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Panic is spreading across all major Ukrainian Telegram channels after Russia struck and destroyed the fourth warehouse belonging to one of Ukraine’s largest pharmaceutical distributors. Not long ago they were celebrating Ukraine’s drone strikes on Wildberries warehouses. Now they fear that this winter, with heating and electricity uncertain, many people will get sick and find no medicine in pharmacies, or prices so high that no one can afford them. Maybe they’ll learn something from this, but I doubt they have the brains to understand that their actions have consequences.

1 hr ago
user_Samiullah Khan
Samiullah Khan
Doctor Malihabad, Lucknow•
1 hr ago

Panic is spreading across all major Ukrainian Telegram channels after Russia struck and destroyed the fourth warehouse belonging to one of Ukraine’s largest pharmaceutical distributors. Not long ago they were celebrating Ukraine’s drone strikes on Wildberries warehouses. Now they fear that this winter, with heating and electricity uncertain, many people will get sick and find no medicine in pharmacies, or prices so high that no one can afford them. Maybe they’ll learn something from this, but I doubt they have the brains to understand that their actions have consequences.

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  • संजना निवाड़ी गांव में सलमान के टेबल पर हुई चोरी कर पॉल के तार लोड 400 मी तार ले गए लखनऊ के माल थाना क्षेत्र में चोरियों का सिलसिला जारी है। रविवार रात 13 सितंबर 2026 को सहिजना नेवारी गांव में एक ट्यूबवेल से करीब 400 मीटर बिजली का तार चोरी हो गया। पुलिस मौके पर पहुंची और मामले की जांच शुरू की। यह घटना सहिजना नेवारी गांव के सलमान के ट्यूबवेल पर हुई। चोर रात के अंधेरे में आए और लगभग पांच से छह खंभों पर लगा करीब 400 मीटर बिजली का तार काट कर ले गए। माल थाना क्षेत्र में पिछले एक हफ्ते से लगातार चोरियां हो रही हैं। यह इस हफ्ते की पांचवीं चोरी है, जिससे चोरों का गैंग पुलिस को खुली चुनौती दे रहा है। लगातार हो रही चोरियों से ग्रामीणों में डर फैल गया है। पुलिस ने अभी तक एक भी चोरी का खुलासा नहीं किया है, जिससे चोरों के हौसले बुलंद हैं।
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    संजना निवाड़ी गांव में सलमान के टेबल पर हुई चोरी कर पॉल के तार लोड 400 मी तार ले गए 
लखनऊ के माल थाना क्षेत्र में चोरियों का सिलसिला जारी है। रविवार रात 13 सितंबर 2026 को सहिजना नेवारी गांव में एक ट्यूबवेल से करीब 400 मीटर बिजली का तार चोरी हो गया। पुलिस मौके पर पहुंची और मामले की जांच शुरू की।
यह घटना सहिजना नेवारी गांव के सलमान के ट्यूबवेल पर हुई। चोर रात के अंधेरे में आए और लगभग पांच से छह खंभों पर लगा करीब 400 मीटर बिजली का तार काट कर ले गए।
माल थाना क्षेत्र में पिछले एक हफ्ते से लगातार चोरियां हो रही हैं। यह इस हफ्ते की पांचवीं चोरी है, जिससे चोरों का गैंग पुलिस को खुली चुनौती दे रहा है।
लगातार हो रही चोरियों से ग्रामीणों में डर फैल गया है। पुलिस ने अभी तक एक भी चोरी का खुलासा नहीं किया है, जिससे चोरों के हौसले बुलंद हैं।
    user_अभिषेक कुमार अवस्थी
    अभिषेक कुमार अवस्थी
    Insurance Agent मलिहाबाद, लखनऊ, उत्तर प्रदेश•
    23 hrs ago
  • Agarwal  Tringel News Lucknow  8574663222 हिन्दी दिवस  एवं गणपति जन्मोत्सव पर डॉ. विद्यासागर उपाध्याय की दो कृतियों का भव्य लोकार्पण लखनऊ, 14 सितंबर। हिन्दी दिवस के अवसर पर उत्तर प्रदेश प्रेस क्लब, कैसरबाग, लखनऊ में 24 ग्रंथों के रचनाकार, चिंतक एवं साहित्यकार डॉ. विद्यासागर उपाध्याय की दो बहुचर्चित कृतियों—‘संक्रान्ति का संहार’ एवं ‘काल यात्रा : वेद से बर्लिन तक’—का भव्य लोकार्पण हुआ। इस अवसर पर आयोजित साहित्यिक परिचर्चा में इतिहास, भारतीय ज्ञान-परंपरा, सांस्कृतिक चेतना और आधुनिक विश्व के संदर्भ में साहित्य की भूमिका पर गंभीर विमर्श हुआ।   उत्तर प्रदेश प्रेस क्लब के खचाखच भरे‌ हाल में पेशवा बाजीराव के वंशज एवं कार्यक्रम के मुख्य अतिथि श्रीमंत राजराजेश्वर प्रभाकर नारायणराव पेशवा ने कहा कि डॉ. विद्यासागर उपाध्याय ने ‘संक्रान्ति का संहार’ के माध्यम से इतिहास के उस महत्वपूर्ण अध्याय को साहित्य के केंद्र में लाने का उल्लेखनीय कार्य किया है, जिससे पेशवा परिवार और उनके पूर्वजों की गौरवशाली ऐतिहासिक परंपरा भी गहराई से जुड़ी हुई है। उन्होंने कहा कि इतिहास के किसी व्यक्तित्व या वंश का उल्लेख इतिहास-ग्रंथों में होना एक बात है, लेकिन साहित्यकार अपनी लेखनी के माध्यम से जब उन पात्रों को संवेदना, संघर्ष और मानवीय संदर्भों के साथ समाज के सामने पुनः उपस्थित करता है, तो वह उन्हें जनस्मृति में पुनर्जीवित करने का कार्य करता है। पेशवा ने इस बात के लिए डॉ. विद्यासागर उपाध्याय के प्रति विशेष आभार व्यक्त किया कि उन्होंने अपनी लेखनी के माध्यम से उनके पूर्वजों और पेशवा परंपरा से जुड़े ऐतिहासिक पात्रों को वर्तमान समाज के सामने पुनः प्रस्तुत किया। उन्होंने डॉ. उपाध्याय की दोनों कृतियों के लिए शुभकामनाएँ देते हुए कहा कि उनकी लेखनी इतिहास और संस्कृति के उन पक्षों को समाज के सामने लाने का कार्य कर रही है, जिन पर आज गंभीर और व्यापक संवाद की आवश्यकता है। मुख्य वक्ता एवं आलोचक डॉ. रिंकी ‘मणिकर्णिका’ ने डॉ. विद्यासागर उपाध्याय के ऐतिहासिक कथा-लेखन की प्रक्रिया, उनकी रचनात्मक दृष्टि और लेखकीय साधना पर विस्तार से प्रकाश डालते हुए कहा कि ऐतिहासिक लेखन केवल घटनाओं और तिथियों को क्रमबद्ध कर देने का नाम नहीं है। इसके पीछे वर्षों का अध्ययन, ऐतिहासिक स्रोतों की खोज और पड़ताल, संदर्भों का सूक्ष्म परीक्षण, पात्रों की मानसिकता को समझना, तत्कालीन सामाजिक-राजनीतिक परिवेश का पुनर्निर्माण और इन समस्त तथ्यों को साहित्यिक संवेदना में रूपांतरित करने की कठिन साधना होती है। उन्होंने कहा कि ‘संक्रान्ति का संहार’ के पीछे डॉ. उपाध्याय की दीर्घकालिक अध्ययनशीलता, शोध-दृष्टि और लेखकीय परिश्रम स्पष्ट दिखाई देता है। ऐतिहासिक उपन्यास की सबसे बड़ी चुनौती यही है कि इतिहास की तथ्यात्मक विश्वसनीयता अक्षुण्ण रखते हुए कथा में ऐसा प्राण फूँका जाए कि पाठक केवल इतिहास पढ़े नहीं, बल्कि उसे घटित होते हुए अनुभव करे। डॉ. उपाध्याय इतिहास और साहित्य के बीच इसी जीवंत सेतु का निर्माण करते दिखाई देते हैं। ख्यातिलब्ध कथाकार महेन्द्र भीष्म ने विशेष रूप से आचार्य चतुरसेन शास्त्री की ऐतिहासिक उपन्यास परंपरा का उल्लेख करते हुए कहा कि हिन्दी साहित्य में इतिहास को विराट कथात्मकता, शोध और मानवीय संवेदना के साथ प्रस्तुत करने की जिस समृद्ध परंपरा को आचार्य चतुरसेन शास्त्री ने ऊँचाई प्रदान की, डॉ. विद्यासागर उपाध्याय उसी परंपरा को अपने समय की आवश्यकताओं और अपनी विशिष्ट वैचारिक दृष्टि के साथ आगे बढ़ाने का गंभीर प्रयास कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि चतुरसेन की परंपरा को आगे बढ़ाने का अर्थ केवल ऐतिहासिक विषयों को चुन लेना नहीं है। इसके लिए इतिहास के भीतर छिपे मनुष्य, समाज, सत्ता, संस्कृति, सभ्यता और संघर्ष के प्रश्नों को साहित्यिक गहराई के साथ पकड़ना आवश्यक है। डॉ. उपाध्याय की रचनाओं में यह प्रयास स्पष्ट रूप से दिखाई देता है।         