Shuru
Apke Nagar Ki App…
बंजारा महिलाओं की पारंपरिक फाग उत्सव ने मचाया गदर , नृत्य नए मोह लिया
Raju Singh Rathod
बंजारा महिलाओं की पारंपरिक फाग उत्सव ने मचाया गदर , नृत्य नए मोह लिया
More news from मध्य प्रदेश and nearby areas
- Post by Raju Singh Rathod1
- खंडवा के खड़कपुरा मस्जिद पर पथराव करने वाले दो आरोपी वसीम और जाकिर को कोतवाली पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया इन आरोपियों का जुलूस शहर भर में निकाला गया।1
- शिवसेना जिला प्रमुख गणेश भावसार ने कहा कि _*होलिका का कृषि-रूपक: जो जलता है वह आवरण है, जो बचता है वह सार है।होलिका-प्रह्लाद की कथा का सर्वाधिक प्राचीन, सर्वाधिक भौतिक और सर्वाधिक उपेक्षित आयाम उसका कृषि-आयाम है। और इस आयाम की कुंजी स्वयं नामों में छिपी है। *संस्कृत में होलिका शब्द होला से आता है* , जिसका अर्थ है अर्ध-पकी हुई फसल, विशेषकर गेहूँ की हरी बाली (green ear of grain) । कुछ शब्दकोशों में होलाका का अर्थ है वह फसल जो आग में भूनी जाए। प्रह्लाद शब्द का एक अर्थ है प्र + ह्लाद — वह जो आनंद से परिपूर्ण हो — किंतु कृषि-संदर्भ में यह उस जीवित बीज या दाने (kernel) का प्रतीक है जो बाली के भीतर संरक्षित रहता है, जो कि अग्नि में बाहरी छिलका जल जाने के बाद भी जीवित रहता है और अंकुरित होने की क्षमता धारण करता है। यह कोई आकस्मिक भाषाई संयोग नहीं है। यह उस प्राचीन काल की स्मृति है जब कथा और कृषि-विज्ञान एक ही भाषा बोलते थे, जब किसान और ऋषि एक ही व्यक्ति थे। होली फाल्गुन मास की पूर्णिमा को मनाई जाती है — फरवरी के अंत से मार्च के प्रारंभ के बीच। भारतीय उपमहाद्वीप में गेहूँ, जौ और चने की रबी फसल के पकने का ठीक यही समय है। इस ऋतु में खेतों में गेहूँ की बालियाँ सुनहरी होने लगती हैं, फसल कटाई के कगार पर होती है, और कृषक समाज में एक विशेष उत्साह और उल्लास का वातावरण होता है। होलिका दहन की परंपरा में आज भी — विशेषकर उत्तर भारत, राजस्थान, मध्यप्रदेश और गुजरात के ग्रामीण क्षेत्रों में — नई फसल की हरी बालियाँ अग्नि में डाली जाती हैं। इसे होला या होलका कहते हैं। किसान अपने खेत से ताज़ी गेहूँ और जौ की बालियाँ तोड़कर लाता है, उन्हें होलिका की अग्नि में भूनता है, और फिर उन भुनी हुई बालियों का प्रसाद ग्रहण करता है। यह नई फसल का प्रथम भोग है — उसे देवता को अर्पित करने की परंपरा। यह परंपरा इस विश्वास पर आधारित है कि जब तक फसल को अग्नि में अर्पित न किया जाए, तब तक उसे खाना शुभ नहीं। यह वैदिक अग्निहोत्र की परंपरा का ग्रामीण विस्तार था — अग्नि देवता को नई उपज का पहला भाग अर्पित करना। कृषि-रूपक में होलिका वह सूखी, पकी हुई बाली है जो फसल के पकने के साथ अपना उद्देश्य पूरा कर चुकी है। बाली (straw, husk, chaff) का काम था — दाने को आकाश से प्रकाश दिलाना, वर्षा का जल संग्रह करना, हवा से सुरक्षा देना, और दाने को परिपक्व करना। किंतु जब दाना पक जाता है, तो बाली की आवश्यकता समाप्त हो जाती है। वह सूख जाती है, उसका हरापन चला जाता है, और वह अग्नि के लिए उचित बन जाती है। होलिका का अग्निरोधक वस्त्र — वह वरदान जो उसे आग से बचाता था — प्रकृति की उस नियामक