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सियासी चुटकी: कांवड़, नौकरी और 'बंटाधार' कांवड़, नौकरी और 'बंटाधार' की सियासत! दिग्गी राजा का तंज- "सरकार नौकरी दे देगी तो कांवड़ यात्रा में कौन जाएगा?" तंज तो कड़क है, पर उनके 10 साल के 'बंटाधार' राज में कौन सी रोजगार क्रांति आई थी? इधर सरकार भी खुश है कि जब तक युवा कांवड़ में मगन है, रोजगार की फाइलें बंद रहेंगी!

49 min ago
user_KHABAR WITH KK
KHABAR WITH KK
Local News Reporter सिलवानी, रायसेन, मध्य प्रदेश•
49 min ago

सियासी चुटकी: कांवड़, नौकरी और 'बंटाधार' कांवड़, नौकरी और 'बंटाधार' की सियासत! दिग्गी राजा का तंज- "सरकार नौकरी दे देगी तो कांवड़ यात्रा में कौन जाएगा?" तंज तो कड़क है, पर उनके 10 साल के 'बंटाधार' राज में कौन सी रोजगार क्रांति आई थी? इधर सरकार भी खुश है कि जब तक युवा कांवड़ में मगन है, रोजगार की फाइलें बंद रहेंगी!

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    सियासी चुटकी: कांवड़, नौकरी और 'बंटाधार' 
कांवड़, नौकरी और 'बंटाधार' की सियासत!
दिग्गी राजा का तंज- "सरकार नौकरी दे देगी तो कांवड़ यात्रा में कौन जाएगा?" तंज तो कड़क है, पर उनके 10 साल के 'बंटाधार' राज में कौन सी रोजगार क्रांति आई थी? इधर सरकार भी खुश है कि जब तक युवा कांवड़ में मगन है, रोजगार की फाइलें बंद रहेंगी!
    user_KHABAR WITH KK
    KHABAR WITH KK
    Local News Reporter सिलवानी, रायसेन, मध्य प्रदेश•
    49 min ago
  • देवरी का बाजार तहसील देवरी जिला ‌रायसेन M.P. आप सभी आपको
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    देवरी का बाजार तहसील देवरी जिला ‌रायसेन  M.P. आप सभी आपको
    user_Jairam nam Jairam noriya
    Jairam nam Jairam noriya
    Building society देवरी, रायसेन, मध्य प्रदेश•
    8 hrs ago
  • गाड़ी विभाग में लगी है तो हिसाब भी विभाग का होगा! प्राइवेट बोलेरो पर ‘मध्य प्रदेश शासन’, रात में ड्राइवर के हाथों दौड़ती गाड़ी ने खोली जल संसाधन विभाग की वाहन व्यवस्था की पोल! रितिक जैन पत्रकार बाड़ी, रायसेन। जल संसाधन विभाग बाड़ी की वाहन व्यवस्था को लेकर अब सवाल और भी गंभीर हो गए हैं। मामला बोलेरो वाहन क्रमांक MP 04 TB 2393 का है। वाहन निजी स्वामित्व का है, लेकिन वह सरकारी अनुबंध के तहत जल संसाधन/सिंचाई विभाग में लगाया गया है। वाहन पर बड़े अक्षरों में “मध्य प्रदेश शासन” लिखा हुआ है और 27 अगस्त की शाम करीब 7:30 बजे बाड़ी बस स्टैंड के आसपास इसे ड्राइवर द्वारा चलाते हुए देखा गया। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि उस समय एसडीओ वाहन में मौजूद नहीं थीं। यानी सरकारी अनुबंध पर विभाग में लगा निजी वाहन अधिकारी की गैरमौजूदगी में ड्राइवर के हाथों सड़कों पर दौड़ रहा था। अब सवाल केवल इतना नहीं कि गाड़ी कहां गई। सवाल यह है कि सरकारी अनुबंध पर लगी निजी गाड़ी का उपयोग किस आदेश, किस काम और किस रिकॉर्ड के आधार पर किया जा रहा है? --- सरकारी अनुबंध है तो नियम और रिकॉर्ड भी होंगे यह बात स्पष्ट है कि निजी वाहन को सरकारी विभाग में अनुबंध के आधार पर लगाया जा सकता है। लेकिन जैसे ही कोई निजी वाहन सरकारी अनुबंध का हिस्सा बनता है, उसके उपयोग, चालक, ड्यूटी, भुगतान और निर्धारित शासकीय कार्य से जुड़े रिकॉर्ड महत्वपूर्ण हो जाते हैं। ऐसे में MP 04 TB 2393 को लेकर विभाग को यह बताना होगा कि वाहन किस आदेश के तहत लगाया गया है, उसकी अनुबंध अवधि क्या है और वाहन के उपयोग की निर्धारित शर्तें क्या हैं। यदि विभाग वाहन का किराया सरकारी मद से चुका रहा है, तो फिर सरकारी पैसे से चलने वाली गाड़ी के हर किलोमीटर का हिसाब भी विभागीय रिकॉर्ड में होना चाहिए। --- रात साढ़े सात बजे बस स्टैंड पर गाड़ी—अधिकारी कहां थीं? 