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आस्था, राजनीति और धरातल की सच्चाई के बीच आखिर गौ-संरक्षण का वास्तविक रास्ता क्या है? भारत में गाय केवल एक पशु नहीं मानी जाती। करोड़ों लोगों की आस्था, संस्कृति और धार्मिक जीवन में गौमाता का विशेष स्थान है। गांव की परंपरा से लेकर धार्मिक अनुष्ठानों तक, भारतीय समाज में गाय को सम्मान की दृष्टि से देखा जाता रहा है। यही कारण है कि समय-समय पर गौ-संरक्षण को लेकर आंदोलन, यात्राएं, धार्मिक सभाएं और बड़े-बड़े मंच तैयार होते रहे हैं। वर्तमान समय में ज्योतिर्मठ शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती द्वारा उत्तर प्रदेश की 403 विधानसभाओं में निकाली जा रही गौ-संरक्षण एवं सनातन जागृति यात्रा भी इसी बहस को फिर से समाज के केंद्र में लेकर आई है। जनपद सोनभद्र में घोरावल, रॉबर्ट्सगंज, ओबरा और दुद्धी विधानसभा तक पहुंची इस यात्रा में बड़ी संख्या में लोग जुड़े, गो-पूजन हुआ, सभाएं हुईं और गौमाता को “राष्ट्रमाता” घोषित करने की मांग भी प्रमुख रूप से उठाई गई। लेकिन इस पूरे घटनाक्रम के बीच सबसे बड़ा प्रश्न वही है जो वर्षों से समाज के सामने खड़ा है — यदि गाय हमारी आस्था का केंद्र है, तो धरातल पर उसकी स्थिति इतनी चिंताजनक क्यों दिखाई देती है? रात के समय नगरों की सड़कों पर घूमते निराश्रित गौवंश, कूड़े के ढेर में भोजन तलाशते पशु, सड़क दुर्घटनाओं में मरते मवेशी, किसानों की फसलों को नुकसान और कई गौशालाओं की खराब व्यवस्थाएं — यह सब आज की वास्तविक तस्वीर है। यह केवल किसी एक नगर या जिले की स्थिति नहीं, बल्कि देश के अनेक हिस्सों में दिखाई देने वाली समस्या है। यहीं से यह विषय केवल धार्मिक नहीं रहता, बल्कि सामाजिक, प्रशासनिक और राजनीतिक बहस का केंद्र बन जाता है। भारतीय परंपरा में धर्माचार्य की भूमिका भारत की परंपरा में धर्माचार्य केवल पूजा-पाठ कराने वाले व्यक्ति नहीं माने गए। प्राचीन व्यवस्था में राजा शासन चलाता था, लेकिन नैतिक और धर्मसम्मत मार्गदर्शन संत और गुरु प्रदान करते थे। रामायण, महाभारत और भारतीय गुरुकुल परंपरा में यह स्पष्ट दिखाई देता है कि धर्माचार्य समाज को केवल धार्मिक कर्मकांड नहीं, बल्कि मर्यादा, विवेक और नीति का मार्ग दिखाते थे। इसी कारण जब कोई शंकराचार्य या बड़ा संत समाज और शासन से जुड़े विषयों पर बोलता है, तो उसे केवल राजनीतिक बयान के रूप में नहीं देखा जा सकता। भारतीय संस्कृति में यह भूमिका सदियों से मौजूद रही है। लेकिन वर्तमान लोकतांत्रिक दौर में स्थिति बदल चुकी है। अब हर धार्मिक विषय राजनीति से जुड़ जाता है। सोशल मीडिया और चुनावी वातावरण ने समाज को इस हद तक विभाजित कर दिया है कि कोई भी धार्मिक वक्तव्य तुरंत “समर्थन” और “विरोध” की बहस में बदल जाता है। यही कारण है कि जब शंकराचार्य गौ-संरक्षण, सनातन जागृति या व्यवस्थागत सुधार की बात करते हैं, तो एक वर्ग उसे धार्मिक चेतना मानता है जबकि दूसरा वर्ग उसे राजनीतिक