नई दिल्ली के राजनीतिक गलियारों में इन दिनों एक बड़ी चर्चा तेजी से फैल रही है कि तृणमूल कांग्रेस (TMC) और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (शरद पवार गुट) का कांग्रेस में विलय हो सकता है। सूत्रों के हवाले से किए जा रहे दावों के अनुसार, यदि यह विलय होता है तो लोकसभा में कांग्रेस सांसदों की संख्या 99 से बढ़कर लगभग 136 तक पहुंच सकती है। हालांकि, इस संबंध में अभी तक कांग्रेस, टीएमसी या एनसीपी (एसपी) की ओर से कोई आधिकारिक घोषणा नहीं की गई है, और इन दावों को फिलहाल राजनीतिक अटकलों और चर्चाओं के रूप में ही देखा जा रहा है। इसी बीच, राजस्थान के पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत का एक बयान भी चर्चा में है। गहलोत ने कहा है कि संविधान और लोकतंत्र की रक्षा के लिए कभी कांग्रेस से अलग होकर बने क्षेत्रीय दलों को अब "घर वापसी" कर कांग्रेस के साथ आना चाहिए और राहुल गांधी के नेतृत्व में एकजुट होकर आगे बढ़ना चाहिए। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव से पहले टीएमसी के भीतर संभावित असंतोष और विपक्षी एकता की रणनीति को देखते हुए इस तरह की चर्चाओं को बल मिल रहा है। फिर भी, सवाल अभी भी बरकरार है कि क्या टीएमसी और एनसीपी (एसपी) वास्तव में कांग्रेस में शामिल होने जा रही हैं, या फिर यह केवल राजनीतिक अफवाह है। इसका जवाब आने वाले दिनों में ही स्पष्ट हो पाएगा। यह समाचार विभिन्न सूत्रों और राजनीतिक चर्चाओं पर आधारित है, और संबंधित दलों की ओर से अभी तक कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं की गई है।
नई दिल्ली के राजनीतिक गलियारों में इन दिनों एक बड़ी चर्चा तेजी से फैल रही है कि तृणमूल कांग्रेस (TMC) और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (शरद पवार गुट) का कांग्रेस में विलय हो सकता है। सूत्रों के हवाले से किए जा रहे दावों के अनुसार, यदि यह विलय होता है तो लोकसभा में कांग्रेस सांसदों की संख्या 99 से बढ़कर लगभग 136 तक पहुंच सकती है। हालांकि, इस संबंध में अभी तक कांग्रेस, टीएमसी या एनसीपी (एसपी) की ओर से कोई आधिकारिक घोषणा नहीं की गई है, और इन दावों को फिलहाल राजनीतिक अटकलों और चर्चाओं के रूप में ही देखा जा रहा है। इसी बीच, राजस्थान के पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत का एक बयान भी चर्चा में है। गहलोत ने कहा है कि संविधान और लोकतंत्र की रक्षा के लिए कभी कांग्रेस से अलग होकर बने क्षेत्रीय दलों को अब "घर वापसी" कर कांग्रेस के साथ आना चाहिए और राहुल गांधी के नेतृत्व में एकजुट होकर आगे बढ़ना चाहिए। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव से पहले टीएमसी के भीतर संभावित असंतोष और विपक्षी एकता की रणनीति को देखते हुए इस तरह की चर्चाओं को बल मिल रहा है। फिर भी, सवाल अभी भी बरकरार है कि क्या टीएमसी और एनसीपी (एसपी) वास्तव में कांग्रेस में शामिल होने जा रही हैं, या फिर यह केवल राजनीतिक अफवाह है। इसका जवाब आने वाले दिनों में ही स्पष्ट हो पाएगा। यह समाचार विभिन्न सूत्रों और राजनीतिक चर्चाओं पर आधारित है, और संबंधित दलों की ओर से अभी तक कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं की गई है।
