भारत में शिक्षा को लेकर सबसे बड़ा भ्रम यह फैलाया गया कि “निजीकरण” यानी गुणवत्ता, और “सरकारी” यानी असफलता। पिछले तीन चार दशकों में उदारीकरण और बाजारवाद ने शिक्षा को धीरे-धीरे अधिकार से हटाकर उत्पाद बना दिया। अब स्कूल ज्ञान के केंद्र कम और ब्रांडेड सर्विस सेंटर ज्यादा दिखाई देते हैं। ऐसे में “प्राइवेट स्कूलों के सरकारीकरण” का सवाल भले आज की राजनीति में असंभव लगे, लेकिन यह सवाल उठना इसलिए जरूरी है क्योंकि शिक्षा केवल बाजार की वस्तु नहीं हो सकती। जब संविधान शिक्षा को मौलिक अधिकार मानता है, तब यह भी सुनिश्चित होना चाहिए कि गुणवत्ता पर केवल अमीरों का कब्जा न हो। आज देश में दो शिक्षा व्यवस्थाएँ साफ दिखाई देती हैं—एक वह जहाँ स्मार्ट क्लास, AC बसें, इंटरनेशनल टैग और लाखों की फीस है; दूसरी वह जहाँ एक या दो शिक्षक पाँच कक्षाएँ संभाल रहा है। यह केवल संस्थागत अंतर नहीं, यह लोकतंत्र के भीतर पैदा हुई शैक्षिक असमानता की खाई है। आखिर सवाल यह क्यों न पूछा जाए कि अगर शिक्षा समाज निर्माण का माध्यम है तो उसे पूरी तरह बाजार के हवाले क्यों कर दिया गया? कोई भी निजी स्कूल चाहे जितनी फीस बढ़ा दे, चाहे बच्चों और अभिभावकों पर कितना भी आर्थिक दबाव डाले, उसका अस्तित्व सुरक्षित रहता है। लेकिन सरकारी स्कूलों के लिए हर साल “विलय”, “समायोजन”, “कम छात्र संख्या” और “अप्रासंगिकता” जैसे शब्द तैयार रहते हैं। यानी जो संस्थान गरीब के बच्चे को पढ़ाता है, वही हमेशा कटघरे में खड़ा किया जाता है। सच यह है कि निजी स्कूलों की सफलता का बड़ा हिस्सा शिक्षा से ज्यादा “इमेज मैनेजमेंट” पर आधारित है। कुछ टॉपर बच्चे, भारी विज्ञापन, अखबारों के पूरे-पूरे परिशिष्ट, चमकदार इमारतें और अंग्रेजी बोलता हुआ वातावरण—इन्हीं के आधार पर शिक्षा की गुणवत्ता मापी जाने लगी। कोई यह नहीं पूछता कि इन स्कूलों में औसत और कमजोर बच्चों के साथ क्या होता है, मानसिक दबाव कितना है, फीस संरचना कितनी पारदर्शी है, और शिक्षकों की वास्तविक स्थिति क्या है। सबसे बड़ा विरोधाभास यह है कि सरकारी स्कूलों पर RTI लागू है, सामाजिक जवाबदेही है, मीडिया की निगरानी है, अदालतों की टिप्पणियाँ हैं, लेकिन निजी स्कूलों के मामले में वही समाज अचानक “स्वायत्तता” और “संस्थान की स्वतंत्रता” की बात करने लगता है। आखिर क्यों? यदि शिक्षा सार्वजनिक महत्व का विषय है, तो हर स्कूल सार्वजनिक जवाबदेही के दायरे में क्यों न आए? क्यों न निजी स्कूलों को भी पारदर्शी भर्ती, फीस नियमन, सामाजिक ऑडिट और कठोर उत्तरदायित्व व्यवस्था के अंतर्गत लाया जाए? असल में समस्या केवल शिक्षा की नहीं, राजनीतिक इच्छाशक्ति की है। क्या आज का राजनीतिक नेतृत्व इतना साहस रखता है कि शिक्षा के