरे में तीन लोग कमरा नंबर-518 की तरफ बढ़े। सबसे आगे चल रहा शख्स करीब साढ़े पांच फीट लंबा। सांवला रंग। वह धीरे-धीरे कमरे के दरवाजे तक पहुंचा। दरवाजा खुला। तीनों अंदर गए। आगे चल रहे शख्स ने कमरे में चारों तरफ नजर दौड़ाई और एक कुर्सी पर जाकर बैठ गया। बाकी दोनों साथी, महिंद्रराजा उर्फ महात्या और एंटोन बालासिंगम उसके पीछे खड़े हो गए। तभी आईबी अफसरों की नजर तीनों के गले पर पड़ी। उनके गले में काले धागे से बंधी कांच की शीशियां लटक रही थीं। पहली नजर में वह किसी ताबीज जैसी लग रही थीं। एक अफसर ने चौंककर पूछा- ये क्या है? जवाब मिला- साइनाइड। साइनाइड एक ऐसा केमिकल होता है, जिसे मुंह में रखते ही मिनटों में मौत हो जाती है। अफसर सोच में पड़ गए कि यह गले में मौत का सामान लटकाकर क्यों घूम रहा है? दरअसल, जिस शख्स के गले में यह कैप्सूल था, उसे कुछ देर बाद भारत के प्रधानमंत्री से मिलना था। नाम था- वेलुपिल्लई प्रभाकरन। वही प्रभाकरन, जो लिट्टे यानी लिबरेशन टाइगर्स ऑफ तमिल ईलम का प्रमुख था। प्रभाकरन और लिट्‌टे श्रीलंका में तमिल भाषियों के लिए अलग देश की मांग के लिए वहां की फौज से लड़ रहे थे। अब एसपीजी से घिरे प्रभाकरन और उसके साथियों को होटल से बाहर निकाला गया। वाहनों का काफिला काफिला 7, रेसकोर्स रोड की ओर बढ़ा। तब प्रधानमंत्री आवास का यही पता था। कुछ देर बाद, काफिला प्रधानमंत्री आवास पहुंच गया। प्रभाकरन और उसके साथियों को अंदर ले जाया गया। तीनों को एक कमरे में बैठा दिया गया। कुछ देर बाद एक अधिकारी कमरे में दाखिल हुआ। उन्होंने प्रभाकरन और उसके साथियों के गले में लटके कैप्सूल की तरफ इशारा किया। कहा- ‘इसे उतार दीजिए।’ दोनों साथियों ने चुपचाप कैप्सूल उतार दिए, लेकिन प्रभाकरन ने कैप्सूल कसकर पकड़ लिया। बोला- ‘यह मेरी सुरक्षा के लिए है, इसे नहीं उतार सकता’ अधिकारी ने समझाया- ‘यहां कोई खतरा नहीं है। उतार दीजिए।’ वह फिर बोला- ‘नहीं।’ अधिकारी समझाते रहे। प्रभाकरन नहीं माना। करीब 45 मिनट तक यही चलता रहा। आखिर सुरक्षा अधिकारी दूसरे कमरे में पहुंचे, वहां प्रधानमंत्री राजीव गांधी मौजूद थे। अधिकारियों ने राजीव को साइनाइड कैप्सूल वाली बात बताई। कुछ पल खामोशी के बाद राजीव बोले- ‘उसे कैप्सूल के साथ ही आने दो।’ अफसर घबराकर बोले- ‘सर, सिक्योरिटी का मामला है। खतरा हो सकता है…’ राजीव ने बात काटी और बोले– ‘कोई गड़बड़ नहीं होगी।’ अधिकारी फिर प्रभाकरन के कमरे में पहुंचे। प्रभाकरन से बोले- ‘ठीक है, कैप्सूल मत उतारो, लेकिन एक शर्त है। तुम्हारे करीब हमारे दो कमांडो रहेंगे।’ प्रभाकरन ने कहा- ‘मंजूर है।’ अगली मुश्किल थी- प्रधानमंत्री और प्रभाकरन के बीच कितनी दूरी रखी जाए? अधिकारियों ने कमरे के बीचों बीच मेज रखी ताकि दूरी इतनी रहे एक-दूसरे को छू न सकें। फिर प्रभाकरन को अंदर लाने का मैसेज भेजा गया। वह सोफे से उठा। शर्ट ठीक की और दूसरे कमरे की तरफ बढ़ा। पीछे उसके दोनों साथी थे। दरवाजा खुला। कुछ अफसर पहले अंदर गए। फिर प्रभाकरन ने कमरे में कदम रखा। सामने बैठे शख्स को देखा। अभिवादन किया। सामने थे प्रधानमंत्री राजीव गांधी। राजीव ने प्रभाकरन को सामने रखी कुर्सी पर बैठने का इशारा किया। एक तरफ राजीव गांधी, दूसरी तरफ प्रभाकरन और दोनों के बीच दो बड़ी मेजें। कुछ पल खामोशी रही। फिर राजीव ने कहा- ‘प्रभाकरन, मुझे लगता है तुम्हें हथियार डाल देने चाहिए।’ प्रभाकरन ने सामने देखा। ‘हथियार तो डाल दें, लेकिन हमारी मांगों का क्या?’ राजीव ने प्रभाकरन को उस समझौते की शर्तें समझानी शुरू कीं, जिसमें श्रीलंका के तमिलों को राजनीतिक अधिकार देने की बात थी। प्रभाकरन चुपचाप सुनता रहा। फिर प्रभाकरन ने तीन खास सवाल पूछे- पहला- ‘अगर श्रीलंका सरकार अपना वादा तोड़ दे तो?’ दूसरा- ‘तमिलों की सुरक्षा की गारंटी कौन देगा?’ तीसरा- ‘लिट्‌टे के खिलाफ श्रीलंकाई सेना कब हटेगी?’ राजीव सुनते रहे, समझाते रहे। एक घंटे बात चली, लेकिन प्रभाकरन अलग देश की मांग पर अड़ा रहा। राजीव चाहते थे कि तमिलों को श्रीलंका में ही राजनीतिक अधिकार मिलें। बातचीत खत्म हुई। प्रभाकरन वापस श्रीलंका चला गया। अब इस वाक्ये के पीछे की कहानी को समझने के लिए करीब चार दशक पीछे जाना होगा। कहानी शुरू होती है 1948 से- इसी साल श्रीलंका आजाद हुआ था। आजादी के बाद बहुसंख्यक सिंहली बौद्धों और अल्पसंख्यक तमिल हिंदुओं के बीच तनाव बढ़ने लगा- भाषा, शिक्षा, नौकरी, राजनीतिक अधिकारों को लेकर असंतोष गहराता गया। शुरुआत में मांगें राजनीतिक थीं, पर धीरे-धीरे तमिल युवाओं में विद्रोह पनपने लगा। 