बीज वक्ता डॉ. जयप्रकाश तिवारी ने कहा कि डॉ. विद्यासागर उपाध्याय का उपन्यास ‘संक्रांति का संहार’ केवल पानीपत के तृतीय युद्ध की ऐतिहासिक गाथा नहीं, बल्कि इतिहास का सांस्कृतिक पुनर्मूल्यांकन है। उन्होंने विट्ठल, कल्याणी, माधव और वेणी जैसे पात्रों को इतिहास के उन गुमनाम नायकों का प्रतीक बताया, जिनके त्याग, व्रत, कला, संस्कार और बलिदान से राष्ट्र और स्वराज्य की नींव निर्मित होती है। उन्होंने ‘तमस’ और ‘उसने कहा था’ के युगबोध से इसकी तुलना करते हुए कहा कि जहाँ ‘तमस’ तटस्थता और सांस्कृतिक विघटन की चेतावनी देता है तथा ‘उसने कहा था’ वचन और व्यक्तिगत त्याग का आदर्श प्रस्तुत करता है, वहीं ‘संक्रांति का संहार’ सामूहिक राष्ट्रबोध, सांस्कृतिक अस्मिता और स्वराज्य के लिए व्रत एवं बलिदान का संदेश देता है। डॉ. तिवारी के अनुसार पानीपत यहाँ अंत नहीं, बल्कि एक युग की संक्रांति और नए युग के जन्म का प्रतीक है; इसलिए यह कृति साहित्यिक उपन्यास से आगे बढ़कर सांस्कृतिक चेतना, इतिहास-बोध और राष्ट्रधर्म का पुनर्स्मरण कराने वाला महत्वपूर्ण ग्रंथ है। उन्होंने इसे प्रत्येक घर में पढ़े और मनन किए जाने योग्य बताते हुए डॉ. विद्यासागर उपाध्याय को इस उच्चकोटि की साहित्यिक सृष्टि के लिए बधाई और साधुवाद दिया।  पूर्व मुख्य चिकित्साधिकारी एवं साहित्यकार डॉ. अनिल मिश्र ने ‘काल यात्रा : वेद से बर्लिन तक’ को भारतीय ज्ञान-परंपरा और आधुनिक विश्व के बीच का सेतु बताते हुए कहा कि आज ऐतिहासिक लेखन के सामने सबसे बड़ी चुनौती इतिहास को न तो रूखा अकादमिक विवरण बनने देना है और न ही उसे कल्पना का ऐसा आख्यान बना देना है जिसमें इतिहास की विश्वसनीयता ही समाप्त हो जाए। इन दोनों के बीच संतुलन स्थापित करना ऐतिहासिक साहित्य की वास्तविक कसौटी है और डॉ. विद्यासागर उपाध्याय की लेखकीय दृष्टि इस चुनौती को साधने की दिशा में गंभीर एवं उल्लेखनीय प्रयास है। डॉ. उपाध्याय अतीत को वर्तमान से काटकर नहीं देखते। उनकी दृष्टि में अतीत केवल बीता हुआ समय नहीं, बल्कि वर्तमान की चेतना और भविष्य की दिशा को समझने का आधार है। साहित्य उस अतीत और वर्तमान के बीच संवाद स्थापित करने का सबसे संवेदनशील माध्यम है। ‘संक्रान्ति का संहार’ और ‘काल यात्रा : वेद से बर्लिन तक’ दोनों कृतियाँ अलग-अलग विधागत धरातल पर इसी वैचारिक दृष्टि को अभिव्यक्त करती हैं। डॉ. उपाध्याय की लेखन-पद्धति में इतिहास महज पृष्ठभूमि बनकर नहीं रहता, बल्कि कथा का सक्रिय और जीवंत तत्व बन जाता है। घटनाओं के साथ तत्कालीन राजनीतिक मनःस्थिति, सामाजिक संरचना, मानवीय मनोविज्ञान, सत्ता-संघर्ष और सभ्यतागत द्वंद्व को समझने की उनकी कोशिश उनकी रचनात्मक दृष्टि को विशिष्ट बनाती है। यही वह बिंदु है जहाँ इतिहास महज विवरण न रहकर साहित्य में रूपांतरित होता है। डॉ नरेन्द्र भूषण ने‌ हिन्दी दिवस को लक्षित करते हुए हिन्दी को बोलने व लेखन में प्राथमिकता के साथ अपनाने पर बल दिया कार्यक्रम में उमेश चन्द्र दुबे, सुशील कुमार वर्मा, कुमार तरल, राजेश सिंह 'श्रेयश', डॉ इंद्रजीत तिवारी निर्भीक, डॉ ओमप्रकाश द्विवेदी, राजीव वत्सल, करुणानिधि तिवारी, डॉ विजय प्रताप आर्य, डॉ आर वी एन पाण्डेय, डॉ अनिल कुमार तिवारी,  विनोद शंकर शुक्ल, देवकीनन्दन शान्त, डॉ स्मिता मिश्रा, बलवन्त सिंह, केशरी प्रसाद शुक्ल, पंकज कृष्ण, सरोज आर्यावर्ती, मन मोहन बाराकोटी, सुरभि सिंह, पी एस सुनील अय्यर, कन्हैया लाल, सोनी शुक्ल, कुॅंवर वीर सिंह मार्तण्ड, डॉ योगेश, मंजू सक्सेना, विनय कुमार मिश्र, संजीव श्रीवास्तव, जलदूत नन्द किशोर वर्मा, रविशंकर श्रीवास्तव, प्रमोद श्रीवास्तव, आनंद सिंह, राहुल पाण्डेय, शिव नाथ सिंह, वेद प्रकाश द्विवेदी, राम लखन वर्मा, वीरेंद्र प्रताप यादव, जितेंद्र शर्मा, हिमांशु सक्सेना, राजेश यादव, रामसुतार सिंह, रोनित पाण्डेय आदि गणमान्य लोग उपस्थित रहे। कार्यक्रम के अध्यक्ष निर्भय नारायण गुप्त द्वारा अपने अध्यक्षीय वक्तव्य में डॉ विद्या सागर उपाध्याय की कृतियों को साहित्य की उपलब्धि बताते हुए  ऐतिहासिक तथ्यों को जनमानस के सम्मुख लाने पर बल दिया। उन्होंने साहित्यकारों का आह्वान किया कि आज साहित्य को लोक मंगल एवं राष्ट्र मंगल के भावों के साथ सृजित किये‌ जाने की आवश्यकता है। कार्यक्रम का सुरुचिपूर्ण संचालन विदुषी डॉ. ममता पंकज ने किया। अंत में सुप्रसिद्ध साहित्यकार  सीमा मधुरिमा ने समस्त अभ्यागतों के प्रति आभार व्यक्त किया। Sanjay Agarwal  Tringel News Lucknow  8574663222                  Sanjay Agarwal  Tringel News Lucknow  8574663222 हिन्दी दिवस  एवं गणपति जन्मोत्सव पर डॉ. विद्यासागर उपाध्याय की दो कृतियों का भव्य लोकार्पण लखनऊ, 14 सितंबर। हिन्दी दिवस के अवसर पर उत्तर प्रदेश प्रेस क्लब, कैसरबाग, लखनऊ में 24 ग्रंथों के रचनाकार, चिंतक एवं साहित्यकार डॉ. विद्यासागर उपाध्याय की दो बहुचर्चित कृतियों—‘संक्रान्ति का संहार’ एवं ‘काल यात्रा : वेद से बर्लिन तक’—का भव्य लोकार्पण हुआ। इस अवसर पर आयोजित साहित्यिक परिचर्चा में इतिहास, भारतीय ज्ञान-परंपरा, सांस्कृतिक चेतना और आधुनिक विश्व के संदर्भ में साहित्य की भूमिका पर गंभीर विमर्श हुआ। उत्तर प्रदेश प्रेस क्लब के खचाखच भरे‌ हाल में पेशवा बाजीराव के वंशज एवं कार्यक्रम के मुख्य अतिथि श्रीमंत राजराजेश्वर प्रभाकर नारायणराव पेशवा ने कहा कि डॉ. विद्यासागर उपाध्याय ने ‘संक्रान्ति का संहार’ के माध्यम से इतिहास के उस महत्वपूर्ण अध्याय को साहित्य के केंद्र में लाने का उल्लेखनीय कार्य किया है, जिससे पेशवा परिवार और उनके पूर्वजों की गौरवशाली ऐतिहासिक परंपरा भी गहराई से जुड़ी हुई है। उन्होंने कहा कि इतिहास के किसी व्यक्तित्व या वंश का उल्लेख इतिहास-ग्रंथों में होना एक बात है, लेकिन साहित्यकार अपनी लेखनी के माध्यम से जब उन पात्रों को संवेदना, संघर्ष और मानवीय संदर्भों के साथ समाज के सामने पुनः उपस्थित करता है, तो वह उन्हें जनस्मृति में पुनर्जीवित करने का कार्य करता है। पेशवा ने इस बात के लिए डॉ. विद्यासागर उपाध्याय के प्रति विशेष आभार व्यक्त किया कि उन्होंने अपनी लेखनी के माध्यम से उनके पूर्वजों और पेशवा परंपरा से जुड़े ऐतिहासिक पात्रों को वर्तमान