शक्ति का प्रतीक है जिसने बाली को तब तक सुरक्षित रखा जब तक दाने को उसकी आवश्यकता थी। किंतु जब दाना पूर्ण हो गया — जब प्रह्लाद (बीज) की परिपक्वता आ गई — तो वह सुरक्षा अपने-आप हट गई। प्रकृति का यह नियम है: आवरण तब तक जब तक सत्त्व को उसकी आवश्यकता हो, और तत्पश्चात उसका स्वयं विलय। यह कृषि-सत्य अत्यंत सूक्ष्म है। किसान जानता है कि जब फसल पक जाए, तो उसे काटना होगा। जो काटता नहीं, जो पकी बाली को खेत में ही रहने देता है, वह अंततः फसल खो देता है — बाली सड़ जाती है, दाना गिर जाता है। होलिका का जलना उस पके आवरण का समय पर विसर्जन है जो जीवन-चक्र के लिए अनिवार्य है। प्रह्लाद वह गेहूँ का दाना है जो बाली के भीतर छिपा होता है। अग्नि उसका क्या कर सकती है? यदि आप गेहूँ की बाली को हल्की आँच में भूनें — जैसा होलिका दहन की परंपरा में होता है — तो बाहरी तना और पत्तियाँ जल जाती हैं, किंतु भीतर का दाना न केवल सुरक्षित रहता है बल्कि पकता है, सुगंधित होता है, और खाने योग्य बन जाता है। अग्नि यहाँ विनाशक नहीं है — वह परिष्कारक (refiner) है। यह भौतिक वास्तविकता पौराणिक रूपक बन गई। जो प्रह्लाद (दाना) है, वह अग्नि में नष्ट नहीं होता, वरन् परिपक्व होता है। अग्नि उसकी परीक्षा है, उसका विनाश नहीं। प्रत्येक वर्ष किसान इस सत्य को होलिका दहन में पुनः अनुभव करता है जब वह भुनी हुई बाली का स्वाद लेता है और पाता है कि दाना मीठा, सुगंधित और जीवनदायी है। इससे एक गहरा कृषि-दर्शन उभरता है: जो वास्तविक है — जो जीवन का सार है — वह अग्नि में नहीं जलता। जो जलता है वह केवल आवरण है, छाल है, वह अनावश्यक परत है जो सत्त्व को ढके हुए थी। आज भी उत्तर भारत के गाँवों में होलिका दहन की रात एक विशेष दृश्य होता है। किसान परिवार अपने खेत की नई गेहूँ और जौ की बालियाँ लेकर होलिका की अग्नि के पास आते हैं। वे उन बालियों को अग्नि के इर्द-गिर्द घुमाते हैं — परिक्रमा करते हैं — और फिर उन्हें आँच के पास रखकर भूनते हैं। भुनी हुई बालियों को होला कहते हैं। इस अनुष्ठान का गहरा अर्थ है। किसान कह रहा है: "हे अग्निदेव, यह नई फसल पहले तुम्हारी है। तुम्हें अर्पित करने के बाद ही हम इसे ग्रहण करेंगे।" यह कृतज्ञता का भाव है — प्रकृति को उसकी देन लौटाने का प्रतीकात्मक कार्य। इस परंपरा को नवान्न (नया अन्न) की परंपरा से जोड़कर देखें। भारत के अनेक प्रदेशों में नई फसल का पहला अन्न सीधे नहीं खाया जाता — पहले उसे अग्नि, देवता या पितरों को अर्पित किया जाता है। यह कृषि-अग्नि उत्सव की परंपरा केवल भारत तक सीमित नहीं है। विश्व के लगभग हर कृषि-समाज में ऐसे उत्सव रहे हैं जिनमें नई फसल के अवसर पर अग्नि जलाई जाती है, पुराना नष्ट किया जाता है, और नए का स्वागत किया जाता है। यूरोप का बेल्टेन (Beltane) स्कॉटलैंड और आयरलैंड में बेल्टेन उत्सव ठीक उसी समय होता था जब होली — वसंत के आगमन पर, मई-दिन के आसपास। उसमें भी विशाल अलाव जलाए जाते थे, पशुओं को उनके बीच से निकाला जाता था, और नई फसल की बालियाँ अग्नि में डाली जाती थीं। बेल का अर्थ है उज्ज्वल अग्नि या सूर्य; यह उत्सव सूर्य की पुनर्विजय और कृषि-वर्ष की नई शुरुआत का प्रतीक था। रूस और पूर्वी यूरोप