विश्व पर्यावरण दिवस 2026 के अवसर पर भारत ने एक महत्वपूर्ण पर्यावरणीय उपलब्धि हासिल करते हुए 100 रामसर स्थलों का आंकड़ा छू लिया है। इस ऐतिहासिक कदम के साथ, उत्तर प्रदेश के बलिया जनपद में स्थित जयप्रकाश नारायण पक्षी विहार, जिसे सुरहा ताल के नाम से भी जाना जाता है, भारत का 100वाँ रामसर स्थल घोषित किया गया। इस घोषणा से उत्तर प्रदेश में रामसर स्थलों की संख्या बढ़कर 13 हो गई है, जिससे राज्य आर्द्रभूमि संरक्षण के क्षेत्र में देश के अग्रणी राज्यों में शामिल हो गया है। यह उपलब्धि देश की प्राकृतिक धरोहरों के संरक्षण, जैव विविधता के संवर्धन और सतत विकास के प्रति उसकी मजबूत प्रतिबद्धता को दर्शाती है। रामसर स्थल ऐसी आर्द्रभूमियाँ होती हैं जिन्हें पारिस्थितिक, जैविक, वैज्ञानिक और पर्यावरणीय दृष्टि से अंतरराष्ट्रीय महत्व का माना जाता है। इन स्थलों का नाम ईरान के रामसर नगर के नाम पर रखा गया है, जहाँ 1971 में आर्द्रभूमियों के संरक्षण और उनके सतत उपयोग को बढ़ावा देने के लिए एक अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन आयोजित हुआ था। यह समझौता 2 फरवरी, 1971 को अपनाया गया और 1975 में प्रभावी हुआ, जिसमें भारत 1 फरवरी, 1982 को सदस्य बना। इसी उपलक्ष्य में प्रत्येक वर्ष 2 फरवरी को विश्व आर्द्रभूमि दिवस मनाया जाता है। भारत की रामसर स्थलों की यात्रा 1982 में ओडिशा की चिल्का झील और राजस्थान के केवलादेव राष्ट्रीय उद्यान को पहले रामसर स्थल का दर्जा मिलने के साथ शुरू हुई थी, और आज यह 100 स्थलों तक पहुँच चुकी है, जो पर्यावरण संरक्षण को विकास की मुख्यधारा से जोड़ने की देश की निरंतर प्रगति का प्रमाण है। आर्द्रभूमियाँ, जिनमें झीलें, तालाब, दलदली क्षेत्र, नदी तट, जलाशय और बाढ़ प्रभावित क्षेत्र शामिल हैं, प्रकृति की अमूल्य धरोहर हैं। ये भूजल पुनर्भरण में सहायक होती हैं, बाढ़ की तीव्रता को कम करती हैं, जल को प्राकृतिक रूप से शुद्ध करती हैं, और असंख्य जीव-जंतुओं व वनस्पतियों को आश्रय प्रदान करती हैं, इसलिए इन्हें पृथ्वी के "प्राकृतिक गुर्दे" भी कहा जाता है। जलवायु परिवर्तन की वैश्विक चुनौतियों के बीच, आर्द्रभूमियों का महत्व और बढ़ जाता है, क्योंकि वे प्राकृतिक कार्बन सिंक के रूप में कार्य कर वातावरण से कार्बन डाइऑक्साइड को अवशोषित करती हैं, जिससे वैश्विक तापमान वृद्धि को नियंत्रित करने में मदद मिलती है। ये सूखे और बाढ़ जैसी चरम परिस्थितियों के प्रभावों को कम करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। भारत की 100वीं रामसर साइट के रूप में घोषित सुरहा ताल, बलिया जनपद में स्थित है और मुख्य रूप से गंगा नदी के बाढ़ क्षेत्र से संबद्ध है। यह जल, जैव विविधता और पक्षी जीवन की दृष्टि से अत्यंत समृद्ध है, जहाँ शीतकाल में साइबेरिया, मध्य एशिया और यूरोप से हजारों प्रवासी पक्षी, जैसे बार-हेडेड गूज, ब्राह्मणी बत्तख और पेंटेड स्टॉर्क आते हैं। रामसर स्थल का दर्जा मिलने से इसके संरक्षण, वैज्ञानिक अध्ययन, इको-टूरिज्म और स्थानीय विकास को नई गति