मामले में अमीर और गरीब के साथ एक जैसा व्यवहार कर सके? क्या कोई नेता अपने बच्चे को उसी सरकारी स्कूल में भेजने का नैतिक उदाहरण देगा जहाँ गरीब का बच्चा पढ़ता है? जब तक सत्ता, नौकरशाही और प्रभावशाली वर्ग खुद सार्वजनिक शिक्षा व्यवस्था का हिस्सा नहीं बनेंगे, तब तक सरकारी स्कूलों को सुधारने की वास्तविक राजनीतिक प्रतिबद्धता पैदा ही नहीं होगी। यह भी समझना होगा कि सरकारीकरण का अर्थ केवल भवनों पर सरकारी ताला लगाना नहीं है। इसका अर्थ है—शिक्षा को बाजार के बजाय सामाजिक न्याय और समान अवसर के सिद्धांत पर खड़ा करना। दुनिया के कई विकसित देशों में गुणवत्तापूर्ण सार्वजनिक शिक्षा इसलिए मजबूत है क्योंकि वहाँ शिक्षा को “निवेश” नहीं, “समानता का आधार” माना गया। भारत में उल्टा हो रहा है—अच्छी शिक्षा धीरे-धीरे आर्थिक क्षमता की गुलाम बनती जा रही है। यदि यही स्थिति जारी रही तो आने वाले समय में शिक्षा केवल वर्ग विभाजन का सबसे बड़ा औजार बन जाएगी। एक वर्ग नेतृत्व करेगा क्योंकि उसने महंगे संस्थानों से पढ़ाई की होगी, और दूसरा वर्ग केवल श्रम करेगा क्योंकि उसके हिस्से में संसाधनहीन शिक्षा आई होगी। यह केवल शिक्षा का संकट नहीं, लोकतंत्र की जड़ों के लिए खतरा है। इसलिए यह सवाल पूरी गंभीरता से पूछा जाना चाहिए कि क्या देश में शिक्षा का उद्देश्य नागरिक बनाना है या ग्राहक? यदि उद्देश्य नागरिक बनाना है, तो फिर शिक्षा व्यवस्था को समानता, जवाबदेही और सार्वजनिक नियंत्रण की दिशा में ले जाना ही होगा। क्योंकि जिस देश में स्कूल भी वर्ग देखकर अलग-अलग गुणवत्ता देने लगें, वहाँ संविधान की “समान अवसर” वाली आत्मा धीरे-धीरे खोखली होने लगती है।
भारत में शिक्षा को लेकर सबसे बड़ा भ्रम यह फैलाया गया कि “निजीकरण” यानी गुणवत्ता, और “सरकारी” यानी असफलता। पिछले तीन चार दशकों में उदारीकरण और बाजारवाद ने शिक्षा को धीरे-धीरे अधिकार से हटाकर उत्पाद बना दिया। अब स्कूल ज्ञान के केंद्र कम और ब्रांडेड सर्विस सेंटर ज्यादा दिखाई देते हैं। ऐसे में “प्राइवेट स्कूलों के सरकारीकरण” का सवाल भले आज की राजनीति में असंभव लगे, लेकिन यह सवाल उठना इसलिए जरूरी है क्योंकि शिक्षा केवल बाजार की वस्तु नहीं हो सकती। जब संविधान शिक्षा को मौलिक अधिकार मानता है, तब यह भी सुनिश्चित होना चाहिए कि गुणवत्ता पर केवल अमीरों का कब्जा न हो। आज देश में दो शिक्षा व्यवस्थाएँ साफ दिखाई देती हैं—एक वह जहाँ स्मार्ट क्लास, AC बसें, इंटरनेशनल टैग और लाखों की फीस है; दूसरी वह जहाँ एक या दो शिक्षक पाँच कक्षाएँ संभाल रहा है। यह केवल संस्थागत अंतर नहीं, यह लोकतंत्र के भीतर पैदा हुई शैक्षिक असमानता की खाई है। आखिर सवाल यह क्यों न पूछा जाए कि अगर शिक्षा समाज