संदेश के रूप में देखने लगता है। महाकुंभ के बाद तेज हुई बहस हाल के समय में महाकुंभ के दौरान शंकराचार्य परंपरा, अखाड़ा व्यवस्था और प्रशासनिक व्यवहार को लेकर जो विवाद सामने आए, उसके बाद यह बहस और तेज हो गई। बयानबाजी का दौर शुरू हुआ और फिर गौ-संरक्षण यात्रा को भी राजनीतिक दृष्टिकोण से देखा जाने लगा। लेकिन यदि इस पूरे विषय को शांत और व्यावहारिक दृष्टि से देखा जाए, तो सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न राजनीति नहीं बल्कि “व्यवस्था” का दिखाई देता है। क्योंकि वास्तविकता यह है कि: गौ-संरक्षण पर योजनाएं बनती हैं, बजट जारी होते हैं, सभाएं और यात्राएं होती हैं, लेकिन निराश्रित गौवंश की समस्या अभी भी समाप्त नहीं हुई है। यानी आस्था मौजूद है, लेकिन व्यवस्था अधूरी है। धर्म के नाम पर दिखावा और वास्तविकता स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती ने अपने भाषणों में एक और महत्वपूर्ण विषय उठाया — धर्म के नाम पर भ्रम और दिखावा। उन्होंने रामचरितमानस और लक्ष्मण रेखा का उदाहरण देते हुए कहा कि केवल बाहरी वेशभूषा देखकर किसी को संत मान लेना उचित नहीं है। वास्तविक धर्म का आधार विवेक, मर्यादा और आचरण है। आज यह बात समाज के लिए और भी महत्वपूर्ण हो जाती है क्योंकि सोशल मीडिया और मंचीय संस्कृति के दौर में धर्म भी कई बार प्रदर्शन का माध्यम बनता दिखाई देता है। लोग धर्म सुनते कम और धर्म का प्रदर्शन अधिक देखने लगे हैं। यही कारण है कि समाज में वास्तविक अध्यात्म, शास्त्र आधारित जीवन और विवेक जागरण की आवश्यकता पहले से अधिक महसूस की जा रही है। सबसे बड़ी चिंता — समाज का विभाजन इस पूरे विषय की सबसे गंभीर बात यह है कि समाज अब लगभग हर मुद्दे पर दो हिस्सों में बंटता दिखाई देता है। यदि कोई गौ-संरक्षण की बात करे तो उसे राजनीतिक नजर से देखा जाता है। यदि कोई व्यवस्थागत सुधार की बात करे तो उसे विरोध के रूप में प्रस्तुत किया जाता है। यदि कोई संत सरकार से प्रश्न पूछे तो उसे राजनीतिक रंग दे दिया जाता है। जबकि वास्तविकता यह है कि: गौ-संरक्षण किसी एक दल का विषय नहीं, सनातन परंपरा किसी एक संगठन की संपत्ति नहीं, और धर्माचार्य की भूमिका केवल चुनावी मंचों तक सीमित नहीं हो सकती। आखिर समाधान क्या है? समस्या का समाधान केवल भाषणों, नारों और राजनीतिक बहसों में नहीं मिलेगा। इसके लिए वास्तविक और स्थायी व्यवस्था बनानी होगी। जरूरत है: नगर निकायों की जवाबदेही तय करने की, पंचायत स्तर पर गौशाला मॉडल विकसित करने की, धार्मिक संस्थाओं और प्रशासन के संयुक्त प्रयास की, पारदर्शी गौ-सेवा व्यवस्था की, और युवाओं को केवल नारे नहीं बल्कि क्रियान्वयन से जोड़ने की। यदि वास्तव में गौ-संरक्षण को मजबूत करना है, तो उसे “भावना” से आगे बढ़ाकर “व्यवस्था” बनाना होगा। अंतिम प्रश्न आज भारत के सामने सबसे बड़ा प्रश्न यही है: क्या गौ-संरक्षण केवल राजनीतिक और धार्मिक मंचों तक सीमित रहेगा, या वास्तव में ऐसा मॉडल तैयार होगा जिससे सड़कों पर घूमते निराश्रित गौवंश को सुरक्षित जीवन मिल सके? क्योंकि जब तक धरातल नहीं बदलेगा, तब तक आस्था और वास्तविकता के बीच यह दूरी समाज को लगातार परेशान करती रहेगी। और शायद यही वह समय है जब भारत को केवल नारों से नहीं, बल्कि विवेक, मर्यादा और प्रभावी क्रियान्वयन से आगे बढ़ने की आवश्यकता है।