मिलेगी। उत्तर प्रदेश की उपलब्धि विशेष रूप से उल्लेखनीय है क्योंकि राज्य में अब 13 रामसर स्थल हैं, जिनमें नवाबगंज, पार्वती अरगा, समन, समसपुर, सांडी, सरसई नावर झील, सूर सरोवर, ऊपरी गंगा नदी, बखिरा वन्यजीव अभयारण्य, हैदरपुर आर्द्रभूमि, पटना पक्षी अभयारण्य, शेखा झील और नवीनतम जयप्रकाश नारायण पक्षी विहार शामिल हैं। पूर्वांचल के संत कबीर नगर जिले में फैला बखिरा वन्यजीव अभयारण्य, उत्तर प्रदेश की सबसे महत्वपूर्ण आर्द्रभूमियों में से एक है और पूर्वांचल की सबसे बड़ी प्राकृतिक झीलों में गिना जाता है। यह हजारों प्रवासी पक्षियों का आश्रय स्थल है और स्थानीय पारिस्थितिकी व मत्स्य आधारित आजीविका का महत्वपूर्ण आधार है। वैज्ञानिक प्रबंधन और आधुनिक पर्यटन सुविधाओं से युक्त होने पर यह राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एक प्रमुख इको-टूरिज्म केंद्र के रूप में विकसित हो सकता है। रामसर स्थलों का महत्व केवल पर्यावरण तक ही सीमित नहीं है, बल्कि इनका व्यापक आर्थिक और सामाजिक महत्व भी है, क्योंकि लाखों लोगों की आजीविका मत्स्य पालन, कृषि, पशुपालन, जल संग्रहण और पर्यटन जैसी गतिविधियों के माध्यम से आर्द्रभूमियों पर प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से निर्भर करती है। भारत सरकार ने आर्द्रभूमियों के संरक्षण के लिए राष्ट्रीय आर्द्रभूमि संरक्षण कार्यक्रम और "अमृत धरोहर योजना" जैसी महत्वपूर्ण पहल की हैं, जिनका उद्देश्य संरक्षण और विकास को एक-दूसरे का पूरक बनाना है। अंतरराष्ट्रीय संस्थाएँ भी जैव विविधता संरक्षण और प्राकृतिक संसाधनों के सतत उपयोग के लिए विश्व स्तर पर कार्य कर रही हैं, और भारत का 100 रामसर स्थलों तक पहुँचना इस वैश्विक अभियान में उसकी सक्रिय भागीदारी का प्रमाण है। हालांकि, इन उपलब्धियों के साथ चुनौतियाँ भी मौजूद हैं। कई आर्द्रभूमियाँ अतिक्रमण, प्रदूषण, अवैध शिकार, अनियंत्रित शहरीकरण, और जलवायु परिवर्तन जैसी समस्याओं का सामना कर रही हैं, जिससे झीलों और तालाबों का क्षेत्रफल घट रहा है। प्लास्टिक कचरा, रासायनिक अपशिष्ट और जल स्रोतों का अंधाधुंध दोहन भी इन पारिस्थितिक तंत्रों को प्रभावित कर रहा है। इन चुनौतियों से निपटने के लिए केवल सरकारी प्रयास पर्याप्त नहीं हैं; स्थानीय समुदायों, शैक्षणिक संस्थानों, पर्यावरण संगठनों और आम नागरिकों की सक्रिय भागीदारी आवश्यक है। विद्यालयों और महाविद्यालयों में आर्द्रभूमियों के महत्व पर विशेष कार्यक्रम आयोजित किए जाने चाहिए ताकि युवाओं को प्रकृति संरक्षण से जोड़ा जा सके। भारत का 100 रामसर स्थल घोषित होना एक पर्यावरणीय उपलब्धि के साथ-साथ भविष्य के प्रति हमारी जिम्मेदारी का भी स्मरण कराता है। ये स्थल केवल जलाशय नहीं, बल्कि जैव विविधता, जल सुरक्षा, पर्यावरणीय संतुलन और मानव जीवन की निरंतरता के आधार स्तंभ हैं, जिन्हें "धरती के फेफड़े और गुर्दे" की तरह माना जा सकता है। इनके संरक्षण में ही जल, वन्यजीव, जैव विविधता और मानव सभ्यता का भविष्य सुरक्षित है। यह शतक एक महत्वपूर्ण पड़ाव है, किंतु वास्तविक सफलता तब होगी जब प्रत्येक नागरिक इन प्राकृतिक धरोहरों के संरक्षण को अपना दायित्व समझे और प्रकृति तथा विकास के बीच संतुलन स्थापित करने में सक्रिय भूमिका निभाए।
