छत्तीसगढ़ के बिलासपुर में महज़ 15 घंटे की मूसलाधार बारिश ने बिलासपुर नगर निगम और जिला प्रशासन के दावों की पोल खोलकर रख दी है। हर साल मानसून से पहले नालों की सफाई और ड्रेनेज सिस्टम दुरुस्त करने के नाम पर करोड़ों रुपये फूंकने वाले प्रशासन की विफलता के कारण पूरा शहर 'जलपुर' में तब्दील हो चुका है। शहर की रफ्तार पूरी तरह थम गई है और जिन सड़कों पर रोजाना गाड़ियां दौड़ती थीं, वहां अब प्रशासनिक नाकामी के चलते रेस्क्यू और फ्लोटिंग नावें तैरती नजर आ रही हैं। घटिया ड्रेनेज सिस्टम और बंद नालों के कारण पानी की निकासी के कोई ठोस इंतजाम नहीं किए गए, जिससे प्रमुख रिहायशी इलाकों और मुख्य सड़कों पर घुटनों से लेकर कमर तक पानी भर गया है। नालियों की समय पर सफाई न होने से बारिश का गंदा पानी बैक मारकर लोगों के ड्राइंग रूम और किचन तक में घुस गया है, जिससे लाखों लोगों का जनजीवन पूरी तरह अस्त-व्यस्त हो चुका है। ड्रेनेज फेल होने के कारण पॉश और निचली कॉलोनियों के लोग अपने ही घरों में कैद हो गए हैं और उनके सामने खाने-पीने व जरूरी सामानों की भारी किल्लत पैदा हो गई है। कागजों पर दिखाई गई प्री-मानसून तैयारियां हकीकत के धरातल पर पूरी तरह फ्लॉप साबित हुई हैं। इस नरकीय स्थिति से आक्रोशित जनता सीधे नगर निगम और स्थानीय प्रशासन को जिम्मेदार ठहराते हुए सवाल पूछ रही है। लोगों का सीधा सवाल है कि आखिर हर साल मानसून तैयारियों के नाम पर पास होने वाला करोड़ों का बजट किसकी जेब में जाता है? क्या अधिकारियों को 15 घंटे की बारिश झेलने लायक ड्रेनेज सिस्टम बनाने की सुध नहीं थी, और क्या प्रशासन लोगों के नुकसान व मानसिक प्रताड़ना की जिम्मेदारी लेगा या हर बार की तरह इसे 'प्राकृतिक आपदा' बताकर पल्ला झाड़ लेगा? बिलासपुर की यह बदहाली साफ बयां कर रही है कि यह कोई प्राकृतिक आपदा नहीं, बल्कि घोर प्रशासनिक लापरवाही और कुप्रबंधन का नतीजा है, जिस पर जिम्मेदार अधिकारियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई होनी बेहद जरूरी है।
छत्तीसगढ़ के बिलासपुर में महज़ 15 घंटे की मूसलाधार बारिश ने बिलासपुर नगर निगम और जिला प्रशासन के दावों की पोल खोलकर रख दी है। हर साल मानसून से पहले नालों की सफाई और ड्रेनेज सिस्टम दुरुस्त करने के नाम पर करोड़ों रुपये फूंकने वाले प्रशासन की विफलता के कारण पूरा शहर 'जलपुर' में तब्दील हो चुका है। शहर की रफ्तार पूरी तरह थम गई है और जिन सड़कों पर रोजाना गाड़ियां दौड़ती थीं, वहां अब प्रशासनिक नाकामी के चलते रेस्क्यू और फ्लोटिंग नावें तैरती नजर आ रही हैं। घटिया ड्रेनेज सिस्टम और बंद नालों के कारण पानी की निकासी के कोई ठोस इंतजाम नहीं किए गए, जिससे प्रमुख रिहायशी इलाकों और मुख्य सड़कों पर घुटनों से लेकर कमर तक पानी भर गया है। नालियों की समय पर सफाई न होने से बारिश का गंदा पानी बैक मारकर लोगों के ड्राइंग रूम और किचन तक में घुस गया है, जिससे लाखों लोगों का जनजीवन पूरी तरह अस्त-व्यस्त हो चुका है। ड्रेनेज फेल होने के कारण