समाज के सामने पुनः प्रस्तुत किया। उन्होंने डॉ. उपाध्याय की दोनों कृतियों के लिए शुभकामनाएँ देते हुए कहा कि उनकी लेखनी इतिहास और संस्कृति के उन पक्षों को समाज के सामने लाने का कार्य कर रही है, जिन पर आज गंभीर और व्यापक संवाद की आवश्यकता है। मुख्य वक्ता एवं आलोचक डॉ. रिंकी ‘मणिकर्णिका’ ने डॉ. विद्यासागर उपाध्याय के ऐतिहासिक कथा-लेखन की प्रक्रिया, उनकी रचनात्मक दृष्टि और लेखकीय साधना पर विस्तार से प्रकाश डालते हुए कहा कि ऐतिहासिक लेखन केवल घटनाओं और तिथियों को क्रमबद्ध कर देने का नाम नहीं है। इसके पीछे वर्षों का अध्ययन, ऐतिहासिक स्रोतों की खोज और पड़ताल, संदर्भों का सूक्ष्म परीक्षण, पात्रों की मानसिकता को समझना, तत्कालीन सामाजिक-राजनीतिक परिवेश का पुनर्निर्माण और इन समस्त तथ्यों को साहित्यिक संवेदना में रूपांतरित करने की कठिन साधना होती है। उन्होंने कहा कि ‘संक्रान्ति का संहार’ के पीछे डॉ. उपाध्याय की दीर्घकालिक अध्ययनशीलता, शोध-दृष्टि और लेखकीय परिश्रम स्पष्ट दिखाई देता है। ऐतिहासिक उपन्यास की सबसे बड़ी चुनौती यही है कि इतिहास की तथ्यात्मक विश्वसनीयता अक्षुण्ण रखते हुए कथा में ऐसा प्राण फूँका जाए कि पाठक केवल इतिहास पढ़े नहीं, बल्कि उसे घटित होते हुए अनुभव करे। डॉ. उपाध्याय इतिहास और साहित्य के बीच इसी जीवंत सेतु का निर्माण करते दिखाई देते हैं। ख्यातिलब्ध कथाकार महेन्द्र भीष्म ने विशेष रूप से आचार्य चतुरसेन शास्त्री की ऐतिहासिक उपन्यास परंपरा का उल्लेख करते हुए कहा कि हिन्दी साहित्य में इतिहास को विराट कथात्मकता, शोध और मानवीय संवेदना के साथ प्रस्तुत करने की जिस समृद्ध परंपरा को आचार्य चतुरसेन शास्त्री ने ऊँचाई प्रदान की, डॉ. विद्यासागर उपाध्याय उसी परंपरा को अपने समय की आवश्यकताओं और अपनी विशिष्ट वैचारिक दृष्टि के साथ आगे बढ़ाने का गंभीर प्रयास कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि चतुरसेन की परंपरा को आगे बढ़ाने का अर्थ केवल ऐतिहासिक विषयों को चुन लेना नहीं है। इसके लिए इतिहास के भीतर छिपे मनुष्य, समाज, सत्ता, संस्कृति, सभ्यता और संघर्ष के प्रश्नों को साहित्यिक गहराई के साथ पकड़ना आवश्यक है। डॉ. उपाध्याय की रचनाओं में यह प्रयास स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। बीज वक्ता डॉ. जयप्रकाश तिवारी ने कहा कि डॉ. विद्यासागर उपाध्याय का उपन्यास ‘संक्रांति का संहार’ केवल पानीपत के तृतीय युद्ध की ऐतिहासिक गाथा नहीं, बल्कि इतिहास का सांस्कृतिक पुनर्मूल्यांकन है। उन्होंने विट्ठल, कल्याणी, माधव और वेणी जैसे पात्रों को इतिहास के उन गुमनाम नायकों का प्रतीक बताया, जिनके त्याग, व्रत, कला, संस्कार और बलिदान से राष्ट्र और स्वराज्य की नींव निर्मित होती है। उन्होंने ‘तमस’ और ‘उसने कहा था’ के युगबोध से इसकी तुलना करते हुए कहा कि जहाँ ‘तमस’ तटस्थता और सांस्कृतिक विघटन की चेतावनी देता है तथा ‘उसने कहा था’ वचन और व्यक्तिगत त्याग का आदर्श प्रस्तुत करता है, वहीं ‘संक्रांति का संहार’ सामूहिक राष्ट्रबोध, सांस्कृतिक अस्मिता और स्वराज्य के लिए व्रत एवं बलिदान का संदेश देता है। डॉ. तिवारी के अनुसार पानीपत यहाँ अंत नहीं, बल्कि एक युग की संक्रांति और नए युग के जन्म का प्रतीक है; इसलिए यह कृति साहित्यिक उपन्यास से आगे बढ़कर सांस्कृतिक चेतना, इतिहास-बोध और राष्ट्रधर्म का पुनर्स्मरण कराने वाला महत्वपूर्ण ग्रंथ है। उन्होंने इसे प्रत्येक घर में पढ़े और मनन किए जाने योग्य बताते हुए डॉ. विद्यासागर उपाध्याय को इस उच्चकोटि की साहित्यिक सृष्टि के लिए बधाई और साधुवाद दिया। पूर्व मुख्य चिकित्साधिकारी एवं साहित्यकार डॉ. अनिल मिश्र ने ‘काल यात्रा : वेद से बर्लिन तक’ को भारतीय ज्ञान-परंपरा और आधुनिक विश्व के बीच का सेतु बताते हुए कहा कि आज ऐतिहासिक लेखन के सामने सबसे बड़ी चुनौती इतिहास को न तो रूखा अकादमिक विवरण बनने देना है और न ही उसे कल्पना का ऐसा आख्यान बना देना है जिसमें इतिहास की विश्वसनीयता ही समाप्त हो जाए। इन दोनों के बीच संतुलन स्थापित करना ऐतिहासिक साहित्य की वास्तविक कसौटी है और डॉ. विद्यासागर उपाध्याय की लेखकीय दृष्टि इस चुनौती को साधने की दिशा में गंभीर एवं उल्लेखनीय प्रयास है। डॉ. उपाध्याय अतीत को वर्तमान से काटकर नहीं देखते। उनकी दृष्टि में अतीत केवल बीता हुआ समय नहीं, बल्कि वर्तमान की चेतना और भविष्य की दिशा को समझने का आधार है। साहित्य उस अतीत और वर्तमान के बीच संवाद स्थापित करने का सबसे संवेदनशील माध्यम है। ‘संक्रान्ति का संहार’ और ‘काल यात्रा : वेद से बर्लिन तक’ दोनों कृतियाँ अलग-अलग विधागत धरातल पर इसी वैचारिक दृष्टि को अभिव्यक्त करती हैं। डॉ. उपाध्याय की लेखन-पद्धति में इतिहास महज पृष्ठभूमि बनकर नहीं रहता, बल्कि कथा का सक्रिय और जीवंत तत्व बन जाता है। घटनाओं के साथ तत्कालीन राजनीतिक मनःस्थिति, सामाजिक संरचना, मानवीय मनोविज्ञान, सत्ता-संघर्ष और सभ्यतागत द्वंद्व को समझने की उनकी कोशिश उनकी रचनात्मक दृष्टि को विशिष्ट बनाती है। यही वह बिंदु है जहाँ इतिहास महज विवरण न रहकर साहित्य में रूपांतरित होता है। डॉ नरेन्द्र भूषण ने‌ हिन्दी दिवस को लक्षित करते हुए हिन्दी को बोलने व लेखन में प्राथमिकता के साथ अपनाने पर बल दिया कार्यक्रम में उमेश चन्द्र दुबे, सुशील कुमार वर्मा, कुमार तरल, राजेश सिंह 'श्रेयश', डॉ इंद्रजीत तिवारी निर्भीक, डॉ ओमप्रकाश द्विवेदी, राजीव वत्सल, करुणानिधि तिवारी, डॉ विजय प्रताप आर्य, डॉ आर वी एन पाण्डेय, डॉ अनिल कुमार तिवारी,  विनोद शंकर शुक्ल, देवकीनन्दन शान्त, डॉ स्मिता मिश्रा, बलवन्त सिंह, केशरी प्रसाद शुक्ल, पंकज कृष्ण, सरोज आर्यावर्ती, मन मोहन बाराकोटी, सुरभि सिंह, पी एस सुनील अय्यर, कन्हैया लाल, सोनी शुक्ल, कुॅंवर वीर सिंह मार्तण्ड, डॉ योगेश, मंजू सक्सेना, विनय कुमार मिश्र, संजीव श्रीवास्तव, जलदूत नन्द किशोर वर्मा, रविशंकर श्रीवास्तव, प्रमोद श्रीवास्तव, आनंद सिंह, राहुल पाण्डेय, शिव नाथ सिंह, वेद प्रकाश द्विवेदी, राम लखन वर्मा, वीरेंद्र प्रताप यादव, जितेंद्र शर्मा, हिमांशु सक्सेना, राजेश यादव, रामसुतार सिंह, रोनित पाण्डेय आदि गणमान्य लोग उपस्थित रहे। कार्यक्रम के अध्यक्ष निर्भय नारायण गुप्त द्वारा अपने अध्यक्षीय वक्तव्य में डॉ विद्या सागर उपाध्याय की कृतियों को साहित्य की उपलब्धि बताते हुए  ऐतिहासिक तथ्यों को जनमानस के सम्मुख लाने पर बल दिया। उन्होंने साहित्यकारों का आह्वान किया कि आज साहित्य को लोक मंगल एवं राष्ट्र मंगल के भावों के साथ सृजित किये‌ जाने की आवश्यकता है। कार्यक्रम का सुरुचिपूर्ण संचालन विदुषी डॉ. ममता पंकज ने किया। अंत में सुप्रसिद्ध साहित्यकार  सीमा मधुरिमा ने समस्त अभ्यागतों के प्रति आभार व्यक्त किया। Sanjay Agarwal  Tringel News Lucknow  8574663222
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    Agarwal 