में मास्लेनित्सा वसंत से पहले का उत्सव है जिसमें शीत ऋतु की पुतली जलाई जाती है — यह होलिका के समान ही है। पुरानी फसल के अवशेष जलाए जाते हैं और नई फसल का स्वागत किया जाता है। ईरान का नौरोज़ (Nowruz) फारसी नव वर्ष है जो वसंत विषुव पर होता है, उसमें चहारशंबे सूरी की परंपरा है — अलाव जलाकर उनके ऊपर से छलाँग लगाना। यह भी शीत और पुराने वर्ष के विसर्जन और नई ऊर्जा के स्वागत का प्रतीक है। मेसोपोटामिया और मिस्र प्राचीन सुमेरियन और मिस्री सभ्यताओं में वसंत में फसल की पहली कटाई से पहले अग्नि-अनुष्ठान किए जाते थे। तम्मूज़ देवता का उत्सव — जो मरता है और पुनर्जीवित होता है — गेहूँ के दाने के जीवन-मृत्यु-पुनर्जीवन के चक्र का प्रतीक था। यहूदी परंपरा का बिकूरीम (Bikkurim) भी यही है। तोरा में बिकूरीम की आज्ञा है — पहली फसल का पहला फल मंदिर में अर्पित करना। यह होला की परंपरा का हिब्रू समकक्ष है। इन सभी परंपराओं में एक सार्वभौमिक कृषि-दर्शन है: पुराने को अग्नि में देना ताकि नया जन्म ले सके। गेहूँ का दाना — जो ज़मीन में गाड़ा जाता है, "मरता" है, और तब अंकुरित होकर नई फसल बनता है — मृत्यु और पुनर्जन्म का सर्वाधिक प्राचीन और सार्वभौमिक प्रतीक रहा है। यह वाक्य प्रह्लाद के कृषि-रूपक का लगभग शाब्दिक अनुवाद है। प्रह्लाद वह दाना है जो अग्नि (जो मृत्यु के समान है) में जाता है और जीवित निकलता है — और उसके जीवित निकलने से ही नई फसल का, नए युग का जन्म होता है। एलेउसिनियन रहस्य (Eleusinian Mysteries) याद करना चाहिए। प्राचीन यूनान की इस सर्वाधिक पवित्र धार्मिक परंपरा का केंद्र भी यही था: डेमेटर (Demeter, अन्न-देवी) और उनकी पुत्री पर्सेफोन का मिथक, जो भूमि के नीचे (मृत्यु-लोक में) जाती है और वापस आती है। उनकी वापसी वसंत है, उनका प्रस्थान शीत है। रहस्य-दीक्षा में शिष्यों को गेहूँ की एक बाली दिखाई जाती थी — और यही उनकी परम दीक्षा थी। मृत्यु में से जीवन का उगना। प्रह्लाद का वह दाना इसी ब्रह्मांडीय सत्य का हिंदू रूप है। भारत की प्राचीन दृष्टि में कृषि-चक्र और ब्रह्मांडीय चक्र में कोई भेद नहीं था। जो ब्रह्मांड में होता है वही खेत में होता है; जो खेत में होता है वही मनुष्य की आत्मा में होता है। यही यथा पिंडे तथा ब्रह्मांडे का सिद्धांत है। गेहूँ का बीज ज़मीन में जाता है → शीत में सोता है → वसंत में अंकुरित होता है → ग्रीष्म में पकता है → काटा जाता है → अग्नि में भूना जाता है → खाया जाता है → पुनः बीज बनता है। यह चक्र अनंत है। होली इस चक्र का उत्सव-बिंदु है — वह क्षण जब बीज ने अपनी यात्रा पूरी की, पकी बाली बनी, और अग्नि में अर्पित होकर अगले चक्र को आमंत्रित किया। इसी ब्रह्मांडीय चक्र को रूपककथा में रखा गया: हिरण्यकशिपु (पुराना, शुष्क, विनाशकारी शीत का शासन), होलिका (वह बाली जो पक गई और जिसे जाना ही है), प्रह्लाद (वह जीवंत दाना जो अगले चक्र का वाहक है), और विष्णु (वह ब्रह्मांडीय व्यवस्था जो यह सुनिश्चित करती है कि जीवन का चक्र न रुके)। होलिका दहन का अनुष्ठान, जब हम उसे कृषि-दृष्टि से देखते हैं, तो एक परिपूर्ण कृषि-विज्ञान के रूप में उभरता है: अग्नि से भूमि की शुद्धि होती है। होलिका