पॉश और निचली कॉलोनियों के लोग अपने ही घरों में कैद हो गए हैं और उनके सामने खाने-पीने व जरूरी सामानों की भारी किल्लत पैदा हो गई है। कागजों पर दिखाई गई प्री-मानसून तैयारियां हकीकत के धरातल पर पूरी तरह फ्लॉप साबित हुई हैं। इस नरकीय स्थिति से आक्रोशित जनता सीधे नगर निगम और स्थानीय प्रशासन को जिम्मेदार ठहराते हुए सवाल पूछ रही है। लोगों का सीधा सवाल है कि आखिर हर साल मानसून तैयारियों के नाम पर पास होने वाला करोड़ों का बजट किसकी जेब में जाता है? क्या अधिकारियों को 15 घंटे की बारिश झेलने लायक ड्रेनेज सिस्टम बनाने की सुध नहीं थी, और क्या प्रशासन लोगों के नुकसान व मानसिक प्रताड़ना की जिम्मेदारी लेगा या हर बार की तरह इसे 'प्राकृतिक आपदा' बताकर पल्ला झाड़ लेगा? बिलासपुर की यह बदहाली साफ बयां कर रही है कि यह कोई प्राकृतिक आपदा नहीं, बल्कि घोर प्रशासनिक लापरवाही और कुप्रबंधन का नतीजा है, जिस पर जिम्मेदार अधिकारियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई होनी बेहद जरूरी है।
- बिलासपुर जिले के रतनपुर थाना क्षेत्र के अंतर्गत ग्राम नवागांव (गिरजाबंद) में रिश्तों को शर्मसार कर देने वाली एक दर्दनाक घटना सामने आई है। यहां शराब के नशे में धुत एक बेटे ने मामूली बात पर अपने ही पिता की डंडे से वार कर बेरहमी से हत्या कर दी। घटना की सूचना मिलते ही रतनपुर पुलिस ने त्वरित कार्रवाई करते हुए आरोपी को कुछ ही समय में गिरफ्तार कर लिया और उसे न्यायिक रिमांड पर भेज दिया। पुलिस के अनुसार, 17 जुलाई 2026 को ग्राम नवागांव (गिरजाबंद) के निवासी विमल सूर्यवंशी ने रतनपुर थाने में रिपोर्ट दर्ज कराई थी। शिकायतकर्ता ने बताया कि उसके मामा शिवचरण सूर्यवंशी उर्फ पिंटू ने खुद उसके घर आकर यह कबूल किया कि उसने अपने पिता रिखीराम सूर्यवंशी की हत्या कर दी है। पूछताछ के दौरान आरोपी ने बताया कि वह शराब पीकर घर लौटा था, जहां खाट पर लेटे हुए उसके पिता रिखीराम ने उसे डांट दिया था। इसी डांट से नाराज होकर आरोपी ने पास ही रखे लकड़ी के डंडे से पिता के सिर पर हमला कर दिया, जिससे मौके पर ही उनकी मौत हो गई। मामले की जानकारी मिलते ही रतनपुर थाने में हत्या का केस दर्ज किया गया। थाना प्रभारी निरीक्षक निलेश पाण्डेय ने तुरंत वरिष्ठ अधिकारियों को इस घटना की जानकारी दी और उनके निर्देश पर पुलिस टीम ने घेराबंदी कर आरोपी शिवचरण सूर्यवंशी उर्फ पिंटू (38 वर्ष) को उसके घर से गिरफ्तार कर लिया। इसके बाद आरोपी को कोर्ट में पेश कर न्यायिक रिमांड पर भेज दिया गया। इस त्वरित कार्रवाई में थाना प्रभारी निरीक्षक निलेश पाण्डेय, उप निरीक्षक विष्णु यादव, सहायक उप निरीक्षक नीलाकर सेठ और आरक्षक धीरज कश्यप की विशेष भूमिका रही।1
- छत्तीसगढ़ के कोरबा से एक बड़ी खबर सामने आ रही है, जहां पहली ही बारिश में निर्माण कार्य में बड़ी लापरवाही या भ्रष्टाचार का मामला उजागर हुआ है। पहली ही बारिश के बाद निर्माण कार्य को लेकर गंभीर सवाल उठ रहे हैं कि आखिर इस निर्माण में लापरवाही बरती गई है या फिर यह भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ गया है।1
- कोरबा के तरदा में एक तरफ जहां कार्रवाई के दावे किए जा रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ बेखौफ होकर रेत का खेल खेला जा रहा है। दावों के उलट धरातल पर लगातार जारी इस गतिविधि को लेकर अब यह तीखा सवाल खड़ा हो रहा है कि आखिर जिम्मेदार कब जागेंगे?1
