"लोकतंत्र का मखौल: दोषी बचाने के लिए साढ़े तीन साल दबाई रही फाइल" — अब आधा दर्जन अफसर कठघरे में, विजय कुमार | वरिष्ठ पत्रकार लोकतंत्र की नींव चुनाव है और चुनाव की पवित्रता इसकी आत्मा। लेकिन जब लोकतंत्र के रखवाले ही उस आत्मा को कुचलने लगें, तो समझिए कि व्यवस्था की जड़ें कितनी गहरी सड़ चुकी हैं। बिहार के मुजफ्फरपुर जिले से आई एक खबर इसी सड़ांध को उजागर करती है — जहाँ एक दोषी बीडीओ को बचाने के लिए आधा दर्जन अधिकारियों ने मिलकर साढ़े तीन साल तक सरकारी फाइल दबाए रखी। क्या हुआ था मुरौल में? वर्ष 2021 के बिहार पंचायत चुनाव में मुजफ्फरपुर जिले की मुरौल प्रखंड स्थित ईटहा रसुलनगर पंचायत में एक उम्मीदवार का चुनाव चिह्न ही बदल दिया गया। यह महज लापरवाही नहीं, यह सुनियोजित धांधली थी। पीड़ित उम्मीदवार ने पहले निर्वाचन अधिकारी को सूचित किया, वहाँ अनदेखी हुई। फिर राज्य निर्वाचन आयोग का दरवाजा खटखटाया, और अंततः हाईकोर्ट का सहारा लेना पड़ा। जांच में राज्य निर्वाचन आयोग ने तत्कालीन बीडीओ चंद्रकांता को इस गड़बड़ी का दोषी पाया और उनके विरुद्ध आरोप पत्र दाखिल करने का स्पष्ट आदेश दिया। साढ़े तीन साल की 'व्यवस्थित' देरी यहीं से शुरू होती है असली कहानी — भ्रष्ट व्यवस्था के संरक्षण की कहानी। बीडीओ ने फरवरी 2022 में अपना स्पष्टीकरण दिया। आयोग ने उसे असंतोषजनक पाया और आरोप पत्र दाखिल करने का पुनः आदेश दिया। लेकिन स्थानीय अधिकारियों ने वह फाइल दबा दी। एक से दूसरे, दूसरे से तीसरे — आधा दर्जन अधिकारियों के दफ्तरों से गुजरती रही वह फाइल, लेकिन किसी ने उसे आगे नहीं बढ़ाया। नतीजा? बीडीओ चंद्रकांता की सेवानिवृत्ति के ठीक दो दिन पहले आरोप पत्र दाखिल हुआ। यह महज देरी नहीं थी — यह एक सुनियोजित षड्यंत्र था जिसका उद्देश्य था: दोषी अधिकारी को सजा से बचाते हुए सेवानिवृत्त कराना। जब जागा विभाग ग्रामीण विकास विभाग के अपर सचिव मन्जु प्रसाद ने इस गंभीर मामले में संज्ञान लेते हुए जिलाधिकारी को उन तमाम अधिकारियों को चिन्हित करने और उनके विरुद्ध कार्रवाई का आदेश दिया है, जिनके कार्यकाल में आरोप पत्र की फाइल दबी रही। अब इन अधिकारियों के विरुद्ध कार्रवाई की रिपोर्ट ग्रामीण विकास विभाग के माध्यम से राज्य निर्वाचन आयोग को भेजी जाएगी। यह कदम स्वागत योग्य है — लेकिन पर्याप्त नहीं। सवाल जो उठने चाहिए यह मामला सिर्फ एक बीडीओ और पआधा दर्जन अधिकारियों का नहीं है। यह उस पूरी व्यवस्था पर प्रश्नचिह्न है जहाँ: पहला — चुनाव आयोग के आदेश को भी अधिकारी वर्षों तक ठंडे बस्ते में डाल सकते हैं। इससे बड़ी अवज्ञा और क्या होगी? दूसरा — जब तक राजनीतिक दबाव या वरिष्ठ हस्तक्षेप न हो, तब तक दोषी कर्मचारी प्रणाली के भीतर सुरक्षित रहता है। तीसरा — सेवानिवृत्ति से दो दिन पहले आरोप पत्र दाखिल करना लोकतंत्र की प्रतीकात्मक हत्या है। इससे दोषी को न दंड मिलेगा, न पीड़ित को न्याय। चौथा — जो उम्मीदवार 2021 में अपना चुनाव चिह्न बदले जाने का शिकार हुआ, क्या उसे अब न्याय मिलेगा? उसकी लोकतांत्रिक क्षति की भरपाई कौन करेगा? यह अकेला मामला नहीं बिहार में यह पहली