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गाड़ी विभाग में लगी है तो हिसाब भी विभाग का होगा! प्राइवेट बोलेरो पर ‘मध्य प्रदेश शासन’, रात में ड्राइवर के हाथों दौड़ती गाड़ी ने खोली जल संसाधन विभाग की वाहन व्यवस्था की पोल! रितिक जैन पत्रकार बाड़ी, रायसेन। जल संसाधन विभाग बाड़ी की वाहन व्यवस्था को लेकर अब सवाल और भी गंभीर हो गए हैं। मामला बोलेरो वाहन क्रमांक MP 04 TB 2393 का है। वाहन निजी स्वामित्व का है, लेकिन वह सरकारी अनुबंध के तहत जल संसाधन/सिंचाई विभाग में लगाया गया है। वाहन पर बड़े अक्षरों में “मध्य प्रदेश शासन” लिखा हुआ है और 27 अगस्त की शाम करीब 7:30 बजे बाड़ी बस स्टैंड के आसपास इसे ड्राइवर द्वारा चलाते हुए देखा गया। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि उस समय एसडीओ वाहन में मौजूद नहीं थीं। यानी सरकारी अनुबंध पर विभाग में लगा निजी वाहन अधिकारी की गैरमौजूदगी में ड्राइवर के हाथों सड़कों पर दौड़ रहा था। अब सवाल केवल इतना नहीं कि गाड़ी कहां गई। सवाल यह है कि सरकारी अनुबंध पर लगी निजी गाड़ी का उपयोग किस आदेश, किस काम और किस रिकॉर्ड के आधार पर किया जा रहा है? --- सरकारी अनुबंध है तो नियम और रिकॉर्ड भी होंगे यह बात स्पष्ट है कि निजी वाहन को सरकारी विभाग में अनुबंध के आधार पर लगाया जा सकता है। लेकिन जैसे ही कोई निजी वाहन सरकारी अनुबंध का हिस्सा बनता है, उसके उपयोग, चालक, ड्यूटी, भुगतान और निर्धारित शासकीय कार्य से जुड़े रिकॉर्ड महत्वपूर्ण हो जाते हैं। ऐसे में MP 04 TB 2393 को लेकर विभाग को यह बताना होगा कि वाहन किस आदेश के तहत लगाया गया है, उसकी अनुबंध अवधि क्या है और वाहन के उपयोग की निर्धारित शर्तें क्या हैं। यदि विभाग वाहन का किराया सरकारी मद से चुका रहा है, तो फिर सरकारी पैसे से चलने वाली गाड़ी के हर किलोमीटर का हिसाब भी विभागीय रिकॉर्ड में होना चाहिए। --- रात साढ़े सात बजे बस स्टैंड पर गाड़ी—अधिकारी कहां थीं? 27 अगस्त की शाम करीब 7:30 बजे बाड़ी बस स्टैंड के आसपास वाहन की मौजूदगी ने मामले को नया मोड़ दे दिया। वाहन में एसडीओ मौजूद नहीं थीं। स्टीयरिंग ड्राइवर के हाथ में थी। अब सीधा सवाल है—अगर वाहन एसडीओ के उपयोग के लिए विभाग में अनुबंधित है, तो अधिकारी की गैरमौजूदगी में ड्राइवर वाहन लेकर किस काम से निकला था? क्या वह विभागीय ड्यूटी पर था? अगर हां, तो उस ड्यूटी का आदेश कहां है? क्या लॉगबुक में उस समय की यात्रा दर्ज है? कहां से कहां तक वाहन गया? किस अधिकारी के निर्देश पर गया? और उस यात्रा का शासकीय उद्देश्य क्या था? --- ड्राइवर का जवाब बना सबसे बड़ा सवाल जब वाहन के ड्राइवर से इस संबंध में सवाल किया गया तो उसका जवाब था— “वो तो हट गई है, ये भी निकालना है।” यहीं से मामले में सबसे बड़ा सवाल पैदा होता है। अगर ड्राइवर का इशारा विभागीय अटैचमेंट या वाहन की स्थिति की ओर था, तो आखिर “हट गई” का मतलब क्या है? क्या वाहन विभागीय अनुबंध से हट चुका है? अगर नहीं हटा है तो ऐसी बात क्यों कही गई? और अगर हट चुका है तो फिर सरकारी अनुबंध के तहत लगी गाड़ी की स्थिति क्या है? सबसे बड़ा सवाल— अगर गाड़ी हट गई तो ‘मध्य प्रदेश शासन’ क्यों नहीं हटा? --- सरकारी पहचान लगी है तो जवाबदेही भी तय होगी वाहन निजी है, लेकिन उस पर “मध्य प्रदेश शासन” लिखा हुआ है। सरकारी अनुबंध के तहत वाहन का उपयोग हो रहा है तो विभाग को यह स्पष्ट करना चाहिए कि वाहन पर यह पहचान किस प्रावधान/अनुमति के तहत प्रदर्शित की जा रही है और अनुबंध समाप्त होने की स्थिति में इसे हटाने की जिम्मेदारी किसकी है। क्योंकि सड़क पर चलने वाला ऐसा वाहन आम नागरिक को सरकारी वाहन जैसा दिखाई देता है। इसलिए यह सिर्फ लिखावट का मामला नहीं है। यह सरकारी पहचान, विभागीय नियंत्रण और वाहन के अधिकृत उपयोग का सवाल है। --- अवैध गतिविधियों की आशंका पर भी जांच क्यों जरूरी? इस मामले में अभी किसी अवैध गतिविधि का प्रत्यक्ष प्रमाण सामने नहीं आया है। इसलिए किसी व्यक्ति या वाहन पर अवैध काम का सीधा आरोप लगाना उचित नहीं होगा। लेकिन सवाल यह जरूर है कि सरकारी पहचान वाले अनुबंधित वाहन का उपयोग निर्धारित शासकीय कार्यों से बाहर तो नहीं हो रहा? यदि वाहन रात में अधिकारी की गैरमौजूदगी में घूम रहा है, तो विभागीय रिकॉर्ड से यह जांचना जरूरी है कि वह किस काम पर था। क्योंकि यदि वाहन सरकारी अनुबंध पर है और उसके किराये का भुगतान सरकारी धन से होता है, तो उसके उपयोग का उद्देश्य भी शासकीय कार्य से संबंधित और रिकॉर्ड में दर्ज होना चाहिए। --- ईई के जवाब से भी नहीं थमा मामला जब इस मामले को लेकर जल संसाधन विभाग बाड़ी के कार्यपालन यंत्री (ईई) से बातचीत कर जानकारी मांगी गई तो उन्होंने कहा कि वे कार्यालय से जानकारी लेकर बताएंगे। अब यही जवाब कई सवाल छोड़ गया है। अगर वाहन विभाग के अनुबंध में है तो उसकी जानकारी विभागीय रिकॉर्ड में होनी चाहिए। अनुबंध है तो उसकी प्रति सामने आए। ड्यूटी है तो आदेश सामने आए। यात्रा है तो लॉगबुक सामने आए। भुगतान है तो बिल सामने आए। मामला जितना सीधा है, जवाब भी उतना ही सीधा होना चाहिए। --- सरकारी खजाने से भुगतान, तो हर किलोमीटर का हिसाब अब सबसे महत्वपूर्ण सवाल सरकारी भुगतान का है। यदि MP 04 TB 2393 को जल संसाधन विभाग में अनुबंध के तहत लगाया गया है और उसके बदले सरकारी खजाने से प्रतिमाह भुगतान किया जा रहा है, तो विभाग को यह स्पष्ट करना होगा कि— वाहन का मासिक किराया कितना है? भुगतान किस मद से होता है? भुगतान किस अवधि से किया जा रहा है? वाहन की ड्यूटी किस अधिकारी के लिए निर्धारित है? प्रतिदिन कितने किलोमीटर चलने की अनुमति है? ईंधन का खर्च किसके जिम्मे है? लॉगबुक कौन प्रमाणित करता है? महीने के बिल का सत्यापन कौन करता है? वाहन के उपयोग की निगरानी कौन करता है? इन सवालों के जवाब आने के बाद ही पता चलेगा कि वाहन व्यवस्था वास्तव में कितनी पारदर्शी है। --- अब जांच सिर्फ गाड़ी की नहीं, पूरे रिकॉर्ड की होनी चाहिए मामले में केवल सड़क पर वाहन देखने से निष्कर्ष निकालना पर्याप्त नहीं होगा। वास्तविक जांच के लिए विभागीय दस्तावेज खंगालने होंगे। जांच के दायरे में होना चाहिए— 1. अनुबंध MP 04 TB 2393 किस निविदा/अनुबंध के तहत विभाग में लगा है? 2. अनुबंध अवधि वाहन की अनुबंध अवधि कब शुरू हुई और कब समाप्त होगी? 3. अधिकृत उपयोग वाहन किस अधिकारी अथवा कार्यालय के उपयोग के लिए निर्धारित है? 4. लॉगबुक 27 अगस्त की पूरी लॉगबुक और वाहन मूवमेंट रिकॉर्ड की जांच हो। 5. ड्राइवर ड्राइवर की नियुक्ति, अधिकृत ड्यूटी और उसे वाहन चलाने के निर्देश की जानकारी सामने आए। 6. भुगतान अब तक वाहन मालिक को सरकारी खजाने से कितना भुगतान किया गया? 7. वाहन की पहचान निजी वाहन पर “मध्य प्रदेश शासन” लिखने की अनुमति किस आधार पर है? 