“विचारों को हटाया नहीं जा सकता, उन्हें केवल चुनौती दी जा सकती है।” 🔴 “वे लेनिन से डरते हैं…” — लेकिन असली सवाल डर नहीं, विचारधारा का है! कार्ल मार्क्स (Karl Marx) और फ्रेडरिक एंगेल्स (Friedrich Engels) ने 1848 में कम्युनिस्ट घोषणा पत्र में लिखा था- “पूंजीवाद को एक भूत सता रहा है — कम्युनिज्म का भूत।” यह वाक्य आज भी उतना ही प्रासंगिक लगता है जितना अपने समय में था। क्योंकि सत्ता, संपत्ति और विचारधारा की लड़ाई आज भी जारी है — बस रूप बदल गए हैं। 🔥 डर किससे है? अक्सर कहा जाता है कि कुछ लोग से डरते हैं। लेकिन असली सवाल यह है — 👉 क्या डर किसी व्यक्ति से है? 👉 या उस विचार से जो असमानता, शोषण और सत्ता के केंद्रीकरण पर सवाल उठाता है? लेनिन केवल एक नेता नहीं थे, बल्कि उस विचार के प्रतीक हैं जिसने यह मूल प्रश्न उठाया: “संपत्ति और सत्ता कुछ ही लोगों के हाथों में क्यों केंद्रित रहे?” यही सवाल हर युग में सत्ता व्यवस्था को असहज करता रहा है। 📌 त्रिपुरा से बंगाल तक — प्रतीकों की राजनीति: त्रिपुरा में जब लेफ्ट सत्ता में था और आज बंगाल में लेफ्ट प्रतीकों पर बहस होती है — तो मुद्दा केवल मूर्तियों या प्रतीकों का नहीं है। असल मुद्दा है 👇 ✔️ कौन सा विचार समाज में प्रभावी है ✔️ कौन सा विचार धीरे-धीरे हाशिये पर धकेला जा रहा है ✔️ और कौन सा विचार सत्ता की मुख्यधारा से बाहर किया जा रहा है विडंबना यह है कि जो लोग “इतिहास बदलने” की बात करते हैं, वे अक्सर इतिहास के प्रतीकों से ही असहज हो जाते हैं। 🧠 मार्क्स, एंगेल्स और आज की दुनिया “दुनिया के मज़दूरों, एक हो जाओ।” — आज भले ही सोवियत संघ का पतन हो चुका हो और कई देशों में कम्युनिस्ट राजनीति कमजोर हुई हो, लेकिन एक सच्चाई अब भी कायम है — 👉 असमानता खत्म नहीं हुई, उसने केवल अपना स्वरूप बदल लिया है। 📊 Oxfam जैसी वैश्विक रिपोर्टें लगातार बताती हैं कि दुनिया की बड़ी संपत्ति आज भी कुछ प्रतिशत लोगों के पास केंद्रित है। 🏭 असली सवाल: विचार या व्यवस्था? यह बहस नई नहीं है। कार्ल मार्क्स ने पहले ही समझाया था कि — 👉 समाज में संघर्ष अक्सर उत्पादन के साधनों और आर्थिक शक्ति के नियंत्रण को लेकर होता है। आज भी मूल प्रश्न वही हैं: ✔️ संसाधनों पर नियंत्रण किसका है? ✔️ लाभ किसके हिस्से में जा रहा है? ✔️ मेहनत कौन कर रहा है और फायदा कौन उठा रहा है? इसलिए किसी विचार को केवल “डर” कह देना अक्सर असली समस्या से ध्यान भटकाने जैसा होता है। 🧱 लेफ्ट आंदोलन में प्रतिमाएँ या प्रतीक केवल पत्थर नहीं होते — वे किसी विचार की ऐतिहासिक और वैचारिक उपस्थिति को दर्शाते हैं। ★ लेकिन यह भी सच है कि लोकतंत्र में हर प्रतीक को राजनीतिक संघर्ष का औजार बना देना बहस को भावनात्मक बना देता है और तर्क को कमजोर करता है। 