Tringel News Lucknow 

8574663222

हिन्दी दिवस  एवं गणपति जन्मोत्सव पर डॉ. विद्यासागर उपाध्याय की दो कृतियों का भव्य लोकार्पण

लखनऊ, 14 सितंबर। हिन्दी दिवस के अवसर पर उत्तर प्रदेश प्रेस क्लब, कैसरबाग, लखनऊ में 24 ग्रंथों के रचनाकार, चिंतक एवं साहित्यकार डॉ. विद्यासागर उपाध्याय की दो बहुचर्चित कृतियों—‘संक्रान्ति का संहार’ एवं ‘काल यात्रा : वेद से बर्लिन तक’—का भव्य लोकार्पण हुआ। इस अवसर पर आयोजित साहित्यिक परिचर्चा में इतिहास, भारतीय ज्ञान-परंपरा, सांस्कृतिक चेतना और आधुनिक विश्व के संदर्भ में साहित्य की भूमिका पर गंभीर विमर्श हुआ।

  उत्तर प्रदेश प्रेस क्लब के खचाखच भरे‌ हाल में पेशवा बाजीराव के वंशज एवं कार्यक्रम के मुख्य अतिथि श्रीमंत राजराजेश्वर प्रभाकर नारायणराव पेशवा ने कहा कि डॉ. विद्यासागर उपाध्याय ने ‘संक्रान्ति का संहार’ के माध्यम से इतिहास के उस महत्वपूर्ण अध्याय को साहित्य के केंद्र में लाने का उल्लेखनीय कार्य किया है, जिससे पेशवा परिवार और उनके पूर्वजों की गौरवशाली ऐतिहासिक परंपरा भी गहराई से जुड़ी हुई है। उन्होंने कहा कि इतिहास के किसी व्यक्तित्व या वंश का उल्लेख इतिहास-ग्रंथों में होना एक बात है, लेकिन साहित्यकार अपनी लेखनी के माध्यम से जब उन पात्रों को संवेदना, संघर्ष और मानवीय संदर्भों के साथ समाज के सामने पुनः उपस्थित करता है, तो वह उन्हें जनस्मृति में पुनर्जीवित करने का कार्य करता है। पेशवा ने इस बात के लिए डॉ. विद्यासागर उपाध्याय के प्रति विशेष आभार व्यक्त किया कि उन्होंने अपनी लेखनी के माध्यम से उनके पूर्वजों और पेशवा परंपरा से जुड़े ऐतिहासिक पात्रों को वर्तमान समाज के सामने पुनः प्रस्तुत किया। उन्होंने डॉ. उपाध्याय की दोनों कृतियों के लिए शुभकामनाएँ देते हुए कहा कि उनकी लेखनी इतिहास और संस्कृति के उन पक्षों को समाज के सामने लाने का कार्य कर रही है, जिन पर आज गंभीर और व्यापक संवाद की आवश्यकता है।

मुख्य वक्ता एवं आलोचक डॉ. रिंकी ‘मणिकर्णिका’ ने डॉ. विद्यासागर उपाध्याय के ऐतिहासिक कथा-लेखन की प्रक्रिया, उनकी रचनात्मक दृष्टि और लेखकीय साधना पर विस्तार से प्रकाश डालते हुए कहा कि ऐतिहासिक लेखन केवल घटनाओं और तिथियों को क्रमबद्ध कर देने का नाम नहीं है। इसके पीछे वर्षों का अध्ययन, ऐतिहासिक स्रोतों की खोज और पड़ताल, संदर्भों का सूक्ष्म परीक्षण, पात्रों की मानसिकता को समझना, तत्कालीन सामाजिक-राजनीतिक परिवेश का पुनर्निर्माण और इन समस्त तथ्यों को साहित्यिक संवेदना में रूपांतरित करने की कठिन साधना होती है। उन्होंने कहा कि ‘संक्रान्ति का संहार’ के पीछे डॉ. उपाध्याय की दीर्घकालिक अध्ययनशीलता, शोध-दृष्टि और लेखकीय परिश्रम स्पष्ट दिखाई देता है। ऐतिहासिक उपन्यास की सबसे बड़ी चुनौती यही है कि इतिहास की तथ्यात्मक विश्वसनीयता अक्षुण्ण रखते हुए कथा में ऐसा प्राण फूँका जाए कि पाठक केवल इतिहास पढ़े नहीं, बल्कि उसे घटित होते हुए अनुभव करे। डॉ. उपाध्याय इतिहास और साहित्य के बीच इसी जीवंत सेतु का निर्माण करते दिखाई देते हैं।

ख्यातिलब्ध कथाकार महेन्द्र भीष्म ने विशेष रूप से आचार्य चतुरसेन शास्त्री की ऐतिहासिक उपन्यास परंपरा का उल्लेख करते हुए कहा कि हिन्दी साहित्य में इतिहास को विराट कथात्मकता, शोध और मानवीय संवेदना के साथ प्रस्तुत करने की जिस समृद्ध परंपरा को आचार्य चतुरसेन शास्त्री ने ऊँचाई प्रदान की, डॉ. विद्यासागर उपाध्याय उसी परंपरा को अपने समय की आवश्यकताओं और अपनी विशिष्ट वैचारिक दृष्टि के साथ आगे बढ़ाने का गंभीर प्रयास कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि चतुरसेन की परंपरा को आगे बढ़ाने का अर्थ केवल ऐतिहासिक विषयों को चुन लेना नहीं है। इसके लिए इतिहास के भीतर छिपे मनुष्य, समाज, सत्ता, संस्कृति, सभ्यता और संघर्ष के प्रश्नों को साहित्यिक गहराई के साथ पकड़ना आवश्यक है। डॉ. उपाध्याय की रचनाओं में यह प्रयास स्पष्ट रूप से दिखाई देता है।