8. रात की ड्यूटी 27 अगस्त को शाम 7:30 बजे वाहन किस शासकीय कार्य पर था? 9. अधिकारी की मौजूदगी उस समय अधिकारी वाहन में क्यों मौजूद नहीं थीं और ड्राइवर किस निर्देश पर वाहन चला रहा था? 10. अनुबंध की शर्तें क्या वाहन का उपयोग केवल निर्धारित शासकीय कार्य के लिए किया जा सकता है और क्या उसके बाहर उपयोग की कोई अनुमति है? --- आरटीओ और विभागीय अधिकारियों के लिए भी सवाल मामला सामने आने के बाद परिवहन विभाग के स्तर पर भी वाहन के दस्तावेज और उसकी श्रेणी की स्थिति स्पष्ट की जा सकती है। वहीं जल संसाधन विभाग के वरिष्ठ अधिकारियों को यह देखना चाहिए कि अनुबंधित वाहन वास्तव में निर्धारित शर्तों के अनुसार ही संचालित हो रहा है या नहीं। अगर सब कुछ नियमों के तहत है तो विभाग के पास जवाब देने के लिए पर्याप्त दस्तावेज होने चाहिए। लेकिन यदि रिकॉर्ड और मौके की स्थिति में अंतर निकलता है तो फिर जिम्मेदारी भी तय होनी चाहिए। --- “सरकारी” लिख देने से कोई वाहन सरकारी नहीं हो जाता—लेकिन सवाल जरूर पैदा होते हैं यहां एक महत्वपूर्ण बात भी साफ होना जरूरी है। किसी निजी वाहन का सरकारी विभाग के साथ अनुबंधित होना उसे स्वामित्व की दृष्टि से सरकारी वाहन नहीं बना देता। इसलिए “प्राइवेट नंबर” और “सरकारी अनुबंध” दोनों एक साथ होना संभव है। लेकिन जब उसी वाहन पर “मध्य प्रदेश शासन” लिखा हो, तब उसकी अनुमति और उपयोग की स्थिति स्पष्ट करना जरूरी हो जाता है। यही इस खबर का मूल सवाल है। --- अब जवाबदेही तय करने का समय मामला किसी व्यक्ति विशेष को दोषी ठहराने का नहीं है। मामला है सरकारी अनुबंध पर चल रहे वाहन के उपयोग और सरकारी पहचान की पारदर्शिता का। वीडियो में वाहन दिखाई देता है। समय करीब 7:30 बजे शाम का है। वाहन ड्राइवर चला रहा है। एसडीओ वाहन में मौजूद नहीं थीं। ड्राइवर से पूछताछ हुई। उसका जवाब सामने आया— “वो तो हट गई है, ये भी निकालना है।” और विभाग के ईई ने कार्यालय से जानकारी लेकर जवाब देने की बात कही। अब इससे आगे की कहानी दस्तावेज बताएंगे। --- सबसे बड़ा सवाल फिर वही— “अगर गाड़ी विभाग से हट गई है तो ‘मध्य प्रदेश शासन’ क्यों नहीं हटा?” और अगर गाड़ी अभी भी सरकारी अनुबंध पर विभाग में लगी है तो— “27 अगस्त की शाम 7:30 बजे एसडीओ की गैरमौजूदगी में ड्राइवर उसे किस शासकीय काम से चला रहा था?” अब नजर जल संसाधन विभाग के आधिकारिक जवाब, अनुबंध की शर्तों, वाहन की लॉगबुक और भुगतान रिकॉर्ड पर है। क्योंकि सरकारी अनुबंध पर लगी प्राइवेट बोलेरो हो सकती है, लेकिन सरकारी पैसे और सरकारी पहचान से जुड़े वाहन का हिसाब भी उतना ही साफ होना चाहिए। बाड़ी में उठे ये सवाल अब केवल एक बोलेरो तक सीमित नहीं हैं—ये सवाल जल संसाधन विभाग की पूरी वाहन व्यवस्था की पारदर्शिता और निगरानी पर हैं।

49 min ago
user_रितिक जैन  बाड़ी
रितिक जैन बाड़ी
Local News Reporter बाड़ी, रायसेन, मध्य प्रदेश•
49 min ago

गाड़ी विभाग में लगी है तो हिसाब भी विभाग का होगा! प्राइवेट बोलेरो पर ‘मध्य प्रदेश शासन’, रात में ड्राइवर के हाथों दौड़ती गाड़ी ने खोली जल संसाधन विभाग की वाहन व्यवस्था की पोल! रितिक जैन पत्रकार बाड़ी, रायसेन। जल संसाधन विभाग बाड़ी की वाहन व्यवस्था को लेकर अब सवाल और भी गंभीर हो गए हैं। मामला बोलेरो वाहन क्रमांक MP 04 TB 2393 का है। वाहन निजी स्वामित्व का है, लेकिन वह सरकारी अनुबंध के तहत जल संसाधन/सिंचाई विभाग में लगाया गया है। वाहन पर बड़े अक्षरों में “मध्य प्रदेश शासन” लिखा हुआ है और 27 अगस्त की शाम करीब 7:30 बजे बाड़ी बस स्टैंड के आसपास इसे ड्राइवर द्वारा चलाते हुए देखा गया। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि उस समय एसडीओ वाहन में मौजूद नहीं थीं। यानी सरकारी अनुबंध पर विभाग में लगा निजी वाहन अधिकारी की गैरमौजूदगी में ड्राइवर के हाथों सड़कों पर दौड़ रहा था। अब सवाल केवल इतना नहीं कि गाड़ी कहां गई। सवाल यह है कि सरकारी अनुबंध पर लगी निजी गाड़ी का उपयोग किस आदेश, किस काम और किस रिकॉर्ड के आधार पर किया जा रहा है? --- सरकारी अनुबंध है तो नियम और रिकॉर्ड भी होंगे यह बात स्पष्ट है कि निजी वाहन को सरकारी विभाग में अनुबंध के आधार पर लगाया जा सकता है। लेकिन जैसे ही कोई निजी वाहन सरकारी अनुबंध का हिस्सा बनता है, उसके उपयोग, चालक, ड्यूटी, भुगतान और निर्धारित शासकीय कार्य से जुड़े रिकॉर्ड महत्वपूर्ण हो जाते हैं। ऐसे में MP 04 TB 2393 को लेकर विभाग को यह बताना होगा कि वाहन किस आदेश के तहत लगाया गया है, उसकी अनुबंध अवधि क्या है और वाहन के उपयोग की निर्धारित शर्तें क्या हैं। यदि विभाग वाहन का किराया सरकारी मद से चुका रहा है, तो फिर सरकारी पैसे से चलने वाली गाड़ी के हर किलोमीटर का हिसाब भी विभागीय रिकॉर्ड में होना चाहिए। --- रात साढ़े सात बजे बस स्टैंड पर गाड़ी—अधिकारी कहां थीं? 27 अगस्त की शाम करीब 7:30 बजे बाड़ी बस स्टैंड के आसपास वाहन की मौजूदगी ने मामले को नया मोड़ दे दिया। वाहन में एसडीओ मौजूद नहीं थीं। स्टीयरिंग ड्राइवर के हाथ में थी। अब सीधा सवाल है—अगर वाहन एसडीओ के उपयोग के लिए विभाग में अनुबंधित है, तो अधिकारी की गैरमौजूदगी में ड्राइवर वाहन लेकर किस काम से निकला था? क्या वह विभागीय ड्यूटी पर था? अगर हां, तो उस ड्यूटी का आदेश कहां है? क्या लॉगबुक में उस समय की यात्रा दर्ज है? कहां से कहां तक वाहन गया? किस अधिकारी के निर्देश पर गया? और उस यात्रा का शासकीय उद्देश्य क्या था? --- ड्राइवर का जवाब बना सबसे बड़ा सवाल जब वाहन के ड्राइवर से इस संबंध में सवाल किया गया तो उसका जवाब था— “वो तो हट गई है, ये भी निकालना है।” यहीं से मामले में सबसे बड़ा सवाल पैदा होता है। अगर ड्राइवर का इशारा विभागीय अटैचमेंट या वाहन की स्थिति की ओर था, तो आखिर “हट गई” का मतलब क्या है? क्या वाहन विभागीय अनुबंध से हट चुका है? अगर नहीं हटा है तो ऐसी बात क्यों कही गई? और अगर हट चुका है तो फिर सरकारी अनुबंध के तहत लगी गाड़ी की स्थिति क्या है? सबसे