1 hr ago
user_Abhishek agrahari संस्थापक सोन
Abhishek agrahari संस्थापक सोन
Student union ओबरा, सोनभद्र, उत्तर प्रदेश•
1 hr ago
f759dcd6-3f26-450b-9fde-dbc1c6ae8df0

आस्था, राजनीति और धरातल की सच्चाई के बीच आखिर गौ-संरक्षण का वास्तविक रास्ता क्या है? भारत में गाय केवल एक पशु नहीं मानी जाती। करोड़ों लोगों की आस्था, संस्कृति और धार्मिक जीवन में गौमाता का विशेष स्थान है। गांव की परंपरा से लेकर धार्मिक अनुष्ठानों तक, भारतीय समाज में गाय को सम्मान की दृष्टि से देखा जाता रहा है। यही कारण है कि समय-समय पर गौ-संरक्षण को लेकर आंदोलन, यात्राएं, धार्मिक सभाएं और बड़े-बड़े मंच तैयार होते रहे हैं। वर्तमान समय में ज्योतिर्मठ शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती द्वारा उत्तर प्रदेश की 403 विधानसभाओं में निकाली जा रही गौ-संरक्षण एवं सनातन जागृति यात्रा भी इसी बहस को फिर से समाज के केंद्र में लेकर आई है। जनपद सोनभद्र में घोरावल, रॉबर्ट्सगंज, ओबरा और दुद्धी विधानसभा तक पहुंची इस यात्रा में बड़ी संख्या में लोग जुड़े, गो-पूजन हुआ, सभाएं हुईं और गौमाता को “राष्ट्रमाता” घोषित करने की मांग भी प्रमुख रूप से उठाई गई। लेकिन इस पूरे घटनाक्रम के बीच सबसे बड़ा प्रश्न वही है जो वर्षों से समाज के सामने खड़ा है — यदि गाय हमारी आस्था का केंद्र है, तो धरातल पर उसकी स्थिति इतनी चिंताजनक क्यों दिखाई देती है? रात के समय नगरों की सड़कों पर घूमते निराश्रित गौवंश, कूड़े के ढेर में भोजन तलाशते पशु, सड़क दुर्घटनाओं में मरते मवेशी, किसानों की फसलों को नुकसान और कई गौशालाओं की खराब व्यवस्थाएं — यह सब आज की वास्तविक तस्वीर है। यह केवल किसी एक नगर या जिले की स्थिति नहीं, बल्कि देश के अनेक हिस्सों में दिखाई देने वाली समस्या है। यहीं से यह विषय केवल धार्मिक नहीं रहता, बल्कि सामाजिक, प्रशासनिक और राजनीतिक बहस का केंद्र बन जाता है। भारतीय परंपरा में धर्माचार्य की भूमिका भारत की परंपरा में धर्माचार्य केवल पूजा-पाठ कराने वाले व्यक्ति नहीं माने गए। प्राचीन व्यवस्था में राजा शासन चलाता था, लेकिन नैतिक और धर्मसम्मत मार्गदर्शन संत और गुरु प्रदान करते थे। रामायण, महाभारत और भारतीय गुरुकुल परंपरा में यह स्पष्ट दिखाई देता है कि धर्माचार्य समाज को केवल धार्मिक कर्मकांड नहीं, बल्कि मर्यादा, विवेक और नीति का मार्ग दिखाते थे। इसी कारण जब कोई शंकराचार्य या बड़ा संत समाज और शासन से जुड़े विषयों पर बोलता है, तो उसे केवल राजनीतिक बयान के रूप में नहीं देखा जा सकता। भारतीय संस्कृति में यह भूमिका