        बीज वक्ता डॉ. जयप्रकाश तिवारी ने कहा कि डॉ. विद्यासागर उपाध्याय का उपन्यास ‘संक्रांति का संहार’ केवल पानीपत के तृतीय युद्ध की ऐतिहासिक गाथा नहीं, बल्कि इतिहास का सांस्कृतिक पुनर्मूल्यांकन है। उन्होंने विट्ठल, कल्याणी, माधव और वेणी जैसे पात्रों को इतिहास के उन गुमनाम नायकों का प्रतीक बताया, जिनके त्याग, व्रत, कला, संस्कार और बलिदान से राष्ट्र और स्वराज्य की नींव निर्मित होती है। उन्होंने ‘तमस’ और ‘उसने कहा था’ के युगबोध से इसकी तुलना करते हुए कहा कि जहाँ ‘तमस’ तटस्थता और सांस्कृतिक विघटन की चेतावनी देता है तथा ‘उसने कहा था’ वचन और व्यक्तिगत त्याग का आदर्श प्रस्तुत करता है, वहीं ‘संक्रांति का संहार’ सामूहिक राष्ट्रबोध, सांस्कृतिक अस्मिता और स्वराज्य के लिए व्रत एवं बलिदान का संदेश देता है। डॉ. तिवारी के अनुसार पानीपत यहाँ अंत नहीं, बल्कि एक युग की संक्रांति और नए युग के जन्म का प्रतीक है; इसलिए यह कृति साहित्यिक उपन्यास से आगे बढ़कर सांस्कृतिक चेतना, इतिहास-बोध और राष्ट्रधर्म का पुनर्स्मरण कराने वाला महत्वपूर्ण ग्रंथ है। उन्होंने इसे प्रत्येक घर में पढ़े और मनन किए जाने योग्य बताते हुए डॉ. विद्यासागर उपाध्याय को इस उच्चकोटि की साहित्यिक सृष्टि के लिए बधाई और साधुवाद दिया।

 पूर्व मुख्य चिकित्साधिकारी एवं साहित्यकार डॉ. अनिल मिश्र ने ‘काल यात्रा : वेद से बर्लिन तक’ को भारतीय ज्ञान-परंपरा और आधुनिक विश्व के बीच का सेतु बताते हुए कहा कि आज ऐतिहासिक लेखन के सामने सबसे बड़ी चुनौती इतिहास को न तो रूखा अकादमिक विवरण बनने देना है और न ही उसे कल्पना का ऐसा आख्यान बना देना है जिसमें इतिहास की विश्वसनीयता ही समाप्त हो जाए। इन दोनों के बीच संतुलन स्थापित करना ऐतिहासिक साहित्य की वास्तविक कसौटी है और डॉ. विद्यासागर उपाध्याय की लेखकीय दृष्टि इस चुनौती को साधने की दिशा में गंभीर एवं उल्लेखनीय प्रयास है। डॉ. उपाध्याय अतीत को वर्तमान से काटकर नहीं देखते। उनकी दृष्टि में अतीत केवल बीता हुआ समय नहीं, बल्कि वर्तमान की चेतना और भविष्य की दिशा को समझने का आधार है। साहित्य उस अतीत और वर्तमान के बीच संवाद स्थापित करने का सबसे संवेदनशील माध्यम है। ‘संक्रान्ति का संहार’ और ‘काल यात्रा : वेद से बर्लिन तक’ दोनों कृतियाँ अलग-अलग विधागत धरातल पर इसी वैचारिक दृष्टि को अभिव्यक्त करती हैं। डॉ. उपाध्याय की लेखन-पद्धति में इतिहास महज पृष्ठभूमि बनकर नहीं रहता, बल्कि कथा का सक्रिय और जीवंत तत्व बन जाता है। घटनाओं के साथ तत्कालीन राजनीतिक मनःस्थिति, सामाजिक संरचना, मानवीय मनोविज्ञान, सत्ता-संघर्ष और सभ्यतागत द्वंद्व को समझने की उनकी कोशिश उनकी रचनात्मक दृष्टि को विशिष्ट बनाती है। यही वह बिंदु है जहाँ इतिहास महज विवरण न रहकर साहित्य में रूपांतरित होता है। डॉ नरेन्द्र भूषण ने‌ हिन्दी दिवस को लक्षित करते हुए हिन्दी को बोलने व लेखन में प्राथमिकता के साथ अपनाने पर बल दिया

कार्यक्रम में उमेश चन्द्र दुबे, सुशील कुमार वर्मा, कुमार तरल, राजेश सिंह 'श्रेयश', डॉ इंद्रजीत तिवारी निर्भीक, डॉ ओमप्रकाश द्विवेदी, राजीव वत्सल, करुणानिधि तिवारी, डॉ विजय प्रताप आर्य, डॉ आर वी एन पाण्डेय, डॉ अनिल कुमार तिवारी,  विनोद शंकर शुक्ल, देवकीनन्दन शान्त, डॉ स्मिता मिश्रा, बलवन्त सिंह, केशरी प्रसाद शुक्ल, पंकज कृष्ण, सरोज आर्यावर्ती, मन मोहन बाराकोटी, सुरभि सिंह, पी एस सुनील अय्यर, कन्हैया लाल, सोनी शुक्ल, कुॅंवर वीर सिंह मार्तण्ड, डॉ योगेश, मंजू सक्सेना, विनय कुमार मिश्र, संजीव श्रीवास्तव, जलदूत नन्द किशोर वर्मा, रविशंकर श्रीवास्तव, प्रमोद श्रीवास्तव, आनंद सिंह, राहुल पाण्डेय, शिव नाथ सिंह, वेद प्रकाश द्विवेदी, राम लखन वर्मा, वीरेंद्र प्रताप यादव, जितेंद्र शर्मा, हिमांशु सक्सेना, राजेश यादव, रामसुतार सिंह, रोनित पाण्डेय आदि गणमान्य लोग उपस्थित रहे।
कार्यक्रम के अध्यक्ष निर्भय नारायण गुप्त द्वारा अपने अध्यक्षीय वक्तव्य में डॉ विद्या सागर उपाध्याय की कृतियों को साहित्य की उपलब्धि बताते हुए  ऐतिहासिक तथ्यों को जनमानस के सम्मुख लाने पर बल दिया। उन्होंने साहित्यकारों का आह्वान किया कि आज साहित्य को लोक मंगल एवं राष्ट्र मंगल के भावों के साथ सृजित किये‌ जाने की आवश्यकता है। कार्यक्रम का सुरुचिपूर्ण संचालन विदुषी डॉ. ममता पंकज ने किया। अंत में सुप्रसिद्ध साहित्यकार  सीमा मधुरिमा ने समस्त अभ्यागतों के प्रति आभार व्यक्त किया।