विश्व पर्यावरण दिवस 2026 के अवसर पर भारत ने एक महत्वपूर्ण पर्यावरणीय उपलब्धि हासिल करते हुए 100 रामसर स्थलों का आंकड़ा छू लिया है। इस ऐतिहासिक कदम के साथ, उत्तर प्रदेश के बलिया जनपद में स्थित जयप्रकाश नारायण पक्षी विहार, जिसे सुरहा ताल के नाम से भी जाना जाता है, भारत का 100वाँ रामसर स्थल घोषित किया गया। इस घोषणा से उत्तर प्रदेश में रामसर स्थलों की संख्या बढ़कर 13 हो गई है, जिससे राज्य आर्द्रभूमि संरक्षण के क्षेत्र में देश के अग्रणी राज्यों में शामिल हो गया है। यह उपलब्धि देश की प्राकृतिक धरोहरों के संरक्षण, जैव विविधता के संवर्धन और सतत विकास के प्रति उसकी मजबूत प्रतिबद्धता को दर्शाती है। रामसर स्थल ऐसी आर्द्रभूमियाँ होती हैं जिन्हें पारिस्थितिक, जैविक, वैज्ञानिक और पर्यावरणीय दृष्टि से अंतरराष्ट्रीय महत्व का माना जाता है। इन स्थलों का नाम ईरान के रामसर नगर के नाम पर रखा गया है, जहाँ 1971 में आर्द्रभूमियों के संरक्षण और उनके सतत उपयोग को बढ़ावा देने के लिए एक अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन आयोजित हुआ था। यह समझौता 2 फरवरी, 1971 को अपनाया गया और 1975 में प्रभावी हुआ, जिसमें भारत 1 फरवरी, 1982 को सदस्य बना। इसी उपलक्ष्य में प्रत्येक वर्ष 2 फरवरी को विश्व आर्द्रभूमि दिवस मनाया जाता है। भारत की रामसर स्थलों की यात्रा 1982 में ओडिशा की चिल्का झील और राजस्थान के केवलादेव राष्ट्रीय उद्यान को पहले रामसर स्थल का दर्जा मिलने के साथ शुरू हुई थी, और आज यह 100 स्थलों तक पहुँच चुकी है, जो पर्यावरण संरक्षण को विकास की मुख्यधारा से जोड़ने की देश की निरंतर प्रगति का प्रमाण है। आर्द्रभूमियाँ, जिनमें झीलें, तालाब, दलदली क्षेत्र, नदी तट, जलाशय और बाढ़ प्रभावित क्षेत्र शामिल हैं, प्रकृति की अमूल्य धरोहर हैं। ये भूजल पुनर्भरण में सहायक होती हैं, बाढ़ की तीव्रता को कम करती हैं, जल को प्राकृतिक रूप से शुद्ध करती हैं, और असंख्य जीव-जंतुओं व वनस्पतियों को आश्रय प्रदान करती हैं, इसलिए इन्हें पृथ्वी के "प्राकृतिक गुर्दे" भी कहा जाता है। जलवायु परिवर्तन की वैश्विक चुनौतियों के बीच, आर्द्रभूमियों का महत्व और बढ़ जाता है, क्योंकि वे प्राकृतिक कार्बन सिंक के रूप में कार्य कर वातावरण से कार्बन डाइऑक्साइड को अवशोषित करती हैं, जिससे वैश्विक तापमान वृद्धि को नियंत्रित करने में मदद मिलती है। ये सूखे और बाढ़ जैसी चरम परिस्थितियों के प्रभावों को कम करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। भारत की 100वीं रामसर साइट के रूप में घोषित सुरहा ताल, बलिया जनपद में स्थित है और मुख्य रूप से गंगा नदी के बाढ़ क्षेत्र से संबद्ध है। यह जल, जैव विविधता और पक्षी जीवन की दृष्टि से अत्यंत समृद्ध है, जहाँ शीतकाल में साइबेरिया, मध्य एशिया और यूरोप से हजारों प्रवासी