सदियों से मौजूद रही है। लेकिन वर्तमान लोकतांत्रिक दौर में स्थिति बदल चुकी है। अब हर धार्मिक विषय राजनीति से जुड़ जाता है। सोशल मीडिया और चुनावी वातावरण ने समाज को इस हद तक विभाजित कर दिया है कि कोई भी धार्मिक वक्तव्य तुरंत “समर्थन” और “विरोध” की बहस में बदल जाता है। यही कारण है कि जब शंकराचार्य गौ-संरक्षण, सनातन जागृति या व्यवस्थागत सुधार की बात करते हैं, तो एक वर्ग उसे धार्मिक चेतना मानता है जबकि दूसरा वर्ग उसे राजनीतिक संदेश के रूप में देखने लगता है। महाकुंभ के बाद तेज हुई बहस हाल के समय में महाकुंभ के दौरान शंकराचार्य परंपरा, अखाड़ा व्यवस्था और प्रशासनिक व्यवहार को लेकर जो विवाद सामने आए, उसके बाद यह बहस और तेज हो गई। बयानबाजी का दौर शुरू हुआ और फिर गौ-संरक्षण यात्रा को भी राजनीतिक दृष्टिकोण से देखा जाने लगा। लेकिन यदि इस पूरे विषय को शांत और व्यावहारिक दृष्टि से देखा जाए, तो सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न राजनीति नहीं बल्कि “व्यवस्था” का दिखाई देता है। क्योंकि वास्तविकता यह है कि: गौ-संरक्षण पर योजनाएं बनती हैं, बजट जारी होते हैं, सभाएं और यात्राएं होती हैं, लेकिन निराश्रित गौवंश की समस्या अभी भी समाप्त नहीं हुई है। यानी आस्था मौजूद है, लेकिन व्यवस्था अधूरी है। धर्म के नाम पर दिखावा और वास्तविकता स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती ने अपने भाषणों में एक और महत्वपूर्ण विषय उठाया — धर्म के नाम पर भ्रम और दिखावा। उन्होंने रामचरितमानस और लक्ष्मण रेखा का उदाहरण देते हुए कहा कि केवल बाहरी वेशभूषा देखकर किसी को संत मान लेना उचित नहीं है। वास्तविक धर्म का आधार विवेक, मर्यादा और आचरण है। आज यह बात समाज के लिए और भी महत्वपूर्ण हो जाती है क्योंकि सोशल मीडिया और मंचीय संस्कृति के दौर में धर्म भी कई बार प्रदर्शन का माध्यम बनता दिखाई देता है। लोग धर्म सुनते कम और धर्म का प्रदर्शन अधिक देखने लगे हैं। यही कारण है कि समाज में वास्तविक अध्यात्म, शास्त्र आधारित जीवन और विवेक जागरण की आवश्यकता पहले से अधिक महसूस की जा रही है। सबसे बड़ी चिंता — समाज का विभाजन इस पूरे विषय की सबसे गंभीर बात यह है कि समाज अब लगभग हर मुद्दे पर दो हिस्सों में बंटता दिखाई देता है। यदि कोई गौ-संरक्षण की बात करे तो उसे राजनीतिक नजर से देखा जाता है। यदि कोई व्यवस्थागत सुधार की बात करे तो उसे विरोध के रूप में प्रस्तुत किया जाता है। यदि कोई संत सरकार से प्रश्न पूछे तो उसे राजनीतिक रंग दे दिया जाता है। जबकि वास्तविकता यह है कि: गौ-संरक्षण किसी एक दल का विषय नहीं, सनातन परंपरा किसी एक संगठन की संपत्ति नहीं, और धर्माचार्य की भूमिका केवल चुनावी मंचों तक सीमित नहीं हो सकती। आखिर समाधान क्या है? समस्या का समाधान केवल भाषणों, नारों और राजनीतिक बहसों में नहीं मिलेगा। इसके लिए वास्तविक और स्थायी व्यवस्था बनानी होगी। जरूरत है: नगर निकायों की जवाबदेही तय करने