- अंबिकापुर शहर में पेट्रोल और डीजल की उपलब्धता को लेकर गंभीर संकट के संकेत दिखाई देने लगे हैं, जिससे वाहन चालकों की परेशानी काफी बढ़ गई है। कई पेट्रोल पंपों पर ईंधन की कमी की स्थिति है, वहीं कुछ पंप संचालकों ने बिक्री पर सीमा निर्धारित कर दी है। इसके चलते बाइक चालकों को 200 रुपए से अधिक का पेट्रोल नहीं दिया जा रहा है, जबकि चारपहिया वाहनों के लिए 400 रुपए तक ईंधन देने की सीमा तय की गई है। स्थिति इतनी बिगड़ गई है कि कई पेट्रोल पंपों पर "पेट्रोल नहीं है" के बोर्ड टांगे गए हैं, और वाहन चालक अपनी आवश्यकतानुसार ईंधन नहीं भरवा पा रहे हैं, जिसके कारण उन्हें एक पंप से दूसरे पंप तक भटकना पड़ रहा है। इस बीच, भारत सरकार के पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्रालय ने 11 जून 2026 को ईंधन वितरण संबंधी महत्वपूर्ण निर्देश जारी किए हैं। इन आदेशों के तहत औद्योगिक, वाणिज्यिक और संस्थागत उपभोक्ताओं को खुदरा पेट्रोल पंपों से पेट्रोल या डीजल खरीदने अथवा मंगाने पर प्रतिबंध लगाया जा सकता है। ऐसे उपभोक्ताओं को अपनी जरूरतें अधिकृत उपभोक्ता पंपों के माध्यम से ही पूरी करनी होंगी। मंत्रालय ने एक ग्राहक या वाहन को एक दिन में अधिकतम 200 लीटर डीजल की बिक्री की सीमा भी तय की है, साथ ही खरीदे गए डीजल के पुनर्विक्रय पर भी रोक लगाई गई है। तेल विपणन कंपनियों और पेट्रोल पंप डीलरों को इन निर्देशों का कड़ाई से पालन सुनिश्चित करने को कहा गया है, जबकि अंबिकापुर में कई पेट्रोल पंप अभी भी 'ड्राई' की स्थिति में हैं। केंद्र सरकार ने राज्य सरकारों को भी निर्देश दिया है कि जमाखोरी, कालाबाजारी, अनधिकृत भंडारण और ईंधन वितरण में होने वाली अन्य अनियमितताओं के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाए। इसके लिए संबंधित विभागों को निगरानी बढ़ाने के निर्देश दिए गए हैं। शहर में ईंधन की सीमित बिक्री और बढ़ती मांग के कारण वाहन चालकों में चिंता का माहौल है। हालांकि, प्रशासन और तेल कंपनियों द्वारा स्थिति सामान्य बनाए रखने के प्रयास जारी हैं, लेकिन राहत तभी मिलने की उम्मीद है जब आने वाले दिनों में आपूर्ति की स्थिति स्पष्ट हो जाएगी।1
- कोरबा जिले में एक ग्रामीण के घर में एक विशालकाय किंग कोबरा घुस गया है। इस घटना की सूचना मिलते ही, कोरबा वन विभाग की टीम सांप को रेस्क्यू करने के लिए तुरंत मौके पर पहुंची।1
- एक युवक की जेल में हुई मौत के बाद उसके परिजनों ने जमकर हंगामा किया है। परिजनों द्वारा इस घटना पर आक्रोश व्यक्त करते हुए यह जानने की मांग की जा रही है कि आखिर उनकी मौत किस तरह हुई।1