📚 भारत की बौद्धिक परंपरा भी समानता और न्याय के विचारों से समृद्ध रही है। संत कबीर कहते हैं: 🖋️ “जाति न पूछो साधु की, पूछ लीजिए ज्ञान।” मुंशी प्रेमचंद लिखते हैं: 🖋️ “साहित्य का उद्देश्य केवल मनोरंजन नहीं, समाज का सुधार भी है।” ⚖️ असली सवाल क्या है? आज बहस किसी मूर्ति या व्यक्ति पर नहीं, बल्कि इन प्रश्नों पर होनी चाहिए — 👉 क्या समाज में असमानता बढ़ रही है? 👉 क्या मजदूर और किसान कमजोर हो रहे हैं? 👉 क्या अवसर और संपत्ति कुछ हाथों में सिमट रही है? अगर इनका उत्तर “हाँ” है, तो समस्या विचारों की नहीं, व्यवस्था की है। 🖋️ एक अटल राजनीतिक सत्य ये भी है कि “विचारों को हटाया नहीं जा सकता, उन्हें केवल चुनौती दी जा सकती है।” 🔴 इसलिए लेनिन हों या कार्ल मार्क्स — वे इतिहास में हैं, लेकिन उनके उठाए सवाल आज भी हमारे सामने खड़े हैं। और शायद असली बहस यह नहीं है कि कोई विचार किससे डराता है, बल्कि यह है कि — 👉 क्या यह व्यवस्था सच में सबके लिए समान है? 👉🏻 क्या बीजेपी के अमृतकाल में मजदूर-किसानों की दुश्वारियां बढ़ी हैं? 👉🏻 क्या युवाओं को रोजगार और महिलाओं की सुरक्षा सुनिश्चित हो पाई है? आपका प्यारा दोस्त फैसल अली सिद्दीकी 🌹✊🔥
“विचारों को हटाया नहीं जा सकता, उन्हें केवल चुनौती दी जा सकती है।” 🔴 “वे लेनिन से डरते हैं…” — लेकिन असली सवाल डर नहीं, विचारधारा का है! कार्ल मार्क्स (Karl Marx) और फ्रेडरिक एंगेल्स (Friedrich Engels) ने 1848 में कम्युनिस्ट घोषणा पत्र में लिखा था- “पूंजीवाद को एक भूत सता रहा है — कम्युनिज्म का भूत।” यह वाक्य आज भी उतना ही प्रासंगिक लगता है जितना अपने समय में था। क्योंकि सत्ता, संपत्ति और विचारधारा की लड़ाई आज भी जारी है — बस रूप बदल गए हैं। 🔥 डर किससे है? अक्सर कहा जाता है कि कुछ लोग से डरते हैं। लेकिन असली सवाल यह है — 👉 क्या डर किसी व्यक्ति से है? 👉 या उस विचार से जो असमानता, शोषण और सत्ता के केंद्रीकरण पर सवाल उठाता है? लेनिन केवल एक नेता नहीं थे, बल्कि उस विचार के प्रतीक हैं जिसने यह मूल प्रश्न उठाया: “संपत्ति और सत्ता कुछ ही लोगों के हाथों में क्यों केंद्रित रहे?” यही सवाल हर युग में सत्ता व्यवस्था को असहज करता रहा है। 📌 त्रिपुरा से बंगाल तक — प्रतीकों की राजनीति: त्रिपुरा में जब लेफ्ट सत्ता में था और आज बंगाल में लेफ्ट प्रतीकों पर बहस होती है — तो मुद्दा केवल मूर्तियों या प्रतीकों का नहीं है। असल मुद्दा है 👇 ✔️ कौन सा विचार समाज में प्रभावी है ✔️ कौन सा विचार धीरे-धीरे हाशिये पर धकेला जा रहा है ✔️ और कौन सा विचार सत्ता की मुख्यधारा से बाहर किया जा रहा है विडंबना यह है कि जो लोग “इतिहास बदलने” की बात करते हैं, वे अक्सर इतिहास के प्रतीकों से ही असहज हो जाते हैं। 