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नई नाली निर्माण हेतु क्योंकि भारी दबाव बढ़ गया गर्मी को देखते हुए पंचायती राज विभाग
Golu Kumar
नई नाली निर्माण हेतु क्योंकि भारी दबाव बढ़ गया गर्मी को देखते हुए पंचायती राज विभाग
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- बिहार में अप्रैल 2016 से लागू शराबबंदी को अब 10 साल पूरे होने को हैं। सरकार के ताज़ा आंकड़ों (मार्च 2026 तक) और विभिन्न रिपोर्ट्स के अनुसार, इस कानून का प्रभाव और इसकी चुनौतियां दोनों ही काफी व्यापक रही हैं। 1. 10 साल का लेखा-जोखा: गिरफ्तारी और मुकदमे हाल ही में बिहार सरकार द्वारा जारी आंकड़ों और न्यायिक समीक्षा के अनुसार स्थिति कुछ इस प्रकार है: गिरफ्तारियां: पिछले 10 वर्षों में लगभग 17 लाख से अधिक लोगों को शराबबंदी कानून के उल्लंघन के आरोप में गिरफ्तार किया गया है। दर्ज केस (FIR): अब तक कुल 11.37 लाख से ज्यादा मामले दर्ज किए जा चुके हैं। इनमें से लगभग 5.77 लाख केस पुलिस ने और 5.60 लाख केस उत्पाद विभाग ने दर्ज किए हैं। पेंडिंग केस और बोझ: न्यायपालिका पर इस कानून का भारी दबाव है। मार्च 2026 तक के आंकड़ों के अनुसार, लगभग 5.70 लाख मामलों का निपटारा किया जा चुका है, जिसका अर्थ है कि अभी भी करीब 5.67 लाख केस अदालतों में लंबित (Pending) हैं। जब्ती: 10 सालों में लगभग 4.83 करोड़ लीटर अवैध शराब जब्त की गई है, जिसमें विदेशी और देसी शराब की मात्रा लगभग बराबर है। इसके अलावा 1.67 लाख वाहन भी जब्त किए गए हैं। 2. सिस्टम की नाकामियां: एक गंभीर विश्लेषण पटना हाई कोर्ट और विभिन्न सामाजिक अध्ययनों ने शराबबंदी को लागू करने वाले सिस्टम की कई खामियों को उजागर किया है: भ्रष्टाचार और पुलिस-माफिया साठगांठ हाई कोर्ट ने कई बार टिप्पणी की है कि राज्य की मशीनरी इस कानून को पूरी तरह लागू करने में विफल रही है। आरोप है कि स्थानीय पुलिस और उत्पाद विभाग के अधिकारियों की मिलीभगत से शराब की होम डिलीवरी एक "समानांतर अर्थव्यवस्था" बन गई है। गरीबों पर गाज, माफिया 'आजाद' विपक्ष और सामाजिक कार्यकर्ताओं का तर्क है कि जेल जाने वाले 17 लाख लोगों में से 50% से अधिक लोग समाज के अत्यंत पिछड़े या गरीब तबके से आते हैं, जो अक्सर "कैरियर" (ढोने वाले) के रूप में इस्तेमाल होते हैं। बड़े शराब माफिया और किंगपिन अक्सर कानून के शिकंजे से बाहर रहते हैं। न्यायपालिका पर अतिरिक्त बोझ इतनी बड़ी संख्या में मुकदमों के कारण निचली अदालतों में सामान्य आपराधिक मामलों की सुनवाई प्रभावित हुई है। हालांकि सरकार ने विशेष 'एक्साइज कोर्ट' बनाए हैं, लेकिन केस पेंडेंसी की दर अभी भी बहुत ऊंची है। जहरीली शराब की त्रासदी (Hooch Tragedy) पूर्ण शराबबंदी के बावजूद, अवैध रूप से निर्मित जहरीली शराब के कारण बिहार में समय-समय पर बड़ी मौतें होती रही हैं। यह सिस्टम की विफलता का सबसे काला पक्ष है, जहाँ लोग सरकारी नियंत्रण न होने के कारण असुरक्षित रसायनों का सेवन कर लेते हैं। प्रमुख असर और वर्तमान स्थिति (2026) सकारात्मक पक्ष: महिलाओं के खिलाफ घरेलू हिंसा में कमी और ग्रामीण परिवारों की आर्थिक स्थिति में सुधार (शिक्षा और भोजन पर खर्च बढ़ना) दर्ज किया गया है। आर्थिक नुकसान: बिहार को सालाना लगभग 5,000 करोड़ से 8,000 करोड़ रुपये के राजस्व का नुकसान हो रहा है, जिसकी कुल भरपाई अब तक 30,000 करोड़ रुपये से अधिक मानी जा रही है। नया मोड़: 2026 के अप्रैल माह में बिहार की राजनीति में बदलाव के संकेत मिल रहे हैं, जहाँ कुछ गठबंधन सहयोगी शराबबंदी कानून में ढील देने या इसे चरणबद्ध तरीके से वापस लेने पर चर्चा कर रहे हैं। Liquor Ban Impact in Bihar: A 10-Year Report 1