निर्माण का माध्यम है तो उसे पूरी तरह बाजार के हवाले क्यों कर दिया गया? कोई भी निजी स्कूल चाहे जितनी फीस बढ़ा दे, चाहे बच्चों और अभिभावकों पर कितना भी आर्थिक दबाव डाले, उसका अस्तित्व सुरक्षित रहता है। लेकिन सरकारी स्कूलों के लिए हर साल “विलय”, “समायोजन”, “कम छात्र संख्या” और “अप्रासंगिकता” जैसे शब्द तैयार रहते हैं। यानी जो संस्थान गरीब के बच्चे को पढ़ाता है, वही हमेशा कटघरे में खड़ा किया जाता है। सच यह है कि निजी स्कूलों की सफलता का बड़ा हिस्सा शिक्षा से ज्यादा “इमेज मैनेजमेंट” पर आधारित है। कुछ टॉपर बच्चे, भारी विज्ञापन, अखबारों के पूरे-पूरे परिशिष्ट, चमकदार इमारतें और अंग्रेजी बोलता हुआ वातावरण—इन्हीं के आधार पर शिक्षा की गुणवत्ता मापी जाने लगी। कोई यह नहीं पूछता कि इन स्कूलों में औसत और कमजोर बच्चों के साथ क्या होता है, मानसिक दबाव कितना है, फीस संरचना कितनी पारदर्शी है, और शिक्षकों की वास्तविक स्थिति क्या है। सबसे बड़ा विरोधाभास यह है कि सरकारी स्कूलों पर RTI लागू है, सामाजिक जवाबदेही है, मीडिया की निगरानी है, अदालतों की टिप्पणियाँ हैं, लेकिन निजी स्कूलों के मामले में वही समाज अचानक “स्वायत्तता” और “संस्थान की स्वतंत्रता” की बात करने लगता है। आखिर क्यों? यदि शिक्षा सार्वजनिक महत्व का विषय है, तो हर स्कूल सार्वजनिक जवाबदेही के दायरे में क्यों न आए? क्यों न निजी स्कूलों को भी पारदर्शी भर्ती, फीस नियमन, सामाजिक ऑडिट और कठोर उत्तरदायित्व व्यवस्था के अंतर्गत लाया जाए? असल में समस्या केवल शिक्षा की नहीं, राजनीतिक इच्छाशक्ति की है। क्या आज का राजनीतिक नेतृत्व इतना साहस रखता है कि शिक्षा के मामले में अमीर और गरीब के साथ एक जैसा व्यवहार कर सके? क्या कोई नेता अपने बच्चे को उसी सरकारी स्कूल में भेजने का नैतिक उदाहरण देगा जहाँ गरीब का बच्चा पढ़ता है? जब तक सत्ता, नौकरशाही और प्रभावशाली वर्ग खुद सार्वजनिक शिक्षा व्यवस्था का हिस्सा नहीं बनेंगे, तब तक सरकारी स्कूलों को सुधारने की वास्तविक राजनीतिक प्रतिबद्धता पैदा ही नहीं होगी। यह भी समझना होगा कि सरकारीकरण का अर्थ केवल भवनों पर सरकारी ताला लगाना नहीं है। इसका अर्थ है—शिक्षा को बाजार के बजाय सामाजिक न्याय और समान अवसर के सिद्धांत पर खड़ा करना। दुनिया के कई विकसित देशों में गुणवत्तापूर्ण सार्वजनिक शिक्षा इसलिए मजबूत है क्योंकि वहाँ शिक्षा को “निवेश” नहीं, “समानता का आधार” माना गया। भारत में उल्टा हो रहा है—अच्छी शिक्षा धीरे-धीरे आर्थिक क्षमता की गुलाम बनती जा रही है। यदि यही स्थिति जारी रही तो आने वाले समय में शिक्षा केवल वर्ग विभाजन का सबसे बड़ा औजार बन जाएगी। एक वर्ग नेतृत्व करेगा क्योंकि उसने महंगे