पक्षी, जैसे बार-हेडेड गूज, ब्राह्मणी बत्तख और पेंटेड स्टॉर्क आते हैं। रामसर स्थल का दर्जा मिलने से इसके संरक्षण, वैज्ञानिक अध्ययन, इको-टूरिज्म और स्थानीय विकास को नई गति मिलेगी। उत्तर प्रदेश की उपलब्धि विशेष रूप से उल्लेखनीय है क्योंकि राज्य में अब 13 रामसर स्थल हैं, जिनमें नवाबगंज, पार्वती अरगा, समन, समसपुर, सांडी, सरसई नावर झील, सूर सरोवर, ऊपरी गंगा नदी, बखिरा वन्यजीव अभयारण्य, हैदरपुर आर्द्रभूमि, पटना पक्षी अभयारण्य, शेखा झील और नवीनतम जयप्रकाश नारायण पक्षी विहार शामिल हैं। पूर्वांचल के संत कबीर नगर जिले में फैला बखिरा वन्यजीव अभयारण्य, उत्तर प्रदेश की सबसे महत्वपूर्ण आर्द्रभूमियों में से एक है और पूर्वांचल की सबसे बड़ी प्राकृतिक झीलों में गिना जाता है। यह हजारों प्रवासी पक्षियों का आश्रय स्थल है और स्थानीय पारिस्थितिकी व मत्स्य आधारित आजीविका का महत्वपूर्ण आधार है। वैज्ञानिक प्रबंधन और आधुनिक पर्यटन सुविधाओं से युक्त होने पर यह राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एक प्रमुख इको-टूरिज्म केंद्र के रूप में विकसित हो सकता है। रामसर स्थलों का महत्व केवल पर्यावरण तक ही सीमित नहीं है, बल्कि इनका व्यापक आर्थिक और सामाजिक महत्व भी है, क्योंकि लाखों लोगों की आजीविका मत्स्य पालन, कृषि, पशुपालन, जल संग्रहण और पर्यटन जैसी गतिविधियों के माध्यम से आर्द्रभूमियों पर प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से निर्भर करती है। भारत सरकार ने आर्द्रभूमियों के संरक्षण के लिए राष्ट्रीय आर्द्रभूमि संरक्षण कार्यक्रम और "अमृत धरोहर योजना" जैसी महत्वपूर्ण पहल की हैं, जिनका उद्देश्य संरक्षण और विकास को एक-दूसरे का पूरक बनाना है। अंतरराष्ट्रीय संस्थाएँ भी जैव विविधता संरक्षण और प्राकृतिक संसाधनों के सतत उपयोग के लिए विश्व स्तर पर कार्य कर रही हैं, और भारत का 100 रामसर स्थलों तक पहुँचना इस वैश्विक अभियान में उसकी सक्रिय भागीदारी का प्रमाण है। हालांकि, इन उपलब्धियों के साथ चुनौतियाँ भी मौजूद हैं। कई आर्द्रभूमियाँ अतिक्रमण, प्रदूषण, अवैध शिकार, अनियंत्रित शहरीकरण, और जलवायु परिवर्तन जैसी समस्याओं का सामना कर रही हैं, जिससे झीलों और तालाबों का क्षेत्रफल घट रहा है। प्लास्टिक कचरा, रासायनिक अपशिष्ट और जल स्रोतों का अंधाधुंध दोहन भी इन पारिस्थितिक तंत्रों को प्रभावित कर रहा है। इन चुनौतियों से निपटने के लिए केवल सरकारी प्रयास पर्याप्त नहीं हैं; स्थानीय समुदायों, शैक्षणिक संस्थानों, पर्यावरण संगठनों और आम नागरिकों की सक्रिय भागीदारी आवश्यक है। विद्यालयों और महाविद्यालयों में आर्द्रभूमियों के महत्व पर विशेष कार्यक्रम आयोजित किए जाने चाहिए ताकि युवाओं को प्रकृति संरक्षण से जोड़ा जा सके। भारत का 100 रामसर स्थल घोषित होना एक पर्यावरणीय उपलब्धि के साथ-साथ भविष्य के प्रति हमारी जिम्मेदारी का भी स्मरण कराता है। ये स्थल केवल जलाशय नहीं, बल्कि जैव विविधता, जल सुरक्षा, पर्यावरणीय संतुलन और मानव जीवन की निरंतरता के आधार स्तंभ हैं, जिन्हें "धरती के फेफड़े और गुर्दे" की तरह माना जा सकता है। इनके संरक्षण में ही जल, वन्यजीव, जैव विविधता और मानव सभ्यता का भविष्य सुरक्षित है। यह शतक एक महत्वपूर्ण पड़ाव है, किंतु वास्तविक सफलता तब होगी जब प्रत्येक नागरिक इन प्राकृतिक धरोहरों के संरक्षण को अपना दायित्व समझे और प्रकृति तथा विकास के बीच संतुलन स्थापित करने में सक्रिय भूमिका निभाए।
