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सोशल मीडिया पर आपत्तिजनक टिप्पणियों के विरोध में जणवा समाज ने वल्लभनगर एसडीएम को कार्रवाई के लिए सौंपा ज्ञापन उदयपुर जिले के नवानिया में जणवा समाज के सदस्यों ने शुक्रवार को उपखण्ड अधिकारी किरणपाल के नाम एक ज्ञापन प्रस्तुत कर सोशल मीडिया पर समाज के खिलाफ की जारही आपत्तिजनक टिप्पणियों के विरुद्ध सख्त कार्रवाई की मांग की। ज्ञापन तहसीलदार वल्लभनगर सुरेंद्र कुमार छिपा को सौंपा गया है। ज्ञापन में बताया गया कि 3 अप्रैल से लगातार फेसबुक पर चंदन नागदा नाम की आईडी के माध्यम से जणवा समाज तथा समाज के सदस्यों के विरुद्ध आपत्तिजनक, भ्रामक एवं व्यक्तिगत टिप्पणियां की जा रही हैं।
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सोशल मीडिया पर आपत्तिजनक टिप्पणियों के विरोध में जणवा समाज ने वल्लभनगर एसडीएम को कार्रवाई के लिए सौंपा ज्ञापन उदयपुर जिले के नवानिया में जणवा समाज के सदस्यों ने शुक्रवार को उपखण्ड अधिकारी किरणपाल के नाम एक ज्ञापन प्रस्तुत कर सोशल मीडिया पर समाज के खिलाफ की जारही आपत्तिजनक टिप्पणियों के विरुद्ध सख्त कार्रवाई की मांग की। ज्ञापन तहसीलदार वल्लभनगर सुरेंद्र कुमार छिपा को सौंपा गया है। ज्ञापन में बताया गया कि 3 अप्रैल से लगातार फेसबुक पर चंदन नागदा नाम की आईडी के माध्यम से जणवा समाज तथा समाज के सदस्यों के विरुद्ध आपत्तिजनक, भ्रामक एवं व्यक्तिगत टिप्पणियां की जा रही हैं।
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- चित्तौड़गढ़। शम्भूपुरा स्थित आदित्य सीमेंट प्लांट में आज उस समय हड़कंप मच गया जब केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB) की टीम अचानक निरीक्षण के लिए पहुंची। जानकारी के अनुसार, अधिकारी एक किआ कार में बिना पूर्व सूचना के प्लांट परिसर में दाखिल हुए, जिससे प्रबंधन में अफरा-तफरी की स्थिति बन गई। टीम के पहुंचते ही प्लांट प्रबंधन ने आनन-फानन में उत्पादन प्रक्रिया को “ब्रेकडाउन” दिखाते हुए बंद कर दिया। सीमेंट निर्माण कार्य और कच्चे माल की आवाजाही तत्काल प्रभाव से रोक दी गई, जिससे यह स्पष्ट संकेत मिला कि निरीक्षण के दौरान वास्तविक स्थिति छिपाने का प्रयास किया गया। स्थानीय ग्रामीणों ने शुरुआत में राहत की सांस ली थी कि शायद अब प्रदूषण की गंभीर समस्या पर कोई ठोस कार्रवाई होगी। क्षेत्र लंबे समय से धूल, धुएं और प्रदूषण की मार झेल रहा है, जिससे लोगों के स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है। लेकिन ग्रामीणों के अनुसार, निरीक्षण केवल “औपचारिकता” बनकर रह गया। ग्रामीणों का आरोप है कि केंद्रीय टीम ने न तो उनकी शिकायतों को गंभीरता से सुना और न ही मौके पर प्रदूषण की वास्तविक स्थिति का निष्पक्ष आकलन किया। उनका कहना है कि टीम प्लांट प्रबंधन के साथ औपचारिक मुलाकात कर “खानापूर्ति” कर वापस लौट गई। यह स्थिति कहावत “ढाक के तीन पात” को चरितार्थ करती है, जहां परिणाम शून्य ही रहा। कानूनी दृष्टि से यह मामला गंभीर है। पर्यावरण संरक्षण अधिनियम, 1986 तथा वायु (प्रदूषण निवारण एवं नियंत्रण) अधिनियम, 1981 के तहत किसी भी औद्योगिक इकाई द्वारा प्रदूषण फैलाना दंडनीय अपराध है। इसके अलावा, केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड और राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की जिम्मेदारी है कि वे नियमित, निष्पक्ष और पारदर्शी निरीक्षण सुनिश्चित करें तथा उल्लंघन पाए जाने पर कड़ी कार्रवाई करें—जिसमें जुर्माना, उत्पादन बंद करना और लाइसेंस निरस्तीकरण तक शामिल है। यदि निरीक्षण के दौरान जानबूझकर उत्पादन बंद कर वास्तविक स्थिति छिपाई गई, तो यह भी कानून के उल्लंघन की श्रेणी में आता है और इसकी स्वतंत्र जांच आवश्यक है। अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या संबंधित विभाग ग्रामीणों के स्वास्थ्य और पर्यावरण सुरक्षा को प्राथमिकता देगा, या फिर ऐसे ही दिखावटी निरीक्षण होते रहेंगे? क्षेत्रवासियों में गहरी निराशा है और वे मांग कर रहे हैं कि— प्लांट का पुनः औचक निरीक्षण किया जाए स्वतंत्र एजेंसी से प्रदूषण स्तर की जांच करवाई जाए दोषी पाए जाने पर कड़ी कानूनी कार्रवाई की जाए प्रभावित ग्रामीणों के स्वास्थ्य परीक्षण और मुआवजे की व्यवस्था हो यदि समय रहते सख्त कदम नहीं उठाए गए, तो यह न केवल पर्यावरण के लिए बल्कि मानव जीवन के लिए भी गंभीर खतरा साबित हो सकता है।1
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