1970 के दशक तक कई सशस्त्र संगठन सामने आ चुके थे- इन्हीं में से एक था लिट्टे, जिसकी कमान 1976 से प्रभाकरन ने संभाली। उसका लक्ष्य श्रीलंका के उत्तर-पूर्व में अलग तमिल राष्ट्र, तमिल ईलम बनाने का था। समय बीतता गया, लिट्टे श्रीलंका का सबसे ताकतवर तमिल अलगाववादी संगठन बन गया। फिर आया 1983। 23 जुलाई को जाफना के तिरुनेलवेली इलाके में श्रीलंकाई सेना का एक गश्ती दल गुजर रहा था। लिट्टे की बिछाई बारूदी सुरंग में धमाका हुआ, गोलियां बरसीं- कुछ मिनटों में सिंहली बाहुल्य सेना के 13 सैनिक मारे गए। अगले दिन सैनिकों के शव कोलंबो लाए गए। सरकार जल्द अंतिम संस्कार चाहती थी- डर था भीड़ जुटी तो हालात बिगड़ेंगे। पर तब तक खबर पूरे देश में फैल चुकी थी। कोलंबो में तमिलों के खिलाफ हिंसा भड़क उठी। भीड़ तमिल बस्तियों में घुसी, लोगों को घरों से निकालकर मारा गया, महिलाओं-बच्चियों के साथ बलात्कार हुआ, घर-दुकानें-कारखाने जलाए गए। हिंसा कोलंबो से निकलकर बाकी हिस्सों में भी फैल गई- एक हफ्ते चली इस हिंसा को ब्लैक जुलाई नाम दिया गया। तमिलों को लगने लगा, श्रीलंका में रहना मुश्किल है। जान बचाने लोग समुद्र पार कर तमिलनाडु आने लगे। भारत के सामने नई चुनौती खड़ी हुई- शरणार्थियों के साथ कहीं लिट्टे के लड़ाके भी न घुस आएं, वरना श्रीलंका की आग भारत तक पहुंच सकती थी। उधर श्रीलंका सरकार ने लिट्टे के खिलाफ सैन्य कार्रवाई तेज कर दी। अगले कुछ वर्षों में हालात ऐसे बने कि भारत को खुद इस संघर्ष में उतरना पड़ा। तारीख थी - 26 मई 1987। श्रीलंका सरकार ने जाफना के वडामाराच्ची इलाके पर कब्जे के लिए बड़ा सैन्य अभियान शुरू किया- नाम था ऑपरेशन लिबरेशन। सेना तेजी से आगे बढ़ रही थी। इधर, दिल्ली में राजीव गांधी के सामने दो बड़ी चुनौतियां थीं। पहली- तमिलों को श्रीलंका में राजनीतिक अधिकार दिलाना। दूसरी- श्रीलंका को टूटने से बचाना। राजीव चाहते थे लिट्टे हथियार छोड़े, बातचीत की मेज़ पर लौटे- क्योंकि श्रीलंका टूटा तो तमिलनाडु में भी अलगाववाद भड़कने का खतरा था। इसलिए उन्होंने सैन्य नहीं, राजनीतिक रास्ता तलाशना शुरू किया। भारत और श्रीलंका के बीच बातचीत शुरू हुई। कई दौर की बातचीत के बाद शांति समझौते का मसौदा तैयार हुआ, लेकिन असली पेंच बाकी था। समझौता तभी जमीन पर उतर सकता था, जब लिट्टे इसे माने। लेकिन लिट्टे को मनाना आसान नहीं था। सवाल था- प्रभाकरन को कौन मनाएगा? राजीव चाहते थे कि प्रभाकरन भारत आए और खुद समझौते की शर्तें सुने। प्रभाकरन को डर था कि भारत कहीं उसे जाल में न फंसा दे। भारत ने सुरक्षा की गारंटी दी। आखिर वह तैयार हुआ। 24 जुलाई 1987 की सुबह। श्रीलंका के जाफना के अम्मन मंदिर में भारतीय वायुसेना का हेलिकॉप्टर खड़ा था। प्रभाकरन दो साथियों के साथ पहुंचा और हेलिकॉप्टर भारत के लिए उड़ गया। पहला पड़ाव था तमिलनाडु का त्रिची, फिर दिल्ली। दिल्ली में खुद राजीव उसका इंतजार कर रहे थे। अशोका होटल के कमरा नंबर- 518 में प्रभाकरन को ठहराया गया। अगले चार दिनों तक होटल और प्रधानमंत्री आवास के बीच बातचीत के कई दौर चले। पांचवें दिन कहानी ने ऐसा मोड़ लिया, जिसकी गूंज 4 साल बाद सुनाई देने वाली थी। प्रभाकरन को श्रीलंका लौटना था, तभी राजीव ने उसे दूसरी बार मिलने बुला लिया। राजीव 17 साल के बेटे राहुल के साथ मौजूद थे। प्रभाकरन आया तो राजीव ने राहुल से कहा- ‘अंदर से मेरी बुलेटप्रूफ जैकेट लेकर आओ।’ राहुल जैकेट ले आए। राजीव ने उसे प्रभाकरन की ओर बढ़ाया, कंधों पर हाथ रखकर मुस्कुराए और बोले- ‘टेक केयर ऑफ योरसेल्फ’। कमरे में मौजूद अफसर हैरान थे। प्रभाकरन बुलेटप्रूफ जैकेट के साथ निकल गया। उसके जाते ही अफसरों ने राजीव से पूछा- क्या उसने हथियार डालने का वादा किया है? राजीव ने कहा- ‘उसने मुझे वचन दिया है।’ पूर्व विदेश मंत्री कुंवर नटवर सिंह ने अपनी किताब One Life Is Not Enough में इसका जिक्र किया है। नटवर सिंह ने पूछा था- क्या प्रभाकरन से लिखित सहमति ली गई? राजीव ने नाराजगी से कहा- ‘उसने मुझे वचन दिया है।’ लेकिन नटवर सिंह को उसके कहे पर भरोसा नहीं था। एमआर नारायण स्वामी ने The Rout of Prabhakaran में लिखा है कि कुछ भारतीय अधिकारियों ने सलाह दी थी कि लिट्टे के हथियार डालने तक प्रभाकरन को भारत में रखा जाए। राजीव ने सलाह नहीं मानी और यहीं से कहानी ने करवट ली। 