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- उत्तर प्रदेश राज्य विद्युत परिषद द्वारा बिजली बिलों पर 10 प्रतिशत ईंधन अधिभार लगाए जाने के विरोध में उद्योग व्यापार प्रतिनिधि मंडल उत्तर प्रदेश के पदाधिकारियों ने बस्ती में शुक्रवार को प्रदर्शन किया। इस दौरान उन्होंने जिलाधिकारी के माध्यम से एक ज्ञापन सौंपा, जिसमें मांग की गई है कि इस बढ़ोतरी को तत्काल वापस लिया जाए। व्यापारियों का कहना है कि बीच सत्र में इस तरह की वृद्धि से उद्योग जगत और आम जनता पर महंगाई का बोझ पड़ेगा, जिसका प्रतिकूल प्रभाव आम उपभोक्ताओं के साथ ही व्यापार पर भी पड़ेगा। प्रदेश उपाध्यक्ष एवं बस्ती मंडल अध्यक्ष डॉ. हरिमूर्ति सिंह ‘मनोज’ ने आरोप लगाया कि जून माह से लागू किए गए इस अधिभार को लगाने से पहले विद्युत नियामक आयोग से आवश्यक अनुमति नहीं ली गई। प्रदेश उपाध्यक्ष परमात्मा प्रसाद मद्धेशिया ने इस बढ़ोतरी को उपभोक्ताओं पर 'दोहरी मार' बताया, क्योंकि औद्योगिक और घरेलू बिलों में पहले से ही फिक्स चार्ज वसूला जा रहा है। प्रदेश उपाध्यक्ष सुनीत पांडेय ने वाणिज्यिक (एलएमवी-2) श्रेणी के बिलों में फिक्स चार्ज और मिनिमम चार्ज दोनों के पहले से लागू होने की बात कही, जबकि जिला महामंत्री आलोक दुबे ने घरेलू, वाणिज्यिक और औद्योगिक बिलों में 7.5 प्रतिशत इलेक्ट्रिसिटी ड्यूटी भी जोड़े जाने की जानकारी दी। जिला संगठन महामंत्री भरत राम गुप्ता ‘बबलू’ ने तर्क दिया कि विद्युत नियामक आयोग हर साल उत्पादन और खर्चों की समीक्षा के बाद सुनवाई कर दरों का निर्धारण करता है, ऐसे में बीच सत्र में अचानक दरों में वृद्धि करना अनुचित है। जिला कोषाध्यक्ष प्रदीप सिंह ने इस अचानक बढ़ोतरी को गलत परंपरा की शुरुआत बताते हुए आगाह किया कि इसका सीधा असर महंगाई के रूप में आम जनता को भुगतना पड़ेगा। नगर अध्यक्ष राणा महेंद्र प्रताप और महामंत्री धीरेंद्र चौधरी ने कहा कि बिजली की लागत बढ़ने से उत्तर प्रदेश का उद्योग और व्यापार प्रभावित होगा, जिससे व्यापारियों की लागत बढ़ेगी और अंततः बाजार पर भी असर पड़ेगा। जिला महामंत्री आलोक दुबे और जिला संगठन महामंत्री भरत राम गुप्ता ‘बबलू’ ने प्रदर्शन का नेतृत्व किया। उद्योग मंच के जिला अध्यक्ष कमलेश चौधरी और जिला युवा संगठन महामंत्री सत्य प्रकाश दुबे सहित अन्य पदाधिकारियों ने ईंधन अधिभार के नाम पर की गई 10 प्रतिशत बढ़ोतरी को तुरंत समाप्त करने के आदेश जारी करने की मांग की। इस अवसर पर विकास शर्मा, पवन गुप्ता, ओम प्रकाश चौधरी, प्रवीण सिंह, अजय कनौजिया सहित बड़ी संख्या में व्यापारी मौजूद रहे।3
- ग्राम अईलिया पोस्ट परसवा जिला बस्ती ब्लॉक कुदरह थाना लालगंज1