27 अगस्त की शाम करीब 7:30 बजे बाड़ी बस स्टैंड के आसपास वाहन की मौजूदगी ने मामले को नया मोड़ दे दिया। वाहन में एसडीओ मौजूद नहीं थीं। स्टीयरिंग ड्राइवर के हाथ में थी। अब सीधा सवाल है—अगर वाहन एसडीओ के उपयोग के लिए विभाग में अनुबंधित है, तो अधिकारी की गैरमौजूदगी में ड्राइवर वाहन लेकर किस काम से निकला था? क्या वह विभागीय ड्यूटी पर था? अगर हां, तो उस ड्यूटी का आदेश कहां है? क्या लॉगबुक में उस समय की यात्रा दर्ज है? कहां से कहां तक वाहन गया? किस अधिकारी के निर्देश पर गया? और उस यात्रा का शासकीय उद्देश्य क्या था? --- ड्राइवर का जवाब बना सबसे बड़ा सवाल जब वाहन के ड्राइवर से इस संबंध में सवाल किया गया तो उसका जवाब था— “वो तो हट गई है, ये भी निकालना है।” यहीं से मामले में सबसे बड़ा सवाल पैदा होता है। अगर ड्राइवर का इशारा विभागीय अटैचमेंट या वाहन की स्थिति की ओर था, तो आखिर “हट गई” का मतलब क्या है? क्या वाहन विभागीय अनुबंध से हट चुका है? अगर नहीं हटा है तो ऐसी बात क्यों कही गई? और अगर हट चुका है तो फिर सरकारी अनुबंध के तहत लगी गाड़ी की स्थिति क्या है? सबसे बड़ा सवाल— अगर गाड़ी हट गई तो ‘मध्य प्रदेश शासन’ क्यों नहीं हटा? --- सरकारी पहचान लगी है तो जवाबदेही भी तय होगी वाहन निजी है, लेकिन उस पर “मध्य प्रदेश शासन” लिखा हुआ है। सरकारी अनुबंध के तहत वाहन का उपयोग हो रहा है तो विभाग को यह स्पष्ट करना चाहिए कि वाहन पर यह पहचान किस प्रावधान/अनुमति के तहत प्रदर्शित की जा रही है और अनुबंध समाप्त होने की स्थिति में इसे हटाने की जिम्मेदारी किसकी है। क्योंकि सड़क पर चलने वाला ऐसा वाहन आम नागरिक को सरकारी वाहन जैसा दिखाई देता है। इसलिए यह सिर्फ लिखावट का मामला नहीं है। यह सरकारी पहचान, विभागीय नियंत्रण और वाहन के अधिकृत उपयोग का सवाल है। --- अवैध गतिविधियों की आशंका पर भी जांच क्यों जरूरी? इस मामले में अभी किसी अवैध गतिविधि का प्रत्यक्ष प्रमाण सामने नहीं आया है। इसलिए किसी व्यक्ति या वाहन पर अवैध काम का सीधा आरोप लगाना उचित नहीं होगा। लेकिन सवाल यह जरूर है कि सरकारी पहचान वाले अनुबंधित वाहन का उपयोग निर्धारित शासकीय कार्यों से बाहर तो नहीं हो रहा? यदि वाहन रात में अधिकारी की गैरमौजूदगी में घूम रहा है, तो विभागीय रिकॉर्ड से यह जांचना जरूरी है कि वह किस काम पर था। क्योंकि यदि वाहन सरकारी अनुबंध पर है और उसके किराये का भुगतान सरकारी धन से होता है, तो उसके उपयोग का उद्देश्य भी शासकीय कार्य से संबंधित और रिकॉर्ड में दर्ज होना चाहिए। --- ईई के जवाब से भी नहीं थमा मामला जब इस मामले को लेकर जल संसाधन विभाग बाड़ी के कार्यपालन यंत्री (ईई) से बातचीत कर जानकारी मांगी गई तो उन्होंने कहा कि वे कार्यालय से जानकारी लेकर बताएंगे। अब यही जवाब कई सवाल छोड़ गया है। अगर वाहन विभाग के अनुबंध में है तो उसकी जानकारी विभागीय रिकॉर्ड में होनी चाहिए। अनुबंध है तो उसकी प्रति