की, पंचायत स्तर पर गौशाला मॉडल विकसित करने की, धार्मिक संस्थाओं और प्रशासन के संयुक्त प्रयास की, पारदर्शी गौ-सेवा व्यवस्था की, और युवाओं को केवल नारे नहीं बल्कि क्रियान्वयन से जोड़ने की। यदि वास्तव में गौ-संरक्षण को मजबूत करना है, तो उसे “भावना” से आगे बढ़ाकर “व्यवस्था” बनाना होगा। अंतिम प्रश्न आज भारत के सामने सबसे बड़ा प्रश्न यही है: क्या गौ-संरक्षण केवल राजनीतिक और धार्मिक मंचों तक सीमित रहेगा, या वास्तव में ऐसा मॉडल तैयार होगा जिससे सड़कों पर घूमते निराश्रित गौवंश को सुरक्षित जीवन मिल सके? क्योंकि जब तक धरातल नहीं बदलेगा, तब तक आस्था और वास्तविकता के बीच यह दूरी समाज को लगातार परेशान करती रहेगी। और शायद यही वह समय है जब भारत को केवल नारों से नहीं, बल्कि विवेक, मर्यादा और प्रभावी क्रियान्वयन से आगे बढ़ने की आवश्यकता है।

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  • Post by @PappuKumar-ky6qb you tube my channel
    1
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    user_@PappuKumar-ky6qb you tube my channel
    @PappuKumar-ky6qb you tube my channel
    Farmer Robertsganj, Sonbhadra•
    2 hrs ago
  • सिंगरौली की निगाही खदान में कबाड़ी गैंग का आतंक चरम पर है। दिनदहाड़े बाइक पर लोहा चोरी करते चोरों का वीडियो वायरल हुआ है, जिससे सुरक्षा व्यवस्था पर सवाल उठ रहे हैं। पुलिस कार्रवाई के बावजूद गैंग बेखौफ है, जो बड़े हादसे का संकेत है।
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    सिंगरौली की निगाही खदान में कबाड़ी गैंग का आतंक चरम पर है। दिनदहाड़े बाइक पर लोहा चोरी करते चोरों का वीडियो वायरल हुआ है, जिससे सुरक्षा व्यवस्था पर सवाल उठ रहे हैं। पुलिस कार्रवाई के बावजूद गैंग बेखौफ है, जो बड़े हादसे का संकेत है।
    user_अमित कुमार
    अमित कुमार
    Police Officer दुद्धी, सोनभद्र, उत्तर प्रदेश•
    17 hrs ago
  • सोनभद्र के विंढमगंज और बुतबेढ़वा इलाके में आतंक फैला रहे एक सांड को पकड़कर गौशाला भेज दिया गया है। इसके बाद से स्थानीय ग्रामीणों ने राहत की सांस ली है, जो लंबे समय से सांड के खौफ में जी रहे थे।
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    सोनभद्र के विंढमगंज और बुतबेढ़वा इलाके में आतंक फैला रहे एक सांड को पकड़कर गौशाला भेज दिया गया है। इसके बाद से स्थानीय ग्रामीणों ने राहत की सांस ली है, जो लंबे समय से सांड के खौफ में जी रहे थे।
    user_Nitesh Kumar
    Nitesh Kumar
    Mandi Agent Mahuli•
    6 hrs ago
  • सिंगरौली में पुलिस अधीक्षक कार्यालय के ठीक सामने दो महिलाएं आपस में भिड़ गईं। पुलिस के भय के बिना हुई इस घटना ने कानून-व्यवस्था पर सवाल खड़े कर दिए हैं।
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    सिंगरौली में पुलिस अधीक्षक कार्यालय के ठीक सामने दो महिलाएं आपस में भिड़ गईं। पुलिस के भय के बिना हुई इस घटना ने कानून-व्यवस्था पर सवाल खड़े कर दिए हैं।
