गंगाजली के सरपंच का बड़ा दावा! "अगली बार गांव को बना दूंगा शहर" | Ground Report वीडियो के बारे में: नमस्कार दोस्तों! आज हम पहुंचे हैं ग्राम पंचायत गंगाजली में, जहां हमने पंचायत के विकास कार्यों की जमीनी हकीकत जानी। इस खास ग्राउंड रिपोर्ट में देखिए गंगाजली गांव का असली हाल। हमने सीधे सरपंच जी से उनके 5 साल के कार्यकाल का हिसाब मांगा। साथ ही, हमने गांव के सरकारी स्कूल का भी मुआयना किया। सरपंच ने दावा किया है कि अगर उन्हें अगला मौका मिलता है, तो वे गंगाजली गांव को पूरी तरह से 'शहर' (Modern City) का रूप दे देंगे! क्या हैं उनके प्लान? और क्या है गांव की मौजूदा स्थिति? जानने के लिए वीडियो को अंत तक जरूर देखें। आपकी राय: क्या आपको लगता है कि एक गांव को शहर जैसी सुविधाएं मिल सकती हैं? कमेंट बॉक्स में अपनी राय जरूर बताएं! अगर आपको हमारी यह ग्राउंड रिपोर्ट पसंद आई हो, तो वीडियो को Like करें, Share करें और ऐसी ही सच्ची खबरों के लिए चैनल को Subscribe करना न भूलें। धन्यवाद!
गंगाजली के सरपंच का बड़ा दावा! "अगली बार गांव को बना दूंगा शहर" | Ground Report वीडियो के बारे में: नमस्कार दोस्तों! आज हम पहुंचे हैं ग्राम पंचायत गंगाजली में, जहां हमने पंचायत के विकास कार्यों की जमीनी हकीकत जानी। इस खास ग्राउंड रिपोर्ट में देखिए गंगाजली गांव का असली हाल। हमने सीधे सरपंच जी से उनके 5 साल के कार्यकाल का हिसाब मांगा। साथ ही, हमने गांव के सरकारी स्कूल का भी मुआयना किया। सरपंच ने दावा किया है कि अगर उन्हें अगला मौका मिलता है, तो वे गंगाजली गांव को पूरी तरह से 'शहर' (Modern City) का रूप दे देंगे! क्या हैं उनके प्लान? और क्या है गांव की मौजूदा स्थिति? जानने के लिए वीडियो को अंत तक जरूर देखें। आपकी राय: क्या आपको लगता है कि एक गांव को शहर जैसी सुविधाएं मिल सकती हैं? कमेंट बॉक्स में अपनी राय जरूर बताएं! अगर आपको हमारी यह ग्राउंड रिपोर्ट पसंद आई हो, तो वीडियो को Like करें, Share करें और ऐसी ही सच्ची खबरों के लिए चैनल को Subscribe करना न भूलें। धन्यवाद!
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- नगर पालिका की दमकल व सेवा समिति की फायर फाइटर भी मौके पर पहुंची और वन विभाग के झाड़ियां में लगी आग पर काबू पाया गया।1
- फलोदी जिले में पिछले दिनों जहां एक ओर बेमौसम बारिश ने पहले ही किसानों के खेतों में फसल खराबा कर एक बड़े नुकसान की ओर धकेल दिया और अब तीन दिनों से बिजली सप्लाई नहीं आने से किसानों की चिंता और बढ़ने लगी है। स्थानीय किसानों ने बताया की थ्री फेस लाइन का तार टुटने के कारण तीन दिनों से विधुत सप्लाई नहीं हो रही जिससे पर्याप्त सिंचाई के अभाव में प्याज और लहसुन की फसलें सुखने लगी है। जो कहीं न कहीं किसानों को दोहरी मार झेलने को मजबूर कर कमर तोड़ने का काम कर रहा है। किसान बताते है कि उनके द्वारा विद्युत विभाग को कई बार फोन करके बताया लेकिन अभी तक विद्युत सप्लाई को लेकर सकारात्मक कार्रवाई नहीं की जा रही साथ ही साथ संबंधित जीएसएस से कोई लाइन मेन टूटे विद्युत लाइन ठीक करने मौके पर पहुंचा है जबकि तार टुट कर खुलें में जमीन पर ही पड़े है, जहां से हमारे छोटे-छोटे बच्चे इन टूटे तारों के ऊपर से जैसे तैसे गुजरते हैं। किसान बताते है कि खेत खलिहानों में जानवर भी घुमते रहते है। बापिणी ढाणियों के किसानों ने विद्युत विभाग के खिलाफ आक्रोशित लहजे में एकजुट होकर बताया कि हमारे खेतों में सिंचाई नहीं हो रही साथ ही पीने के पानी की दिक्कत होने से पशु धन भी प्यासें है। किसानों ने चेतावनी देते हुए बताया कि जल्द से जल्द विद्युत लाइन के टूटे तार जोड़ दिए जाएं नहीं गये तो मजबूरन जीएसएस पर ताला लगाया जायेगा।1