दहन के पश्चात उस स्थान की राख (होली की राख) को शुभ माना जाता है। किसान उसे अपने खेत में मिलाते हैं। राख एक प्राकृतिक खाद है — पोटाश और अन्य खनिजों से भरपूर। यह अनुष्ठान भूमि को उर्वर बनाने का प्राचीन वैज्ञानिक तरीका था। मूल होली के रंग प्राकृतिक थे — टेसू (पलाश) के फूलों का केसरिया, हल्दी का पीला, नील का नीला। ये सभी वसंत में खिलने वाले पौधों से थे। रंग खेलना वास्तव में उस ऋतु के रंगों का उत्सव था — प्रकृति के स्वयं के रंगों से खेलना।होली के भोजन—गुजिया, ठंडाई, चना — होली के पारंपरिक व्यंजन हैं जो नई फसल के उत्पादों से बने हैं। गेहूँ का मैदा, गुड़ (गन्ने की नई फसल), छोले (नई चने की फसल) — यह नई फसल का प्रथम भोज है। यों कृषि-रूपक और आत्मिक रूपक एक ही सत्य की ओर संकेत करते हैं। कृषि में: बाली जलती है → दाना बचता है → नई फसल उगती है।वेदांत में: अहंकार (होलिका) जलता है → आत्मा (प्रह्लाद) बचती है → मुक्ति होती है। राजनीति में: अत्याचार जलता है → चेतना बचती है → नया युग आता है। यह समानांतर संरचना आकस्मिक नहीं है। भारत के प्राचीन ऋषियों ने खेत में वही पढ़ा जो उन्होंने आत्मा में पढ़ा था। किसान जब अपनी फसल की बाली को आग में डालता था, तो वह अनजाने में उसी ब्रह्मांडीय सत्य को दोहरा रहा था जिसे योगी अपनी समाधि में अनुभव करता था। यही भारतीय मिथक की महानता है: वह खेत को मंदिर बना देता है और मंदिर को खेत। वह किसान को योगी बना देता है और योगी को किसान। जब एक निरक्षर किसान होलिका दहन में अपनी गेहूँ की बाली जलाता है और भुने हुए दाने को प्रसाद के रूप में ग्रहण करता है — वह उतनी ही गहरी सच्चाई को जी रहा होता है जितनी शंकराचार्य अपने ब्रह्मसूत्र भाष्य में कह रहे थे। इस कथा का सर्वाधिक दार्शनिक और तात्कालिक पाठ वेदांत की दृष्टि से है। अद्वैत वेदांत परंपरा में अस्तित्व की मूलभूत समस्या यह है कि आत्मा — जो ब्रह्म से अभिन्न है, सत्ता का सार्वभौमिक आधार — की अहंकार के साथ भ्रांत पहचान हो जाती है। यह निर्मित, सीमाबद्ध "मैं" की भावना है जो पृथकता, सत्ता और स्थायित्व का दावा करती है। हिरण्यकशिपु का नाम ही शिक्षाप्रद है। "हिरण्य" का अर्थ है स्वर्ण; "कशिपु" का अर्थ है कोमल बिछौने या विलासी वस्त्र। वह, शाब्दिक अर्थ में, वह है जो सोने और रेशम पर विश्राम करता है — वह चेतना जो भौतिक पहचान में इस कदर विलीन हो गई है कि उसने अपने दिव्य मूल को भूल दिया है। वह अहंकार का सर्वाधिक फूला हुआ रूप है: एक वरदान प्राप्त करके जो उसे स्थायी बनाता है, उसने स्वयं को अमर, आत्मनिर्भर और वास्तविकता का सर्वोच्च सिद्धांत मान लिया है। उसकी यह घोषणा कि वह, न कि विष्णु, सब कुछ का स्वामी है — अहंकार-चेतना का उद् घोष है। सीमित अनंत होने का दावा करता है, सशर्त नि:शर्त होने का दावा करता है। यही वेदांत में अहंकार है अपने सर्वाधिक विराट रूप में। प्रह्लाद, इसके विपरीत, उस आत्मा का प्रतिनिधित्व करता है जो अपनी वास्तविक प्रकृति को जानती है। वह प्रह्लाद है — "जो आनंद देता है" या "जो आनंद से भरा है" — क्योंकि आत्मा, जब अपनी सच्ची प्रकृति में पहचानी जाती है, आनंद-स्वरूप होती है। वह अपने पिता का बल या तर्क से विरोध