सामने आए। ड्यूटी है तो आदेश सामने आए। यात्रा है तो लॉगबुक सामने आए। भुगतान है तो बिल सामने आए। मामला जितना सीधा है, जवाब भी उतना ही सीधा होना चाहिए। --- सरकारी खजाने से भुगतान, तो हर किलोमीटर का हिसाब अब सबसे महत्वपूर्ण सवाल सरकारी भुगतान का है। यदि MP 04 TB 2393 को जल संसाधन विभाग में अनुबंध के तहत लगाया गया है और उसके बदले सरकारी खजाने से प्रतिमाह भुगतान किया जा रहा है, तो विभाग को यह स्पष्ट करना होगा कि— वाहन का मासिक किराया कितना है? भुगतान किस मद से होता है? भुगतान किस अवधि से किया जा रहा है? वाहन की ड्यूटी किस अधिकारी के लिए निर्धारित है? प्रतिदिन कितने किलोमीटर चलने की अनुमति है? ईंधन का खर्च किसके जिम्मे है? लॉगबुक कौन प्रमाणित करता है? महीने के बिल का सत्यापन कौन करता है? वाहन के उपयोग की निगरानी कौन करता है? इन सवालों के जवाब आने के बाद ही पता चलेगा कि वाहन व्यवस्था वास्तव में कितनी पारदर्शी है। --- अब जांच सिर्फ गाड़ी की नहीं, पूरे रिकॉर्ड की होनी चाहिए मामले में केवल सड़क पर वाहन देखने से निष्कर्ष निकालना पर्याप्त नहीं होगा। वास्तविक जांच के लिए विभागीय दस्तावेज खंगालने होंगे। जांच के दायरे में होना चाहिए— 1. अनुबंध MP 04 TB 2393 किस निविदा/अनुबंध के तहत विभाग में लगा है? 2. अनुबंध अवधि वाहन की अनुबंध अवधि कब शुरू हुई और कब समाप्त होगी? 3. अधिकृत उपयोग वाहन किस अधिकारी अथवा कार्यालय के उपयोग के लिए निर्धारित है? 4. लॉगबुक 27 अगस्त की पूरी लॉगबुक और वाहन मूवमेंट रिकॉर्ड की जांच हो। 5. ड्राइवर ड्राइवर की नियुक्ति, अधिकृत ड्यूटी और उसे वाहन चलाने के निर्देश की जानकारी सामने आए। 6. भुगतान अब तक वाहन मालिक को सरकारी खजाने से कितना भुगतान किया गया? 7. वाहन की पहचान निजी वाहन पर “मध्य प्रदेश शासन” लिखने की अनुमति किस आधार पर है? 8. रात की ड्यूटी 27 अगस्त को शाम 7:30 बजे वाहन किस शासकीय कार्य पर था? 9. अधिकारी की मौजूदगी उस समय अधिकारी वाहन में क्यों मौजूद नहीं थीं और ड्राइवर किस निर्देश पर वाहन चला रहा था? 10. अनुबंध की शर्तें क्या वाहन का उपयोग केवल निर्धारित शासकीय कार्य के लिए किया जा सकता है और क्या उसके बाहर उपयोग की कोई अनुमति है? --- आरटीओ और विभागीय अधिकारियों के लिए भी सवाल मामला सामने आने के बाद परिवहन विभाग के स्तर पर भी वाहन के दस्तावेज और उसकी श्रेणी की स्थिति स्पष्ट की जा सकती है। वहीं जल संसाधन विभाग के वरिष्ठ अधिकारियों को यह देखना चाहिए कि अनुबंधित वाहन वास्तव में निर्धारित शर्तों के अनुसार ही संचालित हो रहा है या नहीं। अगर सब कुछ नियमों के तहत है तो विभाग के पास जवाब देने के लिए पर्याप्त दस्तावेज होने चाहिए। लेकिन यदि रिकॉर्ड और मौके की स्थिति में अंतर निकलता है तो फिर जिम्मेदारी भी तय होनी चाहिए। --- “सरकारी” लिख देने से कोई वाहन सरकारी नहीं हो जाता—लेकिन सवाल जरूर पैदा होते हैं यहां एक महत्वपूर्ण बात भी साफ होना जरूरी है। किसी निजी वाहन का सरकारी विभाग के साथ अनुबंधित होना उसे स्वामित्व की दृष्टि से सरकारी वाहन नहीं बना देता। इसलिए “प्राइवेट नंबर” और “सरकारी अनुबंध” दोनों एक साथ होना संभव है। लेकिन जब उसी वाहन पर “मध्य प्रदेश शासन” लिखा हो, तब उसकी अनुमति और उपयोग की स्थिति स्पष्ट करना जरूरी हो जाता है। यही इस खबर का मूल सवाल है। --- अब जवाबदेही तय करने