Sanjay Agarwal 

Tringel News Lucknow 

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हिन्दी दिवस  एवं गणपति जन्मोत्सव पर डॉ. विद्यासागर उपाध्याय की दो कृतियों का भव्य लोकार्पण
लखनऊ, 14 सितंबर। हिन्दी दिवस के अवसर पर उत्तर प्रदेश प्रेस क्लब, कैसरबाग, लखनऊ में 24 ग्रंथों के रचनाकार, चिंतक एवं साहित्यकार डॉ. विद्यासागर उपाध्याय की दो बहुचर्चित कृतियों—‘संक्रान्ति का संहार’ एवं ‘काल यात्रा : वेद से बर्लिन तक’—का भव्य लोकार्पण हुआ। इस अवसर पर आयोजित साहित्यिक परिचर्चा में इतिहास, भारतीय ज्ञान-परंपरा, सांस्कृतिक चेतना और आधुनिक विश्व के संदर्भ में साहित्य की भूमिका पर गंभीर विमर्श हुआ।
उत्तर प्रदेश प्रेस क्लब के खचाखच भरे‌ हाल में पेशवा बाजीराव के वंशज एवं कार्यक्रम के मुख्य अतिथि श्रीमंत राजराजेश्वर प्रभाकर नारायणराव पेशवा ने कहा कि डॉ. विद्यासागर उपाध्याय ने ‘संक्रान्ति का संहार’ के माध्यम से इतिहास के उस महत्वपूर्ण अध्याय को साहित्य के केंद्र में लाने का उल्लेखनीय कार्य किया है, जिससे पेशवा परिवार और उनके पूर्वजों की गौरवशाली ऐतिहासिक परंपरा भी गहराई से जुड़ी हुई है। उन्होंने कहा कि इतिहास के किसी व्यक्तित्व या वंश का उल्लेख इतिहास-ग्रंथों में होना एक बात है, लेकिन साहित्यकार अपनी लेखनी के माध्यम से जब उन पात्रों को संवेदना, संघर्ष और मानवीय संदर्भों के साथ समाज के सामने पुनः उपस्थित करता है, तो वह उन्हें जनस्मृति में पुनर्जीवित करने का कार्य करता है। पेशवा ने इस बात के लिए डॉ. विद्यासागर उपाध्याय के प्रति विशेष आभार व्यक्त किया कि उन्होंने अपनी लेखनी के माध्यम से उनके पूर्वजों और पेशवा परंपरा से जुड़े ऐतिहासिक पात्रों को वर्तमान समाज के सामने पुनः प्रस्तुत किया। उन्होंने डॉ. उपाध्याय की दोनों कृतियों के लिए शुभकामनाएँ देते हुए कहा कि उनकी लेखनी इतिहास और संस्कृति के उन पक्षों को समाज के सामने लाने का कार्य कर रही है, जिन पर आज गंभीर और व्यापक संवाद की आवश्यकता है।
मुख्य वक्ता एवं आलोचक डॉ. रिंकी ‘मणिकर्णिका’ ने डॉ. विद्यासागर उपाध्याय के ऐतिहासिक कथा-लेखन की प्रक्रिया, उनकी रचनात्मक दृष्टि और लेखकीय साधना पर विस्तार से प्रकाश डालते हुए कहा कि ऐतिहासिक लेखन केवल घटनाओं और तिथियों को क्रमबद्ध कर देने का नाम नहीं है। इसके पीछे वर्षों का अध्ययन, ऐतिहासिक स्रोतों की खोज और पड़ताल, संदर्भों का सूक्ष्म परीक्षण, पात्रों की मानसिकता को समझना, तत्कालीन सामाजिक-राजनीतिक परिवेश का पुनर्निर्माण और इन समस्त तथ्यों को साहित्यिक संवेदना में रूपांतरित करने की कठिन साधना होती है। उन्होंने कहा कि ‘संक्रान्ति का संहार’ के पीछे डॉ. उपाध्याय की दीर्घकालिक अध्ययनशीलता, शोध-दृष्टि और लेखकीय परिश्रम स्पष्ट दिखाई देता है। ऐतिहासिक उपन्यास की सबसे बड़ी चुनौती यही है कि इतिहास की तथ्यात्मक विश्वसनीयता अक्षुण्ण रखते हुए कथा में ऐसा प्राण फूँका जाए कि पाठक केवल इतिहास पढ़े नहीं, बल्कि उसे घटित होते हुए अनुभव करे। डॉ. उपाध्याय इतिहास और साहित्य के बीच इसी जीवंत सेतु का निर्माण करते दिखाई देते हैं।
ख्यातिलब्ध कथाकार महेन्द्र भीष्म ने विशेष रूप से आचार्य चतुरसेन शास्त्री की ऐतिहासिक उपन्यास परंपरा का उल्लेख करते हुए कहा कि हिन्दी साहित्य में इतिहास को विराट कथात्मकता, शोध और मानवीय संवेदना के साथ प्रस्तुत करने की जिस समृद्ध परंपरा को आचार्य चतुरसेन शास्त्री ने ऊँचाई प्रदान की, डॉ. विद्यासागर उपाध्याय उसी परंपरा को अपने समय की आवश्यकताओं और अपनी विशिष्ट वैचारिक दृष्टि के साथ आगे बढ़ाने का गंभीर प्रयास कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि चतुरसेन की परंपरा को आगे बढ़ाने का अर्थ केवल ऐतिहासिक विषयों को चुन लेना नहीं है। इसके लिए इतिहास के भीतर छिपे मनुष्य, समाज, सत्ता, संस्कृति, सभ्यता और संघर्ष के प्रश्नों को साहित्यिक गहराई के साथ पकड़ना आवश्यक है। डॉ. उपाध्याय की रचनाओं में यह प्रयास स्पष्ट रूप से दिखाई देता है।
बीज वक्ता डॉ. जयप्रकाश तिवारी ने कहा कि डॉ. विद्यासागर उपाध्याय का उपन्यास ‘संक्रांति का संहार’ केवल पानीपत के तृतीय युद्ध की ऐतिहासिक गाथा नहीं, बल्कि इतिहास का सांस्कृतिक पुनर्मूल्यांकन है। उन्होंने विट्ठल, कल्याणी, माधव और वेणी जैसे पात्रों को इतिहास के उन गुमनाम नायकों का प्रतीक बताया, जिनके त्याग, व्रत, कला, संस्कार और बलिदान से राष्ट्र और स्वराज्य की नींव निर्मित होती है। उन्होंने ‘तमस’ और ‘उसने कहा था’ के युगबोध से इसकी तुलना करते हुए कहा कि जहाँ ‘तमस’ तटस्थता और सांस्कृतिक विघटन की चेतावनी देता है तथा ‘उसने कहा था’ वचन और व्यक्तिगत त्याग का आदर्श प्रस्तुत करता है, वहीं ‘संक्रांति का संहार’ सामूहिक राष्ट्रबोध, सांस्कृतिक अस्मिता और स्वराज्य के लिए व्रत एवं बलिदान का संदेश देता है। डॉ. तिवारी के अनुसार पानीपत यहाँ अंत नहीं, बल्कि एक युग की संक्रांति और नए युग के जन्म का प्रतीक है; इसलिए यह कृति साहित्यिक उपन्यास से आगे बढ़कर सांस्कृतिक चेतना, इतिहास-बोध और राष्ट्रधर्म का पुनर्स्मरण कराने वाला महत्वपूर्ण ग्रंथ है। उन्होंने इसे प्रत्येक घर में पढ़े और मनन किए जाने योग्य बताते हुए डॉ. विद्यासागर उपाध्याय को इस उच्चकोटि की साहित्यिक सृष्टि के लिए बधाई और साधुवाद दिया।
पूर्व मुख्य चिकित्साधिकारी एवं साहित्यकार डॉ. अनिल मिश्र ने ‘काल यात्रा : वेद से बर्लिन तक’ को भारतीय ज्ञान-परंपरा और आधुनिक विश्व के बीच का सेतु बताते हुए कहा कि आज ऐतिहासिक लेखन के सामने सबसे बड़ी चुनौती इतिहास को न तो रूखा अकादमिक विवरण बनने देना है और न ही उसे कल्पना का ऐसा आख्यान बना देना है जिसमें इतिहास की विश्वसनीयता ही समाप्त हो जाए। इन दोनों के बीच संतुलन स्थापित करना ऐतिहासिक साहित्य की वास्तविक कसौटी है और डॉ. विद्यासागर उपाध्याय की लेखकीय दृष्टि इस चुनौती को साधने की दिशा में गंभीर एवं उल्लेखनीय प्रयास है। डॉ. उपाध्याय अतीत को वर्तमान से काटकर नहीं देखते। उनकी दृष्टि में अतीत केवल बीता हुआ समय नहीं, बल्कि वर्तमान की चेतना और भविष्य की दिशा को समझने का आधार है। साहित्य उस अतीत और वर्तमान के बीच संवाद स्थापित करने का सबसे संवेदनशील माध्यम है। ‘संक्रान्ति का संहार’ और ‘काल यात्रा : वेद से बर्लिन तक’ दोनों कृतियाँ अलग-अलग विधागत धरातल पर इसी वैचारिक दृष्टि को अभिव्यक्त करती हैं। डॉ. उपाध्याय की लेखन-पद्धति में इतिहास महज पृष्ठभूमि बनकर नहीं रहता, बल्कि कथा का सक्रिय और जीवंत तत्व बन जाता है। घटनाओं के साथ तत्कालीन राजनीतिक मनःस्थिति, सामाजिक संरचना, मानवीय मनोविज्ञान, सत्ता-संघर्ष और सभ्यतागत द्वंद्व को समझने की उनकी कोशिश उनकी रचनात्मक दृष्टि को विशिष्ट बनाती है। यही वह बिंदु है जहाँ इतिहास महज विवरण न रहकर साहित्य में रूपांतरित होता है। डॉ नरेन्द्र भूषण ने‌ हिन्दी दिवस को लक्षित करते हुए हिन्दी को बोलने व लेखन में प्राथमिकता के साथ अपनाने पर बल दिया
कार्यक्रम में उमेश चन्द्र दुबे, सुशील कुमार वर्मा, कुमार तरल, राजेश सिंह 'श्रेयश', डॉ इंद्रजीत तिवारी निर्भीक, डॉ ओमप्रकाश द्विवेदी, राजीव वत्सल, करुणानिधि तिवारी, डॉ विजय प्रताप आर्य, डॉ आर वी एन पाण्डेय, डॉ अनिल कुमार तिवारी,  विनोद शंकर शुक्ल, देवकीनन्दन शान्त, डॉ स्मिता मिश्रा, बलवन्त सिंह, केशरी प्रसाद शुक्ल, पंकज कृष्ण, सरोज आर्यावर्ती, मन मोहन बाराकोटी, सुरभि सिंह, पी एस सुनील अय्यर, कन्हैया लाल, सोनी शुक्ल, कुॅंवर वीर सिंह मार्तण्ड, डॉ योगेश, मंजू सक्सेना, विनय कुमार मिश्र, संजीव श्रीवास्तव, जलदूत नन्द किशोर वर्मा, रविशंकर श्रीवास्तव, प्रमोद श्रीवास्तव, आनंद सिंह, राहुल पाण्डेय, शिव नाथ सिंह, वेद प्रकाश द्विवेदी, राम लखन वर्मा, वीरेंद्र प्रताप यादव, जितेंद्र शर्मा, हिमांशु सक्सेना, राजेश यादव, रामसुतार सिंह, रोनित पाण्डेय आदि गणमान्य लोग उपस्थित रहे।
कार्यक्रम के अध्यक्ष निर्भय नारायण गुप्त द्वारा अपने अध्यक्षीय वक्तव्य में डॉ विद्या सागर उपाध्याय की कृतियों को साहित्य की उपलब्धि बताते हुए  ऐतिहासिक तथ्यों को जनमानस के सम्मुख लाने पर बल दिया। उन्होंने साहित्यकारों का आह्वान किया कि आज साहित्य को लोक मंगल एवं राष्ट्र मंगल के भावों के साथ सृजित किये‌ जाने की आवश्यकता है। कार्यक्रम का सुरुचिपूर्ण संचालन विदुषी डॉ. ममता पंकज ने किया। अंत में सुप्रसिद्ध साहित्यकार  सीमा मधुरिमा ने समस्त अभ्यागतों के प्रति आभार व्यक्त किया।
Sanjay Agarwal 
Tringel News Lucknow 
8574663222
    user_Reporter Sanjay Agrawal
    Reporter Sanjay Agrawal
    Local News Reporter सदर, लखनऊ, उत्तर प्रदेश•
    45 min ago
  • लखनऊ के माल इलाके में एक युवक का अवैध असलहे से फायरिंग करते हुए वीडियो हुआ वायरल , वायरल वीडियो में दिख रहा युवक संतोष रावत बताया जा रहा है 📍 लखनऊ के माल इलाके में एक युवक का अवैध असलहे से फायरिंग करते हुए वीडियो हुआ वायरल , वायरल वीडियो में दिख रहा युवक संतोष रावत बताया जा रहा है 📍
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    लखनऊ के माल इलाके में एक युवक का अवैध असलहे से फायरिंग करते हुए वीडियो हुआ वायरल , वायरल वीडियो में दिख रहा युवक संतोष रावत बताया जा रहा है 📍