29 जुलाई 1987 को प्रभाकरन को जाफना पहुंचा दिया गया। इसके कुछ घंटे बाद राजीव गांधी कोलंबो रवाना हुए। भारत-श्रीलंका शांति समझौते पर हस्ताक्षर हुए। समझौते को जमीन पर उतारने के लिए भारत ने अपनी सेना भेज दी। नाम था- इंडियन पीस कीपिंग फोर्स यानी IPKF। शुरुआत में सब सामान्य रहा, लेकिन प्रभाकरन हथियार डालने को तैयार नहीं था। सितंबर 1987 में लिट्टे ने हथियार डालने से इनकार कर दिया। अब भारतीय सेना और लिट्टे आमने-सामने थे। 10 अक्टूबर 1987 को IPKF ने लिट्टे के खिलाफ ऑपरेशन पवन शुरू किया। जाफना के जंगल और गांव युद्ध क्षेत्र में बदल गए। करीब दो साल संघर्ष चला। इस दौरान 1,165 भारतीय सैनिक मारे गए और 3,000 घायल हुए। भारत में सवाल उठने लगे- जिस सेना को शांति कायम करने भेजा गया था, वह श्रीलंका के गृहयुद्ध में क्यों उलझ गई? अभियान लंबा होता गया और सरकार पर दबाव बढ़ता गया। फिर 1989 में लोकसभा चुनाव आए। राजीव का श्रीलंका में सेना भेजने का फैसला, बोफोर्स समेत कई मुद्दे चुनाव में छाए रहे। राजीव चुनाव हार गए, कांग्रेस को सिर्फ 197 सीटें मिलीं। वीपी सिंह की अगुवाई में गठबंधन सरकार बनी। सरकार ने भारतीय सेना को श्रीलंका से वापस बुलाने का फैसला लिया। 24 मार्च 1990 को आखिरी टुकड़ी भारत लौट आई। लिट्टे ने इसे अपनी जीत माना। लेकिन कहानी खत्म नहीं हुई थी। जुलाई 1990 में राजीव गांधी ने एक इंटरव्यू में संकेत दिया कि सत्ता में लौटे तो भारत-श्रीलंका समझौता फिर लागू किया जा सकता है। जरूरत पड़ी तो सेना दोबारा श्रीलंका भेजी जा सकती है। प्रभाकरन को डर गया कि राजीव सत्ता में लौटे तो भारतीय सेना फिर श्रीलंका आ सकती है। 1991 में देश फिर आम चुनाव के मुहाने पर था। राजीव कांग्रेस के चुनाव अभियान में जुटे थे। 21 मई 1991। रात करीब 10 बजे। तमिलनाडु का श्रीपेरंबुदूर। राजीव गांधी चुनाव प्रचार के लिए पहुंचे थे। वह सुरक्षा घेरे से निकलकर लोगों के बीच जा रहे थे। कोई फूल दे रहा था। कोई हाथ मिलाना चाहता था। इसी भीड़ में एक युवती खड़ी थी। कोड नेम था- धनु, असली नाम- थेनमोझी राजरत्नम। वह लिट्टे की आत्मघाती कैडर थी। उसके हाथ में फूलों की माला थी। वह राजीव के सामने पहुंची। माला पहनाई। फिर पैर छूने के लिए झुकी। किसी को नहीं पता था कि उसके शरीर पर बम बंधा है। अगले ही पल तेज धमाका हुआ। नारों से गूंज रहा मैदान अचानक धुएं, मलबे और चीखों से भर गया। राजीव गांधी समेत 17 लोगों की मौत हुई। बाद की जांच, सीबीआई, जैन आयोग और अदालत की कार्यवाहियों में इस हत्या की साजिश के लिए लिट्टे और उसके प्रमुख प्रभाकरन को जिम्मेदार ठहराया गया। 1991 में कांग्रेस 244 सीटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी बनी। बहुमत से दूर थी, लेकिन सरकार बनाने का मौका कांग्रेस को मिला औैर पीवी नरसिम्हा राव प्रधानमंत्री बने। 4 साल पहले, जिस राजीव ने प्रभाकरन को अपनी बुलेटप्रूफ जैकेट पहनाई थी। कहा था- ‘टेक केयर ऑफ योरसेल्फ।’ उस वक्त किसी ने नहीं सोचा होगा कि यही शब्द एक ऐसी घटना की याद बन जाएंगे। इसके बाद हमेशा के लिए भारत की श्रीलंका नीति बदल गई। ***** रेफरेंस: 1- One Life Is Not Enough: By Natwar Singh 2- The Rout of Prabhakaran: By M. R. Narayan Swamy 3- India Today #copypast: दैनिक भास्कर
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    *हत्यारे प्रभाकरण को राजीव गांधी ने खुद दी बुलेटप्रूफ जैकेट:* सेना के हेलिकॉप्टर से गुपचुप पहुंचा था दिल्ली, बेटे राहुल से मंगवाकर गिफ्ट दी 
एक खास रिपोर्ट:
 

जून 1985 का एक दिन। दिल्ली का पांच सितारा अशोका होटल।
समय- दोपहर के करीब 2 बजे। होटल की पांचवीं मंजिल पर अचानक हलचल बढ़ गई। गलियारे को एसपीजी जवानों ने घेर लिया। आने-जाने वाले हर शख्स पर नजर। सबसे ज्यादा सुरक्षा कमरा नंबर- 518 के आसपास।
तभी एसपीजी के घेरे में तीन लोग कमरा नंबर-518 की तरफ बढ़े। सबसे आगे चल रहा शख्स करीब साढ़े पांच फीट लंबा। सांवला रंग। वह धीरे-धीरे कमरे के दरवाजे तक पहुंचा।
दरवाजा खुला। तीनों अंदर गए। आगे चल रहे शख्स ने कमरे में चारों तरफ नजर दौड़ाई और एक कुर्सी पर जाकर बैठ गया। बाकी दोनों साथी, महिंद्रराजा उर्फ महात्या और एंटोन बालासिंगम उसके पीछे खड़े हो गए।
तभी आईबी अफसरों की नजर तीनों के गले पर पड़ी। उनके गले में काले धागे से बंधी कांच की शीशियां लटक रही थीं। पहली नजर में वह किसी ताबीज जैसी लग रही थीं।
एक अफसर ने चौंककर पूछा- ये क्या है?