का समय मामला किसी व्यक्ति विशेष को दोषी ठहराने का नहीं है। मामला है सरकारी अनुबंध पर चल रहे वाहन के उपयोग और सरकारी पहचान की पारदर्शिता का। वीडियो में वाहन दिखाई देता है। समय करीब 7:30 बजे शाम का है। वाहन ड्राइवर चला रहा है। एसडीओ वाहन में मौजूद नहीं थीं। ड्राइवर से पूछताछ हुई। उसका जवाब सामने आया— “वो तो हट गई है, ये भी निकालना है।” और विभाग के ईई ने कार्यालय से जानकारी लेकर जवाब देने की बात कही। अब इससे आगे की कहानी दस्तावेज बताएंगे। --- सबसे बड़ा सवाल फिर वही— “अगर गाड़ी विभाग से हट गई है तो ‘मध्य प्रदेश शासन’ क्यों नहीं हटा?” और अगर गाड़ी अभी भी सरकारी अनुबंध पर विभाग में लगी है तो— “27 अगस्त की शाम 7:30 बजे एसडीओ की गैरमौजूदगी में ड्राइवर उसे किस शासकीय काम से चला रहा था?” अब नजर जल संसाधन विभाग के आधिकारिक जवाब, अनुबंध की शर्तों, वाहन की लॉगबुक और भुगतान रिकॉर्ड पर है। क्योंकि सरकारी अनुबंध पर लगी प्राइवेट बोलेरो हो सकती है, लेकिन सरकारी पैसे और सरकारी पहचान से जुड़े वाहन का हिसाब भी उतना ही साफ होना चाहिए। बाड़ी में उठे ये सवाल अब केवल एक बोलेरो तक सीमित नहीं हैं—ये सवाल जल संसाधन विभाग की पूरी वाहन व्यवस्था की पारदर्शिता और निगरानी पर हैं।
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    गाड़ी विभाग में लगी है तो हिसाब भी विभाग का होगा!

प्राइवेट बोलेरो पर ‘मध्य प्रदेश शासन’, रात में ड्राइवर के हाथों दौड़ती गाड़ी ने खोली जल संसाधन विभाग की वाहन व्यवस्था की पोल!
रितिक जैन पत्रकार 
बाड़ी, रायसेन। जल संसाधन विभाग बाड़ी की वाहन व्यवस्था को लेकर अब सवाल और भी गंभीर हो गए हैं। मामला बोलेरो वाहन क्रमांक MP 04 TB 2393 का है। वाहन निजी स्वामित्व का है, लेकिन वह सरकारी अनुबंध के तहत जल संसाधन/सिंचाई विभाग में लगाया गया है। वाहन पर बड़े अक्षरों में “मध्य प्रदेश शासन” लिखा हुआ है और 27 अगस्त की शाम करीब 7:30 बजे बाड़ी बस स्टैंड के आसपास इसे ड्राइवर द्वारा चलाते हुए देखा गया।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि उस समय एसडीओ वाहन में मौजूद नहीं थीं। यानी सरकारी अनुबंध पर विभाग में लगा निजी वाहन अधिकारी की गैरमौजूदगी में ड्राइवर के हाथों सड़कों पर दौड़ रहा था।
अब सवाल केवल इतना नहीं कि गाड़ी कहां गई। सवाल यह है कि सरकारी अनुबंध पर लगी निजी गाड़ी का उपयोग किस आदेश, किस काम और किस रिकॉर्ड के आधार पर किया जा रहा है?
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सरकारी अनुबंध है तो नियम और रिकॉर्ड भी होंगे
यह बात स्पष्ट है कि निजी वाहन को सरकारी विभाग में अनुबंध के आधार पर लगाया जा सकता है। लेकिन जैसे ही कोई निजी वाहन सरकारी अनुबंध का हिस्सा बनता है, उसके उपयोग, चालक, ड्यूटी, भुगतान और निर्धारित शासकीय कार्य से जुड़े रिकॉर्ड महत्वपूर्ण हो जाते हैं।
ऐसे में MP 04 TB 2393 को लेकर विभाग को यह बताना होगा कि वाहन किस आदेश के तहत लगाया गया है, उसकी अनुबंध अवधि क्या है और वाहन के उपयोग की निर्धारित शर्तें क्या हैं।
यदि विभाग वाहन का किराया सरकारी मद से चुका रहा है, तो फिर सरकारी पैसे से चलने वाली गाड़ी के हर किलोमीटर का हिसाब भी विभागीय रिकॉर्ड में होना चाहिए।
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रात साढ़े सात बजे बस स्टैंड पर गाड़ी—अधिकारी कहां थीं?