- रायगढ़ जिला जेल में अवैध शराब बिक्री के एक मामले में बंद 28 वर्षीय संजय बघेल नामक विचाराधीन कैदी की संदिग्ध परिस्थितियों में मौत हो गई है। बताया गया है कि तबीयत बिगड़ने पर संजय को मेडिकल कॉलेज अस्पताल ले जाया गया था, जहाँ इलाज के दौरान उनकी मृत्यु हो गई। इस घटना के बाद मृतक कैदी के परिजनों ने जेल में मारपीट का गंभीर आरोप लगाया है और इस पूरे मामले की निष्पक्ष जांच की मांग की है। वहीं, जेल प्रशासन और पुलिस ने परिजनों द्वारा लगाए गए इन आरोपों से इनकार किया है। अधिकारियों के मुताबिक, संजय बघेल की मौत के वास्तविक कारणों का खुलासा पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट आने और आगे की जांच पूरी होने के बाद ही हो सकेगा।1
- सरगुजा जिले के रामगढ़ में शनिवार को केते एक्सटेंशन खदान सहित अन्य नई खनन परियोजनाओं को स्वीकृति दिए जाने के विरोध में एक विशाल परिचर्चा कार्यक्रम आयोजित किया गया। इस कार्यक्रम में हजारों ग्रामीणों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और जनप्रतिनिधियों ने भाग लिया। इसी अवसर पर कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष दीपक बैज ने प्रदेशभर में खनन परियोजनाओं के खिलाफ आंदोलन शुरू करने का शंखनाद किया। दीपक बैज ने आरोप लगाया कि राज्य सरकार बड़े उद्योगपतियों के हित में कार्य कर रही है, जिसके चलते खनन परियोजनाओं के माध्यम से जल, जंगल और जमीन को नुकसान पहुंचाया जा रहा है। उन्होंने कहा कि आदिवासी क्षेत्रों में खदानों के लगातार विस्तार से स्थानीय लोगों के अधिकार और उनकी आजीविका प्रभावित हो रही है। पूर्व उपमुख्यमंत्री टी.एस. सिंहदेव ने भी छत्तीसगढ़ में प्राकृतिक संसाधनों के दोहन की तेज होती प्रक्रिया पर चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि रामगढ़ क्षेत्र में प्रस्तावित खनन परियोजनाएं इस क्षेत्र के अस्तित्व, पर्यावरण और सामाजिक ताने-बाने पर गंभीर प्रभाव डाल सकती हैं। हसदेव बचाओ मंच के आलोक शुक्ला ने दावा किया कि केते एक्सटेंशन परियोजना के कारण लगभग 5000 एकड़ क्षेत्र में 7 लाख पेड़ों की कटाई हो सकती है, और भविष्य में अन्य कोल ब्लॉकों में भी बड़े पैमाने पर वन क्षेत्र प्रभावित होने की आशंका है। कार्यक्रम में युवा कांग्रेस के राष्ट्रीय प्रभारी मनीष शर्मा, सर्व आदिवासी समाज के प्रतिनिधि, रामगढ़ संरक्षण एवं संवर्धन समिति के सदस्य तथा विभिन्न सामाजिक संगठनों के पदाधिकारी भी उपस्थित रहे। वक्ताओं ने लोकतांत्रिक तरीके से अपना संघर्ष जारी रखने और जल, जंगल, जमीन व प्राकृतिक संसाधनों की रक्षा के लिए एकजुट रहने का आह्वान किया। इस परिचर्चा में उदयपुर, लखनपुर, अंबिकापुर, सीतापुर, बतौली, मैनपाट, प्रेमनगर, श्रीनगर, सूरजपुर सहित कई क्षेत्रों से बड़ी संख्या में ग्रामीण शामिल हुए।3
- कोरबा जिले में हसदेव दर्री बैराज के पास हसदेव नदी जलकुंभी से पूरी तरह घिर गई है, जिससे नदी का दम घुट रहा है। सामने आई चौंकाने वाली तस्वीरों में नदी किसी मैदान जैसी दिखाई दे रही है, जिससे उसके जलीय जीवन पर गंभीर खतरा मंडरा रहा है। यह स्थिति नदी के पारिस्थितिकी तंत्र के लिए एक बड़ी चुनौती बन गई है।1