जवाब मिला- साइनाइड। साइनाइड एक ऐसा केमिकल होता है, जिसे मुंह में रखते ही मिनटों में मौत हो जाती है।
अफसर सोच में पड़ गए कि यह गले में मौत का सामान लटकाकर क्यों घूम रहा है?
दरअसल, जिस शख्स के गले में यह कैप्सूल था, उसे कुछ देर बाद भारत के प्रधानमंत्री से मिलना था। नाम था- वेलुपिल्लई प्रभाकरन। वही प्रभाकरन, जो लिट्टे यानी लिबरेशन टाइगर्स ऑफ तमिल ईलम का प्रमुख था। प्रभाकरन और लिट्‌टे श्रीलंका में तमिल भाषियों के लिए अलग देश की मांग के लिए वहां की फौज से लड़ रहे थे।
अब एसपीजी से घिरे प्रभाकरन और उसके साथियों को होटल से बाहर निकाला गया। वाहनों का काफिला काफिला 7, रेसकोर्स रोड की ओर बढ़ा। तब प्रधानमंत्री आवास का यही पता था।
कुछ देर बाद, काफिला प्रधानमंत्री आवास पहुंच गया।
प्रभाकरन और उसके साथियों को अंदर ले जाया गया। तीनों को एक कमरे में बैठा दिया गया।
कुछ देर बाद एक अधिकारी कमरे में दाखिल हुआ। उन्होंने प्रभाकरन और उसके साथियों के गले में लटके कैप्सूल की तरफ इशारा किया। कहा- ‘इसे उतार दीजिए।’
दोनों साथियों ने चुपचाप कैप्सूल उतार दिए, लेकिन प्रभाकरन ने कैप्सूल कसकर पकड़ लिया। बोला- ‘यह मेरी सुरक्षा के लिए है, इसे नहीं उतार सकता’
अधिकारी ने समझाया- ‘यहां कोई खतरा नहीं है। उतार दीजिए।’
वह फिर बोला- ‘नहीं।’
अधिकारी समझाते रहे। प्रभाकरन नहीं माना। करीब 45 मिनट तक यही चलता रहा। आखिर सुरक्षा अधिकारी दूसरे कमरे में पहुंचे, वहां प्रधानमंत्री राजीव गांधी मौजूद थे। अधिकारियों ने राजीव को साइनाइड कैप्सूल वाली बात बताई।
कुछ पल खामोशी के बाद राजीव बोले- ‘उसे कैप्सूल के साथ ही आने दो।’
अफसर घबराकर बोले- ‘सर, सिक्योरिटी का मामला है। खतरा हो सकता है…’
राजीव ने बात काटी और बोले– ‘कोई गड़बड़ नहीं होगी।’
अधिकारी फिर प्रभाकरन के कमरे में पहुंचे।
प्रभाकरन से बोले- ‘ठीक है, कैप्सूल मत उतारो, लेकिन एक शर्त है। तुम्हारे करीब हमारे दो कमांडो रहेंगे।’
प्रभाकरन ने कहा- ‘मंजूर है।’
अगली मुश्किल थी- प्रधानमंत्री और प्रभाकरन के बीच कितनी दूरी रखी जाए?
अधिकारियों ने कमरे के बीचों बीच मेज रखी ताकि दूरी इतनी रहे एक-दूसरे को छू न सकें। फिर प्रभाकरन को अंदर लाने का मैसेज भेजा गया।
वह सोफे से उठा। शर्ट ठीक की और दूसरे कमरे की तरफ बढ़ा। पीछे उसके दोनों साथी थे।
दरवाजा खुला। कुछ अफसर पहले अंदर गए। फिर प्रभाकरन ने कमरे में कदम रखा। सामने बैठे शख्स को देखा। अभिवादन किया। सामने थे प्रधानमंत्री राजीव गांधी।
राजीव ने प्रभाकरन को सामने रखी कुर्सी पर बैठने का इशारा किया।
एक तरफ राजीव गांधी, दूसरी तरफ प्रभाकरन और दोनों के बीच दो बड़ी मेजें। कुछ पल खामोशी रही। फिर राजीव ने कहा- ‘प्रभाकरन, मुझे लगता है तुम्हें हथियार डाल देने चाहिए।’
प्रभाकरन ने सामने देखा। ‘हथियार तो डाल दें, लेकिन हमारी मांगों का क्या?’
राजीव ने प्रभाकरन को उस समझौते की शर्तें समझानी शुरू कीं, जिसमें श्रीलंका के तमिलों को राजनीतिक अधिकार देने की बात थी। प्रभाकरन चुपचाप सुनता रहा।
फिर प्रभाकरन ने तीन खास सवाल पूछे-
पहला- ‘अगर श्रीलंका सरकार अपना वादा तोड़ दे तो?’
दूसरा- ‘तमिलों की सुरक्षा की गारंटी कौन देगा?’
तीसरा- ‘लिट्‌टे के खिलाफ श्रीलंकाई सेना कब हटेगी?’