संस्थानों से पढ़ाई की होगी, और दूसरा वर्ग केवल श्रम करेगा क्योंकि उसके हिस्से में संसाधनहीन शिक्षा आई होगी। यह केवल शिक्षा का संकट नहीं, लोकतंत्र की जड़ों के लिए खतरा है। इसलिए यह सवाल पूरी गंभीरता से पूछा जाना चाहिए कि क्या देश में शिक्षा का उद्देश्य नागरिक बनाना है या ग्राहक? यदि उद्देश्य नागरिक बनाना है, तो फिर शिक्षा व्यवस्था को समानता, जवाबदेही और सार्वजनिक नियंत्रण की दिशा में ले जाना ही होगा। क्योंकि जिस देश में स्कूल भी वर्ग देखकर अलग-अलग गुणवत्ता देने लगें, वहाँ संविधान की “समान अवसर” वाली आत्मा धीरे-धीरे खोखली होने लगती है।
- *चौरसिया समाज की शोभायात्रा में वरिष्ठ जनों का सम्मान,सौरज पांडेय ने माई की चुनर ओढ़ाकर किया एवं माई की रसोई ने कराया प्रसाद वितरण* *चौरसिया समाज की शोभायात्रा में वरिष्ठ जनों का सम्मान,सौरज पांडेय ने माई की चुनर ओढ़ाकर किया एवं माई की रसोई ने कराया प्रसाद वितरण* मैहर। नाग पंचमी एवं चौरसिया दिवस के पावन अवसर पर चौरसिया समाज मैहर द्वारा निकाली गई विशाल शोभायात्रा में माई की रसोई के संचालक पंडित धीरज महाराज के सुपुत्र सौरज पांडेय ने सामाजिक सेवा और सम्मान की मिसाल पेश की। शोभायात्रा में शामिल चौरसिया समाज के वरिष्ठ जनों का सौरज पांडेय द्वारा मां शारदा की चुनरी ओढ़ाकर सम्मान किया गया। इसके साथ ही माई की रसोई की ओर से सभी सामाजिक बंधुओं को भोजन प्रसाद ग्रहण कराकर आत्मीय स्वागत किया गया। इस अवसर पर समाज के वरिष्ठ जनों ने सौरज पांडेय एवं माई की रसोई परिवार के इस सेवाभावी कार्य की सराहना करते हुए आभार व्यक्त किया। उन्होंने कहा कि ऐसे आयोजन समाज में आपसी प्रेम, सहयोग और एकता की भावना को मजबूत करते हैं। नाग पंचमी एवं चौरसिया दिवस के अवसर पर निकली शोभायात्रा में हजारों की संख्या में समाज के लोग शामिल हुए, जिसमें रथ, घोड़े, पालकी, डीजे एवं बैंड बाजे के साथ भव्य आयोजन किया गया।3
- *मैहर खेल मैदान की दुर्दशा पर कांग्रेस जिला अध्यक्ष तो चुप है,जन प्रतिनिधि भी चुप है लेकिन कांग्रेस नगर अध्यक्ष ने कही बड़ी बात,सीएम आए तो धान का रोपा भी साथ लाए। सुनिए प्रभात द्विवेदी को...?* *मैहर खेल मैदान की दुर्दशा पर कांग्रेस जिला अध्यक्ष तो चुप है,जन प्रतिनिधि भी चुप है लेकिन कांग्रेस नगर अध्यक्ष ने कही बड़ी बात,सीएम आए तो धान का रोपा भी साथ लाए। सुनिए प्रभात द्विवेदी को...?*1