🧠 मार्क्स, एंगेल्स और आज की दुनिया “दुनिया के मज़दूरों, एक हो जाओ।” — आज भले ही सोवियत संघ का पतन हो चुका हो और कई देशों में कम्युनिस्ट राजनीति कमजोर हुई हो, लेकिन एक सच्चाई अब भी कायम है — 👉 असमानता खत्म नहीं हुई, उसने केवल अपना स्वरूप बदल लिया है। 📊 Oxfam जैसी वैश्विक रिपोर्टें लगातार बताती हैं कि दुनिया की बड़ी संपत्ति आज भी कुछ प्रतिशत लोगों के पास केंद्रित है। 🏭 असली सवाल: विचार या व्यवस्था? यह बहस नई नहीं है। कार्ल मार्क्स ने पहले ही समझाया था कि — 👉 समाज में संघर्ष अक्सर उत्पादन के साधनों और आर्थिक शक्ति के नियंत्रण को लेकर होता है। आज भी मूल प्रश्न वही हैं: ✔️ संसाधनों पर नियंत्रण किसका है? ✔️ लाभ किसके हिस्से में जा रहा है? ✔️ मेहनत कौन कर रहा है और फायदा कौन उठा रहा है? इसलिए किसी विचार को केवल “डर” कह देना अक्सर असली समस्या से ध्यान भटकाने जैसा होता है। 🧱 लेफ्ट आंदोलन में प्रतिमाएँ या प्रतीक केवल पत्थर नहीं होते — वे किसी विचार की ऐतिहासिक और वैचारिक उपस्थिति को दर्शाते हैं। ★ लेकिन यह भी सच है कि लोकतंत्र में हर प्रतीक को राजनीतिक संघर्ष का औजार बना देना बहस को भावनात्मक बना देता है और तर्क को कमजोर करता है। 📚 भारत की बौद्धिक परंपरा भी समानता और न्याय के विचारों से समृद्ध रही है। संत कबीर कहते हैं: 🖋️ “जाति न पूछो साधु की, पूछ लीजिए ज्ञान।” मुंशी प्रेमचंद लिखते हैं: 🖋️ “साहित्य का उद्देश्य केवल मनोरंजन नहीं, समाज का सुधार भी है।” ⚖️ असली सवाल क्या है? आज बहस किसी मूर्ति या व्यक्ति पर नहीं, बल्कि इन प्रश्नों पर होनी चाहिए — 👉 क्या समाज में असमानता बढ़ रही है? 👉 क्या मजदूर और किसान कमजोर हो रहे हैं? 👉 क्या अवसर और संपत्ति कुछ हाथों में सिमट रही है? अगर इनका उत्तर “हाँ” है, तो समस्या विचारों की नहीं, व्यवस्था की है। 🖋️ एक अटल राजनीतिक सत्य ये भी है कि “विचारों को हटाया नहीं जा सकता, उन्हें केवल चुनौती दी जा सकती है।” 🔴 इसलिए लेनिन हों या कार्ल मार्क्स — वे इतिहास में हैं, लेकिन उनके उठाए सवाल आज भी हमारे सामने खड़े हैं। और शायद असली बहस यह नहीं है कि कोई विचार किससे डराता है, बल्कि यह है कि — 👉 क्या यह व्यवस्था सच में सबके लिए समान है? 👉🏻 क्या बीजेपी के अमृतकाल में मजदूर-किसानों की दुश्वारियां बढ़ी हैं? 👉🏻 क्या युवाओं को रोजगार और महिलाओं की सुरक्षा सुनिश्चित हो पाई है? आपका प्यारा दोस्त फैसल अली सिद्दीकी 🌹✊🔥
- જય શ્રીકષ્ટભંજનદેવ સાળંગપુર હનુમાનજી મહારાજના દર્શન કરી આપના કામધંધાની શરૂઆત કરો.1
- અજમેર દરગાહની મોટી દેગમાં એક યુવક ચઢાવો લૂંટવાના ઇરાદે કૂદ્યો, જેનાથી હડકંપ મચી ગયો. CCTVમાં કેદ થયેલી આ ઘટનાથી દરગાહની સુરક્ષા વ્યવસ્થા પર સવાલો ઉભા થયા છે.1
- અમદાવાદના વાટવા વિસ્તારમાં કુશવાહા પરિવારે પોતાના જીવનનો એક નવો અધ્યાય શરૂ કર્યો છે. તેઓ પ્રેમ અને આનંદ સાથે પોતાના આ 'નવા જીવન'ને સ્વીકારી રહ્યા છે.1
