इंडस्ट्रियल पार्क पर संकट: "दाल का कटोरा" बचाने सड़क पर उतरे गंगापुर-नरौली के किसान, बंजर जमीन पर प्रोजेक्ट शिफ्ट करने की मांग। पटना/बख्तियारपुर: प्रखंड के गंगापुर और नरौली सहित चार गांवों में प्रस्तावित औद्योगिक पार्क (इंडस्ट्रियल पार्क) के निर्माण को लेकर विवाद गहराता जा रहा है। जिला प्रशासन के निर्देश पर भू-अर्जन के लिए 'सामाजिक प्रभाव मूल्यांकन सर्वेक्षण' (SIA) की प्रक्रिया शुरू की गई है, जिसका स्थानीय किसानों ने पुरजोर विरोध किया है। शनिवार को ललित नारायण मिश्रा आर्थिक विकास एवं सामाजिक परिवर्तन संस्थान (L.N. Mishra Institute) के कर्मी जब प्रश्नावली फॉर्म लेकर किसानों की सहमति लेने गांवों में पहुंचे, तो उन्हें भारी विरोध का सामना करना पड़ा। सर्वे कर्मियों के सामने ही किसानों ने अपनी अनापत्ति दर्ज कराते हुए स्पष्ट कर दिया कि वे किसी भी कीमत पर अपनी पुश्तैनी और उपजाऊ जमीन सरकार को नहीं देंगे। किसानों का कहना है कि यह क्षेत्र उनके जीविकोपार्जन का एकमात्र साधन है। आंदोलनकारी किसानों ने भावुक होते हुए कहा, "यह इलाका 'दाल का कटोरा' माना जाता है। हमारी जमीन तीन फसली है और बेहद उपजाऊ है। अगर सरकार इस जमीन का अधिग्रहण करती है, तो हमारा अस्तित्व ही मिट जाएगा।" किसानों ने प्रशासन को सुझाव दिया कि इस तरह के बड़े प्रोजेक्ट्स के लिए बिहार में कई ऐसी जगहें हैं जहां भूमि बंजर है या सरकारी जमीन उपलब्ध है। पूर्व के उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि पहले भी बड़े प्लांट बंजर जमीनों पर ही लगाए जाते थे, ताकि कृषि योग्य भूमि सुरक्षित रहे। सर्वे के दौरान मौजूद किसानों ने एकजुट होकर नारा दिया— "मर जाएंगे, मिट जाएंगे, लेकिन अपनी उपजाऊ जमीन नहीं देंगे।" किसानों ने सरकार से मांग की है कि इस प्रोजेक्ट के लिए किसी बंजर स्थान का चयन किया जाए। वहीं, सर्वे के लिए आए कर्मियों ने बताया कि वे केवल शासन के निर्देश पर सामाजिक प्रभाव का आकलन करने आए हैं और किसानों की बातों को रिपोर्ट में शामिल किया जाएगा। अब देखना यह है कि प्रशासन किसानों के इस कड़े विरोध के बाद क्या रुख अपनाता है।
इंडस्ट्रियल पार्क पर संकट: "दाल का कटोरा" बचाने सड़क पर उतरे गंगापुर-नरौली के किसान, बंजर जमीन पर प्रोजेक्ट शिफ्ट करने की मांग। पटना/बख्तियारपुर: प्रखंड के गंगापुर और नरौली सहित चार गांवों में प्रस्तावित औद्योगिक पार्क (इंडस्ट्रियल पार्क) के निर्माण को लेकर विवाद गहराता जा रहा है। जिला प्रशासन के निर्देश पर भू-अर्जन के लिए 'सामाजिक प्रभाव मूल्यांकन सर्वेक्षण' (SIA) की प्रक्रिया शुरू की गई है, जिसका स्थानीय किसानों ने पुरजोर विरोध किया है। शनिवार को ललित नारायण मिश्रा आर्थिक विकास एवं सामाजिक परिवर्तन संस्थान (L.N. Mishra Institute) के कर्मी जब प्रश्नावली फॉर्म लेकर किसानों की सहमति लेने गांवों में पहुंचे, तो उन्हें भारी विरोध का सामना करना पड़ा। सर्वे कर्मियों के सामने ही किसानों ने अपनी अनापत्ति दर्ज कराते हुए स्पष्ट कर दिया कि वे किसी भी कीमत पर अपनी पुश्तैनी और उपजाऊ जमीन सरकार को नहीं देंगे। किसानों का कहना है कि यह क्षेत्र उनके जीविकोपार्जन का