बड़ा सवाल— अगर गाड़ी हट गई तो ‘मध्य प्रदेश शासन’ क्यों नहीं हटा? --- सरकारी पहचान लगी है तो जवाबदेही भी तय होगी वाहन निजी है, लेकिन उस पर “मध्य प्रदेश शासन” लिखा हुआ है। सरकारी अनुबंध के तहत वाहन का उपयोग हो रहा है तो विभाग को यह स्पष्ट करना चाहिए कि वाहन पर यह पहचान किस प्रावधान/अनुमति के तहत प्रदर्शित की जा रही है और अनुबंध समाप्त होने की स्थिति में इसे हटाने की जिम्मेदारी किसकी है। क्योंकि सड़क पर चलने वाला ऐसा वाहन आम नागरिक को सरकारी वाहन जैसा दिखाई देता है। इसलिए यह सिर्फ लिखावट का मामला नहीं है। यह सरकारी पहचान, विभागीय नियंत्रण और वाहन के अधिकृत उपयोग का सवाल है। --- अवैध गतिविधियों की आशंका पर भी जांच क्यों जरूरी? इस मामले में अभी किसी अवैध गतिविधि का प्रत्यक्ष प्रमाण सामने नहीं आया है। इसलिए किसी व्यक्ति या वाहन पर अवैध काम का सीधा आरोप लगाना उचित नहीं होगा। लेकिन सवाल यह जरूर है कि सरकारी पहचान वाले अनुबंधित वाहन का उपयोग निर्धारित शासकीय कार्यों से बाहर तो नहीं हो रहा? यदि वाहन रात में अधिकारी की गैरमौजूदगी में घूम रहा है, तो विभागीय रिकॉर्ड से यह जांचना जरूरी है कि वह किस काम पर था। क्योंकि यदि वाहन सरकारी अनुबंध पर है और उसके किराये का भुगतान सरकारी धन से होता है, तो उसके उपयोग का उद्देश्य भी शासकीय कार्य से संबंधित और रिकॉर्ड में दर्ज होना चाहिए। --- ईई के जवाब से भी नहीं थमा मामला जब इस मामले को लेकर जल संसाधन विभाग बाड़ी के कार्यपालन यंत्री (ईई) से बातचीत कर जानकारी मांगी गई तो उन्होंने कहा कि वे कार्यालय से जानकारी लेकर बताएंगे। अब यही जवाब कई सवाल छोड़ गया है। अगर वाहन विभाग के अनुबंध में है तो उसकी जानकारी विभागीय रिकॉर्ड में होनी चाहिए। अनुबंध है तो उसकी प्रति सामने आए। ड्यूटी है तो आदेश सामने आए। यात्रा है तो लॉगबुक सामने आए। भुगतान है तो बिल सामने आए। मामला जितना सीधा है, जवाब भी उतना ही सीधा होना चाहिए। --- सरकारी खजाने से भुगतान, तो हर किलोमीटर का हिसाब अब सबसे महत्वपूर्ण सवाल सरकारी भुगतान का है। यदि MP 04 TB 2393 को जल संसाधन विभाग में अनुबंध के तहत लगाया गया है और उसके बदले सरकारी खजाने से प्रतिमाह भुगतान किया जा रहा है, तो विभाग को यह स्पष्ट करना होगा कि— वाहन का मासिक किराया कितना है? भुगतान किस मद से होता है? भुगतान किस अवधि से किया जा रहा है? वाहन की ड्यूटी किस अधिकारी के लिए निर्धारित है? प्रतिदिन कितने किलोमीटर चलने की अनुमति है? ईंधन का खर्च किसके जिम्मे है? लॉगबुक कौन प्रमाणित करता है? महीने के बिल का सत्यापन कौन करता है? वाहन के उपयोग की निगरानी कौन करता है? इन सवालों के जवाब आने के बाद ही पता चलेगा कि वाहन व्यवस्था वास्तव में कितनी पारदर्शी है। --- अब जांच सिर्फ गाड़ी की नहीं, पूरे रिकॉर्ड की होनी चाहिए मामले में केवल सड़क पर वाहन देखने से निष्कर्ष निकालना पर्याप्त नहीं होगा। वास्तविक जांच के लिए विभागीय दस्तावेज खंगालने होंगे। जांच के दायरे में होना चाहिए— 1. अनुबंध MP 04 TB 2393 किस निविदा/अनुबंध के तहत विभाग में लगा है? 2. अनुबंध अवधि वाहन की अनुबंध अवधि कब शुरू हुई और कब समाप्त होगी? 3. अधिकृत उपयोग वाहन किस अधिकारी

अथवा कार्यालय के उपयोग के लिए निर्धारित है? 4. लॉगबुक 27 अगस्त की पूरी लॉगबुक और वाहन मूवमेंट रिकॉर्ड की जांच हो। 5. ड्राइवर ड्राइवर की नियुक्ति, अधिकृत ड्यूटी और उसे वाहन चलाने के निर्देश की जानकारी सामने आए। 6. भुगतान अब तक वाहन मालिक को सरकारी खजाने से कितना भुगतान किया गया? 7. वाहन की पहचान निजी वाहन पर “मध्य प्रदेश शासन” लिखने की अनुमति किस आधार पर है? 8. रात की ड्यूटी 27 अगस्त को शाम 7:30 बजे वाहन किस शासकीय कार्य पर था? 9. अधिकारी की मौजूदगी उस समय अधिकारी वाहन में क्यों मौजूद नहीं थीं और ड्राइवर किस निर्देश पर वाहन चला रहा था? 10. अनुबंध की शर्तें क्या वाहन का उपयोग केवल निर्धारित शासकीय कार्य के लिए किया जा सकता है और क्या उसके बाहर उपयोग की कोई अनुमति है? --- आरटीओ और विभागीय अधिकारियों के लिए भी सवाल मामला सामने आने के बाद परिवहन विभाग के स्तर पर भी वाहन के दस्तावेज और उसकी श्रेणी की स्थिति स्पष्ट की जा सकती है। वहीं जल संसाधन विभाग के वरिष्ठ अधिकारियों को यह देखना चाहिए कि अनुबंधित वाहन वास्तव में निर्धारित शर्तों के अनुसार ही संचालित हो रहा है या नहीं। अगर सब कुछ नियमों के तहत है तो विभाग के पास जवाब देने के लिए पर्याप्त दस्तावेज होने चाहिए। लेकिन यदि रिकॉर्ड और मौके की स्थिति में अंतर निकलता है तो फिर जिम्मेदारी भी तय होनी चाहिए। --- “सरकारी” लिख देने से कोई वाहन सरकारी नहीं हो जाता—लेकिन सवाल जरूर पैदा होते हैं यहां एक महत्वपूर्ण बात भी साफ होना जरूरी है। किसी निजी वाहन का सरकारी विभाग के साथ अनुबंधित होना उसे स्वामित्व की दृष्टि से सरकारी वाहन नहीं बना देता। इसलिए “प्राइवेट नंबर” और “सरकारी अनुबंध” दोनों एक साथ होना संभव है। लेकिन जब उसी वाहन पर “मध्य प्रदेश शासन” लिखा हो, तब उसकी अनुमति और उपयोग की स्थिति स्पष्ट करना जरूरी हो जाता है। यही इस खबर का मूल सवाल है। --- अब जवाबदेही तय करने का समय मामला किसी व्यक्ति विशेष को दोषी ठहराने का नहीं है। मामला है सरकारी अनुबंध पर चल रहे वाहन के उपयोग और सरकारी पहचान की पारदर्शिता का। वीडियो में वाहन दिखाई देता है। समय करीब 7:30 बजे शाम का है। वाहन ड्राइवर चला रहा है। एसडीओ वाहन में मौजूद नहीं थीं। ड्राइवर से पूछताछ हुई। उसका जवाब सामने आया— “वो तो हट गई है, ये भी निकालना है।” और विभाग के ईई ने कार्यालय से जानकारी लेकर जवाब देने की बात कही। अब इससे आगे की कहानी दस्तावेज बताएंगे। --- सबसे बड़ा सवाल फिर वही— “अगर गाड़ी विभाग से हट गई है तो ‘मध्य प्रदेश शासन’ क्यों नहीं हटा?” और अगर गाड़ी अभी भी सरकारी अनुबंध पर विभाग में लगी है तो— “27 अगस्त की शाम 7:30 बजे एसडीओ की गैरमौजूदगी में ड्राइवर उसे किस शासकीय काम से चला रहा था?” अब नजर जल संसाधन विभाग के आधिकारिक जवाब, अनुबंध की शर्तों, वाहन की लॉगबुक और भुगतान रिकॉर्ड पर है। क्योंकि सरकारी अनुबंध पर लगी प्राइवेट बोलेरो हो सकती है, लेकिन सरकारी पैसे और सरकारी पहचान से जुड़े वाहन का हिसाब भी उतना ही साफ होना चाहिए। बाड़ी में उठे ये सवाल अब केवल एक बोलेरो तक सीमित नहीं हैं—ये सवाल जल संसाधन विभाग की पूरी वाहन व्यवस्था की पारदर्शिता और निगरानी पर हैं।

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27 अगस्त की शाम करीब 7:30 बजे बाड़ी बस स्टैंड के आसपास वाहन की मौजूदगी ने मामले को नया मोड़ दे दिया। वाहन में एसडीओ मौजूद नहीं थीं। स्टीयरिंग ड्राइवर के हाथ में थी। अब सीधा सवाल है—अगर वाहन एसडीओ के उपयोग के लिए विभाग में अनुबंधित है, तो अधिकारी की गैरमौजूदगी में ड्राइवर वाहन लेकर किस काम से निकला था? क्या वह विभागीय ड्यूटी पर था? अगर हां, तो उस ड्यूटी का आदेश कहां है? क्या लॉगबुक में उस समय की यात्रा दर्ज है? कहां से कहां तक वाहन गया? किस अधिकारी के निर्देश पर गया? और उस यात्रा का शासकीय उद्देश्य क्या था? --- ड्राइवर का जवाब बना सबसे बड़ा सवाल जब वाहन के ड्राइवर से इस संबंध में सवाल किया गया तो उसका जवाब था— “वो तो हट गई है, ये भी निकालना है।” यहीं से मामले में सबसे बड़ा सवाल पैदा होता है। अगर ड्राइवर का इशारा विभागीय अटैचमेंट या वाहन की स्थिति की ओर था, तो आखिर “हट गई” का मतलब क्या है? क्या वाहन