27 अगस्त की शाम करीब 7:30 बजे बाड़ी बस स्टैंड के आसपास वाहन की मौजूदगी ने मामले को नया मोड़ दे दिया।
वाहन में एसडीओ मौजूद नहीं थीं। स्टीयरिंग ड्राइवर के हाथ में थी।
अब सीधा सवाल है—अगर वाहन एसडीओ के उपयोग के लिए विभाग में अनुबंधित है, तो अधिकारी की गैरमौजूदगी में ड्राइवर वाहन लेकर किस काम से निकला था?
क्या वह विभागीय ड्यूटी पर था?
अगर हां, तो उस ड्यूटी का आदेश कहां है?
क्या लॉगबुक में उस समय की यात्रा दर्ज है?
कहां से कहां तक वाहन गया?
किस अधिकारी के निर्देश पर गया?
और उस यात्रा का शासकीय उद्देश्य क्या था?
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ड्राइवर का जवाब बना सबसे बड़ा सवाल
जब वाहन के ड्राइवर से इस संबंध में सवाल किया गया तो उसका जवाब था—
“वो तो हट गई है, ये भी निकालना है।”
यहीं से मामले में सबसे बड़ा सवाल पैदा होता है।
अगर ड्राइवर का इशारा विभागीय अटैचमेंट या वाहन की स्थिति की ओर था, तो आखिर “हट गई” का मतलब क्या है?
क्या वाहन विभागीय अनुबंध से हट चुका है?
अगर नहीं हटा है तो ऐसी बात क्यों कही गई?
और अगर हट चुका है तो फिर सरकारी अनुबंध के तहत लगी गाड़ी की स्थिति क्या है?
सबसे बड़ा सवाल—
अगर गाड़ी हट गई तो ‘मध्य प्रदेश शासन’ क्यों नहीं हटा?
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सरकारी पहचान लगी है तो जवाबदेही भी तय होगी
वाहन निजी है, लेकिन उस पर “मध्य प्रदेश शासन” लिखा हुआ है।
सरकारी अनुबंध के तहत वाहन का उपयोग हो रहा है तो विभाग को यह स्पष्ट करना चाहिए कि वाहन पर यह पहचान किस प्रावधान/अनुमति के तहत प्रदर्शित की जा रही है और अनुबंध समाप्त होने की स्थिति में इसे हटाने की जिम्मेदारी किसकी है।
क्योंकि सड़क पर चलने वाला ऐसा वाहन आम नागरिक को सरकारी वाहन जैसा दिखाई देता है।
इसलिए यह सिर्फ लिखावट का मामला नहीं है। यह सरकारी पहचान, विभागीय नियंत्रण और वाहन के अधिकृत उपयोग का सवाल है।
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अवैध गतिविधियों की आशंका पर भी जांच क्यों जरूरी?
इस मामले में अभी किसी अवैध गतिविधि का प्रत्यक्ष प्रमाण सामने नहीं आया है। इसलिए किसी व्यक्ति या वाहन पर अवैध काम का सीधा आरोप लगाना उचित नहीं होगा।
लेकिन सवाल यह जरूर है कि सरकारी पहचान वाले अनुबंधित वाहन का उपयोग निर्धारित शासकीय कार्यों से बाहर तो नहीं हो रहा?
यदि वाहन रात में अधिकारी की गैरमौजूदगी में घूम रहा है, तो विभागीय रिकॉर्ड से यह जांचना जरूरी है कि वह किस काम पर था।
क्योंकि यदि वाहन सरकारी अनुबंध पर है और उसके किराये का भुगतान सरकारी धन से होता है, तो उसके उपयोग का उद्देश्य भी शासकीय कार्य से संबंधित और रिकॉर्ड में दर्ज होना चाहिए।
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ईई के जवाब से भी नहीं थमा मामला
जब इस मामले को लेकर जल संसाधन विभाग बाड़ी के कार्यपालन यंत्री (ईई) से बातचीत कर जानकारी मांगी गई तो उन्होंने कहा कि वे कार्यालय से जानकारी लेकर बताएंगे।
अब यही जवाब कई सवाल छोड़ गया है।
अगर वाहन विभाग के अनुबंध में है तो उसकी जानकारी विभागीय रिकॉर्ड में होनी चाहिए।
अनुबंध है तो उसकी प्रति सामने आए।
ड्यूटी है तो आदेश सामने आए।
यात्रा है तो लॉगबुक सामने आए।
भुगतान है तो बिल सामने आए।
मामला जितना सीधा है, जवाब भी उतना ही सीधा होना चाहिए।
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सरकारी खजाने से भुगतान, तो हर किलोमीटर का हिसाब
अब सबसे महत्वपूर्ण सवाल सरकारी भुगतान का है।
यदि MP 04 TB 2393 को जल संसाधन विभाग में अनुबंध के तहत लगाया गया है और उसके बदले सरकारी खजाने से प्रतिमाह भुगतान किया जा रहा है, तो विभाग को यह स्पष्ट करना होगा कि—
वाहन का मासिक किराया कितना है?