बार नहीं हुआ। गया, बेगूसराय, किशनगंज — हर जगह से ऐसी खबरें आती हैं जहाँ जाँच फाइलें दबती हैं, दोषी बचते हैं और पीड़ित थक-हारकर चुप हो जाते हैं। जब तक आरोप पत्र को दबाने वाले अधिकारियों को कठोर सजा नहीं मिलती, तब तक यह सिलसिला नहीं रुकेगा। क्या होना चाहिए? राज्य निर्वाचन आयोग को चाहिए कि वह ऐसे मामलों में एक निश्चित समय-सीमा तय करे और उल्लंघन पर स्वतः दंड की व्यवस्था करे। जो अधिकारी आयोग के आदेशों की अनदेखी करें, उनके विरुद्ध कानूनी कार्रवाई अनिवार्य हो। दोषी बीडीओ की पेंशन और सेवानिवृत्ति लाभ पर भी पुनर्विचार होना चाहिए — क्योंकि सेवानिवृत्ति, दंड से मुक्ति का परवाना नहीं है। निष्कर्ष मुजफ्फरपुर का यह मामला बताता है कि बिहार में प्रशासनिक जवाबदेही अभी भी कागजों तक सीमित है। जब दोषी को बचाने के लिए पूरा महकमा पएकजुट हो जाए, तो समझिए कि सरकारी तंत्र में नैतिक पतन किस हद तक पहुँच चुका है। अब सवाल यह है — क्या केवल रिपोर्ट भेजने से न्याय मिलेगा, या कोई ठोस दंड भी होगा? लोकतंत्र को जवाब चाहिए।
"लोकतंत्र का मखौल: दोषी बचाने के लिए साढ़े तीन साल दबाई रही फाइल" — अब आधा दर्जन अफसर कठघरे में, विजय कुमार | वरिष्ठ पत्रकार लोकतंत्र की नींव चुनाव है और चुनाव की पवित्रता इसकी आत्मा। लेकिन जब लोकतंत्र के रखवाले ही उस आत्मा को कुचलने लगें, तो समझिए कि व्यवस्था की जड़ें कितनी गहरी सड़ चुकी हैं। बिहार के मुजफ्फरपुर जिले से आई एक खबर इसी सड़ांध को उजागर करती है — जहाँ एक दोषी बीडीओ को बचाने के लिए आधा दर्जन अधिकारियों ने मिलकर साढ़े तीन साल तक सरकारी फाइल दबाए रखी। क्या हुआ था मुरौल में? वर्ष 2021 के बिहार पंचायत चुनाव में मुजफ्फरपुर जिले की मुरौल प्रखंड स्थित ईटहा रसुलनगर पंचायत में एक उम्मीदवार का चुनाव चिह्न ही बदल दिया गया। यह महज लापरवाही नहीं, यह सुनियोजित धांधली थी। पीड़ित उम्मीदवार ने पहले निर्वाचन अधिकारी को सूचित किया, वहाँ अनदेखी हुई। फिर राज्य निर्वाचन आयोग का दरवाजा खटखटाया, और अंततः हाईकोर्ट का सहारा लेना पड़ा। जांच में राज्य निर्वाचन आयोग ने तत्कालीन बीडीओ चंद्रकांता को इस गड़बड़ी का दोषी पाया और उनके विरुद्ध आरोप पत्र दाखिल करने का स्पष्ट आदेश दिया। साढ़े तीन साल की 'व्यवस्थित' देरी यहीं से शुरू होती है असली कहानी — भ्रष्ट व्यवस्था के संरक्षण की कहानी। बीडीओ ने फरवरी 2022 में अपना स्पष्टीकरण दिया। आयोग ने उसे असंतोषजनक पाया और आरोप पत्र दाखिल करने का पुनः आदेश दिया। लेकिन स्थानीय अधिकारियों ने वह फाइल दबा दी। एक से दूसरे, दूसरे से तीसरे — आधा दर्जन अधिकारियों के दफ्तरों से गुजरती रही वह फाइल, लेकिन किसी ने उसे आगे नहीं बढ़ाया। नतीजा? बीडीओ चंद्रकांता की सेवानिवृत्ति के ठीक दो दिन पहले आरोप पत्र दाखिल हुआ। यह महज देरी नहीं थी — यह एक सुनियोजित षड्यंत्र था जिसका उद्देश्य था: दोषी अधिकारी को सजा से बचाते हुए सेवानिवृत्त कराना। जब जागा विभाग ग्रामीण विकास विभाग के अपर सचिव मन्जु प्रसाद ने इस गंभीर मामले में संज्ञान लेते हुए जिलाधिकारी को उन तमाम अधिकारियों को चिन्हित करने