विभागीय अनुबंध से हट चुका है? अगर नहीं हटा है तो ऐसी बात क्यों कही गई? और अगर हट चुका है तो फिर सरकारी अनुबंध के तहत लगी गाड़ी की स्थिति क्या है? सबसे बड़ा सवाल— अगर गाड़ी हट गई तो ‘मध्य प्रदेश शासन’ क्यों नहीं हटा? --- सरकारी पहचान लगी है तो जवाबदेही भी तय होगी वाहन निजी है, लेकिन उस पर “मध्य प्रदेश शासन” लिखा हुआ है। सरकारी अनुबंध के तहत वाहन का उपयोग हो रहा है तो विभाग को यह स्पष्ट करना चाहिए कि वाहन पर यह पहचान किस प्रावधान/अनुमति के तहत प्रदर्शित की जा रही है और अनुबंध समाप्त होने की स्थिति में इसे हटाने की जिम्मेदारी किसकी है। क्योंकि सड़क पर चलने वाला ऐसा वाहन आम नागरिक को सरकारी वाहन जैसा दिखाई देता है। इसलिए यह सिर्फ लिखावट का मामला नहीं है। यह सरकारी पहचान, विभागीय नियंत्रण और वाहन के अधिकृत उपयोग का सवाल है। --- अवैध गतिविधियों की आशंका पर भी जांच क्यों जरूरी? इस मामले में अभी किसी अवैध गतिविधि का प्रत्यक्ष प्रमाण सामने नहीं आया है। इसलिए किसी व्यक्ति या वाहन पर अवैध काम का सीधा आरोप लगाना उचित नहीं होगा। लेकिन सवाल यह जरूर है कि सरकारी पहचान वाले अनुबंधित वाहन का उपयोग निर्धारित शासकीय कार्यों से बाहर तो नहीं हो रहा? यदि वाहन रात में अधिकारी की गैरमौजूदगी में घूम रहा है, तो विभागीय रिकॉर्ड से यह जांचना जरूरी है कि वह किस काम पर था। क्योंकि यदि वाहन सरकारी अनुबंध पर है और उसके किराये का भुगतान सरकारी धन से होता है, तो उसके उपयोग का उद्देश्य भी शासकीय कार्य से संबंधित और रिकॉर्ड में दर्ज होना चाहिए। --- ईई के जवाब से भी नहीं थमा मामला जब इस मामले को लेकर जल संसाधन विभाग बाड़ी के कार्यपालन यंत्री (ईई) से बातचीत कर जानकारी मांगी गई तो उन्होंने कहा कि वे कार्यालय से जानकारी लेकर बताएंगे। अब यही जवाब कई सवाल छोड़ गया है। अगर वाहन विभाग के अनुबंध में है तो उसकी जानकारी विभागीय रिकॉर्ड में होनी चाहिए। अनुबंध है तो उसकी प्रति सामने आए। ड्यूटी है तो आदेश सामने आए। यात्रा है तो लॉगबुक सामने आए। भुगतान है तो बिल सामने आए। मामला जितना सीधा है, जवाब भी उतना ही सीधा होना चाहिए। --- सरकारी खजाने से भुगतान, तो हर किलोमीटर का हिसाब अब सबसे महत्वपूर्ण सवाल सरकारी भुगतान का है। यदि MP 04 TB 2393 को जल संसाधन विभाग में अनुबंध के तहत लगाया गया है और उसके बदले सरकारी खजाने से प्रतिमाह भुगतान किया जा रहा है, तो विभाग को यह स्पष्ट करना होगा कि— वाहन का मासिक किराया कितना है? भुगतान किस मद से होता है? भुगतान किस अवधि से किया जा रहा है? वाहन की ड्यूटी किस अधिकारी के लिए निर्धारित है? प्रतिदिन कितने किलोमीटर चलने की अनुमति है? ईंधन का खर्च किसके जिम्मे है? लॉगबुक कौन प्रमाणित करता है? महीने के बिल का सत्यापन कौन करता है? वाहन के उपयोग की निगरानी कौन करता है? इन सवालों के जवाब आने के बाद ही पता चलेगा कि वाहन व्यवस्था वास्तव में कितनी पारदर्शी है। --- अब जांच सिर्फ गाड़ी की नहीं, पूरे रिकॉर्ड की होनी चाहिए मामले में केवल सड़क पर वाहन देखने से निष्कर्ष निकालना पर्याप्त नहीं होगा। वास्तविक जांच के लिए विभागीय दस्तावेज खंगालने होंगे। जांच के दायरे में होना चाहिए— 1. अनुबंध MP 04 TB 2393 किस निविदा/अनुबंध के तहत विभाग में लगा है? 2. अनुबंध अवधि वाहन की अनुबंध अवधि कब शुरू हुई और कब समाप्त होगी? 3. अधिकृत उपयोग वाहन किस अधिकारी अथवा कार्यालय के उपयोग के लिए निर्धारित है? 4. लॉगबुक 27 अगस्त की पूरी लॉगबुक और वाहन मूवमेंट रिकॉर्ड की जांच हो। 5. ड्राइवर ड्राइवर की नियुक्ति, अधिकृत ड्यूटी और उसे वाहन चलाने के निर्देश की जानकारी सामने आए। 6. भुगतान अब तक वाहन मालिक को सरकारी खजाने से कितना भुगतान किया गया? 7. वाहन की पहचान निजी वाहन पर “मध्य प्रदेश शासन” लिखने की अनुमति किस आधार पर है? 8. रात की ड्यूटी 27 अगस्त को शाम 7:30 बजे वाहन किस शासकीय कार्य पर था? 9. अधिकारी की मौजूदगी उस समय अधिकारी वाहन में क्यों मौजूद नहीं थीं और ड्राइवर किस निर्देश पर वाहन चला रहा था? 10. अनुबंध की शर्तें क्या वाहन का उपयोग केवल निर्धारित शासकीय कार्य के लिए किया जा सकता है और क्या उसके बाहर उपयोग की कोई अनुमति है? --- आरटीओ और विभागीय अधिकारियों के लिए भी सवाल मामला सामने आने के बाद परिवहन विभाग के स्तर पर भी वाहन के दस्तावेज और उसकी श्रेणी की स्थिति स्पष्ट की जा सकती है। वहीं जल संसाधन विभाग के वरिष्ठ अधिकारियों को यह देखना चाहिए कि अनुबंधित वाहन वास्तव में निर्धारित शर्तों के अनुसार ही संचालित हो रहा है या नहीं। अगर सब कुछ नियमों के तहत है तो विभाग के पास जवाब देने के लिए पर्याप्त दस्तावेज होने चाहिए। लेकिन यदि रिकॉर्ड और मौके की स्थिति में अंतर निकलता है तो फिर जिम्मेदारी भी तय होनी चाहिए। --- “सरकारी” लिख देने से कोई वाहन सरकारी नहीं हो जाता—लेकिन सवाल जरूर पैदा होते हैं यहां एक महत्वपूर्ण बात भी साफ होना जरूरी है। किसी निजी वाहन का सरकारी विभाग के साथ अनुबंधित होना उसे स्वामित्व की दृष्टि से सरकारी वाहन नहीं बना देता। इसलिए “प्राइवेट नंबर” और “सरकारी अनुबंध” दोनों एक साथ होना संभव है। लेकिन जब उसी वाहन पर “मध्य प्रदेश शासन” लिखा हो, तब उसकी अनुमति और उपयोग की स्थिति स्पष्ट करना जरूरी हो जाता है। यही इस खबर का मूल सवाल है। --- अब जवाबदेही तय करने का समय मामला किसी व्यक्ति विशेष को दोषी ठहराने का नहीं है। मामला है सरकारी अनुबंध पर चल रहे वाहन के उपयोग और सरकारी पहचान की पारदर्शिता का। वीडियो में वाहन दिखाई देता है। समय करीब 7:30 बजे शाम का है। वाहन ड्राइवर चला रहा है। एसडीओ वाहन में मौजूद नहीं थीं। ड्राइवर से पूछताछ हुई। उसका जवाब सामने आया— “वो तो हट गई है, ये भी निकालना है।” और विभाग के ईई ने कार्यालय से जानकारी लेकर जवाब देने की बात कही। अब इससे आगे की कहानी दस्तावेज बताएंगे। --- सबसे बड़ा सवाल फिर वही— “अगर गाड़ी विभाग से हट गई है तो ‘मध्य प्रदेश शासन’ क्यों नहीं हटा?” और अगर गाड़ी अभी भी सरकारी अनुबंध पर विभाग में लगी है तो— “27 अगस्त की शाम 7:30 बजे एसडीओ की गैरमौजूदगी में ड्राइवर उसे किस शासकीय काम से चला रहा था?” अब नजर जल संसाधन विभाग के आधिकारिक जवाब, अनुबंध की शर्तों, वाहन की लॉगबुक और भुगतान रिकॉर्ड पर है। क्योंकि सरकारी अनुबंध पर लगी प्राइवेट बोलेरो हो सकती है, लेकिन सरकारी पैसे और सरकारी पहचान से जुड़े वाहन का हिसाब भी उतना ही साफ होना चाहिए। बाड़ी में उठे ये सवाल अब केवल एक बोलेरो तक सीमित नहीं हैं—ये सवाल जल संसाधन विभाग की पूरी वाहन व्यवस्था की पारदर्शिता और निगरानी पर हैं।
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    गाड़ी विभाग में लगी है तो हिसाब भी विभाग का होगा!