लखनऊ के माल इलाके में एक युवक का अवैध असलहे से फायरिंग करते हुए वीडियो हुआ वायरल , वायरल वीडियो में दिख रहा युवक संतोष रावत बताया जा रहा है 📍
    user_Journalist Himanshu Garg
    Journalist Himanshu Garg
    Local News Reporter सदर, लखनऊ, उत्तर प्रदेश•
    1 hr ago
  • इंडिया लाइव न्यूज़:- अंकित कुमार, के साथ देखें ताजा अपडेट लखनऊ विश्वविद्यालय में सुरक्षा कर्मियों पर संकट, नौकरी जाने से महिला गार्ड का छलका दर्द लखनऊ विश्वविद्यालय में सुरक्षा कर्मियों पर संकट, नौकरी जाने से महिला गार्ड का छलका दर्द बिना पूर्व सूचना हटाए जाने का आरोप, परिवार चलाने की चिंता में रो पड़ी महिला सुरक्षाकर्मी; न्याय की गुहार इंडिया लाइव न्यूज़ | क्राइम डेस्क | लखनऊ रिपोर्ट: अंकित कुमार लखनऊ विश्वविद्यालय से सुरक्षा कर्मियों की नौकरी जाने का मामला अब तूल पकड़ता दिखाई दे रहा है। विश्वविद्यालय परिसर में वर्षों से सुरक्षा व्यवस्था संभाल रहे कई कर्मचारियों को अचानक ड्यूटी से हटाए जाने का मामला सामने आया है। कर्मचारियों की संख्या को लेकर अलग-अलग रिपोर्टों में करीब 40 से लेकर लगभग 100 सुरक्षाकर्मियों के प्रभावित होने की बात कही गई है। कर्मचारियों का आरोप है कि उन्हें बिना किसी पूर्व लिखित सूचना या नोटिस के अचानक काम से हटा दिया गया, जिसके बाद उनके सामने रोजी-रोटी का संकट खड़ा हो गया है। कैमरे के सामने छलका महिला सुरक्षाकर्मी का दर्द मामले से जुड़ा एक वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से चर्चा में है। वीडियो में नौकरी से हटाई गई एक महिला सुरक्षाकर्मी भावुक होकर अपनी पीड़ा बताती नजर आ रही हैं। महिला का कहना है कि उन्होंने लंबे समय तक विश्वविद्यालय में पूरी जिम्मेदारी के साथ काम किया, लेकिन अचानक नौकरी चले जाने से परिवार की आर्थिक स्थिति पर बड़ा असर पड़ेगा। उनका सवाल है कि नौकरी नहीं रही तो घर का खर्च और बच्चों की पढ़ाई कैसे चलेगी? महिला सुरक्षाकर्मी ने विश्वविद्यालय प्रशासन के साथ-साथ कुलसचिव और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से न्याय की गुहार लगाई है।
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    इंडिया लाइव न्यूज़:- अंकित कुमार, के साथ देखें ताजा अपडेट 
लखनऊ विश्वविद्यालय में सुरक्षा कर्मियों पर संकट, नौकरी जाने से महिला गार्ड का छलका दर्द
लखनऊ विश्वविद्यालय में सुरक्षा कर्मियों पर संकट, नौकरी जाने से महिला गार्ड का छलका दर्द
बिना पूर्व सूचना हटाए जाने का आरोप, परिवार चलाने की चिंता में रो पड़ी महिला सुरक्षाकर्मी; न्याय की गुहार
इंडिया लाइव न्यूज़ | क्राइम डेस्क | लखनऊ
रिपोर्ट: अंकित कुमार
लखनऊ विश्वविद्यालय से सुरक्षा कर्मियों की नौकरी जाने का मामला अब तूल पकड़ता दिखाई दे रहा है। विश्वविद्यालय परिसर में वर्षों से सुरक्षा व्यवस्था संभाल रहे कई कर्मचारियों को अचानक ड्यूटी से हटाए जाने का मामला सामने आया है। कर्मचारियों की संख्या को लेकर अलग-अलग रिपोर्टों में करीब 40 से लेकर लगभग 100 सुरक्षाकर्मियों के प्रभावित होने की बात कही गई है।
कर्मचारियों का आरोप है कि उन्हें बिना किसी पूर्व लिखित सूचना या नोटिस के अचानक काम से हटा दिया गया, जिसके बाद उनके सामने रोजी-रोटी का संकट खड़ा हो गया है।
कैमरे के सामने छलका महिला सुरक्षाकर्मी का दर्द
मामले से जुड़ा एक वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से चर्चा में है। वीडियो में नौकरी से हटाई गई एक महिला सुरक्षाकर्मी भावुक होकर अपनी पीड़ा बताती नजर आ रही हैं।
महिला का कहना है कि उन्होंने लंबे समय तक विश्वविद्यालय में पूरी जिम्मेदारी के साथ काम किया, लेकिन अचानक नौकरी चले जाने से परिवार की आर्थिक स्थिति पर बड़ा असर पड़ेगा। उनका सवाल है कि नौकरी नहीं रही तो घर का खर्च और बच्चों की पढ़ाई कैसे चलेगी?
महिला सुरक्षाकर्मी ने विश्वविद्यालय प्रशासन के साथ-साथ कुलसचिव और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से न्याय की गुहार लगाई है।
    user_अंकित कुमार
    अंकित कुमार
    Social worker बख्शी का तालाब, लखनऊ, उत्तर प्रदेश•
    1 hr ago
  • मुंबई के जुहू स्थित प्रसिद्ध रेस्टोरेंट के बाहर स्पॉट हुई , शर्लिन चोपड़ा! मुंबई -शर्लिन चोपड़ा हाल ही में मुंबई के जुहू स्थित प्रसिद्ध रेस्टोरेंट 'चिन चिन चू' ,#ChinChinChu के बाहर स्पॉट हुई ,जहाँ उन्होंने एक बेहद ग्लैमरस और बोल्ड ग्रीन साटन ड्रेस पहनी हुई थी। इस दौरान बिंदास अंदाज में हमेशा की तरह दिए दमदार पोज। #BollywoodGossip #highlights2026 #followerseveryone #nishafakecase #RPT #RakeshPandey #character #Mumbai #highlightsfollowers #viralphotopost #BreakingNewsUpdate #SherlynChopra
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    मुंबई के जुहू स्थित प्रसिद्ध रेस्टोरेंट 
के बाहर स्पॉट हुई , शर्लिन चोपड़ा!
मुंबई -शर्लिन चोपड़ा हाल ही में मुंबई के जुहू स्थित प्रसिद्ध रेस्टोरेंट 'चिन चिन चू' ,#ChinChinChu के बाहर स्पॉट हुई ,जहाँ उन्होंने एक बेहद ग्लैमरस और बोल्ड ग्रीन साटन ड्रेस पहनी हुई थी। इस दौरान बिंदास अंदाज में हमेशा की तरह दिए दमदार पोज। 
#BollywoodGossip #highlights2026 #followerseveryone #nishafakecase #RPT #RakeshPandey #character  #Mumbai #highlightsfollowers #viralphotopost  #BreakingNewsUpdate #SherlynChopra
    user_AmanTv
    AmanTv
    Archive सदर, लखनऊ, उत्तर प्रदेश•
    1 hr ago
  • राजधानी लखनऊ सिर्फ एलडीए ही नहीं पुलिस भी करा रही है अवैध निर्माण. बिल्डिंग बनने के समय महीनों पहले जेई ने तहरीर, जब बिल्डिंग की दुकानें बन गईं, बिक गईं... उच्च स्तर पर फोटो समेत शिकायत हुई तब अमीनाबाद थाने में दर्ज कर ली गई एफआईआर... पुलिस ने खूब लिया लाभ... मामला अमीनाबाद थाने के लाटूश रोड पर विद्यांत कॉलेज के सामने एलडीए द्वारा सील करके पुलिस अभिरक्षा में सौंपी गई बिल्डिंग का है ... अब सील की गई बिल्डिंग बनकर तैयार हो गई है... जब काम चल रहा था तब एलडीए के जेई, पुलिस को तहरी देते रहे, फोन करते रहेलेकिन....काम चलता रहा.. जब आपसी बंदरबांट से बिल्डिंग बन गई, दुकानें बन गईं तब जनता अदालत और अधिकारियों से शिकायत हुई तब बीती 12 सितंबर को बिल्डर फैज़ान के खिलाफ je की शिक़ायत पर एफआईआर दर्ज कर ली/
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    राजधानी लखनऊ सिर्फ एलडीए ही नहीं पुलिस भी करा रही है अवैध निर्माण.
बिल्डिंग बनने के समय महीनों पहले जेई ने तहरीर, जब बिल्डिंग की दुकानें बन गईं, बिक गईं... उच्च स्तर पर फोटो समेत शिकायत हुई तब अमीनाबाद थाने में दर्ज कर ली गई एफआईआर... पुलिस ने खूब लिया लाभ...
मामला अमीनाबाद थाने के लाटूश रोड पर विद्यांत कॉलेज के सामने एलडीए द्वारा सील करके पुलिस अभिरक्षा में सौंपी गई बिल्डिंग का है ... अब सील की गई बिल्डिंग बनकर तैयार हो गई है... जब काम चल रहा था तब एलडीए के जेई, पुलिस को तहरी देते रहे, फोन करते रहेलेकिन....काम चलता रहा.. जब आपसी बंदरबांट से बिल्डिंग बन गई, दुकानें बन गईं तब जनता अदालत और अधिकारियों से शिकायत हुई तब बीती 12 सितंबर को बिल्डर फैज़ान के खिलाफ je की शिक़ायत पर एफआईआर दर्ज कर ली/
    user_Khabro Ki Paini Najar News New
    Khabro Ki Paini Najar News New
    Advertising agency बख्शी का तालाब, लखनऊ, उत्तर प्रदेश•
    1 hr ago
  • ताज़ा खबर: न्यूयॉर्क टाइम्स के अनुसार, वाशिंगटन ने रियाद की हूती विद्रोहियों के खिलाफ सीधी अमेरिकी सैन्य कार्रवाई की मांग को ठुकरा दिया है, जिसके बाद सऊदी अरब ट्रंप प्रशासन से पूरी तरह नाराज़ है — और अब वह अपने सबसे बुरे हालात का सामना कर रहा है। क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान ने कथित तौर पर ट्रंप से अमेरिकी हवाई हमलों की मांग की थी। ट्रंप ने इनकार कर दिया। कुछ ही दिनों में, हूतियों ने लाल सागर और बाब अल-मंदब के आसपास महत्वपूर्ण क्षेत्र पर कब्ज़ा कर लिया, सऊदी समर्थित बलों को हरा दिया गया, और हमलों के बाद पूर्व-पश्चिम तेल पाइपलाइन को बंद कर दिया गया। पूर्व अमेरिकी राजदूत माइकल रैटनी ने रियाद की स्थिति को "उनका सबसे बुरा हालात" करार दिया। रियाद ने अपने सबसे शक्तिशाली सहयोगी से मदद मांगी। वाशिंगटन ने इसके बजाय खुफिया जानकारी की पेशकश की। अब सऊदी अरब अकेले ही अपनी सुरक्षा और तेल आपूर्ति लाइन दोनों पर खतरे का सामना कर रहा है। संदेश स्पष्ट है: अमेरिका के खाड़ी साझेदार कठिन तरीके से सीख रहे हैं कि वाशिंगटन की सुरक्षा गारंटी की सीमाएं होती हैं। और वे सीमाएं अब पार हो चुकी हैं। चूंकि साउदी अरब का तेल निर्यात पूरी तरह से ठप हो गया है इसका असर भारत पर भी अगले सप्ताह से दिखना शुरू हो जायेगा।
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    ताज़ा खबर: न्यूयॉर्क टाइम्स के अनुसार, वाशिंगटन ने रियाद की हूती विद्रोहियों के खिलाफ सीधी अमेरिकी सैन्य कार्रवाई की मांग को ठुकरा दिया है, जिसके बाद सऊदी अरब ट्रंप प्रशासन से पूरी तरह नाराज़ है — और अब वह अपने सबसे बुरे हालात का सामना कर रहा है।