राजीव सुनते रहे, समझाते रहे। एक घंटे बात चली, लेकिन प्रभाकरन अलग देश की मांग पर अड़ा रहा। राजीव चाहते थे कि तमिलों को श्रीलंका में ही राजनीतिक अधिकार मिलें। बातचीत खत्म हुई। प्रभाकरन वापस श्रीलंका चला गया।
अब इस वाक्ये के पीछे की कहानी को समझने के लिए करीब चार दशक पीछे जाना होगा।
कहानी शुरू होती है 1948 से- इसी साल श्रीलंका आजाद हुआ था।
आजादी के बाद बहुसंख्यक सिंहली बौद्धों और अल्पसंख्यक तमिल हिंदुओं के बीच तनाव बढ़ने लगा- भाषा, शिक्षा, नौकरी, राजनीतिक अधिकारों को लेकर असंतोष गहराता गया। शुरुआत में मांगें राजनीतिक थीं, पर धीरे-धीरे तमिल युवाओं में विद्रोह पनपने लगा।
1970 के दशक तक कई सशस्त्र संगठन सामने आ चुके थे- इन्हीं में से एक था लिट्टे, जिसकी कमान 1976 से प्रभाकरन ने संभाली। उसका लक्ष्य श्रीलंका के उत्तर-पूर्व में अलग तमिल राष्ट्र, तमिल ईलम बनाने का था।
समय बीतता गया, लिट्टे श्रीलंका का सबसे ताकतवर तमिल अलगाववादी संगठन बन गया।
फिर आया 1983। 23 जुलाई को जाफना के तिरुनेलवेली इलाके में श्रीलंकाई सेना का एक गश्ती दल गुजर रहा था। लिट्टे की बिछाई बारूदी सुरंग में धमाका हुआ, गोलियां बरसीं- कुछ मिनटों में सिंहली बाहुल्य सेना के 13 सैनिक मारे गए।
अगले दिन सैनिकों के शव कोलंबो लाए गए। सरकार जल्द अंतिम संस्कार चाहती थी- डर था भीड़ जुटी तो हालात बिगड़ेंगे। पर तब तक खबर पूरे देश में फैल चुकी थी।
कोलंबो में तमिलों के खिलाफ हिंसा भड़क उठी। भीड़ तमिल बस्तियों में घुसी, लोगों को घरों से निकालकर मारा गया, महिलाओं-बच्चियों के साथ बलात्कार हुआ, घर-दुकानें-कारखाने जलाए गए। हिंसा कोलंबो से निकलकर बाकी हिस्सों में भी फैल गई- एक हफ्ते चली इस हिंसा को ब्लैक जुलाई नाम दिया गया।
तमिलों को लगने लगा, श्रीलंका में रहना मुश्किल है। जान बचाने लोग समुद्र पार कर तमिलनाडु आने लगे।
भारत के सामने नई चुनौती खड़ी हुई- शरणार्थियों के साथ कहीं लिट्टे के लड़ाके भी न घुस आएं, वरना श्रीलंका की आग भारत तक पहुंच सकती थी।
उधर श्रीलंका सरकार ने लिट्टे के खिलाफ सैन्य कार्रवाई तेज कर दी। अगले कुछ वर्षों में हालात ऐसे बने कि भारत को खुद इस संघर्ष में उतरना पड़ा।
तारीख थी - 26 मई 1987। श्रीलंका सरकार ने जाफना के वडामाराच्ची इलाके पर कब्जे के लिए बड़ा सैन्य अभियान शुरू किया- नाम था ऑपरेशन लिबरेशन। सेना तेजी से आगे बढ़ रही थी।
इधर, दिल्ली में राजीव गांधी के सामने दो बड़ी चुनौतियां थीं।
पहली- तमिलों को श्रीलंका में राजनीतिक अधिकार दिलाना।
दूसरी- श्रीलंका को टूटने से बचाना।
राजीव चाहते थे लिट्टे हथियार छोड़े, बातचीत की मेज़ पर लौटे- क्योंकि श्रीलंका टूटा तो तमिलनाडु में भी अलगाववाद भड़कने का खतरा था। इसलिए उन्होंने सैन्य नहीं, राजनीतिक रास्ता तलाशना शुरू किया।
भारत और श्रीलंका के बीच बातचीत शुरू हुई। कई दौर की बातचीत के बाद शांति समझौते का मसौदा तैयार हुआ, लेकिन असली पेंच बाकी था।
समझौता तभी जमीन पर उतर सकता था, जब लिट्टे इसे माने। लेकिन लिट्टे को मनाना आसान नहीं था।
सवाल था- प्रभाकरन को कौन मनाएगा?
राजीव चाहते थे कि प्रभाकरन भारत आए और खुद समझौते की शर्तें सुने। प्रभाकरन को डर था कि भारत कहीं उसे जाल में न फंसा दे।
भारत ने सुरक्षा की गारंटी दी। आखिर वह तैयार हुआ।
24 जुलाई 1987 की सुबह। श्रीलंका के जाफना के अम्मन मंदिर में भारतीय वायुसेना का हेलिकॉप्टर खड़ा था। प्रभाकरन दो साथियों के साथ पहुंचा और हेलिकॉप्टर भारत के लिए उड़ गया। पहला पड़ाव था तमिलनाडु का त्रिची, फिर दिल्ली।
दिल्ली में खुद राजीव उसका इंतजार कर रहे थे। अशोका होटल के कमरा नंबर- 518 में प्रभाकरन को ठहराया गया। अगले चार दिनों तक होटल और प्रधानमंत्री आवास के बीच बातचीत के कई दौर चले।
पांचवें दिन कहानी ने ऐसा मोड़ लिया, जिसकी गूंज 4 साल बाद सुनाई देने वाली थी।
प्रभाकरन को श्रीलंका लौटना था, तभी राजीव ने उसे दूसरी बार मिलने बुला लिया। राजीव 17 साल के बेटे राहुल के साथ मौजूद थे।
प्रभाकरन आया तो राजीव ने राहुल से कहा- ‘अंदर से मेरी बुलेटप्रूफ जैकेट लेकर आओ।’
राहुल जैकेट ले आए। राजीव ने उसे प्रभाकरन की ओर बढ़ाया, कंधों पर हाथ रखकर मुस्कुराए और बोले- ‘टेक केयर ऑफ योरसेल्फ’।
कमरे में मौजूद अफसर हैरान थे।
प्रभाकरन बुलेटप्रूफ जैकेट के साथ निकल गया। उसके जाते ही अफसरों ने राजीव से पूछा- क्या उसने हथियार डालने का वादा किया है?