- छत्तीसगढ़ के रायगढ़ में कांग्रेस नेताओं और कार्यकर्ताओं ने सरकार के खिलाफ एक बड़ा विरोध प्रदर्शन किया। कांग्रेस नेताओं के नेतृत्व में बड़ी संख्या में प्रदर्शनकारियों ने 'विशाल किसान रैली एवं कलेक्ट्रेट घेराव' का आयोजन किया। कलेक्ट्रेट कार्यालय के मुख्य गेट पर जमा हुए कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने हाथों में पार्टी के झंडे और बैनर-पोस्टर थामे सरकार विरोधी नारे लगाए, साथ ही "जय जवान, जय किसान" और "अत्याचार नहीं सहेंगे" के नारे बुलंद किए। इस घेराव को देखते हुए कलेक्ट्रेट परिसर और मुख्य द्वार पर भारी संख्या में पुलिस बल तैनात किया गया था। पुलिस ने मुस्तैदी दिखाते हुए बैरिकेड्स लगाकर प्रदर्शनकारियों को परिसर के अंदर जाने से रोका, जहाँ वरिष्ठ पुलिस अधिकारी खुद मौके पर सुरक्षा व्यवस्था बनाए रखने के लिए मौजूद थे। प्रदर्शन के दौरान, कांग्रेस के स्थानीय नेताओं ने मीडियाकर्मियों को संबोधित करते हुए किसानों की समस्याओं और अपनी अन्य माँगों को रखा। प्रदर्शन के अंत में, प्रशासनिक अधिकारियों को एक ज्ञापन भी सौंपा गया, जिसमें जनहित और किसानों की समस्याओं का जल्द से जल्द निराकरण करने की माँग की गई है।2
- छत्तीसगढ़ की राजनीति में मुख्यमंत्री विष्णु देव साय एक नए विवाद के केंद्र में आ गए हैं। विपक्ष ने उन पर सीधा आरोप लगाया है कि उनकी नीतियाँ आदिवासियों के संरक्षण के बजाय रसूखदार उद्योगपतियों के फायदे के लिए काम कर रही हैं। कोंडागांव के मालगांव से सामने आई तस्वीरों ने इस 'नेता-उद्योगपति' गठजोड़ के दावों को बल दिया है, जिसके चलते पूरे बस्तर संभाग में तनाव का माहौल व्याप्त है। स्थानीय सूत्रों और सोशल मीडिया पर सार्वजनिक जानकारियों के अनुसार, मालगांव में पीढ़ियों से रह रहे आदिवासियों को बेदखल करने के पीछे कोई जन-कल्याण की योजना नहीं, बल्कि बड़े कॉरपोरेट घरानों और उद्योगपतियों के व्यावसायिक हित छिपे हैं। आरोप है कि मुख्यमंत्री विष्णु देव साय के इशारे पर प्रशासनिक अमला आदिवासियों के जल, जंगल और जमीन छीनकर पूंजीपतियों और उद्योगपतियों को सौंपने की साजिश रच रहा है। इतने बड़े पैमाने पर विस्थापन और आदिवासी समाज पर बढ़ते अत्याचारों के बावजूद मुख्यमंत्री साय की चुप्पी पर सवाल उठाए जा रहे हैं, जो दर्शाता है कि सरकार आम जनता के बजाय उद्योगपतियों के हितों को प्राथमिकता दे रही है। विपक्ष का सीधा हमला है कि भाजपा जिस शासन को 'सुशासन' कह रही है, वह असल में 'आदिवासियों को उजाड़ो और पसंदीदा उद्योगपतियों को बसाओ' की नीति पर आधारित है। मालगांव की महिलाओं और बुजुर्गों की रोती-बिलखती तस्वीरें स्पष्ट करती हैं कि उद्योगपतियों के मुनाफे के लिए आदिवासियों के अस्तित्व और सम्मान को दांव पर लगा दिया गया है। आदिवासी नेताओं का कहना है कि बस्तर की जनता ने अपनी जमीन कभी किसी उद्योगपति की तिजोरी भरने के लिए नहीं छोड़ी है। विपक्ष ने मुख्यमंत्री विष्णु देव साय से सीधा अल्टीमेटम दिया है कि वे जवाब दें कि बस्तर की इस पावन भूमि को उद्योगपतियों के हाथों क्यों बेचा जा रहा है और आदिवासियों को बेघर कर किसके बैंक खाते भरे जा रहे हैं। यह मामला अब सिर्फ एक क्षेत्र तक सीमित नहीं रह गया है। मुख्यमंत्री विष्णु देव साय और उनके चहेते उद्योगपतियों के खिलाफ यह आक्रोश आने वाले दिनों में एक बड़े जनांदोलन का रूप ले सकता है, जो साय सरकार की नींव हिलाने की क्षमता रखता है।1