- "नशा मुक्ति ही राष्ट्र की उन्नति" जिला मैहर के ग्राम भीसमपुर में चला नशा मुक्ति अभियान, ग्रामीणों और बच्चों ने लिया बढ़-चढ़कर हिस्सा अमरपाटन, मैहर (म.प्र.) | दिनांक: 17 अगस्त 2026 जिला मैहर के विकासखंड अमरपाटन अंतर्गत ग्राम भीसमपुर में आज "नशा मुक्त भारत अभियान" के तहत जागरूकता कार्यक्रम आयोजित किया गया। कार्यक्रम में ग्राम के लोग स्कूली बच्चों ने उत्साह के साथ भाग लिया। बच्चों ने नशा मुक्ति पर आधारित , भाषण एवं पोस्टर के माध्यम से शानदार प्रदर्शन किया। कार्यक्रम के वक्ताओं ने कहा कि "नशा मुक्त होना समाज और परिवार की तरक्की के लिए बहुत जरूरी है"। नशे से होने वाले शारीरिक, मानसिक और आर्थिक नुकसान के बारे में विस्तार से जानकारी दी गई। ग्रामवासियों ने संकल्प लिया कि वे अपने गांव को नशा मुक्त बनाएंगे और युवाओं को नशे से दूर रखने के लिए जागरूकता फैलाएंगे। कार्यक्रम का समापन सामूहिक शपथ के साथ हुआ। समस्त ग्रामवासियों ने मिलकर नशे के खिलाफ एकजुट होकर काम करने का प्रण लिया। नशा मुक्त समाज - स्वस्थ भारत जय हिंद2
- सतना जिला चित्रकूट मंदाकिनी नदी उफान पर, खतरे के निशान को किया पार चित्रकूट। धर्मनगरी चित्रकूट में लगातार बारिश के बीच मंदाकिनी नदी ने रौद्र रूप धारण कर लिया है। नदी का जलस्तर तेजी से बढ़ते हुए खतरे के निशान को पार कर गया, जिससे नदी किनारे बसे इलाकों और घाटों पर चिंता बढ़ गई है। मंदाकिनी का बढ़ता जलस्तर अब लोगों के लिए चेतावनी बनकर सामने आया है। चित्रकूट मंदाकिनी नदी का लगातार बढ़ रहा जलस्तर पुलिस प्रशासन हर जगह मुस्तैदी से तैनात चारों तरफ किए गए सुरक्षा व्यवस्था का इंतजाम।2
- मैहर जिले के ग्राम पंचायत डिठौरा साकेत बस्ती में नाली निर्माण न होने से घरों में घुस रहा पानी मैहर जिले के ग्राम पंचायत डिठौरा साकेत बस्ती में नाली निर्माण न होने से घरों में घुस रहा पानी ग्रामीणों ने बताया डिठौरा सरपंच को सूचना देने के बाद भी आज तक नाली निर्माण का कार्य नहीं कराया गया ग्रामीण राजलला साकेत महेश साकेत विश्राम साकेत सोनू साकेत ने बताया सारे गांव का पानी इकट्ठा होकर नाली निर्माण न होने से रोड के ऊपर से पानी बहता है जिससे घर के अंदर भी पानी घुस जाता है और छोटे-छोटे बच्चे स्कूल जाते हैं जिससे उनको डूबने जैसे जहरीले जानवर का शिकार भी हो सकते हैं शासन प्रशासन जनप्रतिनिधियों से मांग की है कि जल्द नई निर्माण का कार्य कराया जाए जिससे हम लोगों का आवान गवन छोटे बच्चों को खतरा न हो सके।1
- डेल्हा पंचायत सभा में ग्रामीणों ने उठाए सवाल, सरपंच से जवाब की मांग मैहर | डेल्हा। ग्राम पंचायत डेल्हा में आयोजित पंचायत सभा के दौरान ग्रामीणों ने पंचायत से जुड़े विभिन्न मुद्दों और कथित अनियमितताओं को लेकर सरपंच अभिषेक जायसवाल से सवाल किए। ग्रामीणों का आरोप है कि उनके सवालों का जवाब देने की बजाय मौके पर पुलिस को बुलाया गया। पुलिस ने पहुंचकर ग्रामीणों और पंचायत प्रतिनिधियों की बात सुनी तथा स्थिति को समझने के बाद मामले को शांतिपूर्ण तरीके से