प्राइवेट बोलेरो पर ‘मध्य प्रदेश शासन’, रात में ड्राइवर के हाथों दौड़ती गाड़ी ने खोली जल संसाधन विभाग की वाहन व्यवस्था की पोल!
रितिक जैन पत्रकार 
बाड़ी, रायसेन। जल संसाधन विभाग बाड़ी की वाहन व्यवस्था को लेकर अब सवाल और भी गंभीर हो गए हैं। मामला बोलेरो वाहन क्रमांक MP 04 TB 2393 का है। वाहन निजी स्वामित्व का है, लेकिन वह सरकारी अनुबंध के तहत जल संसाधन/सिंचाई विभाग में लगाया गया है। वाहन पर बड़े अक्षरों में “मध्य प्रदेश शासन” लिखा हुआ है और 27 अगस्त की शाम करीब 7:30 बजे बाड़ी बस स्टैंड के आसपास इसे ड्राइवर द्वारा चलाते हुए देखा गया।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि उस समय एसडीओ वाहन में मौजूद नहीं थीं। यानी सरकारी अनुबंध पर विभाग में लगा निजी वाहन अधिकारी की गैरमौजूदगी में ड्राइवर के हाथों सड़कों पर दौड़ रहा था।
अब सवाल केवल इतना नहीं कि गाड़ी कहां गई। सवाल यह है कि सरकारी अनुबंध पर लगी निजी गाड़ी का उपयोग किस आदेश, किस काम और किस रिकॉर्ड के आधार पर किया जा रहा है?
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सरकारी अनुबंध है तो नियम और रिकॉर्ड भी होंगे
यह बात स्पष्ट है कि निजी वाहन को सरकारी विभाग में अनुबंध के आधार पर लगाया जा सकता है। लेकिन जैसे ही कोई निजी वाहन सरकारी अनुबंध का हिस्सा बनता है, उसके उपयोग, चालक, ड्यूटी, भुगतान और निर्धारित शासकीय कार्य से जुड़े रिकॉर्ड महत्वपूर्ण हो जाते हैं।
ऐसे में MP 04 TB 2393 को लेकर विभाग को यह बताना होगा कि वाहन किस आदेश के तहत लगाया गया है, उसकी अनुबंध अवधि क्या है और वाहन के उपयोग की निर्धारित शर्तें क्या हैं।
यदि विभाग वाहन का किराया सरकारी मद से चुका रहा है, तो फिर सरकारी पैसे से चलने वाली गाड़ी के हर किलोमीटर का हिसाब भी विभागीय रिकॉर्ड में होना चाहिए।
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रात साढ़े सात बजे बस स्टैंड पर गाड़ी—अधिकारी कहां थीं?
27 अगस्त की शाम करीब 7:30 बजे बाड़ी बस स्टैंड के आसपास वाहन की मौजूदगी ने मामले को नया मोड़ दे दिया।
वाहन में एसडीओ मौजूद नहीं थीं। स्टीयरिंग ड्राइवर के हाथ में थी।
अब सीधा सवाल है—अगर वाहन एसडीओ के उपयोग के लिए विभाग में अनुबंधित है, तो अधिकारी की गैरमौजूदगी में ड्राइवर वाहन लेकर किस काम से निकला था?
क्या वह विभागीय ड्यूटी पर था?
अगर हां, तो उस ड्यूटी का आदेश कहां है?
क्या लॉगबुक में उस समय की यात्रा दर्ज है?
कहां से कहां तक वाहन गया?
किस अधिकारी के निर्देश पर गया?
और उस यात्रा का शासकीय उद्देश्य क्या था?
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ड्राइवर का जवाब बना सबसे बड़ा सवाल
जब वाहन के ड्राइवर से इस संबंध में सवाल किया गया तो उसका जवाब था—
“वो तो हट गई है, ये भी निकालना है।”
यहीं से मामले में सबसे बड़ा सवाल पैदा होता है।
अगर ड्राइवर का इशारा विभागीय अटैचमेंट या वाहन की स्थिति की ओर था, तो आखिर “हट गई” का मतलब क्या है?
क्या वाहन विभागीय अनुबंध से हट चुका है?
अगर नहीं हटा है तो ऐसी बात क्यों कही गई?
और अगर हट चुका है तो फिर सरकारी अनुबंध के तहत लगी गाड़ी की स्थिति क्या है?
सबसे बड़ा सवाल—
अगर गाड़ी हट गई तो ‘मध्य प्रदेश शासन’ क्यों नहीं हटा?
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सरकारी पहचान लगी है तो जवाबदेही भी तय होगी
वाहन निजी है, लेकिन उस पर “मध्य प्रदेश शासन” लिखा हुआ है।
सरकारी अनुबंध के तहत वाहन का उपयोग हो रहा है तो विभाग को यह स्पष्ट करना चाहिए कि वाहन पर यह पहचान किस प्रावधान/अनुमति के तहत प्रदर्शित की जा रही है और अनुबंध समाप्त होने की स्थिति में इसे हटाने की जिम्मेदारी किसकी है।
क्योंकि सड़क पर चलने वाला ऐसा वाहन आम नागरिक को सरकारी वाहन जैसा दिखाई देता है।
इसलिए यह सिर्फ लिखावट का मामला नहीं है। यह सरकारी पहचान, विभागीय नियंत्रण और वाहन के अधिकृत उपयोग का सवाल है।
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अवैध गतिविधियों की आशंका पर भी जांच क्यों जरूरी?
इस मामले में अभी किसी अवैध गतिविधि का प्रत्यक्ष प्रमाण सामने नहीं आया है। इसलिए किसी व्यक्ति या वाहन पर अवैध काम का सीधा आरोप लगाना उचित नहीं होगा।
लेकिन सवाल यह जरूर है कि सरकारी पहचान वाले अनुबंधित वाहन का उपयोग निर्धारित शासकीय कार्यों से बाहर तो नहीं हो रहा?
यदि वाहन रात में अधिकारी की गैरमौजूदगी में घूम रहा है, तो विभागीय रिकॉर्ड से यह जांचना जरूरी है कि वह किस काम पर था।
क्योंकि यदि वाहन सरकारी अनुबंध पर है और उसके किराये का भुगतान सरकारी धन से होता है, तो उसके उपयोग का उद्देश्य भी शासकीय कार्य से संबंधित और रिकॉर्ड में दर्ज होना चाहिए।
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ईई के जवाब से भी नहीं थमा मामला
जब इस मामले को लेकर जल संसाधन विभाग बाड़ी के कार्यपालन यंत्री (ईई) से बातचीत कर जानकारी मांगी गई तो उन्होंने कहा कि वे कार्यालय से जानकारी लेकर बताएंगे।
अब यही जवाब कई सवाल छोड़ गया है।
अगर वाहन विभाग के अनुबंध में है तो उसकी जानकारी विभागीय रिकॉर्ड में होनी चाहिए।
अनुबंध है तो उसकी प्रति सामने आए।
ड्यूटी है तो आदेश सामने आए।
यात्रा है तो लॉगबुक सामने आए।
भुगतान है तो बिल सामने आए।
मामला जितना सीधा है, जवाब भी उतना ही सीधा होना चाहिए।
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सरकारी खजाने से भुगतान, तो हर किलोमीटर का हिसाब
अब सबसे महत्वपूर्ण सवाल सरकारी भुगतान का है।
यदि MP 04 TB 2393 को जल संसाधन विभाग में अनुबंध के तहत लगाया गया है और उसके बदले सरकारी खजाने से प्रतिमाह भुगतान किया जा रहा है, तो विभाग को यह स्पष्ट करना होगा कि—
वाहन का मासिक किराया कितना है?