    user_Amrendra Shukla पत्रकार
    Amrendra Shukla पत्रकार
    Local News Reporter सिंगरौली नगर, सिंगरौली, मध्य प्रदेश•
    6 hrs ago
  • गंभीर बीमार संध्या दुबे के लिए वरदान बनी 'पीएम श्री एयर एम्बुलेंस सेवा' सांसद के प्रयास और कलेक्टर की तत्परता से एयरलिफ्ट कर भेजी गईं एम्स भोपाल
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    गंभीर बीमार संध्या दुबे के लिए वरदान बनी 'पीएम श्री एयर एम्बुलेंस सेवा' सांसद के प्रयास और कलेक्टर की तत्परता  से एयरलिफ्ट कर भेजी गईं एम्स भोपाल
    user_Brijesh kumar
    Brijesh kumar
    सिंगरौली, सिंगरौली, मध्य प्रदेश•
    2 hrs ago
  • सिंगरौली SP ऑफिस के सामने हाईवोल्टेज ड्रामा: महिलाओं ने सड़क पर पकड़े बाल, जमकर हुई मारपीट; VIDEO वायरल एमपी के उर्जाधानी सिंगरौली में पुलिस अधीक्षक कार्यालय के सामने सोमबार करीब 4 बजे उस वक्त हड़कंप मच गया ,जब दो पक्षों की महिलाएं अचानक सड़क पर ही आपस में भिड़ गईं। देखते ही देखते बहस इतनी बढ़ी कि महिलाओं ने एक-दूसरे के बाल पकड़ लिए और बीच सड़क जमकर मारपीट शुरू हो गई.एसपी ऑफिस के बाहर हुए इस हंगामे से इलाके में अफरा-तफरी मच गई। घटना का वीडियो अब सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहा है, जिसमें महिलाएं एक-दूसरे पर हमला करती दिखाई दे रही हैं। तस्वीरें सिंगरौली जिले के एसपी ऑफिस के बाहर की हैं… जहां इंसाफ की उम्मीद लेकर पहुंचे दो पक्ष अचानक सड़क पर ही आमने-सामने आ गए। पहले तीखी बहस हुई… फिर आवाजें ऊंची हुईं… और देखते ही देखते मामला हाथापाई तक पहुंच गया। वीडियो में साफ दिखाई दे रहा है कि महिलाएं एक-दूसरे के बाल पकड़कर सड़क पर खींचतान कर रही हैं। आसपास मौजूद लोग बीच-बचाव की कोशिश करते रहे… लेकिन गुस्सा इतना ज्यादा था कि कोई किसी की सुनने को तैयार नहीं था। हंगामे के कारण एसपी ऑफिस के सामने लोगों की भीड़ जमा हो गई और कुछ देर के लिए माहौल पूरी तरह तनावपूर्ण बन गया। जानकारी के मुताबिक दोनों पक्ष किसी पुराने विवाद की शिकायत लेकर एसपी ऑफिस पहुंचे थे.इसी दौरान दोनों के बीच कहासुनी शुरू हुई, जो कुछ ही मिनटों में बेकाबू हो गई। गुस्से में महिलाएं सड़क पर ही भिड़ गईं और जमकर मारपीट होने लगी। मौके पर मौजूद लोगों ने पूरे घटनाक्रम का वीडियो मोबाइल में कैद कर लिया, जो अब सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है। सूचना मिलते ही पुलिस मौके पर पहुंची और दोनों पक्षों को अलग कर मामला शांत कराया। फिलहाल पुलिस पूरे विवाद की जांच में जुटी हुई है।
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    सिंगरौली SP ऑफिस के सामने हाईवोल्टेज ड्रामा: महिलाओं ने सड़क पर पकड़े बाल, जमकर हुई मारपीट; VIDEO वायरल
एमपी के उर्जाधानी सिंगरौली में पुलिस अधीक्षक कार्यालय के सामने सोमबार करीब 4 बजे उस वक्त हड़कंप मच गया ,जब दो पक्षों की महिलाएं अचानक सड़क पर ही आपस में भिड़ गईं।