राजीव ने कहा- ‘उसने मुझे वचन दिया है।’
पूर्व विदेश मंत्री कुंवर नटवर सिंह ने अपनी किताब One Life Is Not Enough में इसका जिक्र किया है। नटवर सिंह ने पूछा था- क्या प्रभाकरन से लिखित सहमति ली गई?
राजीव ने नाराजगी से कहा- ‘उसने मुझे वचन दिया है।’ लेकिन नटवर सिंह को उसके कहे पर भरोसा नहीं था।
एमआर नारायण स्वामी ने The Rout of Prabhakaran में लिखा है कि कुछ भारतीय अधिकारियों ने सलाह दी थी कि लिट्टे के हथियार डालने तक प्रभाकरन को भारत में रखा जाए।
राजीव ने सलाह नहीं मानी और यहीं से कहानी ने करवट ली।
29 जुलाई 1987 को प्रभाकरन को जाफना पहुंचा दिया गया। इसके कुछ घंटे बाद राजीव गांधी कोलंबो रवाना हुए।
भारत-श्रीलंका शांति समझौते पर हस्ताक्षर हुए। समझौते को जमीन पर उतारने के लिए भारत ने अपनी सेना भेज दी।
नाम था- इंडियन पीस कीपिंग फोर्स यानी IPKF।
शुरुआत में सब सामान्य रहा, लेकिन प्रभाकरन हथियार डालने को तैयार नहीं था। सितंबर 1987 में लिट्टे ने हथियार डालने से इनकार कर दिया। अब भारतीय सेना और लिट्टे आमने-सामने थे।
10 अक्टूबर 1987 को IPKF ने लिट्टे के खिलाफ ऑपरेशन पवन शुरू किया। जाफना के जंगल और गांव युद्ध क्षेत्र में बदल गए। करीब दो साल संघर्ष चला। इस दौरान 1,165 भारतीय सैनिक मारे गए और 3,000 घायल हुए।
भारत में सवाल उठने लगे- जिस सेना को शांति कायम करने भेजा गया था, वह श्रीलंका के गृहयुद्ध में क्यों उलझ गई? अभियान लंबा होता गया और सरकार पर दबाव बढ़ता गया।
फिर 1989 में लोकसभा चुनाव आए। राजीव का श्रीलंका में सेना भेजने का फैसला, बोफोर्स समेत कई मुद्दे चुनाव में छाए रहे।
राजीव चुनाव हार गए, कांग्रेस को सिर्फ 197 सीटें मिलीं। वीपी सिंह की अगुवाई में गठबंधन सरकार बनी। सरकार ने भारतीय सेना को श्रीलंका से वापस बुलाने का फैसला लिया।
24 मार्च 1990 को आखिरी टुकड़ी भारत लौट आई। लिट्टे ने इसे अपनी जीत माना।
लेकिन कहानी खत्म नहीं हुई थी।
जुलाई 1990 में राजीव गांधी ने एक इंटरव्यू में संकेत दिया कि सत्ता में लौटे तो भारत-श्रीलंका समझौता फिर लागू किया जा सकता है। जरूरत पड़ी तो सेना दोबारा श्रीलंका भेजी जा सकती है।
प्रभाकरन को डर गया कि राजीव सत्ता में लौटे तो भारतीय सेना फिर श्रीलंका आ सकती है। 1991 में देश फिर आम चुनाव के मुहाने पर था। राजीव कांग्रेस के चुनाव अभियान में जुटे थे।
21 मई 1991। रात करीब 10 बजे। तमिलनाडु का श्रीपेरंबुदूर। राजीव गांधी चुनाव प्रचार के लिए पहुंचे थे। वह सुरक्षा घेरे से निकलकर लोगों के बीच जा रहे थे। कोई फूल दे रहा था। कोई हाथ मिलाना चाहता था।
इसी भीड़ में एक युवती खड़ी थी। कोड नेम था- धनु, असली नाम- थेनमोझी राजरत्नम। वह लिट्टे की आत्मघाती कैडर थी। उसके हाथ में फूलों की माला थी।
वह राजीव के सामने पहुंची। माला पहनाई। फिर पैर छूने के लिए झुकी। किसी को नहीं पता था कि उसके शरीर पर बम बंधा है।
अगले ही पल तेज धमाका हुआ। नारों से गूंज रहा मैदान अचानक धुएं, मलबे और चीखों से भर गया। राजीव गांधी समेत 17 लोगों की मौत हुई।
बाद की जांच, सीबीआई, जैन आयोग और अदालत की कार्यवाहियों में इस हत्या की साजिश के लिए लिट्टे और उसके प्रमुख प्रभाकरन को जिम्मेदार ठहराया गया।
1991 में कांग्रेस 244 सीटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी बनी। बहुमत से दूर थी, लेकिन सरकार बनाने का मौका कांग्रेस को मिला औैर पीवी नरसिम्हा राव प्रधानमंत्री बने।
4 साल पहले, जिस राजीव ने प्रभाकरन को अपनी बुलेटप्रूफ जैकेट पहनाई थी। कहा था- ‘टेक केयर ऑफ योरसेल्फ।’ उस वक्त किसी ने नहीं सोचा होगा कि यही शब्द एक ऐसी घटना की याद बन जाएंगे।
इसके बाद हमेशा के लिए भारत की श्रीलंका नीति बदल गई।
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रेफरेंस:
1- One Life Is Not Enough: By Natwar Singh
2- The Rout of Prabhakaran: By M. R. Narayan Swamy
3- India Today
#copypast: दैनिक भास्कर
    user_Shyamveer Choudhary
    Shyamveer Choudhary
    Farmer लक्ष्मणगढ़, अलवर, राजस्थान•
    8 hrs ago
  • कोटपूतली-बहरोड़, जिला कलक्टर सोहन सिंह नरुका की अध्यक्षता में शुक्रवार को सेवा संकल्प अभियान के अंतर्गत जिला स्तरीय युवा संवाद कार्यक्रम का आयोजन कलेक्ट्रेट सभागार में किया गया। कार्यक्रम के दौरान बिडला ऑडिटोरियम, जयपुर में आयोजित राज्य स्तरीय युवा संवाद कार्यक्रम का लाइव प्रसारण किया गया, जिसे जिले के युवाओं ने उत्साहपूर्वक देखा और सुना। राज्य स्तरीय युवा संवाद कार्यक्रम में मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा, सांसद नितिन नवीन एवं सांसद मदन राठौड़ ने युवाओं से संवाद करते हुए उनकी उपलब्धियों, विजन एवं अपेक्षाओं के बारे में विस्तार से जानकारी ली। उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सार्वजनिक जीवन में सेवा के 25 वर्ष पूर्ण होने पर उनके राष्ट्र सेवा के