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- लालगढ़ जाटान किसानों की परेशानी से जुड़ी एक गंभीर तस्वीर सामने आई है। सरकार भले ही किसानों के हितों को लेकर बड़े-बड़े दावे करती हो, लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और ही बयां कर रही है। धान मंडी में फसल लेकर पहुंचने वाले किसानों को भारी अव्यवस्थाओं और शोषण का सामना करना पड़ रहा है। किसानों का आरोप है कि जिस फसल को वे लगभग 6 महीने तक दिन-रात मेहनत और खून-पसीना एक करके तैयार करते हैं, वही फसल मंडी में पहुंचने के बाद सड़क पर बिखरी नजर आती है। व्यापारियों द्वारा अनाज को व्यवस्थित रखने के बजाय खुले में डाल दिया जाता है, जिससे किसानों की मेहनत मिट्टी में मिलती दिख रही है। मंडी में किसानों की फसल को सुरक्षित रखने के लिए शेड बनाए गए हैं, लेकिन इन शेडों का उपयोग किसानों के बजाय व्यापारियों द्वारा किया जा रहा है। शेड के नीचे व्यापारियों के ट्रैक्टर-ट्रॉली खड़े रहते हैं, जबकि किसानों का अनाज खुले आसमान के नीचे पड़ा रहता है। इतना ही नहीं, पंजाब से आने वाली कंबाइन मशीनें भी मंडी के शेडों पर कब्जा जमाए हुए हैं। किसानों का कहना है कि ये मशीनें व्यापारियों के परिचितों की होती हैं, इसलिए उन्हें प्राथमिकता दी जाती है। इस कारण आम किसान की फसल को कोई संरक्षण नहीं मिल पाता। एक पीड़ित किसान ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि रात करीब 10 बजे उसने मीडिया से संपर्क कर मंडी की वास्तविक स्थिति दिखाई। खराब मौसम के कारण खुले में पड़ी फसल को नुकसान होने का डर बना हुआ है, जिससे किसान मानसिक रूप से भी परेशान नजर आ रहा है। किसान ने मांग की है कि मीडिया के माध्यम से सरकार तक उनकी आवाज पहुंचाई जाए, ताकि इस समस्या का समाधान हो सके। उन्होंने यह भी कहा कि यह समस्या केवल लालगढ़ जाटान तक सीमित नहीं है, बल्कि पूरे राजस्थान की धान मंडियों में व्यापारियों और अधिकारियों की मिलीभगत से किसान शोषण का शिकार हो रहे हैं। अब देखना यह होगा कि प्रशासन इस मामले को कितनी गंभीरता से लेता है और किसानों को राहत दिलाने के लिए क्या कदम उठाए जाते हैं। लालगढ़ जाटान. शेड के नीचे खड़ी हुई कंबाइन व ट्रैक्टर ट्रालियां। लालगढ़ जाटान किसानों की फसल धान मंडी में सड़कों पर बिखरी हुई।1
- पत्रकार इकबाल खान उत्तर प्रदेश के नोएडा और ग्रेटर नोएडा में घरेलू और कमर्शल एलपीजी गैस की भारी किल्लत ने जनजीवन को बुरी तरह प्रभावित कर दिया है। हालात इतने गंभीर हो गए हैं कि इसका असर अब औद्योगिक उत्पादन पर भी साफ दिखने लगा है। जानकारी के अनुसार, गैस संकट के चलते कई फैक्ट्रियों और इकाइयों में उत्पादन करीब 20 प्रतिशत तक गिर गया है। उद्योगों की रफ्तार धीमी पड़ने से कामगारों के सामने रोजगार का संकट खड़ा हो गया है। स्थिति यह है कि दो वक्त की रोटी के लिए जूझ रहे मजदूर अब मजबूरी में अपने गांवों की ओर पलायन करने लगे हैं। इस संकट की सबसे ज्यादा मार दिहाड़ी मजदूरों और कामगारों पर पड़ी है, जो बिल्डर साइटों, गारमेंट यूनिट्स और एक्सपोर्ट कंपनियों में काम करते हैं। इन कामगारों के पास स्थायी गैस कनेक्शन नहीं होता और वे छोटे 5 किलो वाले सिलेंडर या पेट्रोमेक्स के जरिए अपना गुजारा करते थे।अब बाजार में गैस की उपलब्धता लगभग खत्म हो चुकी है। जहां कहीं गैस मिल भी रही है, वहां ऊंचे दाम वसूले जा रहे हैं, जिससे गरीब मजदूरों के लिए खाना बनाना भी मुश्किल हो गया है। इधर बीकानेर में भी हालात अलग नहीं हैं। यहां खुले बाजार में 1से 2 किलो गैस भरवाने पर 170 से 200 रुपये प्रति किलो तक वसूले जा रहे हैं। खासकर बाहर से आए प्रवासी मजदूरों की स्थिति बेहद खराब हो चुकी है, जिनके पास कोई गैस कनेक्शन नहीं है। ऐसे मजदूरों के लिए शहर में कोई वैकल्पिक व्यवस्था नजर नहीं आ रही है, जिससे वे अपना दो वक्त का खाना बना सकें। सरकार को इन प्रवासी मजदूरों के लिए अलग से व्यवस्था करनी चाहिए, जैसे अस्थायी रसोई या सस्ती गैस उपलब्ध कराना, ताकि उनकी बुनियादी जरूरतें पूरी हो सकें।यदि जल्द ही गैस आपूर्ति सामान्य नहीं हुई और मजदूरों के लिए राहत कदम नहीं उठाए गए, तो इसका असर न केवल उद्योगों बल्कि सामाजिक ढांचे पर भी देखने को मिल सकता है।1
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