नहीं करता; वह बस वही है जो वह है। उसके होठों पर विष्णु का नाम केवल एक भक्तिपूर्ण कार्य नहीं है, बल्कि एक अद्वैत दार्शनिक कथन है: चेतना सदा अपने स्रोत की ओर संकेत करती रहती है। यातना के प्रसंग — विष, हाथी, सर्प, चट्टानें — अहंकार के द्वारा साक्षी-चेतना को नष्ट या दबाने के बढ़ते प्रयासों का प्रतिनिधित्व करते हैं। अहंकार आत्मा की उपस्थिति को सहन नहीं कर सकता क्योंकि आत्मा का अस्तित्व ही अहंकार की सर्वोच्चता के दावे को झुठला देता है। और फिर भी, चूँकि प्रह्लाद आत्मा है, कुछ भी उसे अंततः हानि नहीं पहुँचा सकता। वेदांत की भाषा में, आत्मा नित्य (शाश्वत), चेतन (सचेतन) और निर्विकार (अपरिवर्तनशील) है। वह भौतिक जगत के विकारों से स्पर्शित नहीं हो सकती। होलिका का अग्निरोधक वस्त्र गुप्त ज्ञान या तकनीक की शक्ति का प्रतीक है — यह विचार कि कोई अनुष्ठान, वरदान, या चतुर रणनीति द्वारा चेतना को स्थायी रूप से पराजित किया जा सकता है। किंतु जिस क्षण वह शक्ति शुद्ध भक्ति के विरुद्ध — अनंत की ओर उन्मुख आत्मा के विरुद्ध — लगाई जाती है, वह पलट जाती है। अग्नि, जो विश्व-शोधक है, अशुद्ध को (अहंकार-अस्त्र को) जलाती है और शुद्ध को (अनंत की ओर उन्मुख चेतना को) बचाती है। यों दर्शन और पारिस्थितिकी एक ही सत्य की ओर संकेत करते हैं: चेतना को स्थायी रूप से कभी नष्ट नहीं किया जा सकता। वसंत हमेशा आता है; आत्मा हमेशा स्वयं को पुनः स्थापित करती है। हिरण्यकशिपु की समस्या यह नहीं है कि वह बुरा था, वो तो था ही।उसकी त्रासदी यह है कि उसने अपना पूरा अस्तित्व इस दाँव पर लगाया कि शक्ति चेतना को पराजित कर सकती है, कि संप्रभुता प्रेम से अधिक टिकाऊ हो सकती है, कि अर्जित सुरक्षा वास्तविक अस्तित्व का विकल्प हो सकती है। उसका वरदान, उसकी सेनाएँ, उसका शाही अधिकार, उसकी पितृशक्ति — कोई भी उस बालक को नहीं छू सका जिसकी चेतना अविनाशी की ओर उन्मुख थी। वह उसे नहीं मार सका जिसे वह पहुँच नहीं सका। और वह प्रह्लाद तक नहीं पहुँच सका क्योंकि प्रह्लाद वहाँ नहीं था जहाँ अस्त्र संधान किए गए थे — वह पहले से ही कहीं ऐसी जगह था जो अस्त्रों की पहुँच से परे थी, उस अवकाश में जहाँ चेतना अपनी स्वयं की प्रकृति में विश्राम करती है। प्रह्लाद की कथा हर उस मानवीय चेतना की कथा है जिसने कभी यह खोजा कि उसकी गहनतम प्रकृति नष्ट नहीं की जा सकती — भय से नहीं, बल से नहीं, सामाजिक दबाव से नहीं, परंपरा के भार से नहीं, अपने साहस की विफलता से नहीं। प्रत्येक व्यक्ति जो अपने स्वयं के परीक्षण की अग्नि में बैठा और जिसने पाया कि उनमें कुछ ऐसा था जो नहीं टूटा — उसने प्रह्लाद की कथा का कुछ संस्करण जिया है। *भगवद्गीता समूह*1
- होली की उमंग, माँ शारदा विद्या निकेतन उमावि अहीरखेड़ा के संग! आज अहिरखेड़ा स्थित विद्यालय में कक्षा नर्सरी से 12वीं तक के विद्यार्थियों ने हर्षोल्लास के साथ होली का पर्व मनाया। रंगों की बौछार और बच्चों के उत्साह ने दिन को यादगार बना दिया।1