एकमात्र साधन है। आंदोलनकारी किसानों ने भावुक होते हुए कहा, "यह इलाका 'दाल का कटोरा' माना जाता है। हमारी जमीन तीन फसली है और बेहद उपजाऊ है। अगर सरकार इस जमीन का अधिग्रहण करती है, तो हमारा अस्तित्व ही मिट जाएगा।" किसानों ने प्रशासन को सुझाव दिया कि इस तरह के बड़े प्रोजेक्ट्स के लिए बिहार में कई ऐसी जगहें हैं जहां भूमि बंजर है या सरकारी जमीन उपलब्ध है। पूर्व के उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि पहले भी बड़े प्लांट बंजर जमीनों पर ही लगाए जाते थे, ताकि कृषि योग्य भूमि सुरक्षित रहे। सर्वे के दौरान मौजूद किसानों ने एकजुट होकर नारा दिया— "मर जाएंगे, मिट जाएंगे, लेकिन अपनी उपजाऊ जमीन नहीं देंगे।" किसानों ने सरकार से मांग की है कि इस प्रोजेक्ट के लिए किसी बंजर स्थान का चयन किया जाए। वहीं, सर्वे के लिए आए कर्मियों ने बताया कि वे केवल शासन के निर्देश पर सामाजिक प्रभाव का आकलन करने आए हैं और किसानों की बातों को रिपोर्ट में शामिल किया जाएगा। अब देखना यह है कि प्रशासन किसानों के इस कड़े विरोध के बाद क्या रुख अपनाता है।
- पटना/बख्तियारपुर: प्रखंड के गंगापुर और नरौली सहित चार गांवों में प्रस्तावित औद्योगिक पार्क (इंडस्ट्रियल पार्क) के निर्माण को लेकर विवाद गहराता जा रहा है। जिला प्रशासन के निर्देश पर भू-अर्जन के लिए 'सामाजिक प्रभाव मूल्यांकन सर्वेक्षण' (SIA) की प्रक्रिया शुरू की गई है, जिसका स्थानीय किसानों ने पुरजोर विरोध किया है। शनिवार को ललित नारायण मिश्रा आर्थिक विकास एवं सामाजिक परिवर्तन संस्थान (L.N. Mishra Institute) के कर्मी जब प्रश्नावली फॉर्म लेकर किसानों की सहमति लेने गांवों में पहुंचे, तो उन्हें भारी विरोध का सामना करना पड़ा। सर्वे कर्मियों के सामने ही किसानों ने अपनी अनापत्ति दर्ज कराते हुए स्पष्ट कर दिया कि वे किसी भी कीमत पर अपनी पुश्तैनी और उपजाऊ जमीन सरकार को नहीं देंगे। किसानों का कहना है कि यह क्षेत्र उनके जीविकोपार्जन का एकमात्र साधन है। आंदोलनकारी किसानों ने भावुक होते हुए कहा, "यह इलाका 'दाल का कटोरा' माना जाता है। हमारी जमीन तीन फसली है और बेहद उपजाऊ है। अगर सरकार इस जमीन का अधिग्रहण करती है, तो हमारा अस्तित्व ही मिट जाएगा।" किसानों ने प्रशासन को सुझाव दिया कि इस तरह के बड़े प्रोजेक्ट्स के लिए बिहार में कई ऐसी जगहें हैं जहां भूमि बंजर है या सरकारी जमीन उपलब्ध है। पूर्व के उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि पहले भी बड़े प्लांट बंजर जमीनों पर ही लगाए जाते थे, ताकि कृषि योग्य भूमि सुरक्षित रहे। सर्वे के दौरान मौजूद किसानों ने एकजुट होकर नारा दिया— "मर जाएंगे, मिट जाएंगे, लेकिन अपनी उपजाऊ जमीन नहीं देंगे।" किसानों ने सरकार से मांग की है कि इस प्रोजेक्ट के लिए किसी बंजर स्थान का चयन किया जाए। वहीं, सर्वे के लिए आए कर्मियों ने बताया कि वे केवल शासन के निर्देश पर सामाजिक प्रभाव का आकलन करने आए हैं और किसानों की बातों को रिपोर्ट में शामिल किया जाएगा। अब देखना यह है कि प्रशासन किसानों के इस कड़े विरोध के बाद क्या रुख अपनाता है।1
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