सवाई माधोपुर में पेड़ों की कटाई पर बढ़ता विवाद: केवल तहसीलदार की अनुमति पर्याप्त नहीं, पर्यावरण कानूनों की अनदेखी के आरोप सवाई माधोपुर शहर में जारी व्यापक वृक्ष कटाई को लेकर स्थानीय नागरिकों, पर्यावरण प्रेमियों एवं सामाजिक कार्यकर्ताओं में भारी आक्रोश है। बजरिया क्षेत्र सहित शहर के विभिन्न हिस्सों में अब तक लगभग 400 पेड़ काटे जा चुके हैं। जानकारी के अनुसार पहले 311 पेड़ों की कटाई की गई तथा 5 मई से 9 मई 2026 के बीच लगभग 70 और पेड़ काट दिए गए। सामाजिक कार्यकर्ताओं का आरोप है कि यह पूरी कार्रवाई केवल तहसीलदार की कथित अनुमति के आधार पर की जा रही है, जबकि पर्यावरणीय और न्यायिक दृष्टि से ऐसी अनुमति पर्याप्त नहीं मानी जा सकती। इस संदर्भ में नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (NGT), केंद्रीय क्षेत्र पीठ, भोपाल के महत्वपूर्ण निर्णय Jabbu Lal Meena vs. State of Rajasthan & Ors. (O.A. No. 227/2024/CZ, निर्णय दिनांक 3 नवंबर 2025) का उल्लेख किया गया है। उक्त मामले में NGT ने स्पष्ट माना कि केवल तहसीलदार द्वारा दी गई अनुमति पर्यावरणीय दृष्टि से पर्याप्त नहीं है और भविष्य में सक्षम प्राधिकारी की पूर्व अनुमति के बिना एक भी पेड़ नहीं काटा जा सकता। उस मामले में PWD द्वारा सड़क चौड़ीकरण हेतु पेड़ों की कटाई की गई थी। विभाग ने राजस्थान राजस्व अधिनियम, 1955 के तहत तहसीलदार से अनुमति लेने का दावा किया था, लेकिन NGT ने FSI की सैटेलाइट इमेजरी के आधार पर वास्तविक वृक्ष क्षति का आकलन करते हुए 2000 पेड़ लगाने का आदेश दिया। ट्रिब्यूनल ने यह भी स्पष्ट किया कि पर्यावरण संरक्षण से जुड़े मामलों में केवल राजस्व अनुमति पर्याप्त नहीं मानी जा सकती। सवाई माधोपुर का मामला और भी गंभीर माना जा रहा है क्योंकि यह क्षेत्र रणथंभौर राष्ट्रीय उद्यान एवं संरक्षित वन क्षेत्र की लगभग 10 किलोमीटर परिधि में आता है। सर्वोच्च न्यायालय द्वारा पूर्व में स्पष्ट निर्देश दिए जा चुके हैं कि संवेदनशील अथवा शहरी क्षेत्रों में 50 से अधिक पेड़ों की कटाई के लिए उच्च स्तरीय वन एवं पर्यावरणीय स्वीकृति आवश्यक है। स्थानीय नागरिकों का आरोप है कि इन महत्वपूर्ण कानूनी प्रावधानों एवं सर्वोच्च न्यायालय के निर्देशों की अनदेखी करते हुए बड़े पैमाने पर वृक्षों का कटान किया गया। यह भी आरोप लगाया गया कि न्यायालय में पूर्ण एवं स्पष्ट तथ्य प्रस्तुत नहीं किए जा रहे तथा वास्तविक स्थिति को छिपाया जा रहा है। वर्तमान में मामला स्थायी लोक अदालत में लंबित है, लेकिन इसके बावजूद वृक्ष कटाई लगातार जारी रहने से लोगों में निराशा एवं असंतोष बढ़ रहा है। सामाजिक कार्यकर्ताओं का कहना है कि यदि स्थानीय स्तर पर न्याय नहीं मिला तो वे इस मामले को NGT और सर्वोच्च न्यायालय तक लेकर जाएंगे। पर्यावरण प्रेमियों का कहना है कि बजरिया क्षेत्र में वर्षों पुराने पेड़ों की कटाई से स्थानीय तापमान में वृद्धि होगी, आमजन को छाया नहीं मिलेगी, दुकानदारों एवं राहगीरों को भारी परेशानी का सामना करना पड़ेगा तथा शहर की पर्यावरणीय पहचान समाप्त हो जाएगी। