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विडियो देखें- लखनऊ (उत्तरप्रदेश) अधिवक्ता और कांस्टेबल के बीच तीखी बहस। लखनऊ के लोहिया अस्पताल में महिला अधिवक्ताओं से मारपीट के मामले में उस समय नया विवाद खड़ा हो गया, जब मेडिकल जांच के लिए अधिवक्ता शक्ति परिषद् की टीम पीड़ित महिला अधिवक्ताओं के साथ अस्पताल पहुंची। आरोप है कि उनके साथ आई महिला कांस्टेबल डॉली मिश्रा ने अधिवक्ताओं से बदतमीजी की और तीखी बहस करने लगीं। आरोप है। कि पुलिस मामले में लीपापोती करने की कोशिश कर रही है।
नवीन चन्द्र आर्य
विडियो देखें- लखनऊ (उत्तरप्रदेश) अधिवक्ता और कांस्टेबल के बीच तीखी बहस। लखनऊ के लोहिया अस्पताल में महिला अधिवक्ताओं से मारपीट के मामले में उस समय नया विवाद खड़ा हो गया, जब मेडिकल जांच के लिए अधिवक्ता शक्ति परिषद् की टीम पीड़ित महिला अधिवक्ताओं के साथ अस्पताल पहुंची। आरोप है कि उनके साथ आई महिला कांस्टेबल डॉली मिश्रा ने अधिवक्ताओं से बदतमीजी की और तीखी बहस करने लगीं। आरोप है। कि पुलिस मामले में लीपापोती करने की कोशिश कर रही है।
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- लखनऊ के लोहिया अस्पताल में महिला अधिवक्ताओं से मारपीट के मामले में उस समय नया विवाद खड़ा हो गया, जब मेडिकल जांच के लिए अधिवक्ता शक्ति परिषद् की टीम पीड़ित महिला अधिवक्ताओं के साथ अस्पताल पहुंची। आरोप है कि उनके साथ आई महिला कांस्टेबल डॉली मिश्रा ने अधिवक्ताओं से बदतमीजी की और तीखी बहस करने लगीं। आरोप है। कि पुलिस मामले में लीपापोती करने की कोशिश कर रही है।1
- जंगलों की अंधाधुंध कटाई, अनियंत्रित पर्यटन, सड़क व भवन निर्माण और वाहनों के बढ़ते दबाव से बिगड़ रही पहाड़ों की सुंदर तस्वीर पहाड़ों में प्राकृतिक आपदाओं से ज्यादा मानवीय गतिविधियों से उपज रही आपदाओं का खतरा तेजी से बढ़ रहा है। पर्यावरण के दृष्टिगत विकास के मानक तय नहीं और जंगलों की अंधाधुंध कटाई, अनियंत्रित पर्यटन, सड़क व भवन निर्माण और वाहनों के बढ़ते दबाव ने पहाड़ों की सुंदर तस्वीर बिगड़ रही है। जिसका भयानक खामियाजा बादल फटने, ग्लेशियर पिघलने, बाढ़ और सूखे के रूप भुगतना पढ़ रहा है। पहाड़ों की तबाही के सिलसिला का इतिहास बहुत पुराना नहीं है, बल्कि तभी से शुरू हुआ, जब विकास की गति में तेजी आई । पहाड़ों को काटना प्रकृति के साथ सबसे बड़ी भूल कही जा सकती है, जो पेड़ों को काटे बिना संभव नहीं। साथ ही भूस्खलन को बढ़ावा देती है और यह किसीसे छिपा नहीं की भूस्खलन की त्रासदियां हर वर्ष जानलेवा साबित होती है तो वृक्षों की कमी से कार्बन जैसी घातक गैसों में वृद्धि स्वाभाविक है, जो वायु प्रदूषण को न्यौता देना है और प्रदूषण रोकने के प्रयास अभी तक नाकाफी साबित हुए हैं। फलस्वरूप पीएम 2.5 जैसी जहरीली गैसों में निरंतर वृद्धि हो रही है। पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए किए जा रहे विकास के चलते अंधाधुंध होटल और रिजॉर्ट की संख्या के कोई मानक नहीं हैं, जबकि इतना तो तय होना चाहिए कि किसीभी क्षेत्र के क्षेत्रफल के हिसाब से विकास हो। साथ ही वाहनों की आवाजाही की संख्या भी क्षेत्र की क्षमता के अनुसार निर्धारित होनी चाहिए। मगर इस दिशा में कोई कदम अभी तक नहीं उठाए गए हैं। जिस कारण कई तरह की दुश्वारियों से दोचार होना पड़ता है। बिजली पानी जैसी बुनियादी सुविधाओं को लेकर हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट्स, हाईवे और