- બ્રેકિંગ અમરેલી: જાફરાબાદના ટીંબીના ખેડૂતે કૃષિમંત્રી જીતુભાઈ વાઘાણીને પાઠવ્યો પત્ર...... બ્રેકિંગ....... અમરેલી: જાફરાબાદના ટીંબીના ખેડૂતે કૃષિમંત્રી જીતુભાઈ વાઘાણીને પાઠવ્યો પત્ર...... સરકાર માન્ય ગાંજો વાવવા અંગે પાઠવ્યો પત્ર....... ખાતર, બિયારણ, જંતુનાશક દવા, ખેતઓજારો અને ડીઝલના ભાવો 10 ગણા વધ્યા... ખેડૂત તરીકે પરમિશન વગર ગાંજાનું વાવેતર કરવામાં આવે તે ક્યાં વિભાગમાં આવે... મામલતદાર, કલેક્ટર , ખેતીવાડી કે પોલીસ વિભાગમાં આવે તો અમારા વિભાગમાં નથી આવતું તેવી જાણ કરવામાં આવે છે.... મંજૂરી વિના કરીએ તો દરેક વિભાગમાં આવે આ તે કેવી કાયદો વ્યવસ્થા છે...... ગુજરાતમાં દારૂ વેચનારને પરમિશન મળે, હથિયારધારીને રિવોલ્વરનો પરવાનો મળે તો ખેડૂત તરીકે ખેડૂતોને સરકાર માન્ય ગાંજો વાવવાની પરમિશન કેમ નહીં...... સરકારની દેખરેખ નીચે વાવેતરથી માંડીને વેચાણ સુધી ગાંજો વાવવાની પરમિશન સરકારના જવાબદાર કૃષિમંત્રી અથવા જવાબદારી કચેરી દ્વારા આપવામાં આવે તેવી માંગ....... ઘઉં, કપાસ, મગફળી, કઠોળના પોષણશમ ભાવો ન હોવાથી વ્યથિત ખેડૂતે પાઠવ્યો પત્ર....... સરકાર માન્ય ગાંજો વાવવાની પરમિશન માટે ઘનશ્યામ ભાલાળાએ પાઠવ્યો પત્ર....... અગાઉ 16 માર્ચના રોજ પણ ઘનશ્યામ ભાલાળાએ પાઠવ્યો હતો પત્ર..... ખેતીમાં મોંઘવારીને કારણે ખેડૂતોની દયનીય હાલત પર કૃષિમંત્રી વાઘાણીને પાઠવ્યો પત્ર....... બાઈટ 1 ઘનશ્યામ ભાલાળા (પત્ર પાઠવનાર ખેડૂત ટીંબી) અશોક મણવર અમરેલી1
- કલોલમાં રોડ રસ્તા બનાવવાની ફોર્ચ્યુંન બિલ્ડર્સની ધીમી કામગીરીથી હાલાકી કલોલમાં વિવિધ ટીપી સ્કીમોની રોડ રસ્તા બનાવવાની ફોર્ચ્યુંન બિલ્ડર્સની ધીમી કામગીરીથી હાલાકી1
- ગાંધીનગર જિલ્લાના દહેગામ તાલુકાના સામેત્રી ગામમાં વર્ષ 1999થી એક અખંડ જ્યોત સતત પ્રજ્વલિત છે. 24 વર્ષથી અવિરત ઝળહળતી આ જ્યોત માં અર્બુદાની શક્તિ અને ભક્તોની અતુટ શ્રદ્ધાનું પ્રતિક બની છે.1
- અમદાવાદ જિલ્લાના બગોદરા-ધોળકા રોડ પર દારૂ ભરેલો આઇસર ટેમ્પો પલટી ગયો. આ અકસ્માત બાદ ઘટનાસ્થળે અફરાતફરી મચી ગઈ હતી અને ટેમ્પોનો ડ્રાઇવર ફરાર થઈ ગયો હતો. બગોદરા પોલીસે વાહન કબજે કરી વધુ તપાસ શરૂ કરી છે.4
- બ્રેકિંગ...... અમરેલી: લીલીયા બૃહદ ગીર વિસ્તારમાં સિંહણ સાથે 2 સિંહબાળનું રોડ ક્રોસિંગ....... બ્રેકિંગ...... અમરેલી: લીલીયા બૃહદ ગીર વિસ્તારમાં સિંહણ સાથે 2 સિંહબાળનું રોડ ક્રોસિંગ....... લીલીયા તાલુકાના વાઘણીયા અને નાના લીલીયા વચ્ચે સવાર સવારમાં સિંહણ સિંહબાળ સાથે નીકળી..... એક સાઇડથી બીજી સાઇડ રોડ ક્રોસિંગ કરતા સિંહણ સાથે સિંહબાળ.... 2 સિંહબાળોને લઈને ઉનાળામાં સેઇફ જગ્યા પર જવા નીકળી સિંહણ..... સિંહણ સાથેના 2 સિંહબાળનું રોડ ક્રોસિંગ મોબાઈલ કેમેરામાં થયું કેદ...... રોડ ક્રોસિંગનો અદ્ભુત વીડિયો સોશિયલ મીડિયામાં થયો વાયરલ... અશોક મણવર અમરેલી1