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि विकास कार्यों का कोई स्पष्ट सार्वजनिक मॉडल प्रस्तुत नहीं किया जा रहा। कई स्थानों पर पुरानी सड़कों के ऊपर सड़कें बनाई जा रही हैं तथा दुकानों के सामने गहरी नालियां खोदी जा रही हैं, जिससे आगामी वर्षा ऋतु में जलभराव एवं बाढ़ जैसे हालात बनने की आशंका है। सामाजिक कार्यकर्ताओं ने यह भी कहा कि इस पूरे मामले में विपक्षी दलों से जुड़े जनप्रतिनिधियों, पूर्व विधायकों एवं सांसदों की ओर से भी अब तक कोई स्पष्ट और ठोस प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। उनका कहना है कि इस चुप्पी से यह संदेश जा रहा है कि वृक्ष कटाई को लेकर राजनीतिक स्तर पर व्यापक सहमति बनी हुई है। साथ ही यह भी कहा गया कि बाजार क्षेत्र के अनेक लोगों ने भी इस मुद्दे को संगठित रूप से उठाने में अपेक्षित रुचि नहीं दिखाई। यदि व्यापारी, स्थानीय नागरिक और सामाजिक संगठन एकजुट होकर प्रभावी जनदबाव बनाते तो संभवतः इतने बड़े स्तर पर पेड़ों की कटाई को रोका जा सकता था। मामले से जुड़े सामाजिक कार्यकर्ता मुकेश भूप्रेमी, रत्नाकर गोयल, राजेश पहाड़िया, अवधेश शर्मा, अजय शर्मा सहित अन्य लोगों ने कहा कि पिछले दो महीनों से लगातार ज्ञापन, शिकायतें एवं कानूनी प्रयास किए जा रहे हैं, लेकिन जिला प्रशासन, पुलिस विभाग, वन विभाग तथा स्थानीय जनप्रतिनिधियों द्वारा प्रभावी कार्रवाई नहीं की जा रही। उन्होंने आरोप लगाया कि “विकास” के नाम पर शहर की हरियाली को समाप्त किया जा रहा है और जनभावनाओं की अनदेखी करते हुए खुलेआम पेड़ों का कत्ल किया जा रहा है। पर्यावरण प्रेमियों ने मांग की है कि: तत्काल प्रभाव से वृक्ष कटाई पर रोक लगाई जाए। संपूर्ण परियोजना की सार्वजनिक जानकारी जारी की जाए। सक्षम पर्यावरणीय एवं वन प्राधिकारियों की अनुमति सार्वजनिक की जाए। काटे गए पेड़ों का वैज्ञानिक आकलन कराया जाए। जिम्मेदार अधिकारियों के विरुद्ध वैधानिक कार्रवाई की जाए। रणथंभौर क्षेत्र की पर्यावरणीय संवेदनशीलता को ध्यान में रखते हुए स्वतंत्र जांच कराई जाए।
सवाई माधोपुर में पेड़ों की कटाई पर बढ़ता विवाद: केवल तहसीलदार की अनुमति पर्याप्त नहीं, पर्यावरण कानूनों की अनदेखी के आरोप सवाई माधोपुर शहर में जारी व्यापक वृक्ष कटाई को लेकर स्थानीय नागरिकों, पर्यावरण प्रेमियों एवं सामाजिक कार्यकर्ताओं में भारी आक्रोश है। बजरिया क्षेत्र सहित शहर के विभिन्न हिस्सों में अब तक लगभग 400 पेड़ काटे जा चुके हैं। जानकारी के अनुसार पहले 311 पेड़ों की कटाई की गई तथा 5 मई से 9 मई 2026 के बीच लगभग 70 और पेड़ काट दिए गए। सामाजिक कार्यकर्ताओं का आरोप है कि यह पूरी कार्रवाई केवल तहसीलदार की कथित अनुमति के आधार पर की जा रही है, जबकि पर्यावरणीय और न्यायिक दृष्टि से ऐसी अनुमति पर्याप्त नहीं मानी जा सकती। इस संदर्भ में नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (NGT), केंद्रीय क्षेत्र पीठ, भोपाल के महत्वपूर्ण निर्णय Jabbu Lal Meena vs. State of Rajasthan & Ors. (O.A. No. 227/2024/CZ, निर्णय दिनांक 3 नवंबर 2025) का उल्लेख किया गया है। उक्त मामले में NGT ने स्पष्ट माना कि केवल तहसीलदार द्वारा दी गई अनुमति पर्यावरणीय दृष्टि से पर्याप्त नहीं है और भविष्य में सक्षम प्राधिकारी की पूर्व अनुमति के बिना एक भी पेड़ नहीं काटा जा सकता। उस मामले में PWD द्वारा सड़क चौड़ीकरण हेतु पेड़ों की कटाई की गई थी। विभाग ने राजस्थान राजस्व अधिनियम, 1955 के तहत तहसीलदार से अनुमति लेने का दावा किया था, लेकिन NGT ने FSI की सैटेलाइट इमेजरी के आधार पर वास्तविक वृक्ष क्षति का आकलन करते हुए 2000 पेड़ लगाने का आदेश दिया। ट्रिब्यूनल ने यह भी स्पष्ट किया कि पर्यावरण संरक्षण से जुड़े मामलों में केवल राजस्व अनुमति पर्याप्त नहीं मानी जा सकती। सवाई माधोपुर का मामला और भी