संभाला। ग्रामीणों ने पुलिस के संयमपूर्ण रवैये के लिए धन्यवाद दिया। ग्रामीणों का कहना है कि पंचायत सभा में सवाल पूछना उनका अधिकार है और पंचायत के कामकाज में पारदर्शिता जरूरी है। ग्रामीणों ने पंचायत में किसी भी प्रकार की अनियमितता या भ्रष्टाचार की शिकायत होने पर जांच की मांग करने की बात कही। उनका कहना है कि यदि सरपंच की ओर से उनके सवालों का संतोषजनक जवाब नहीं मिलता है, तो वे संबंधित अधिकारियों को ज्ञापन सौंपकर जांच एवं आवश्यक कार्रवाई की मांग करेंगे। ग्रामीणों ने यह भी कहा कि आवश्यकता पड़ने पर वे लोकतांत्रिक तरीके से विरोध प्रदर्शन करेंगे। डेल्हा पंचायत सभा में ग्रामीणों ने उठाए सवाल, सरपंच से जवाब की मांग मैहर | डेल्हा। ग्राम पंचायत डेल्हा में आयोजित पंचायत सभा के दौरान ग्रामीणों ने पंचायत से जुड़े विभिन्न मुद्दों और कथित अनियमितताओं को लेकर सरपंच अभिषेक जायसवाल से सवाल किए। ग्रामीणों का आरोप है कि उनके सवालों का जवाब देने की बजाय मौके पर पुलिस को बुलाया गया। पुलिस ने पहुंचकर ग्रामीणों और पंचायत प्रतिनिधियों की बात सुनी तथा स्थिति को समझने के बाद मामले को शांतिपूर्ण तरीके से संभाला। ग्रामीणों ने पुलिस के संयमपूर्ण रवैये के लिए धन्यवाद दिया। ग्रामीणों का कहना है कि पंचायत सभा में सवाल पूछना उनका अधिकार है और पंचायत के कामकाज में पारदर्शिता जरूरी है। ग्रामीणों ने पंचायत में किसी भी प्रकार की अनियमितता या भ्रष्टाचार की शिकायत होने पर जांच की मांग करने की बात कही। उनका कहना है कि यदि सरपंच की ओर से उनके सवालों का संतोषजनक जवाब नहीं मिलता है, तो वे संबंधित अधिकारियों को ज्ञापन सौंपकर जांच एवं आवश्यक कार्रवाई की मांग करेंगे। ग्रामीणों ने यह भी कहा कि आवश्यकता पड़ने पर वे लोकतांत्रिक तरीके से विरोध प्रदर्शन करेंगे।1
- नाग पंचमी पर चौरसिया समाज की भव्य शोभायात्रा, जगह-जगह हुआ स्वागत मैहर। नाग पंचमी एवं चौरसिया दिवस के अवसर पर चौरसिया समाज मैहर के तत्वावधान में रविवार को भव्य शोभायात्रा निकाली गई। ढोल-नगाड़ों, डीजे और धार्मिक भजनों की गूंज के बीच निकली शोभायात्रा ने नगर में भक्तिमय माहौल बना दिया। यात्रा का विभिन्न स्थानों पर लोगों ने पुष्पवर्षा कर स्वागत किया। शोभायात्रा में समाज के बुजुर्ग, महिलाएं, युवा और बच्चे बड़ी संख्या में शामिल हुए। पीले साफे और पट्टे पहने समाजजन आकर्षण का केंद्र रहे। सुसज्जित रथ और धार्मिक झांकियों के साथ निकली यात्रा में श्रद्धालु उत्साहपूर्वक शामिल हुए। शोभायात्रा के अलाउद्दीन तिराहे पहुंचने पर ‘माई की रसोई’ के संचालक सौरज पांडे द्वारा समाजजनों और श्रद्धालुओं का आत्मीय स्वागत किया गया। इस दौरान समाज के प्रमुख लोगों का सम्मान भी किया गया। राम मंदिर में महाआरती के साथ समापन नगर के प्रमुख मार्गों से भ्रमण करते हुए शोभायात्रा राम मंदिर पहुंची, जहां भगवान नागदेव एवं महर्षि चौरसिया जी की महाआरती की गई। इसके बाद श्रद्धालुओं को प्रसाद वितरित किया गया। समाज के प्रतिनिधियों ने कहा कि ऐसे आयोजन सामाजिक एकता, सांस्कृतिक सद्भाव और धार्मिक चेतना को मजबूत करते हैं।1