भुगतान किस मद से होता है?
भुगतान किस अवधि से किया जा रहा है?
वाहन की ड्यूटी किस अधिकारी के लिए निर्धारित है?
प्रतिदिन कितने किलोमीटर चलने की अनुमति है?
ईंधन का खर्च किसके जिम्मे है?
लॉगबुक कौन प्रमाणित करता है?
महीने के बिल का सत्यापन कौन करता है?
वाहन के उपयोग की निगरानी कौन करता है?
इन सवालों के जवाब आने के बाद ही पता चलेगा कि वाहन व्यवस्था वास्तव में कितनी पारदर्शी है।
---
अब जांच सिर्फ गाड़ी की नहीं, पूरे रिकॉर्ड की होनी चाहिए
मामले में केवल सड़क पर वाहन देखने से निष्कर्ष निकालना पर्याप्त नहीं होगा। वास्तविक जांच के लिए विभागीय दस्तावेज खंगालने होंगे।
जांच के दायरे में होना चाहिए—
1. अनुबंध
MP 04 TB 2393 किस निविदा/अनुबंध के तहत विभाग में लगा है?
2. अनुबंध अवधि
वाहन की अनुबंध अवधि कब शुरू हुई और कब समाप्त होगी?
3. अधिकृत उपयोग
वाहन किस अधिकारी अथवा कार्यालय के उपयोग के लिए निर्धारित है?
4. लॉगबुक
27 अगस्त की पूरी लॉगबुक और वाहन मूवमेंट रिकॉर्ड की जांच हो।
5. ड्राइवर
ड्राइवर की नियुक्ति, अधिकृत ड्यूटी और उसे वाहन चलाने के निर्देश की जानकारी सामने आए।
6. भुगतान
अब तक वाहन मालिक को सरकारी खजाने से कितना भुगतान किया गया?
7. वाहन की पहचान
निजी वाहन पर “मध्य प्रदेश शासन” लिखने की अनुमति किस आधार पर है?
8. रात की ड्यूटी
27 अगस्त को शाम 7:30 बजे वाहन किस शासकीय कार्य पर था?
9. अधिकारी की मौजूदगी
उस समय अधिकारी वाहन में क्यों मौजूद नहीं थीं और ड्राइवर किस निर्देश पर वाहन चला रहा था?
10. अनुबंध की शर्तें
क्या वाहन का उपयोग केवल निर्धारित शासकीय कार्य के लिए किया जा सकता है और क्या उसके बाहर उपयोग की कोई अनुमति है?
---
आरटीओ और विभागीय अधिकारियों के लिए भी सवाल
मामला सामने आने के बाद परिवहन विभाग के स्तर पर भी वाहन के दस्तावेज और उसकी श्रेणी की स्थिति स्पष्ट की जा सकती है।
वहीं जल संसाधन विभाग के वरिष्ठ अधिकारियों को यह देखना चाहिए कि अनुबंधित वाहन वास्तव में निर्धारित शर्तों के अनुसार ही संचालित हो रहा है या नहीं।
अगर सब कुछ नियमों के तहत है तो विभाग के पास जवाब देने के लिए पर्याप्त दस्तावेज होने चाहिए।
लेकिन यदि रिकॉर्ड और मौके की स्थिति में अंतर निकलता है तो फिर जिम्मेदारी भी तय होनी चाहिए।
---
“सरकारी” लिख देने से कोई वाहन सरकारी नहीं हो जाता—लेकिन सवाल जरूर पैदा होते हैं
यहां एक महत्वपूर्ण बात भी साफ होना जरूरी है।
किसी निजी वाहन का सरकारी विभाग के साथ अनुबंधित होना उसे स्वामित्व की दृष्टि से सरकारी वाहन नहीं बना देता। इसलिए “प्राइवेट नंबर” और “सरकारी अनुबंध” दोनों एक साथ होना संभव है।
लेकिन जब उसी वाहन पर “मध्य प्रदेश शासन” लिखा हो, तब उसकी अनुमति और उपयोग की स्थिति स्पष्ट करना जरूरी हो जाता है।
यही इस खबर का मूल सवाल है।
---
अब जवाबदेही तय करने का समय
मामला किसी व्यक्ति विशेष को दोषी ठहराने का नहीं है। मामला है सरकारी अनुबंध पर चल रहे वाहन के उपयोग और सरकारी पहचान की पारदर्शिता का।
वीडियो में वाहन दिखाई देता है।
समय करीब 7:30 बजे शाम का है।
वाहन ड्राइवर चला रहा है।
एसडीओ वाहन में मौजूद नहीं थीं।
ड्राइवर से पूछताछ हुई।
उसका जवाब सामने आया—
“वो तो हट गई है, ये भी निकालना है।”
और विभाग के ईई ने कार्यालय से जानकारी लेकर जवाब देने की बात कही।
अब इससे आगे की कहानी दस्तावेज बताएंगे।
---
सबसे बड़ा सवाल फिर वही—
“अगर गाड़ी विभाग से हट गई है तो ‘मध्य प्रदेश शासन’ क्यों नहीं हटा?”