गंभीर माना जा रहा है क्योंकि यह क्षेत्र रणथंभौर राष्ट्रीय उद्यान एवं संरक्षित वन क्षेत्र की लगभग 10 किलोमीटर परिधि में आता है। सर्वोच्च न्यायालय द्वारा पूर्व में स्पष्ट निर्देश दिए जा चुके हैं कि संवेदनशील अथवा शहरी क्षेत्रों में 50 से अधिक पेड़ों की कटाई के लिए उच्च स्तरीय वन एवं पर्यावरणीय स्वीकृति आवश्यक है। स्थानीय नागरिकों का आरोप है कि इन महत्वपूर्ण कानूनी प्रावधानों एवं सर्वोच्च न्यायालय के निर्देशों की अनदेखी करते हुए बड़े पैमाने पर वृक्षों का कटान किया गया। यह भी आरोप लगाया गया कि न्यायालय में पूर्ण एवं स्पष्ट तथ्य प्रस्तुत नहीं किए जा रहे तथा वास्तविक स्थिति को छिपाया जा रहा है। वर्तमान में मामला स्थायी लोक अदालत में लंबित है, लेकिन इसके बावजूद वृक्ष कटाई लगातार जारी रहने से लोगों में निराशा एवं असंतोष बढ़ रहा है। सामाजिक कार्यकर्ताओं का कहना है कि यदि स्थानीय स्तर पर न्याय नहीं मिला तो वे इस मामले को NGT और सर्वोच्च न्यायालय तक लेकर जाएंगे। पर्यावरण प्रेमियों का कहना है कि बजरिया क्षेत्र में वर्षों पुराने पेड़ों की कटाई से स्थानीय तापमान में वृद्धि होगी, आमजन को छाया नहीं मिलेगी, दुकानदारों एवं राहगीरों को भारी परेशानी का सामना करना पड़ेगा तथा शहर की पर्यावरणीय पहचान समाप्त हो जाएगी। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि विकास कार्यों का कोई स्पष्ट सार्वजनिक मॉडल प्रस्तुत नहीं किया जा रहा। कई स्थानों पर पुरानी सड़कों के ऊपर सड़कें बनाई जा रही हैं तथा दुकानों के सामने गहरी नालियां खोदी जा रही हैं, जिससे आगामी वर्षा ऋतु में जलभराव एवं बाढ़ जैसे हालात बनने की आशंका है। सामाजिक कार्यकर्ताओं ने यह भी कहा कि इस पूरे मामले में विपक्षी दलों से जुड़े जनप्रतिनिधियों, पूर्व विधायकों एवं सांसदों की ओर से भी अब तक कोई स्पष्ट और ठोस प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। उनका कहना है कि इस चुप्पी से यह संदेश जा रहा है कि वृक्ष कटाई को लेकर राजनीतिक स्तर पर व्यापक सहमति बनी हुई है। साथ ही यह भी कहा गया कि बाजार क्षेत्र के अनेक लोगों ने भी इस मुद्दे को संगठित रूप से उठाने में अपेक्षित रुचि नहीं दिखाई। यदि व्यापारी, स्थानीय नागरिक और सामाजिक संगठन एकजुट होकर प्रभावी जनदबाव बनाते तो संभवतः इतने बड़े स्तर पर पेड़ों की कटाई को रोका जा सकता था। मामले से जुड़े सामाजिक कार्यकर्ता मुकेश भूप्रेमी, रत्नाकर गोयल, राजेश पहाड़िया, अवधेश शर्मा, अजय शर्मा सहित अन्य लोगों ने कहा कि पिछले दो महीनों से लगातार ज्ञापन, शिकायतें एवं कानूनी प्रयास किए जा रहे हैं, लेकिन जिला प्रशासन, पुलिस विभाग, वन विभाग तथा स्थानीय जनप्रतिनिधियों द्वारा प्रभावी कार्रवाई नहीं की जा रही। उन्होंने आरोप लगाया कि “विकास” के नाम पर शहर की हरियाली को समाप्त किया जा रहा है और जनभावनाओं की अनदेखी करते हुए खुलेआम पेड़ों का कत्ल किया जा रहा है। पर्यावरण प्रेमियों ने मांग की है कि: तत्काल प्रभाव से वृक्ष कटाई पर रोक लगाई जाए। संपूर्ण परियोजना की सार्वजनिक जानकारी जारी की जाए। सक्षम पर्यावरणीय एवं वन प्राधिकारियों की अनुमति सार्वजनिक की जाए। काटे गए पेड़ों का वैज्ञानिक आकलन कराया जाए। जिम्मेदार अधिकारियों के विरुद्ध वैधानिक कार्रवाई की जाए। रणथंभौर क्षेत्र की पर्यावरणीय संवेदनशीलता को ध्यान में रखते हुए स्वतंत्र जांच कराई जाए।
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