- रायगढ़ जिले के धरमजयगढ़ क्षेत्र से गुजर रही भारतमाला सड़क परियोजना अब प्रशासनिक पारदर्शिता, पर्यावरणीय अनुपालन और सार्वजनिक संपत्तियों की सुरक्षा को लेकर गंभीर विवादों में घिर गई है। स्थानीय ग्रामीणों का आरोप है कि सड़क का निर्माण स्वीकृत राइट ऑफ वे (आरओडब्ल्यू) की सीमा से बाहर जाकर किया गया है। निर्माण के दौरान भारी मशीनों के उपयोग और ब्लास्टिंग के कारण स्वीकृत क्षेत्र के बाहर स्थित मंदिर परिसर, सार्वजनिक शौचालय, कुएं, जल स्रोत और अन्य शासकीय संपत्तियां बुरी तरह प्रभावित हुई हैं। इसके बाद निर्माण एजेंसी द्वारा मंदिर परिसर और कुछ सरकारी संपत्तियों के पुनर्निर्माण का लिखित आश्वासन देने की बात भी सामने आई है, जिससे नुकसान की पुष्टि और इसके आकलन की जिम्मेदारी पर सवाल खड़े हो गए हैं। इसके अलावा, सिसरिंगा घाट क्षेत्र में सागौन सहित बड़ी संख्या में मूल्यवान पेड़ों को जड़ से उखाड़कर रहस्यमयी ढंग से गायब करने का आरोप है, जिसके निशान आज भी वहां मौजूद हैं। इस मामले में वन विभाग के अधिकारियों के बयान पूरी तरह विरोधाभासी हैं। एक ओर जहां एक अधिकारी ने पेड़ों की कटाई को विभागीय प्रक्रिया के तहत बताया, वहीं उत्पादन इकाई के रेंजर ने स्पष्ट किया कि परियोजना के लिए पेड़ों की कटाई वर्षों पहले ही पूरी हो चुकी थी और हाल ही में किसी नई कटाई की अनुमति नहीं दी गई थी। इससे इन पेड़ों को हटाने और उनके निस्तारण के रिकॉर्ड की प्रामाणिकता पर बड़ा प्रश्नचिह्न लग गया है। इस पूरे घटनाक्रम में राजस्व, लोक निर्माण, वन, पंचायत और राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण जैसे संबंधित विभागों द्वारा किसी संयुक्त सर्वेक्षण या क्षति के आकलन की रिपोर्ट को सार्वजनिक नहीं किया गया है। आरओडब्ल्यू से बाहर निर्माण, क्षतिग्रस्त धार्मिक व सरकारी संपत्तियां, गायब हुए पेड़ और अधिकारियों के परस्पर विरोधी दावे एक व्यापक, स्वतंत्र और दस्तावेज-आधारित जांच की मांग को बेहद मजबूत करते हैं। जब तक संबंधित विभाग इन सभी प्रश्नों के पारदर्शी और दस्तावेजी उत्तर सार्वजनिक नहीं करते, तब तक सुशासन और जवाबदेही पर गंभीर सवाल उठते रहेंगे।2
- सक्ती के सिंघनसरा बैकुंठपुर मोहल्ले में सरपंच की लापरवाही के कारण हैंडपंप के बोर की स्थिति बेहद खराब हो गई है। हैंडपंप के पास जमा होने वाले पानी की निकासी की कोई व्यवस्था नहीं होने की वजह से वहां भरा हुआ गंदा पानी वापस सीधे बोर के अंदर ही जा रहा है। सरपंच द्वारा जल निकासी का कोई इंतजाम नहीं किए जाने के कारण यह दूषित पानी लगातार वापस बोर में मिल रहा है।1
- सक्ती जिले के मालखरौदा में शासकीय हिंदी माध्यम स्कूल के छात्र-छात्राओं ने शिक्षकों की कमी से नाराज होकर सड़क पर मोर्चा खोल दिया है। अपनी पढ़ाई प्रभावित होने से आक्रोशित बच्चों ने एसडीएम कार्यालय के सामने वीरभाठा-मालखरौदा मुख्य मार्ग पर चक्काजाम कर दिया है। स्कूली बच्चे सड़क के बीचों-बीच दरी बिछाकर बैठ गए हैं, जिससे मार्ग के दोनों ओर वाहनों की लंबी कतारें लग गई हैं और राहगीरों को भारी परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है। सड़क पर प्रदर्शन कर रहे स्कूली बच्चों का साफ कहना है कि उनके स्कूल में लंबे समय से शिक्षकों के पद खाली पड़े हैं, जिसके कारण उनकी नियमित पढ़ाई नहीं हो पा रही है और उनका भविष्य अंधकार में है। बच्चों ने प्रशासन को दो टूक चेतावनी दी है कि जब तक स्कूल में नए शिक्षकों की नियुक्ति नहीं की जाएगी, तब तक वे सड़क से नहीं उठेंगे। चक्काजाम और हंगामे की सूचना मिलने के बाद स्थानीय पुलिस और प्रशासन के अधिकारी मौके पर पहुंचने की तैयारी में हैं और बच्चों को समझाने की कोशिशें की जा रही हैं, लेकिन छात्र अपनी मांग पर अड़े हुए हैं।1