भुगतान किस मद से होता है?
भुगतान किस अवधि से किया जा रहा है?
वाहन की ड्यूटी किस अधिकारी के लिए निर्धारित है?
प्रतिदिन कितने किलोमीटर चलने की अनुमति है?
ईंधन का खर्च किसके जिम्मे है?
लॉगबुक कौन प्रमाणित करता है?
महीने के बिल का सत्यापन कौन करता है?
वाहन के उपयोग की निगरानी कौन करता है?
इन सवालों के जवाब आने के बाद ही पता चलेगा कि वाहन व्यवस्था वास्तव में कितनी पारदर्शी है।
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अब जांच सिर्फ गाड़ी की नहीं, पूरे रिकॉर्ड की होनी चाहिए
मामले में केवल सड़क पर वाहन देखने से निष्कर्ष निकालना पर्याप्त नहीं होगा। वास्तविक जांच के लिए विभागीय दस्तावेज खंगालने होंगे।
जांच के दायरे में होना चाहिए—
1. अनुबंध
MP 04 TB 2393 किस निविदा/अनुबंध के तहत विभाग में लगा है?
2. अनुबंध अवधि
वाहन की अनुबंध अवधि कब शुरू हुई और कब समाप्त होगी?
3. अधिकृत उपयोग
वाहन किस अधिकारी अथवा कार्यालय के उपयोग के लिए निर्धारित है?
4. लॉगबुक
27 अगस्त की पूरी लॉगबुक और वाहन मूवमेंट रिकॉर्ड की जांच हो।
5. ड्राइवर
ड्राइवर की नियुक्ति, अधिकृत ड्यूटी और उसे वाहन चलाने के निर्देश की जानकारी सामने आए।
6. भुगतान
अब तक वाहन मालिक को सरकारी खजाने से कितना भुगतान किया गया?
7. वाहन की पहचान
निजी वाहन पर “मध्य प्रदेश शासन” लिखने की अनुमति किस आधार पर है?
8. रात की ड्यूटी
27 अगस्त को शाम 7:30 बजे वाहन किस शासकीय कार्य पर था?
9. अधिकारी की मौजूदगी
उस समय अधिकारी वाहन में क्यों मौजूद नहीं थीं और ड्राइवर किस निर्देश पर वाहन चला रहा था?
10. अनुबंध की शर्तें
क्या वाहन का उपयोग केवल निर्धारित शासकीय कार्य के लिए किया जा सकता है और क्या उसके बाहर उपयोग की कोई अनुमति है?
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आरटीओ और विभागीय अधिकारियों के लिए भी सवाल
मामला सामने आने के बाद परिवहन विभाग के स्तर पर भी वाहन के दस्तावेज और उसकी श्रेणी की स्थिति स्पष्ट की जा सकती है।
वहीं जल संसाधन विभाग के वरिष्ठ अधिकारियों को यह देखना चाहिए कि अनुबंधित वाहन वास्तव में निर्धारित शर्तों के अनुसार ही संचालित हो रहा है या नहीं।
अगर सब कुछ नियमों के तहत है तो विभाग के पास जवाब देने के लिए पर्याप्त दस्तावेज होने चाहिए।
लेकिन यदि रिकॉर्ड और मौके की स्थिति में अंतर निकलता है तो फिर जिम्मेदारी भी तय होनी चाहिए।
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“सरकारी” लिख देने से कोई वाहन सरकारी नहीं हो जाता—लेकिन सवाल जरूर पैदा होते हैं
यहां एक महत्वपूर्ण बात भी साफ होना जरूरी है।
किसी निजी वाहन का सरकारी विभाग के साथ अनुबंधित होना उसे स्वामित्व की दृष्टि से सरकारी वाहन नहीं बना देता। इसलिए “प्राइवेट नंबर” और “सरकारी अनुबंध” दोनों एक साथ होना संभव है।
लेकिन जब उसी वाहन पर “मध्य प्रदेश शासन” लिखा हो, तब उसकी अनुमति और उपयोग की स्थिति स्पष्ट करना जरूरी हो जाता है।
यही इस खबर का मूल सवाल है।
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अब जवाबदेही तय करने का समय
मामला किसी व्यक्ति विशेष को दोषी ठहराने का नहीं है। मामला है सरकारी अनुबंध पर चल रहे वाहन के उपयोग और सरकारी पहचान की पारदर्शिता का।
वीडियो में वाहन दिखाई देता है।
समय करीब 7:30 बजे शाम का है।
वाहन ड्राइवर चला रहा है।
एसडीओ वाहन में मौजूद नहीं थीं।
ड्राइवर से पूछताछ हुई।
उसका जवाब सामने आया—
“वो तो हट गई है, ये भी निकालना है।”
और विभाग के ईई ने कार्यालय से जानकारी लेकर जवाब देने की बात कही।
अब इससे आगे की कहानी दस्तावेज बताएंगे।
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सबसे बड़ा सवाल फिर वही—
“अगर गाड़ी विभाग से हट गई है तो ‘मध्य प्रदेश शासन’ क्यों नहीं हटा?”
और अगर गाड़ी अभी भी सरकारी अनुबंध पर विभाग में लगी है तो—
“27 अगस्त की शाम 7:30 बजे एसडीओ की गैरमौजूदगी में ड्राइवर उसे किस शासकीय काम से चला रहा था?”
अब नजर जल संसाधन विभाग के आधिकारिक जवाब, अनुबंध की शर्तों, वाहन की लॉगबुक और भुगतान रिकॉर्ड पर है।
क्योंकि सरकारी अनुबंध पर लगी प्राइवेट बोलेरो हो सकती है, लेकिन सरकारी पैसे और सरकारी पहचान से जुड़े वाहन का हिसाब भी उतना ही साफ होना चाहिए।
बाड़ी में उठे ये सवाल अब केवल एक बोलेरो तक सीमित नहीं हैं—ये सवाल जल संसाधन विभाग की पूरी वाहन व्यवस्था की पारदर्शिता और निगरानी पर हैं।
    user_रितिक जैन  बाड़ी
    रितिक जैन बाड़ी
    Local News Reporter बाड़ी, रायसेन, मध्य प्रदेश•
    49 min ago
  • रक्षाबंधन पर अनोखी पहल, सतपुड़ा टाइगर रिजर्व में शुरू हुआ ‘बाघ रक्षा सूत्र अभियान’ रक्षाबंधन पर अनोखी पहल, सतपुड़ा टाइगर रिजर्व में शुरू हुआ ‘बाघ रक्षा सूत्र अभियान’ रक्षाबंधन के अवसर पर सतपुड़ा टाइगर रिजर्व द्वारा ‘बाघ रक्षा सूत्र अभियान’ शुरू किया गया है। 27 से 29 अगस्त तक चलने वाले इस अभियान में बाघों और वन्यजीवों के संरक्षण का संकल्प दिलाया जा रहा है।आज गुरुवार को पहले दिनदोपहर बाद 12 बजे पीएम श्री हायर सेकेंडरी स्कूल कामती के 450, बागड़ा के 275 छात्र-छात्राओं सहित ग्राम सारंगपुर में 50 गाइड, जिप्सी चालकों और पर्यटकों को बाघ रक्षा सूत्र बांधकर बाघों की सुरक्षा का संकल्प दिलाया गया।अभियान के तहत तीन दिनों में करीब 11 हजार ग्रामीणों, विद्यार्थियों और आमजन को जागरूक करने का लक्ष्य रखा गया है।
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    रक्षाबंधन पर अनोखी पहल, सतपुड़ा टाइगर रिजर्व में शुरू हुआ ‘बाघ रक्षा सूत्र अभियान’

रक्षाबंधन पर अनोखी पहल, सतपुड़ा टाइगर रिजर्व में शुरू हुआ ‘बाघ रक्षा सूत्र अभियान’
रक्षाबंधन के अवसर पर सतपुड़ा टाइगर रिजर्व द्वारा ‘बाघ रक्षा सूत्र अभियान’ शुरू किया गया है। 27 से 29 अगस्त तक चलने वाले इस अभियान में बाघों और वन्यजीवों के संरक्षण का संकल्प दिलाया जा रहा है।आज गुरुवार को पहले दिनदोपहर बाद 12 बजे पीएम श्री हायर सेकेंडरी स्कूल कामती के 450, बागड़ा के 275 छात्र-छात्राओं सहित ग्राम सारंगपुर में 50 गाइड, जिप्सी चालकों और पर्यटकों को बाघ रक्षा सूत्र बांधकर बाघों की सुरक्षा का संकल्प दिलाया गया।अभियान के तहत तीन दिनों में करीब 11 हजार ग्रामीणों, विद्यार्थियों और आमजन को जागरूक करने का लक्ष्य रखा गया है।
    user_रीतेश साहू
    रीतेश साहू
    Salesperson सोहागपुर, नर्मदापुरम, मध्य प्रदेश•
    1 hr ago