और अगर गाड़ी अभी भी सरकारी अनुबंध पर विभाग में लगी है तो—
“27 अगस्त की शाम 7:30 बजे एसडीओ की गैरमौजूदगी में ड्राइवर उसे किस शासकीय काम से चला रहा था?”
अब नजर जल संसाधन विभाग के आधिकारिक जवाब, अनुबंध की शर्तों, वाहन की लॉगबुक और भुगतान रिकॉर्ड पर है।
क्योंकि सरकारी अनुबंध पर लगी प्राइवेट बोलेरो हो सकती है, लेकिन सरकारी पैसे और सरकारी पहचान से जुड़े वाहन का हिसाब भी उतना ही साफ होना चाहिए।
बाड़ी में उठे ये सवाल अब केवल एक बोलेरो तक सीमित नहीं हैं—ये सवाल जल संसाधन विभाग की पूरी वाहन व्यवस्था की पारदर्शिता और निगरानी पर हैं।
    user_रितिक जैन  बाड़ी
    रितिक जैन बाड़ी
    Local News Reporter बाड़ी, रायसेन, मध्य प्रदेश•
    2 hrs ago
  • 300 की आबादी... 3 किलोमीटर का दलदल! बिलगुआ टोला में सड़क नहीं, ग्रामीणों की मजबूरी का सफर
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    300 की आबादी... 3 किलोमीटर का दलदल! बिलगुआ टोला में सड़क नहीं, ग्रामीणों की मजबूरी का सफर
    user_Dharmendra sahu
    Dharmendra sahu
    Photographer तेंदूखेड़ा, नरसिंहपुर, मध्य प्रदेश•
    7 hrs ago
  • गौरझामर के मुक्तिधाम में शवदाह को जाने वाले लोगों के लिए बैठक व्यवस्था मुक्तिधाम में यह क्या? नई सड़क बनी नाली का यह ज्वाइंट रोकेगा जल निकासी? नेपाल के भयावह दृश्य जो कुछ विचित्र से चित्र? आप भी 4कर सकते हैं मुक्तिधाम गौरझामर को यही काम?
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    गौरझामर के मुक्तिधाम में शवदाह को जाने वाले लोगों के लिए बैठक व्यवस्था 
मुक्तिधाम में यह क्या? नई सड़क बनी नाली का यह ज्वाइंट रोकेगा जल निकासी? नेपाल के भयावह दृश्य जो कुछ विचित्र से चित्र? आप भी 4कर सकते हैं मुक्तिधाम गौरझामर को यही काम?