प्रति समर्पण तथा विकसित भारत-2047 के विजन पर विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि विकसित भारत-विकसित राजस्थान 2047 हम सभी का सपना होना चाहिए। राष्ट्र प्रथम की भावना को आत्मसात करते हुए युवाओं से नशे सहित अन्य कुरीतियों के उन्मूलन के लिए एकजुट होकर कार्य करने का आह्वान किया। इस अवसर पर अतिरिक्त जिला कलक्टर सोहन सिंह नरुका ने युवाओं को संबोधित करते हुए कहा कि युवा किसी भी राष्ट्र की ऊर्जा, शक्ति और परिवर्तन के प्रमुख वाहक होते हैं। उन्होंने युवाओं से अपने लक्ष्य निर्धारित कर निरंतर मेहनत एवं सकारात्मक सोच के साथ आगे बढ़ने तथा समाज एवं राष्ट्र के विकास में सक्रिय भागीदारी निभाने का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि विकसित भारत के संकल्प को साकार करने में युवाओं की भूमिका महत्वपूर्ण है। युवा अपनी प्रतिभा, नवाचार एवं रचनात्मक सोच का उपयोग करते हुए स्वयं के साथ-साथ समाज के विकास में भी योगदान दें। उन्होंने युवाओं से नशे एवं अन्य सामाजिक कुरीतियों से दूर रहने तथा अपने आसपास के युवाओं को भी इनके दुष्प्रभावों के प्रति जागरूक करने की अपील की। उन्होंने कहा कि युवा शक्ति को सही दिशा और सकारात्मक उद्देश्यों से जोड़कर जिले एवं प्रदेश के विकास को नई गति दी जा सकती है। कार्यक्रम में बड़ी संख्या में युवा उपस्थित रहे तथा उन्होंने राज्य स्तरीय युवा संवाद कार्यक्रम को देखा एवं सुना। ---०००---
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    कोटपूतली-बहरोड़, जिला कलक्टर सोहन सिंह नरुका की अध्यक्षता में शुक्रवार को सेवा संकल्प अभियान के अंतर्गत जिला स्तरीय युवा संवाद कार्यक्रम का आयोजन कलेक्ट्रेट सभागार में किया गया। कार्यक्रम के दौरान बिडला ऑडिटोरियम, जयपुर में आयोजित राज्य स्तरीय युवा संवाद कार्यक्रम का लाइव प्रसारण किया गया, जिसे जिले के युवाओं ने उत्साहपूर्वक देखा और सुना।

राज्य स्तरीय युवा संवाद कार्यक्रम में मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा, सांसद नितिन नवीन एवं सांसद मदन राठौड़ ने युवाओं से संवाद करते हुए उनकी उपलब्धियों, विजन एवं अपेक्षाओं के बारे में विस्तार से जानकारी ली। उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सार्वजनिक जीवन में सेवा के 25 वर्ष पूर्ण होने पर उनके राष्ट्र सेवा के प्रति समर्पण तथा विकसित भारत-2047 के विजन पर विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि विकसित भारत-विकसित राजस्थान 2047 हम सभी का सपना होना चाहिए। राष्ट्र प्रथम की भावना को आत्मसात करते हुए युवाओं से नशे सहित अन्य कुरीतियों के उन्मूलन के लिए एकजुट होकर कार्य करने का आह्वान किया।

इस अवसर पर अतिरिक्त जिला कलक्टर सोहन सिंह नरुका ने युवाओं को संबोधित करते हुए कहा कि युवा किसी भी राष्ट्र की ऊर्जा, शक्ति और परिवर्तन के प्रमुख वाहक होते हैं। उन्होंने युवाओं से अपने लक्ष्य निर्धारित कर निरंतर मेहनत एवं सकारात्मक सोच के साथ आगे बढ़ने तथा समाज एवं राष्ट्र के विकास में सक्रिय भागीदारी निभाने का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि विकसित भारत के संकल्प को साकार करने में युवाओं की भूमिका महत्वपूर्ण है। युवा अपनी प्रतिभा, नवाचार एवं रचनात्मक सोच का उपयोग करते हुए स्वयं के साथ-साथ समाज के विकास में भी योगदान दें।

उन्होंने युवाओं से नशे एवं अन्य सामाजिक कुरीतियों से दूर रहने तथा अपने आसपास के युवाओं को भी इनके दुष्प्रभावों के प्रति जागरूक करने की अपील की। उन्होंने कहा कि युवा शक्ति को सही दिशा और सकारात्मक उद्देश्यों से जोड़कर जिले एवं प्रदेश के विकास को नई गति दी जा सकती है।

कार्यक्रम में बड़ी संख्या में युवा उपस्थित रहे तथा उन्होंने राज्य स्तरीय युवा संवाद कार्यक्रम को देखा एवं सुना।

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    user_Kotputli-Behror
    Kotputli-Behror
    कोटपूतली, जयपुर, राजस्थान•
    2 hrs ago
  • चेयरमैन जी को बधाई… अब सड़कों की भी बारी! सीकरी नगरपालिका के चेयरमैन जी ने पदभार संभाल लिया है। शहर की सड़कें पहले से ही गड्ढों से बेहाल हैं और हाल ही में कई ट्रॉलियां गड्ढों में फंसकर पलटने की बात सामने आई है। जनता का मजेदार सवाल— चेयरमैन जी, कुर्सी तो संभाल ली… अब सीकरी की सड़कें कब संभलेंगी? 📍 सीकरी | ब्रज मेवात टाइम्स #Sikri #SikriNews #BrajMewatTimes #SikriMunicipality #RoadProblem #सीकरी
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    चेयरमैन जी को बधाई… अब सड़कों की भी बारी! सीकरी नगरपालिका के चेयरमैन जी ने पदभार संभाल लिया है।
शहर की सड़कें पहले से ही गड्ढों से बेहाल हैं और हाल ही में कई ट्रॉलियां गड्ढों में फंसकर पलटने की बात सामने आई है।
जनता का मजेदार सवाल—
चेयरमैन जी, कुर्सी तो संभाल ली… अब सीकरी की सड़कें कब संभलेंगी? 