  • पितृ स्मृति को सेवा से जोड़ा,, जरूरतमंदों को भी कराए गए स्वादिष्ट भोजन- सोहागपुर (नर्मदापुरम) "मारूपुरा निवासी की अनुकरणीय पहल" रामप्रसाद वार्ड (मारूपुरा) निवासी श्री शैलेंद्र कपरिया जी ने मानवता की मिसाल पेश की है। आज उन्होंने अपने पूज्य पिताजी, वन विभाग में रेंजर के पद पर सेवाएं दे चुके स्वर्गीय श्री ओमप्रकाश जी कपरिया की गंगाजली पूजन एवं 13वीं के अवसर पर अपने निजी कार्यक्रम के साथ-साथ सामाजिक दायित्व का भी निर्वहन किया। इस अवसर पर उन्होंने राम रहीम रोटी बैंक, सोहागपुर में माँ नर्मदा के परिक्रमावासियों, बेघर, बेसहारा एवं जरूरतमंद लोगों के लिए प्रेमपूर्वक स्वादिष्ट भोजन भिजवाकर सच्चे अर्थों में पुण्य लाभ अर्जित किया। यह कार्य इस बात का प्रतीक है कि हमारे बुजुर्गों की सच्ची श्रद्धांजलि भूखे को भोजन कराने से बढ़कर कुछ नहीं। स्व. ओमप्रकाश जी कपरिया को भावभीनी श्रद्धांजलि एवं शैलेंद्र जी के इस पुनीत सेवा कार्य को हृदय से साधुवाद।🙏
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    पितृ स्मृति को सेवा से जोड़ा,, जरूरतमंदों को भी कराए गए स्वादिष्ट भोजन- 
सोहागपुर (नर्मदापुरम)
"मारूपुरा निवासी की अनुकरणीय पहल" 
रामप्रसाद वार्ड (मारूपुरा) निवासी श्री शैलेंद्र कपरिया जी ने मानवता की मिसाल पेश की है।
आज उन्होंने अपने पूज्य पिताजी, वन विभाग में रेंजर के पद पर सेवाएं दे चुके स्वर्गीय श्री ओमप्रकाश जी कपरिया की गंगाजली पूजन एवं 13वीं के अवसर पर अपने निजी कार्यक्रम के साथ-साथ सामाजिक दायित्व का भी निर्वहन किया।
इस अवसर पर उन्होंने राम रहीम रोटी बैंक, सोहागपुर में माँ नर्मदा के परिक्रमावासियों, बेघर, बेसहारा एवं जरूरतमंद लोगों के लिए प्रेमपूर्वक स्वादिष्ट भोजन भिजवाकर सच्चे अर्थों में पुण्य लाभ अर्जित किया।
यह कार्य इस बात का प्रतीक है कि हमारे बुजुर्गों की सच्ची श्रद्धांजलि भूखे को भोजन कराने से बढ़कर कुछ नहीं।
स्व. ओमप्रकाश जी कपरिया को भावभीनी श्रद्धांजलि  एवं शैलेंद्र जी के इस पुनीत सेवा कार्य को हृदय से साधुवाद।🙏
    user_जमील खान  "राम रहीम रोटी बैंक
    जमील खान "राम रहीम रोटी बैंक
    Voice of people सोहागपुर, नर्मदापुरम, मध्य प्रदेश•
    5 hrs ago
  • नर्मदापुरम में त्योहारों के मद्देनजर खाद्य पदार्थों की सघन जांच, 126 नमूने लिए नर्मदापुरम त्योहारों के मद्देनजर दूध एवं दुग्ध उत्पादों में मिलावट की रोकथाम के लिए खाद्य सुरक्षा प्रशासन द्वारा जिले में विशेष अभियान चलाया जा रहा है। कलेक्टर श्री सोमेश मिश्रा के निर्देश पर बीते एक माह में दुकानों, एजेंसियों, बसों एवं अन्य परिवहन साधनों का सघन एवं औचक निरीक्षण किया गया। अभियान के दौरान खाद्य सुरक्षा अधिकारियों बीएस धाकड़, जितेंद्र सिंह राणा एवं कमलेश एस दियावार ने संदेह के आधार पर घी, मिठाई, सोनपापड़ी, रसगुल्ला, बेसन, सोयाबीन तेल और नमकीन सहित विभिन्न खाद्य पदार्थों के 126 नमूने लिए। सभी नमूनों को परीक्षण के लिए राज्य खाद्य प्रयोगशाला भेजा गया है। जांच रिपोर्ट के आधार पर नियमानुसार आगे की कार्रवाई प्रस्तावित की जा रही है। निरीक्षण के दौरान जनहित में बड़ी मात्रा में संदिग्ध खाद्य पदार्थ जब्त किए गए। कार्रवाई में 1,426 किलोग्राम घी, जिसकी अनुमानित कीमत करीब 7 लाख 30 हजार रुपये, तथा 42 किलोग्राम पनीर, जिसकी कीमत करीब 12 हजार रुपये, जब्त किया गया। वहीं कटियार बस से 650 किलोग्राम खोया, जिसकी अनुमानित कीमत करीब 2 लाख रुपये है, भी जब्त किया गया। खाद्य सुरक्षा अधिकारी कमलेश एस दियावार ने बताया कि विभाग को प्राप्त जांच रिपोर्ट में नंद कृष्णा घी, संगाथ घी एवं ब्रजवासी घी के नमूने जांच में असुरक्षित एवं मानव स्वास्थ्य के लिए हानिकारक पाए गए हैं। संबंधित विक्रेताओं एवं निर्माताओं को अपना पक्ष प्रस्तुत करने के लिए नोटिस जारी किए गए हैं। इन उत्पादों के संबंध में नियमानुसार प्रतिबंधात्मक कार्रवाई प्रस्तावित की जा रही है। खाद्य सुरक्षा प्रशासन ने कहा है कि त्योहारों को देखते हुए खाद्य पदार्थों की जांच का अभियान लगातार जारी रहेगा। विशेष रूप से दूध, दुग्ध उत्पाद एवं घी की नियमित जांच की जाएगी। मिलावट पाए जाने पर संबंधितों के विरुद्ध नियमानुसार कार्रवाई की जाएगी। NDPM NEWS twenty four नर्मदापुरम खास रिपोर्ट
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    नर्मदापुरम में त्योहारों के मद्देनजर खाद्य पदार्थों की सघन जांच, 126 नमूने लिए
नर्मदापुरम त्योहारों के मद्देनजर दूध एवं दुग्ध उत्पादों में मिलावट की रोकथाम के लिए खाद्य सुरक्षा प्रशासन द्वारा जिले में विशेष अभियान चलाया जा रहा है। कलेक्टर श्री सोमेश मिश्रा के निर्देश पर बीते एक माह में दुकानों, एजेंसियों, बसों एवं अन्य परिवहन साधनों का सघन एवं औचक निरीक्षण किया गया।
अभियान के दौरान खाद्य सुरक्षा अधिकारियों बीएस धाकड़, जितेंद्र सिंह राणा एवं कमलेश एस दियावार ने संदेह के आधार पर घी, मिठाई, सोनपापड़ी, रसगुल्ला, बेसन, सोयाबीन तेल और नमकीन सहित विभिन्न खाद्य पदार्थों के 126 नमूने लिए। सभी नमूनों को परीक्षण के लिए राज्य खाद्य प्रयोगशाला भेजा गया है। जांच रिपोर्ट के आधार पर नियमानुसार आगे की कार्रवाई प्रस्तावित की जा रही है।
निरीक्षण के दौरान जनहित में बड़ी मात्रा में संदिग्ध खाद्य पदार्थ जब्त किए गए। कार्रवाई में 1,426 किलोग्राम घी, जिसकी अनुमानित कीमत करीब 7 लाख 30 हजार रुपये, तथा 42 किलोग्राम पनीर, जिसकी कीमत करीब 12 हजार रुपये, जब्त किया गया। वहीं कटियार बस से 650 किलोग्राम खोया, जिसकी अनुमानित कीमत करीब 2 लाख रुपये है, भी जब्त किया गया।
खाद्य सुरक्षा अधिकारी कमलेश एस दियावार ने बताया कि विभाग को प्राप्त जांच रिपोर्ट में नंद कृष्णा घी, संगाथ घी एवं ब्रजवासी घी के नमूने जांच में असुरक्षित एवं मानव स्वास्थ्य के लिए हानिकारक पाए गए हैं। संबंधित विक्रेताओं एवं निर्माताओं को अपना पक्ष प्रस्तुत करने के लिए नोटिस जारी किए गए हैं। इन उत्पादों के संबंध में नियमानुसार प्रतिबंधात्मक कार्रवाई प्रस्तावित की जा रही है।
खाद्य सुरक्षा प्रशासन ने कहा है कि त्योहारों को देखते हुए खाद्य पदार्थों की जांच का अभियान लगातार जारी रहेगा। विशेष रूप से दूध, दुग्ध उत्पाद एवं घी की नियमित जांच की जाएगी। मिलावट पाए जाने पर संबंधितों के विरुद्ध नियमानुसार कार्रवाई की जाएगी।
NDPM NEWS twenty four नर्मदापुरम  खास रिपोर्ट
    user_NDPM NEWS 24
    NDPM NEWS 24
    Local News Reporter होशंगाबाद, नर्मदापुरम, मध्य प्रदेश•
    32 min ago