क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान ने कथित तौर पर ट्रंप से अमेरिकी हवाई हमलों की मांग की थी। ट्रंप ने इनकार कर दिया। कुछ ही दिनों में, हूतियों ने लाल सागर और बाब अल-मंदब के आसपास महत्वपूर्ण क्षेत्र पर कब्ज़ा कर लिया, सऊदी समर्थित बलों को हरा दिया गया, और हमलों के बाद पूर्व-पश्चिम तेल पाइपलाइन को बंद कर दिया गया।

पूर्व अमेरिकी राजदूत माइकल रैटनी ने रियाद की स्थिति को "उनका सबसे बुरा हालात" करार दिया।

रियाद ने अपने सबसे शक्तिशाली सहयोगी से मदद मांगी। वाशिंगटन ने इसके बजाय खुफिया जानकारी की पेशकश की। अब सऊदी अरब अकेले ही अपनी सुरक्षा और तेल आपूर्ति लाइन दोनों पर खतरे का सामना कर रहा है।

संदेश स्पष्ट है: अमेरिका के खाड़ी साझेदार कठिन तरीके से सीख रहे हैं कि वाशिंगटन की सुरक्षा गारंटी की सीमाएं होती हैं। और वे सीमाएं अब पार हो चुकी हैं।
चूंकि साउदी अरब का तेल निर्यात पूरी तरह से ठप हो गया है इसका असर भारत पर भी अगले सप्ताह से दिखना शुरू हो जायेगा।
    user_Samiullah Khan
    Samiullah Khan
    Doctor Malihabad, Lucknow•
    1 hr ago
  • Panic is spreading across all major Ukrainian Telegram channels after Russia struck and destroyed the fourth warehouse belonging to one of Ukraine’s largest pharmaceutical distributors. Not long ago they were celebrating Ukraine’s drone strikes on Wildberries warehouses. Now they fear that this winter, with heating and electricity uncertain, many people will get sick and find no medicine in pharmacies, or prices so high that no one can afford them. Maybe they’ll learn something from this, but I doubt they have the brains to understand that their actions have consequences.
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    Panic is spreading across all major Ukrainian Telegram channels after Russia struck and destroyed the fourth warehouse belonging to one of Ukraine’s largest pharmaceutical distributors. 

Not long ago they were celebrating Ukraine’s drone strikes on Wildberries warehouses. 

Now they fear that this winter, with heating and electricity uncertain, many people will get sick and find no medicine in pharmacies, or prices so high that no one can afford them. 

Maybe they’ll learn something from this, but I doubt they have the brains to understand that their actions have consequences.
    user_Samiullah Khan
    Samiullah Khan
    Doctor Malihabad, Lucknow•
    1 hr ago
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