और उनके विरुद्ध कार्रवाई का आदेश दिया है, जिनके कार्यकाल में आरोप पत्र की फाइल दबी रही। अब इन अधिकारियों के विरुद्ध कार्रवाई की रिपोर्ट ग्रामीण विकास विभाग के माध्यम से राज्य निर्वाचन आयोग को भेजी जाएगी। यह कदम स्वागत योग्य है — लेकिन पर्याप्त नहीं। सवाल जो उठने चाहिए यह मामला सिर्फ एक बीडीओ और पआधा दर्जन अधिकारियों का नहीं है। यह उस पूरी व्यवस्था पर प्रश्नचिह्न है जहाँ: पहला — चुनाव आयोग के आदेश को भी अधिकारी वर्षों तक ठंडे बस्ते में डाल सकते हैं। इससे बड़ी अवज्ञा और क्या होगी? दूसरा — जब तक राजनीतिक दबाव या वरिष्ठ हस्तक्षेप न हो, तब तक दोषी कर्मचारी प्रणाली के भीतर सुरक्षित रहता है। तीसरा — सेवानिवृत्ति से दो दिन पहले आरोप पत्र दाखिल करना लोकतंत्र की प्रतीकात्मक हत्या है। इससे दोषी को न दंड मिलेगा, न पीड़ित को न्याय। चौथा — जो उम्मीदवार 2021 में अपना चुनाव चिह्न बदले जाने का शिकार हुआ, क्या उसे अब न्याय मिलेगा? उसकी लोकतांत्रिक क्षति की भरपाई कौन करेगा? यह अकेला मामला नहीं बिहार में यह पहली बार नहीं हुआ। गया, बेगूसराय, किशनगंज — हर जगह से ऐसी खबरें आती हैं जहाँ जाँच फाइलें दबती हैं, दोषी बचते हैं और पीड़ित थक-हारकर चुप हो जाते हैं। जब तक आरोप पत्र को दबाने वाले अधिकारियों को कठोर सजा नहीं मिलती, तब तक यह सिलसिला नहीं रुकेगा। क्या होना चाहिए? राज्य निर्वाचन आयोग को चाहिए कि वह ऐसे मामलों में एक निश्चित समय-सीमा तय करे और उल्लंघन पर स्वतः दंड की व्यवस्था करे। जो अधिकारी आयोग के आदेशों की अनदेखी करें, उनके विरुद्ध कानूनी कार्रवाई अनिवार्य हो। दोषी बीडीओ की पेंशन और सेवानिवृत्ति लाभ पर भी पुनर्विचार होना चाहिए — क्योंकि सेवानिवृत्ति, दंड से मुक्ति का परवाना नहीं है। निष्कर्ष मुजफ्फरपुर का यह मामला बताता है कि बिहार में प्रशासनिक जवाबदेही अभी भी कागजों तक सीमित है। जब दोषी को बचाने के लिए पूरा महकमा पएकजुट हो जाए, तो समझिए कि सरकारी तंत्र में नैतिक पतन किस हद तक पहुँच चुका है। अब सवाल यह है — क्या केवल रिपोर्ट भेजने से न्याय मिलेगा, या कोई ठोस दंड भी होगा? लोकतंत्र को जवाब चाहिए।
- Post by Hindustan Express News1
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- गया के मानपुर इलाके से बड़ी खबर सामने आ रही है, जहां भुसुंडा बाजार समिति के पास अचानक लगी भीषण आग ने देखते ही देखते विकराल रूप ले लिया। इस आगजनी की घटना में लाखों रुपये का सामान जलकर राख हो गया। बताया जा रहा है कि आग इतनी तेज थी कि 13 बकरा, 50 मुर्गी और एक गाय भी इसकी चपेट में आकर जल गई। इसके अलावा करीब 20 प्लंग (खाट/बेड) समेत घर का सारा सामान पूरी तरह नष्ट हो गया। घटना के बाद इलाके में अफरा-तफरी मच गई। स्थानीय लोगों ने काफी प्रयास कर आग पर काबू पाने की कोशिश की, जिसके बाद फायर ब्रिगेड को सूचना दी गई। फिलहाल आग लगने के कारणों का पता नहीं चल पाया है।2
- Post by Sabindar paswan1
- Post by गौतम चंद्रवंशी जी1
- Post by जन सेवक1
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- Post by Hindustan Express News1