- वायरल पोस्ट में बिहार को लेकर एक टिप्पणी की गई है, जिसमें कहा गया है कि यह बिहार है, और यहाँ कुछ भी हो सकता है।1
- सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र (CHC) कप्तानगंज एक बार फिर विवादों के घेरे में है, जहाँ गरीब मरीजों को इलाज की जगह अस्पताल कर्मियों के 'रौद्र रूप' और बदसलूकी का सामना करना पड़ रहा है। यह आरोप लगाया गया है कि अस्पताल में मरीजों को न तो सम्मान मिलता है और न ही उचित स्वास्थ्य सेवा, बल्कि उनके साथ दुर्व्यवहार किया जाता है। हालिया घटना में, एक मरीज के परिजनों द्वारा गंदी बेडशीट बदलने की सामान्य मांग पर अस्पताल कर्मियों ने न केवल अभद्र व्यवहार किया, बल्कि मामले को तूल देते हुए अस्पताल परिसर में घंटों तक हंगामा खड़ा कर दिया। इस घटना ने स्वास्थ्य केंद्र की कार्यशैली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं, जहाँ सफाई की मांग करना भी 'गुनाह' माना जा रहा है। इतना ही नहीं, पीड़ितों ने अस्पताल के भीतर भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप भी लगाए हैं। उनका कहना है कि डॉक्टर अस्पताल में उपलब्ध दवाओं के बजाय बाहर से महंगी कमीशन वाली दवाइयां लिखते हैं और मरीजों को बाहर से जांच करवाने के लिए मजबूर किया जाता है। इससे यह सवाल उठ रहा है कि क्या यह अस्पताल गरीब मरीजों के इलाज के लिए है या अपनी जेबें भरने वालों के लिए। हमेशा विवादों में रहने वाला सीएचसी कप्तानगंज अब कुप्रबंधन का केंद्र बन चुका है, जहाँ तड़पते मरीजों की सुध लेने वाला कोई नहीं है, जबकि कर्मी अपने रौब झाड़ने में व्यस्त रहते हैं। प्रशासन से इस मामले में त्वरित संज्ञान लेकर अस्पताल की व्यवस्था में सुधार लाने और दोषी कर्मियों पर कड़ी कार्रवाई करने की मांग की गई है, ताकि लोगों का सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था पर भरोसा बना रहे।1
- उत्तर प्रदेश के बस्ती जनपद के वाल्टरगंज थाना क्षेत्र में भारत रत्न बाबा साहब डॉ. भीमराव अंबेडकर की प्रतिमा को असामाजिक तत्वों द्वारा खंडित किए जाने का एक अत्यंत निंदनीय मामला सामने आया है। ग्राम बिशनपुरवा बगड़वरवा के पास हुई इस घटना की जानकारी सुबह मिलते ही स्थानीय ग्रामीणों में भारी आक्रोश फैल गया, जिससे मौके पर तनाव की स्थिति उत्पन्न हो गई। मामले की संवेदनशीलता को देखते हुए, वाल्टरगंज थाना पुलिस और उच्च अधिकारी भारी पुलिस बल के साथ तुरंत घटनास्थल पर पहुँचे हैं। प्रशासन लगातार ग्रामीणों को शांत कराने और स्थिति को नियंत्रण में लाने का प्रयास कर रहा है। स्थानीय समाज और विभिन्न संगठनों ने इस कृत्य की कड़ी निंदा की है, साथ ही दोषियों के खिलाफ सख्त कानूनी कार्रवाई और खंडित प्रतिमा के स्थान पर अविलंब नई प्रतिमा स्थापित करने की मांग की है। एहतियात के तौर पर पूरे इलाके में पुलिस बल तैनात कर दिया गया है।1
