मजदूर दिवस पर असमानता की झलक: आंगनबाड़ी कर्मियों की अनदेखी रिपोर्ट --शंभु कुमार गोस्वामी भागलपुर भागलपुर विश्व मजदूर दिवस है, यह दिन दुनियाभर के मजदूरों की एकता, उनके अधिकारों और सम्मान के लिए समर्पित माना जाता है। इस अवसर पर अधिकांश सरकारी दफ्तरों से लेकर निजी संस्थानों तक छुट्टी रहती है। सभी कर्मचारी—चाहे उनकी तनख्वाह पचास हजार हो या डेढ़-दो लाख रुपये—इस दिन अवकाश का लाभ उठाते हैं, क्योंकि उन्हें “मजदूर” की श्रेणी में देखा जाता है लेकिन इसी तस्वीर का एक दूसरा पहलू भी है, जो व्यवस्था की विडंबना को उजागर करता है आंगनबाड़ी केंद्र, जो समाज के सबसे निचले स्तर तक सेवा पहुंचाने का काम करते हैं, आज भी खुले रहते हैं यहां काम करने वाली सेविकाओं को मात्र नौ हजार रुपये और सहायिकाओं को साढ़े चार हजार रुपये प्रतिमाह मानदेय मिलता है इसके बावजूद उन्हें मजदूर नहीं माना जाता, कम से कम व्यवहारिक रूप से तो नहीं यह विरोधाभास चौंकाने वाला है कि एक ही विभाग आईसीडीएस के अंतर्गत कार्यरत अधिकारी, जैसे निदेशक, डीपीओ, सीडीपीओ और पर्यवेक्षिका, मजदूर दिवस पर अवकाश पाते हैं, जबकि उन्हीं के अधीन कार्य करने वाली सेविका और सहायिका को काम करना पड़ता है सवाल उठता है कि क्या कम वेतन पाने वाले और जमीनी स्तर पर काम करने वाले ये कर्मी मजदूर की श्रेणी में नहीं आते मजदूर दिवस का वास्तविक उद्देश्य श्रमिकों के अधिकारों की रक्षा और उनके योगदान को सम्मान देना है ऐसे में आंगनबाड़ी कर्मियों के साथ यह भेदभाव न केवल उनके मनोबल को प्रभावित करता है, बल्कि सामाजिक न्याय के सिद्धांतों पर भी प्रश्नचिह्न खड़ा करता है समय आ गया है कि इस असमानता पर गंभीरता से विचार किया जाए और आंगनबाड़ी कर्मियों को भी उनका उचित अधिकार और सम्मान दिया जाए तभी मजदूर दिवस की सार्थकता पूरी तरह सिद्ध हो सकेगी
मजदूर दिवस पर असमानता की झलक: आंगनबाड़ी कर्मियों की अनदेखी रिपोर्ट --शंभु कुमार गोस्वामी भागलपुर भागलपुर विश्व मजदूर दिवस है, यह दिन दुनियाभर के मजदूरों की एकता, उनके अधिकारों और सम्मान के लिए समर्पित माना जाता है। इस अवसर पर अधिकांश सरकारी दफ्तरों से लेकर निजी संस्थानों तक छुट्टी रहती है। सभी कर्मचारी—चाहे उनकी तनख्वाह पचास हजार हो या डेढ़-दो लाख रुपये—इस दिन अवकाश का लाभ उठाते हैं, क्योंकि उन्हें “मजदूर” की श्रेणी में देखा जाता है लेकिन इसी तस्वीर का एक दूसरा पहलू भी है, जो व्यवस्था की विडंबना को उजागर करता है आंगनबाड़ी केंद्र, जो समाज के सबसे निचले स्तर तक सेवा पहुंचाने का काम करते हैं, आज भी खुले रहते हैं यहां काम करने वाली सेविकाओं को मात्र नौ हजार रुपये और सहायिकाओं को साढ़े चार हजार रुपये प्रतिमाह मानदेय मिलता है इसके बावजूद उन्हें मजदूर नहीं माना जाता, कम से कम व्यवहारिक रूप से तो नहीं यह विरोधाभास