    user_Akhlesh jain Reportar
    Akhlesh jain Reportar
    Salesperson देवरी, सागर, मध्य प्रदेश•
    1 hr ago
  • *SBI मंडी रोड शाखा पर मनमानी के आरोप, खाता खुलवाने 8-10 दिन से चक्कर काट रहा छात्र!* नरसिंहपुर ! 27 अगस्त 2026 नरसिंहपुर भारतीय स्टेट बैंक की मंडी रोड शाखा में खाता खुलवाने में कथित देरी और बार-बार नई औपचारिकताएं बताए जाने का मामला सामने आया है। छात्र प्रिंस लोधी ने इस संबंध में कलेक्टर नरसिंहपुर को शिकायत देकर कार्रवाई की मांग की है। शिकायत में छात्र ने आरोप लगाया कि वह पिछले 8-10 दिनों से बैंक में अपना खाता खुलवाने के लिए चक्कर लगा रहा है। स्कूल में खाता नंबर जमा करना आवश्यक होने के बावजूद अब तक उसका खाता नहीं खुल पाया है। छात्र के अनुसार, उसने बैंक द्वारा मांगी गई आवश्यक औपचारिकताएं पूरी कर दस्तावेज और फॉर्म जमा किए थे तथा बैंक अधिकारी द्वारा फॉर्म का सत्यापन भी किया गया था। छात्र का कहना है कि इसके बाद भी अलग-अलग समय पर नई प्रक्रियाएं और नियम बताए जा रहे हैं, जिससे उसे परेशानी का सामना करना पड़ रहा है। शिकायत में कहा गया है कि इस प्रकार की प्रक्रिया से छात्र के साथ-साथ अन्य अभिभावकों को भी परेशानी हो रही है। प्रिंस लोधी ने कलेक्टर से मामले को संज्ञान में लेकर उचित जांच एवं कार्रवाई की मांग की है। शिकायत की प्रतिलिपि मुख्यमंत्री, एसबीआई के रीजनल मैनेजर जबलपुर तथा चीफ जनरल मैनेजर भोपाल को भी भेजी गई है।
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    *SBI मंडी रोड शाखा पर मनमानी के आरोप, खाता खुलवाने 8-10 दिन से चक्कर काट रहा छात्र!*
नरसिंहपुर ! 27 अगस्त 2026 
नरसिंहपुर भारतीय स्टेट बैंक की मंडी रोड शाखा में खाता खुलवाने में कथित देरी और बार-बार नई औपचारिकताएं बताए जाने का मामला सामने आया है। छात्र प्रिंस लोधी ने इस संबंध में कलेक्टर नरसिंहपुर को शिकायत देकर कार्रवाई की मांग की है।
शिकायत में छात्र ने आरोप लगाया कि वह पिछले 8-10 दिनों से बैंक में अपना खाता खुलवाने के लिए चक्कर लगा रहा है। स्कूल में खाता नंबर जमा करना आवश्यक होने के बावजूद अब तक उसका खाता नहीं खुल पाया है। छात्र के अनुसार, उसने बैंक द्वारा मांगी गई आवश्यक औपचारिकताएं पूरी कर दस्तावेज और फॉर्म जमा किए थे तथा बैंक अधिकारी द्वारा फॉर्म का सत्यापन भी किया गया था।
छात्र का कहना है कि इसके बाद भी अलग-अलग समय पर नई प्रक्रियाएं और नियम बताए जा रहे हैं, जिससे उसे परेशानी का सामना करना पड़ रहा है। शिकायत में कहा गया है कि इस प्रकार की प्रक्रिया से छात्र के साथ-साथ अन्य अभिभावकों को भी परेशानी हो रही है।
प्रिंस लोधी ने कलेक्टर से मामले को संज्ञान में लेकर उचित जांच एवं कार्रवाई की मांग की है। शिकायत की प्रतिलिपि मुख्यमंत्री, एसबीआई के रीजनल मैनेजर जबलपुर तथा चीफ जनरल मैनेजर भोपाल को भी भेजी गई है।
    user_Polkholnewz
    Polkholnewz
    News Anchor गाडरवारा, नरसिंहपुर, मध्य प्रदेश•
    5 hrs ago
  • https://youtu.be/_cQ0smEqQ9s?si=8aNMCzdLWbae-xgh #Bhopal गो सम्मान आव्हान अभियान के तीसरे चरण को सफल बनाने को लेकर बैठक आयोजित
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    https://youtu.be/_cQ0smEqQ9s?si=8aNMCzdLWbae-xgh
#Bhopal गो सम्मान आव्हान अभियान के तीसरे चरण को सफल बनाने को लेकर बैठक आयोजित
    user_पं. सतीश लबानिया
    पं. सतीश लबानिया
    गाडरवारा, नरसिंहपुर, मध्य प्रदेश•
    9 hrs ago
  • तेंदूखेड़ा पुलिस की बड़ी कार्यवाही,स्मैक के दो युवकों से 7.90 ग्राम नशीला पदार्थ बरामद ✍️ धर्मेंद्र साहू
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    तेंदूखेड़ा पुलिस की बड़ी कार्यवाही,स्मैक के दो युवकों से 7.90 ग्राम नशीला पदार्थ बरामद

✍️ धर्मेंद्र साहू
    user_Dharmendra sahu
    Dharmendra sahu
    Photographer तेंदूखेड़ा, नरसिंहपुर, मध्य प्रदेश•
    7 hrs ago
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