- ऑल इंडिया पावर इंजीनियर्स फेडरेशन (एआईपीईएफ) की संघीय कार्यकारिणी की बैठक 12 जून को बेंगलुरु में संपन्न हुई, जिसमें उत्तर प्रदेश के बिजली कर्मियों एवं अभियंताओं के आंदोलन तथा प्रस्तावित विद्युत (संशोधन) विधेयक-2025 के विरोध में सर्वसम्मति से महत्वपूर्ण प्रस्ताव पारित किए गए। फेडरेशन ने उत्तर प्रदेश में चल रहे निजीकरण विरोधी आंदोलन को पूर्ण समर्थन देने की घोषणा की है। संघर्ष समिति के पदाधिकारी रंजन कुमार ने एआईपीईएफ द्वारा दिए गए समर्थन का स्वागत करते हुए कहा कि इससे प्रदेश के बिजली कर्मियों और अभियंताओं का मनोबल और मजबूत हुआ है। एआईपीईएफ ने अपने प्रस्ताव में इस बात पर जोर दिया कि पूर्वांचल विद्युत वितरण निगम और दक्षिणांचल विद्युत वितरण निगम के निजीकरण के विरोध में पिछले 562 दिनों से बिजली कर्मी एवं अभियंता शांतिपूर्ण और लोकतांत्रिक तरीके से आंदोलन कर रहे हैं। बिजली पंचायतों, महापंचायतों, रैलियों और जनसभाओं के माध्यम से यह आंदोलन अब एक व्यापक जन आंदोलन का स्वरूप ले चुका है। फेडरेशन ने आंदोलन के दौरान कर्मचारियों के स्थानांतरण, संविदा कर्मियों की सेवाएं समाप्त करने तथा अनुशासनात्मक कार्रवाई के नाम पर किए गए कदमों पर गहरी चिंता व्यक्त करते हुए इन्हें लोकतांत्रिक अधिकारों के दमन का प्रयास बताया। संघर्ष समिति के पदाधिकारी राघवेंद्र सिंह ने मांग की है कि निजीकरण का निर्णय तत्काल वापस लिया जाए तथा आंदोलन के दौरान बिजली कर्मियों और अभियंताओं के विरुद्ध की गई सभी दमनात्मक कार्रवाइयों को बिना शर्त समाप्त किया जाए। बैठक में पारित दूसरे प्रस्ताव में, एआईपीईएफ ने प्रस्तावित विद्युत (संशोधन) विधेयक-2025 का कड़ा विरोध करते हुए इसे बिजली क्षेत्र के निजीकरण को बढ़ावा देने वाला बताया। फेडरेशन का कहना है कि विधेयक के प्रावधान सार्वजनिक वितरण कंपनियों को कमजोर कर निजी कंपनियों को लाभ पहुंचाएंगे, जिससे किसानों, घरेलू उपभोक्ताओं, छोटे व्यापारियों और कमजोर वर्गों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है। एआईपीईएफ ने चेतावनी दी कि यदि आगामी मानसून सत्र में यह विधेयक संसद में प्रस्तुत किया गया, तो राष्ट्रीय समन्वय समिति (एनसीसीओईईई) एवं अन्य संगठनों के साथ मिलकर देशव्यापी विरोध कार्यक्रम चलाया जाएगा। आवश्यकता पड़ने पर राष्ट्रव्यापी "लाइटनिंग स्ट्राइक" सहित अन्य आंदोलनात्मक कदम भी उठाए जाएंगे। संघर्ष समिति की पदाधिकारी दीक्षा श्रीवास्तव ने जोर दिया कि उत्तर प्रदेश में निजीकरण के खिलाफ चल रहा आंदोलन अब राष्ट्रीय स्वरूप ग्रहण कर चुका है और यह सार्वजनिक बिजली क्षेत्र, उपभोक्ताओं, किसानों तथा बिजली कर्मियों के हितों की रक्षा का एक महत्वपूर्ण अभियान बन गया है। इसी क्रम में, शुक्रवार को संतकबीरनगर में भी बिजली कर्मियों ने अपना विरोध प्रदर्शन किया, जिसमें सहायक लेखाकार प्रिंस गुप्ता, संतोष गुप्ता, कार्यकारी सहायक अमरनाथ यादव, दिलीप सिंह, राघवेंद्र सिंह, दीक्षा श्रीवास्तव, सूरज प्रजापति, अशोक कुमार, सत्येंद्र सिंह, रंजन कुमार, वीरेंद्र मौर्य, प्रदुम्न कुमार और संजय यादव समेत अन्य विद्युत कर्मी मौजूद रहे।1
- ग्राम अईलिया पोस्ट पारसवा ब्लॉक कूद रहा जिला बस्ती थाना लालगंज1