📍 सीकरी | ब्रज मेवात टाइम्स
#Sikri #SikriNews #BrajMewatTimes #SikriMunicipality #RoadProblem #सीकरी
    user_SANDEEP SHARMA
    SANDEEP SHARMA
    News Anchor सीकरी, भरतपुर, राजस्थान•
    4 hrs ago
  • विराटनगर के स्थित आज मालाखेड़ा मंडल के हल्दीना में आंगन मिलन सेवा अभियान के अंतर्गत आयोजित कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में रिंकी वर्मा भाजपा नेत्री ने सहभागिता की। साथ में सीडीपीओ सहित सभी आंगनबाड़ी कार्यकर्ता बहनों, सहयोगिनियों एवं साथिनों की गरिमामयी उपस्थिति रही। इस दौरान लाभार्थी बहनो को सम्मानित किया मातृशक्ति एवं क्षेत्रवासियों से आत्मीय संवाद कर उनकी समस्याओं, आवश्यकताओं एवं सुझावों को सुना तथा जनसेवा के लिए निरंतर कार्य करने का संकल्प लिया। महिलाओं की सहभागिता, उनका विश्वास और उत्साह इस अभियान की सबसे बड़ी शक्ति है। सेवा, संवाद और जनकल्याण के संकल्प के साथ निरंतर आगे बढ़ते रहेंगे।
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    विराटनगर के स्थित आज मालाखेड़ा मंडल के हल्दीना में आंगन मिलन सेवा अभियान के अंतर्गत आयोजित कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में रिंकी वर्मा भाजपा नेत्री ने सहभागिता की।
साथ में सीडीपीओ सहित सभी आंगनबाड़ी कार्यकर्ता बहनों, सहयोगिनियों एवं साथिनों की गरिमामयी उपस्थिति रही। 

इस दौरान लाभार्थी बहनो को सम्मानित किया मातृशक्ति एवं क्षेत्रवासियों से आत्मीय संवाद कर उनकी समस्याओं, आवश्यकताओं एवं सुझावों को सुना तथा जनसेवा के लिए निरंतर कार्य करने का संकल्प लिया।

महिलाओं की सहभागिता, उनका विश्वास और उत्साह इस अभियान की सबसे बड़ी शक्ति है। 

सेवा, संवाद और जनकल्याण के संकल्प के साथ निरंतर आगे बढ़ते रहेंगे।
    user_Raj.JANTA SEVA-84 NEWS
    Raj.JANTA SEVA-84 NEWS
    रिपोर्टर Viratnagar, Jaipur•
    9 hrs ago
  • बहरोड़, अखिल भारतीय अग्रवाल सम्मेलन ने बहरोड़ निवासी संजय अग्रवाल को पूर्वी राजस्थान का प्रदेश उपाध्यक्ष मनोनीत किया है। सम्मेलन के प्रदेश अध्यक्ष अशोक गर्ग एवं प्रदेश महामंत्री गोपाल अग्रवाल की ओर से जारी मनोनयन पत्र में संजय अग्रवाल को यह जिम्मेदारी सौंपी गई है।
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    बहरोड़, अखिल भारतीय अग्रवाल सम्मेलन ने बहरोड़ निवासी संजय अग्रवाल को पूर्वी राजस्थान का प्रदेश उपाध्यक्ष मनोनीत किया है।
सम्मेलन के प्रदेश अध्यक्ष अशोक गर्ग एवं प्रदेश महामंत्री गोपाल अग्रवाल की ओर से जारी मनोनयन पत्र में संजय अग्रवाल को यह जिम्मेदारी सौंपी गई है।
    user_NARESH Kumar Khanna
    NARESH Kumar Khanna
    Local News Reporter बहरोड़, अलवर, राजस्थान•
    2 hrs ago
  • आतंकी हाफिज पर सवाल से भागे पाकिस्तान PM शहबाज:* UN में पत्रकारों ने पूछा- आतंकियों को पनाह देना कब बंद करेंगे; कोई जवाब नहीं दिया पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ गुरुवार को संयुक्त राष्ट्र मुख्यालय पहुंचे। UN मुख्यालय में दाखिल होते समय पत्रकारों ने शहबाज से पूछा, ‘प्रधानमंत्री, आप आतंकियों को पनाह देना कब बंद करेंगे?’ शहबाज ने इस सवाल का जवाब नहीं दिया। लेकिन शहबाज ने दोबारा कोई जवाब नहीं दिया। लश्कर-ए-तैयबा के संस्थापक हाफिज सईद को लेकर सवाल किया, लेकिन शहबाज सवालों को नजरअंदाज करते हुए आगे बढ़ गए। हाफिज सईद 26/11 मामले में आरोपी यहां पत्रकारों ने उनसे
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    आतंकी हाफिज पर सवाल से भागे पाकिस्तान PM शहबाज:* UN में पत्रकारों ने पूछा- आतंकियों को पनाह देना कब बंद करेंगे; कोई जवाब नहीं दिया 
पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ गुरुवार को संयुक्त राष्ट्र मुख्यालय पहुंचे। 
UN मुख्यालय में दाखिल होते समय पत्रकारों ने शहबाज से पूछा, ‘प्रधानमंत्री, आप आतंकियों को पनाह देना कब बंद करेंगे?’
शहबाज ने इस सवाल का जवाब नहीं दिया।  लेकिन शहबाज ने दोबारा कोई जवाब नहीं दिया। लश्कर-ए-तैयबा के संस्थापक हाफिज सईद को लेकर सवाल किया, 
लेकिन शहबाज सवालों को नजरअंदाज करते हुए आगे बढ़ गए।
हाफिज सईद 26/11 मामले में आरोपी
यहां पत्रकारों ने उनसे
    user_Shyamveer Choudhary
    Shyamveer Choudhary
    Farmer लक्ष्मणगढ़, अलवर, राजस्थान•
    9 hrs ago
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