देखते ही देखते बहस इतनी बढ़ी कि महिलाओं ने एक-दूसरे के बाल पकड़ लिए और बीच सड़क जमकर मारपीट शुरू हो गई.एसपी ऑफिस के बाहर हुए इस हंगामे से इलाके में अफरा-तफरी मच गई।
घटना का वीडियो अब सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहा है, जिसमें महिलाएं एक-दूसरे पर हमला करती दिखाई दे रही हैं।
तस्वीरें सिंगरौली जिले के एसपी ऑफिस के बाहर की हैं…
जहां इंसाफ की उम्मीद लेकर पहुंचे दो पक्ष अचानक सड़क पर ही आमने-सामने आ गए।
पहले तीखी बहस हुई…
फिर आवाजें ऊंची हुईं…
और देखते ही देखते मामला हाथापाई तक पहुंच गया।
वीडियो में साफ दिखाई दे रहा है कि महिलाएं एक-दूसरे के बाल पकड़कर सड़क पर खींचतान कर रही हैं।
आसपास मौजूद लोग बीच-बचाव की कोशिश करते रहे… लेकिन गुस्सा इतना ज्यादा था कि कोई किसी की सुनने को तैयार नहीं था।
हंगामे के कारण एसपी ऑफिस के सामने लोगों की भीड़ जमा हो गई और कुछ देर के लिए माहौल पूरी तरह तनावपूर्ण बन गया।
जानकारी के मुताबिक दोनों पक्ष किसी पुराने विवाद की शिकायत लेकर एसपी ऑफिस पहुंचे थे.इसी दौरान दोनों के बीच कहासुनी शुरू हुई, जो कुछ ही मिनटों में बेकाबू हो गई।
गुस्से में महिलाएं सड़क पर ही भिड़ गईं और जमकर मारपीट होने लगी।
मौके पर मौजूद लोगों ने पूरे घटनाक्रम का वीडियो मोबाइल में कैद कर लिया, जो अब सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है।
सूचना मिलते ही पुलिस मौके पर पहुंची और दोनों पक्षों को अलग कर मामला शांत कराया।
फिलहाल पुलिस पूरे विवाद की जांच में जुटी हुई है।
    user_Devendra Pandey
    Devendra Pandey
    TV News Anchor सिंगरौली, सिंगरौली, मध्य प्रदेश•
    2 hrs ago
  • Post by @PappuKumar-ky6qb you tube my channel
    1
    Post by @PappuKumar-ky6qb you tube my channel
    user_@PappuKumar-ky6qb you tube my channel
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    Farmer Robertsganj, Sonbhadra•
    2 hrs ago
  • सोनभद्र के दूधी में मोबाइल को लेकर हुए विवाद के बाद एक महिला की मौत हो गई। उसका शव 3 घंटे बाद एक कुएं से बरामद किया गया, जिससे इलाके में सनसनी फैल गई है।
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    user_Nitesh Kumar
    Nitesh Kumar
    Mandi Agent Mahuli•
    21 hrs ago
  • मुख्यमंत्री मोहन यादव ने कूनो नेशनल पार्क में बोत्सवाना से लाए गए दो मादा चीतों को खुले जंगल में छोड़ा। 'प्रोजेक्ट चीता' की इस नई उपलब्धि के साथ, भारत में चीतों की कुल संख्या बढ़कर 57 हो गई है। यह कदम देश में वन्यजीव संरक्षण और जैव विविधता के लिए एक ऐतिहासिक मील का पत्थर है।
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    user_Arvind Kumar Mishra
    Arvind Kumar Mishra
    Singrauli, Madhya Pradesh•
    7 hrs ago
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