- सतना की होटल में ओडिशा के युवक का मिला शव: फर्श पर मिले खून के निशान, शराब की 11 खाली बोतलें और सिगरेट के पैकेट बरामद सतना। जिले के कोलगवां थाना क्षेत्र अंतर्गत टिकुरिया टोला स्थित 'चंद्रव्यू होटल' के कमरा नंबर 105 से सोमवार शाम एक युवक का संदिग्ध परिस्थितियों में शव मिलने से इलाके में सनसनी फैल गई। मृतक की पहचान गंजम (ओडिशा) निवासी 30 वर्षीय बच्चल लोकनाथ के रूप में हुई है। कमरे के फर्श पर खून के निशान मिले हैं और मृतक की नाक से भी खून बहता पाया गया। सूचना मिलने पर मौके पर पहुंची पुलिस और फॉरेंसिक टीम ने घटनास्थल की सघन जांच शुरू कर दी है। फॉरेंसिक टीम के शुरुआती आकलन के मुताबिक, शव करीब दो दिन पुराना प्रतीत हो रहा है। 3 साल से कंपनी के काम से आता-जाता था सतना पुलिस जांच में सामने आया है कि बच्चल लोकनाथ एक कंपनी के सिलसिले में पिछले डेढ़-दो वर्षों से लगातार सतना आता-जाता रहता था और इसी होटल में ठहरता था। इस बार वह 29 जुलाई को होटल चंद्रव्यू में आकर रुका था। 14 अगस्त के बाद नहीं दिखा, कमरे से आती थी दिन में एक बार ऑर्डर की कॉल होटल स्टाफ के अनुसार, 14 अगस्त के बाद से बच्चल लोकनाथ को कमरे से बाहर निकलते नहीं देखा गया था। वह आमतौर पर दिन में केवल एक बार खाना कमरे में मंगवाता था और शाम के समय शराब व सिगरेट ऑर्डर करता था। सोमवार शाम जब काफी देर तक कमरे से कोई हलचल नहीं हुई, तो होटल मैनेजर ने मास्टर की से कमरा खुलवाया। अंदर फर्श पर बच्चल का शव पड़ा देख तुरंत पुलिस को सूचना दी गई। 15 अगस्त को परिजनों से हुई थी आखिरी बातचीत पुलिस ने जब मृतक के परिजनों से संपर्क किया, तो जानकारी मिली कि 15 अगस्त की शाम बच्चल की परिजनों से फोन पर आखिरी बार बात हुई थी। जांच के दायरे में मिली सामग्री: शराब की 11 खाली बोतलें सिगरेट के पैकेट और भुट्टा (कॉर्न) फर्श और नाक पर खून के साक्ष्य पुलिस का बयान कोलगवां थाना पुलिस का कहना है कि मौत के स्पष्ट कारणों का खुलासा पोस्टमार्टम रिपोर्ट आने के बाद ही हो सकेगा। परिजनों के ओडिशा से सतना पहुंचने के बाद शव का पोस्टमार्टम कराया जाएगा। पुलिस फिलहाल होटल स्टाफ से पूछताछ कर रही है और कमरे से जुटाए गए साक्ष्यों के आधार पर सभी पहलुओं की जांच में जुटी है। रिपोर्ट: राहुल सोनी, रिपोर्टर - मध्य भारत न्यूज़1