- सर काट कर जंगल में छुपाया पत्तों से, सर का पता नहीं मडर या जंगली जानवरों का कहर आत्माराम यादव देवली कला मामला ग्राम गधडीया खेड़ा तहसील खालवा जिला खंडवा मध्य प्रदेश का है जबर सिंह नाम के बुजुर्ग उम्र 60वर्ष अपने खेतों की रखवाली कर रहा था वहीं पर यह घटना घटित हुई दूसरे दिन सुबह उसका पुत्र भजन लेकर पहुंचा तो उसने देखा कि पिताजी की पगड़ी पड़ी हुई है और खून लगा हुआ है घसीटने के निशान दिखे इसमें झामसिंह घबरा गया और तत्काल थाने में रिपोर्ट करी उधर ग्रामीणों में इस बात डर है उनके खेत जंगल किनारे पर था इसलिए जंगली जानवर शिकार करके घसीट कर के तो नहीं ले गया है यह सोच भी गांव वालों की थी सुरक्षा जवानों ने ढूंढने की कोशिश भी बहुत की लेकिन नहीं मिल पाया फिर खालवा थाने के टीआई साहब और साथ में डॉग स्क्वाड की टीम गई जबर सिंह के खेत से करीबन 3 किलोमीटर दूर डॉग स्पॉट की टीम पहुंची तब जाकर शव मिला शव पत्तों से ढका हुआ था आप गांव वालों का यह कहना है कि कि गांव में तो सभी जन खेत की रखवाली करते हैं खेतों में रहते हैं इस पर यह घटनाक्रम को अंजाम किसने दिया उसकी कड़ी से कड़ी सजा मिलना चाहिए l शव पोस्टमार्टम के लिए ले जाया गया बुजुर्ग की सर की तलाश की जा रही है मामला विवेचना में है यह कहना है खालवा टी आई जगदीश सिंधिया जी का1
- Post by Shahrukh mansuri1
- निवाली में लगातार दुसरे वर्ष 11 जोड़ी भारी भरकम टनो वजनी लकड़ी के चक्को को बगैर मशीनीउपकरणो व बिन बैलौ गाडो को के दैवीय शक्ति से 200 मीटर दौडाया निवाली, 4 मार्च बुधवार, (स्वतंत्र पत्रकार सुनील सोनी) नगर मे बहुप्रतीक्षित गाडा खिचाई का कार्यक्रम देखने के लिये नगर और आसपास के गांवों से बड़ी संख्या में लोग पहुंचे थे शाम पांच बजे जय मल्हार ग्रुप के कार्यकर्ताओं ने बाबा को उनके घर से अपने कंधो पर बैठाकर खेडापति हनुमान मंदीर दर्शन के लिये ले गये फिर गायत्री मंदीर के पास दस फिट ऊॅचे लकड़ी के खंबे पर निसैनी के सहारे चढ़ कर तीन बार मकड़ी घुमाकर वापस भक्तों ने हेमेन्द्र सिंह राजपूत सहवाग बाबा को अपने कधो पर उठा लिया सहवाग बाबा की शोभा यात्रा झंडा चौक सुभाष चौक सुभाष मार्केट होते हुवे बस स्टैंड पहुंचे शोभा यात्रा में सैकड़ों लोग येलकोट जय मल्हार के उदघोष कर रहे थे कार्यक्रम स्थल बस स्टैंड पर पहले से ही हजारों लोग उपस्थित थे बाबा ने गाडो पर सवार होने से पहले भरकोले की बलि दी गई . गाडा खिचाई का कार्य नगर में यह दुसरा वर्ष था सहवाग बाबा इससे पुर्व अंजड नगर में गाडा खिचाई कार्य करते थे पश्चात अपने गृहनगर निवाली में गत वर्ष और इस वर्ष सफलतापूर्वक किया गया गाडा खिचाई कार्य निवाली क्षेत्र के लोगों के लिये नया और अचरज भरा काम है लोगों में इस अनुभव काम को देखने के लिये बडी उत्सुकता और उत्साह रहता है गाडा खिचाई के पश्चात श्रीराम मंदीर में सफलता पुर्वक कार्य संपन्न होने की खुशी में हनुमान जी का आभार प्रकट कर आरती पूजा के बाद नुक्सान का प्रसाद वितरण किया गया . बड़ी संख्या में लोगों ने आसपास के मकानों छज्जों पर चढ़कर गाडा खिचाई कार्य देखा महिलाओं और पुरूषों ने भी कार्यक्रम स्थल पर पहले से ही खड़े होकर अपना स्थान सुरक्षित कर लिया था . गाडा खिचाई के पश्चात श्रीराम मंदीर में सफलता पुर्वक कार्य संपन्न होने की खुशी में हनुमान जी का आभार प्रकट कर आरती पूजा के बाद का मिष्ठान्न का प्रसाद वितरण किया गया .4
- Post by Raju Singh Rathod1