चौंकाने वाला है कि एक ही विभाग आईसीडीएस के अंतर्गत कार्यरत अधिकारी, जैसे निदेशक, डीपीओ, सीडीपीओ और पर्यवेक्षिका, मजदूर दिवस पर अवकाश पाते हैं, जबकि उन्हीं के अधीन कार्य करने वाली सेविका और सहायिका को काम करना पड़ता है सवाल उठता है कि क्या कम वेतन पाने वाले और जमीनी स्तर पर काम करने वाले ये कर्मी मजदूर की श्रेणी में नहीं आते मजदूर दिवस का वास्तविक उद्देश्य श्रमिकों के अधिकारों की रक्षा और उनके योगदान को सम्मान देना है ऐसे में आंगनबाड़ी कर्मियों के साथ यह भेदभाव न केवल उनके मनोबल को प्रभावित करता है, बल्कि सामाजिक न्याय के सिद्धांतों पर भी प्रश्नचिह्न खड़ा करता है समय आ गया है कि इस असमानता पर गंभीरता से विचार किया जाए और आंगनबाड़ी कर्मियों को भी उनका उचित अधिकार और सम्मान दिया जाए तभी मजदूर दिवस की सार्थकता पूरी तरह सिद्ध हो सकेगी
- रिपोर्ट --शंभु कुमार गोस्वामी भागलपुर भागलपुर विश्व मजदूर दिवस है, यह दिन दुनियाभर के मजदूरों की एकता, उनके अधिकारों और सम्मान के लिए समर्पित माना जाता है। इस अवसर पर अधिकांश सरकारी दफ्तरों से लेकर निजी संस्थानों तक छुट्टी रहती है। सभी कर्मचारी—चाहे उनकी तनख्वाह पचास हजार हो या डेढ़-दो लाख रुपये—इस दिन अवकाश का लाभ उठाते हैं, क्योंकि उन्हें “मजदूर” की श्रेणी में देखा जाता है लेकिन इसी तस्वीर का एक दूसरा पहलू भी है, जो व्यवस्था की विडंबना को उजागर करता है आंगनबाड़ी केंद्र, जो समाज के सबसे निचले स्तर तक सेवा पहुंचाने का काम करते हैं, आज भी खुले रहते हैं यहां काम करने वाली सेविकाओं को मात्र नौ हजार रुपये और सहायिकाओं को साढ़े चार हजार रुपये प्रतिमाह मानदेय मिलता है इसके बावजूद उन्हें मजदूर नहीं माना जाता, कम से कम व्यवहारिक रूप से तो नहीं यह विरोधाभास चौंकाने वाला है कि एक ही विभाग आईसीडीएस के अंतर्गत कार्यरत अधिकारी, जैसे निदेशक, डीपीओ, सीडीपीओ और पर्यवेक्षिका, मजदूर दिवस पर अवकाश पाते हैं, जबकि उन्हीं के अधीन कार्य करने वाली सेविका और सहायिका को काम करना पड़ता है सवाल उठता है कि क्या कम वेतन पाने वाले और जमीनी स्तर पर काम करने वाले ये कर्मी मजदूर की श्रेणी में नहीं आते मजदूर दिवस का वास्तविक उद्देश्य श्रमिकों के अधिकारों की रक्षा और उनके योगदान को सम्मान देना है ऐसे में आंगनबाड़ी कर्मियों के साथ यह भेदभाव न केवल उनके मनोबल को प्रभावित करता है, बल्कि सामाजिक न्याय के सिद्धांतों पर भी प्रश्नचिह्न खड़ा करता है समय आ गया है कि इस असमानता पर गंभीरता से विचार किया जाए और आंगनबाड़ी कर्मियों को भी उनका उचित अधिकार और सम्मान दिया जाए तभी मजदूर दिवस की सार्थकता पूरी तरह सिद्ध हो सकेगी1
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- Post by Raj Ranjeet1
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