  • बढ़ती महंगाई भ्रष्टाचार और सरकार की जन नीतियों के विरोध में कांग्रेसियों ने पुतला दहन कर धरना दिया बढ़ती महंगाई भ्रष्टाचार और सरकार की जन नीतियों के विरोध में कांग्रेसियों ने मंगलवारा चौराहे पर पुतला दहन कर धरना दिया
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    बढ़ती महंगाई भ्रष्टाचार और सरकार की जन नीतियों के विरोध में कांग्रेसियों ने पुतला दहन कर धरना दिया
बढ़ती महंगाई भ्रष्टाचार और सरकार की जन नीतियों के विरोध में कांग्रेसियों ने मंगलवारा चौराहे पर पुतला दहन कर धरना दिया
    user_न्यूज नर्मदापुरम
    न्यूज नर्मदापुरम
    पिपरिया, नर्मदापुरम, मध्य प्रदेश•
    1 hr ago
  • बढ़ते चीनी के दाम और महंगाई के विरोध में सांची में कांग्रेस का प्रदर्शन, हाथ ठेले पर खाली गैस सिलेंडर लेकर किया विरोध प्रदर्शन। बढ़ते चीनी के दाम और महंगाई के विरोध में सांची में कांग्रेस का प्रदर्शन, हाथ ठेले पर खाली गैस सिलेंडर लेकर किया विरोध प्रदर्शन।
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    बढ़ते चीनी के दाम और महंगाई के विरोध में सांची में कांग्रेस का प्रदर्शन, हाथ ठेले पर खाली गैस सिलेंडर लेकर किया विरोध प्रदर्शन।
बढ़ते चीनी के दाम और महंगाई के विरोध में सांची में कांग्रेस का प्रदर्शन, हाथ ठेले पर खाली गैस सिलेंडर लेकर किया विरोध प्रदर्शन।
    user_ABBTAK NEWS Dewangnj
    ABBTAK NEWS Dewangnj
    रायसेन, रायसेन, मध्य प्रदेश•
    2 hrs ago
  • गंदे जानवर आवारा सुअर रायसेन दरगाह में घुसे रायसेन। आवारा सुअर शहर में विचरण कर ही रहे हैं। पर अब यह रायसेन स्थित बाबा पीर फतेह उल्लाह साहब की मजार के आसपास भी घूम रहे हैं इससे मुस्लिम धर्म के लोगों में खासी नाराजगी है। शहर काजी जहीरूद्दीन साहब ने हमें बताया कि इसे लेकर उन्होंने पिछले दिनों एसडीएम को भी शिकायत की थी पर कोई कार्रवाई नहीं हुई। अब सभी लोग मिलकर कलेक्टर से मिलने की तैयारी में है। इससे पहले मांग की जा रही है कि इन्हें पकड़ लिया जाए। गंदे जानवर आवारा सुअर रायसेन दरगाह में घुसे रायसेन। आवारा सुअर शहर में विचरण कर ही रहे हैं। पर अब यह रायसेन स्थित बाबा पीर फतेह उल्लाह साहब की मजार के आसपास भी घूम रहे हैं इससे मुस्लिम धर्म के लोगों में खासी नाराजगी है। शहर काजी जहीरूद्दीन साहब ने हमें बताया कि इसे लेकर उन्होंने पिछले दिनों एसडीएम को भी शिकायत की थी पर कोई कार्रवाई नहीं हुई। अब सभी लोग मिलकर कलेक्टर से मिलने की तैयारी में है। इससे पहले मांग की जा रही है कि इन्हें पकड़ लिया जाए।
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    गंदे जानवर आवारा सुअर रायसेन दरगाह में घुसे 

 

रायसेन। आवारा सुअर शहर में विचरण कर ही रहे हैं। पर अब यह रायसेन स्थित बाबा पीर फतेह उल्लाह साहब की मजार के आसपास भी घूम रहे हैं इससे मुस्लिम धर्म के लोगों में खासी नाराजगी है। 
शहर काजी जहीरूद्दीन साहब ने हमें बताया कि इसे लेकर उन्होंने पिछले दिनों एसडीएम को भी शिकायत की थी पर कोई कार्रवाई नहीं हुई। अब सभी लोग मिलकर कलेक्टर से मिलने की तैयारी में है। इससे पहले मांग की जा रही है कि इन्हें पकड़ लिया जाए।
गंदे जानवर आवारा सुअर रायसेन दरगाह में घुसे 
रायसेन। आवारा सुअर शहर में विचरण कर ही रहे हैं। पर अब यह रायसेन स्थित बाबा पीर फतेह उल्लाह साहब की मजार के आसपास भी घूम रहे हैं इससे मुस्लिम धर्म के लोगों में खासी नाराजगी है। 
शहर काजी जहीरूद्दीन साहब ने हमें बताया कि इसे लेकर उन्होंने पिछले दिनों एसडीएम को भी शिकायत की थी पर कोई कार्रवाई नहीं हुई। अब सभी लोग मिलकर कलेक्टर से मिलने की तैयारी में है। इससे पहले मांग की जा रही है कि इन्हें पकड़ लिया जाए।
    user_Chandresh joshi
    Chandresh joshi
    रायसेन, रायसेन, मध्य प्रदेश•
    5 hrs ago
  • सेमरी हरचंद में छात्राओं ने अधिकारियों को बांधी राखी, मनाया रक्षाबंधन सेमरी हरचंद में छात्राओं ने अधिकारियों को बांधी राखी, मनाया रक्षाबंधन सोहागपुर। रक्षा बंधन पर्व के अवसर पर ग्राम सेमरी हरचंद स्थित कस्तूरबा बालिका छात्रावास एवं शासकीय कन्या हायर सेकंडरी स्कूल में गुरुवार दोपहर 1 बजे के लगभग रक्षाबन्धन कार्यक्रम आयोजित किया गया।एसडीएम डॉ. बबीता राठौर, बीआरसी राकेश रघुवंशी एवं प्राचार्य संतोष ठाकुर सहित स्टाफ ने छात्राओं से राखी बंधवाई। एसडीएम डॉ. बबीता राठौर ने छात्राओं को मिठाई एवं उपहार भेंट कर रक्षाबंधन की शुभकामनाएं दीं। उन्होंने छात्राओं से पढ़ाई, भोजन, छात्रावास की सुविधाओं और समस्याओं की जानकारी ली तथा मेहनत और लगन से पढ़ाई कर अपने माता-पिता व शिक्षकों का नाम रोशन करने के लिए प्रेरित किया। बीआरसी राकेश रघुवंशी ने कक्षा 10वीं और 12वीं की छात्राओं से परीक्षा की बेहतर तैयारी करने की अपील करते हुए कम से कम एक छात्रा के मेरिट सूची में स्थान बनाने का लक्ष्य रखने को कहा। कार्यक्रम में छात्राओं और अधिकारियों के बीच आत्मीयता का माहौल रहा। अंत में प्राचार्य संतोष ठाकुर ने आभार व्यक्त किया।
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    सेमरी हरचंद में छात्राओं ने अधिकारियों को बांधी राखी, मनाया रक्षाबंधन
सेमरी हरचंद में छात्राओं ने अधिकारियों को बांधी राखी, मनाया रक्षाबंधन
सोहागपुर। रक्षा बंधन पर्व के अवसर पर ग्राम सेमरी हरचंद स्थित कस्तूरबा बालिका छात्रावास एवं शासकीय कन्या हायर सेकंडरी स्कूल में  गुरुवार दोपहर 1 बजे के लगभग रक्षाबन्धन कार्यक्रम आयोजित किया गया।एसडीएम डॉ. बबीता राठौर, बीआरसी राकेश रघुवंशी एवं प्राचार्य संतोष ठाकुर सहित स्टाफ ने छात्राओं से राखी बंधवाई। एसडीएम डॉ. बबीता राठौर ने छात्राओं को मिठाई एवं उपहार भेंट कर रक्षाबंधन की शुभकामनाएं दीं। उन्होंने छात्राओं से पढ़ाई, भोजन, छात्रावास की सुविधाओं और समस्याओं की जानकारी ली तथा मेहनत और लगन से पढ़ाई कर अपने माता-पिता व शिक्षकों का नाम रोशन करने के लिए प्रेरित किया।
बीआरसी राकेश रघुवंशी ने कक्षा 10वीं और 12वीं की छात्राओं से परीक्षा की बेहतर तैयारी करने की अपील करते हुए कम से कम एक छात्रा के मेरिट सूची में स्थान बनाने का लक्ष्य रखने को कहा। कार्यक्रम में छात्राओं और अधिकारियों के बीच आत्मीयता का माहौल रहा। अंत में प्राचार्य संतोष ठाकुर ने आभार व्यक्त किया।
    user_रीतेश साहू
    रीतेश साहू
    Salesperson सोहागपुर, नर्मदापुरम, मध्य प्रदेश•
    5 hrs ago
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