- छत्तीसगढ़ के बिलासपुर स्थित अपोलो अस्पताल में आयुष्मान भारत योजना और खूबचंद बघेल स्वास्थ्य सहायता योजना के प्रभावी क्रियान्वयन को लेकर शुक्रवार को कलेक्टर कार्यालय में एक महत्वपूर्ण बैठक आयोजित की गई। इस बैठक में जिला प्रशासन, अपोलो अस्पताल प्रबंधन और कांग्रेस प्रतिनिधिमंडल के बीच अस्पताल की स्वास्थ्य सेवाओं, मरीजों को मिलने वाली सुविधाओं और गरीब मरीजों के लिए सरकारी योजनाओं का लाभ सुनिश्चित करने पर विस्तार से चर्चा हुई। कांग्रेस नेता विजय केशरवानी ने बैठक के बाद बताया कि मरीजों को बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएं उपलब्ध कराने के लिए आवश्यक कदम उठाए जाएंगे। इसके तहत आपातकालीन स्थिति में एंबुलेंस की उपलब्धता, गंभीर बीमारियों से जूझ रहे मरीजों को प्राथमिकता के आधार पर इलाज देने तथा दोनों योजनाओं के तहत उपचार की सुविधा शुरू करने पर विचार-विमर्श किया गया। बैठक में कैंसर, किडनी और फेफड़ों जैसी गंभीर बीमारियों से पीड़ित मरीजों को सरकारी योजनाओं का लाभ प्राथमिकता से दिलाने पर विशेष जोर दिया गया। इसके अलावा अस्पताल में हाल ही में सामने आए कथित लापरवाही के मामले की जांच के लिए एक समिति गठित करने की बात भी कही गई। कांग्रेस ने स्पष्ट किया है कि फिलहाल उन्होंने जिला प्रशासन के आश्वासन पर भरोसा जताया है। लेकिन यदि जल्द ही आयुष्मान योजना लागू कर मरीजों को राहत नहीं मिली और अन्य मांगों पर अमल नहीं हुआ, तो अपोलो अस्पताल प्रबंधन के खिलाफ आंदोलन को और तेज किया जाएगा।4
- छत्तीसगढ़ के बिलासपुर में महज़ 15 घंटे की मूसलाधार बारिश ने बिलासपुर नगर निगम और जिला प्रशासन के दावों की पोल खोलकर रख दी है। हर साल मानसून से पहले नालों की सफाई और ड्रेनेज सिस्टम दुरुस्त करने के नाम पर करोड़ों रुपये फूंकने वाले प्रशासन की विफलता के कारण पूरा शहर 'जलपुर' में तब्दील हो चुका है। शहर की रफ्तार पूरी तरह थम गई है और जिन सड़कों पर रोजाना गाड़ियां दौड़ती थीं, वहां अब प्रशासनिक नाकामी के चलते रेस्क्यू और फ्लोटिंग नावें तैरती नजर आ रही हैं। घटिया ड्रेनेज सिस्टम और बंद नालों के कारण पानी की निकासी के कोई ठोस इंतजाम नहीं किए गए, जिससे प्रमुख रिहायशी इलाकों और मुख्य सड़कों पर घुटनों से लेकर कमर तक पानी भर गया है। नालियों की समय पर सफाई न होने से बारिश का गंदा पानी बैक मारकर लोगों के ड्राइंग रूम और किचन तक में घुस गया है, जिससे लाखों लोगों का जनजीवन पूरी तरह अस्त-व्यस्त हो चुका है। ड्रेनेज फेल होने के कारण पॉश और निचली कॉलोनियों के लोग अपने ही घरों में कैद हो गए हैं और उनके सामने खाने-पीने व जरूरी सामानों की भारी किल्लत पैदा हो गई है। कागजों पर दिखाई गई प्री-मानसून तैयारियां हकीकत के धरातल पर पूरी तरह फ्लॉप साबित हुई हैं। इस नरकीय स्थिति से आक्रोशित जनता सीधे नगर निगम और स्थानीय प्रशासन को जिम्मेदार ठहराते हुए सवाल पूछ रही है। लोगों का सीधा सवाल है कि आखिर हर साल मानसून तैयारियों के नाम पर पास होने वाला करोड़ों का बजट किसकी जेब में जाता है? क्या अधिकारियों को 15 घंटे की बारिश झेलने लायक ड्रेनेज सिस्टम बनाने की सुध नहीं थी, और क्या प्रशासन लोगों के नुकसान व मानसिक प्रताड़ना की जिम्मेदारी लेगा या हर बार की तरह इसे 'प्राकृतिक आपदा' बताकर पल्ला झाड़ लेगा? बिलासपुर की यह बदहाली साफ बयां कर रही है कि यह कोई प्राकृतिक आपदा नहीं, बल्कि घोर प्रशासनिक लापरवाही और कुप्रबंधन का नतीजा है, जिस पर जिम्मेदार अधिकारियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई होनी बेहद जरूरी है।2