सुरंग खोदा जाना प्रकृति के साथ अन्याय है। बांधों का निर्माण क्षेत्रीय मौसम पर बड़ा असर डालता है, जो उस क्षेत्र के साथ नजदीकी क्षेत्रों की बारिश में अनिश्चितता पैदा करता है और कृषि, आर्थिकी और सामाजिक स्तर प्रभावित होता है। मानवीय गतिविधियों के चलते पर्वतीय क्षेत्रों में एक बड़ा दुष्प्रभाव हिमालय भुगत रहा है। हालाकि इसकी इसके पीछे प्रमुख जिम्मेदार वैश्विक ताप में वृद्धि है, लेकिन पर्वतीय क्षेत्र में मानवीय गतिविधि भी कम जिम्मेदार नहीं है। पहाड़ों में नदियों किनारे निर्माण, अत्यधिक वाहनों की आवाजाही, प्लास्टिक कचरा और बेहिसाब माइनिंग पर्यावरण पर अटैक जैसा है। हिमालय से जुड़े राज्य लेह लद्दाख, हिमाचल और उत्तराखंड में अभी तक किया गया विकास आपदाओं को जन्मदाता रहा है। लिहाजा प्रदूषण बढ़ रहा है तो नुकसान अनेक उठाने पड़ रहे हैं। जिस ओर गंभीरता से ध्यान देने की सख्त जरूरत है। समय रहते इस दिशा में सार्थक प्रयास नहीं किए गए तो भविष्य में आपदाओं से निबटने के निबटने के लिए तैयार रहना होगा। पर्यावरण विशेषज्ञों की रिपोर्ट मानवीय कृत्य को जिम्मेदार मानती हैं आर्यभट्ट प्रेक्षण विज्ञान शोध संस्थान एरीज के वरिष्ठ पर्यावरण व वायुमंडलीय वैज्ञानिक डॉ नरेंद्र सिंह कहते हैं कि अनियोजित माननीय विकास को लेकर कई रिपोर्ट आ चुकी हैं, जो प्रकृति के साथ खिलवाड़ का विरोध करती हैं। विकास का आधार वैज्ञानिक होना चाहिए और पर्यावरण के अनुरूप होना चाहिए। भारतीय मौसम विभाग, वाडिया इंस्टीट्यूट हिमालयन जियोलॉजी और पर्यावरण मंत्रालय समेत कई अन्य रिपोर्ट आ चुकी हैं। एरीज भी हिमालय क्षेत्र की वायुमंडलीय स्थिति पर कई शोध कर चुका है, जो बताता है कि विकास पर्यावरण संरक्षण के आधार पर होना चाहिए। खनन से अधिक निकलती है मीथेन ऑस्ट्रेलियाई पर्यावरण वैज्ञानिकों का शोध बताता है कि खनन से मीथेन गैस अधिक निकलती है, जो ग्लोबल वार्मिंग बढ़ाने में अधिक जिम्मेदार मानी जाती है। कार्बन डाईऑक्साइड की तुलना में मीथेन 40 प्रतिशत अधिक वैश्विक ताप बढ़ाती है। इधर पहाड़ों में निरंतर खनन जारी है तो जिम्मेदार कोई और नहीं इंसान है।1
- Post by Rajendra Kumar1
- comedy 🤣🤣🤣🤣🤣1
- Hello, namaskar Mein AAP sabka Bhai Sultan a video ek road ke maksath ke saath banai hui hai1
- ईरान-इजरायल युद्ध का सीधा असर अब आपकी जेब पर पड़ने वाला है. कच्चे तेल के दाम 90 डॉलर पार कर चुके हैं और इनके 150 डॉलर तक पहुंचने की आशंका है. भारत अपना आधा तेल खाड़ी देशों से खरीदता है. ऐसे में क्रूड ऑयल की यह आग देश में भारी महंगाई ला सकती है, जिससे भारतीय अर्थव्यवस्था पर ब्रेक लग सकता है. भारत के लिए यह स्थिति ज्यादा चुनौतीपूर्ण इसलिए है क्योंकि हम अपनी जरूरत का लगभग 30 से 50 प्रतिशत कच्चा तेल सीधे मिडिल ईस्ट से खरीदते हैं. देश की रिफाइनरियां भी मुख्य रूप से इसी क्षेत्र के क्रूड ऑयल को प्रोसेस करने के लिए ही डिजाइन की गई हैं. हालांकि, संकट की स्थिति से निपटने के लिए भारत के पास 25 से 30 दिनों का रणनीतिक पेट्रोलियम रिजर्व मौजूद है. लेकिन यह ध्यान रखना जरूरी है कि यह सिर्फ आपातकाल के लिए है, लंबे समय तक चलने वाले युद्ध के लिए नहीं.1
- Post by शैल शक्ति1
- उत्तराखंड के शांत वादियों में तेज स्पीड का हुड़दंग। इन्हें किसी का कोई भय नही। पुलिस प्रशासन से निवेदन है उक्त रफ्तार में इन सभी की पहचान करके दंडात्मक कार्यवाही करे।और पहाड़ों में सड़क हादसो में रोक लगे।1