तेज पिघल रहे ग्लेशियर तो धरती के ध्रुवों से गायब होने लगी है बर्फ धरती के ध्रुवों से गायब होने लगी है बर्फ, 12.5 ट्रिलियन मीट्रिक टन बर्फ बनी पानी, बढ़ा समुद्र का जलस्तर एक ओर हिमालय के ग्लेशियरों के पिघलने की रफ्तार तेज हुई है तो दूसरी ओर ध्रुवों की बर्फ का समुद्र में समाने का क्रम जारी है। पृथ्वी के वातावरण के लिए यह खबरें चिंताजनक है। एक नए शोध के अनुसार धरती के ध्रुवों से 12.5 ट्रिलियन मीट्रिक टन बर्फ गायब हो चुकी है। जिसे विलुप्त होने में करीब 50 साल का समय लगा है। उधर थर्ड पोल हिमालय के ग्लेशियरों को देखें तो वह पिघलकर पीछे खिसकने लगे हैं। आर्यभट्ट प्रेक्षण विज्ञान शोध संस्थान एरीज के वरिष्ठ वायुमंडलीय वैज्ञानिक डॉ नरेंद्र सिंह बताते हैं कि वर्ष 2018 में ग्लेशियरों के पीछे खिसकने को लेकर अध्ययन किया गया था, जो प्रतिवर्ष 20 मीटर पीछे खिसक रहे थे, लेकिन इसके बाद खिसकने की दर अधिक तेज हो चली है, जो अब प्रति वर्ष 25 मीटर पीछे खिसकने लगे हैं। ग्लेशियरों के पिघलने से हिमालय से निकलने वाली नदियों के लिए खतरा उत्पन्न होने लगे है। स्थिति यही रही तो भविष्य में नदियों में जल की मात्रा घट जाएगी और कई छोटी नदियां सूख जाएंगी। इस परिस्थिति में उत्तर भारत समेत बांग्लादेश व नेपाल समेत कुछ अन्य हिस्से प्रभावित होंगे, जो हिमालय से निकलने वाली नदियों के जल पर निर्भर हैं। उन्हें पलायन के मजबूर होना पड़ेगा। डा नरेंद्र सिंह ग्लेशियर पिघलने की मुख्य वजह ग्लोबल वार्मिंग बताते हैं। वह कहते हैं कि अभी तक हुए तमाम शोध बताते हैं कि ग्लोबल वार्मिंग का सावधिक प्रभाव बर्फीले क्षेत्रों पर पड़ रहा है। हिमालय में वैश्विक तापमान बढ़ने की दर दूसरे क्षेत्रों की अपेक्षा कहीं अधिक है। हालिया शोध बताते हैं कि हिमालय में ग्लोबल वॉर्मिंग 2 डिग्री सेल्सियस पहुंच गई है, जो वास्तव में चिंताजनक है और इस सदी के अंत तक हिमालय क्षेत्र में वैश्विक तापमान 5 से 7 डिग्री सेल्सियस तक बढ़ने का पूर्वानुमान है। यदि यह स्थिति रही तो हिमालय के ग्लेशियरों की स्थिति और बर्फ का सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है। अब जो खबर पृथ्वी के ध्रुवों से आ रही है, वह सचेत करने वाली है। नए शोध से पता चला है कि ग्रीनलैंड और अंटार्कटिका की विशाल बर्फ की मोटी चादरों में पिछले करीब पांच दशकों में भारी कमी दर्ज की गई है। वैज्ञानिकों का कहना है कि 1970 से लेकर 2023 तक के आंकड़ों के आधार पर 12.5 ट्रिलियन अमेरिकी टन (लगभग 11.3 ट्रिलियन मीट्रिक टन) बर्फ कम हो चुकी है। यह शोध उपग्रहों से लिए आंकड़ों के आधार पर किया गया है और यह शोध सबसे लंबे समय के रिकार्ड पर आधारित है। इस शोध में 27 उपग्रहों के मिशनों से लिए गए आंकड़ों का विश्लेषण है। इससे वैश्विक समुद्र के जल स्तर में लगभग 3.1 सेंटीमीटर की वृद्धि हुई है। यह अध्ययन Ice Sheet Mass Balance Inter-comparison Exercise (IMBIE) के तहत किया गया। अंतरराष्ट्रीय वैज्ञानिक टीम ने 42 स्वतंत्र उपग्रह सर्वेक्षणों और 27 उपग्रह मिशनों से मिले आंकड़ों को एक साथ विश्लेषित किया। रिकॉर्ड में ग्रीनलैंड के लिए 1972 और अंटार्कटिका के लिए 1979 से लेकर 2023 तक के आंकड़े शामिल हैं। वैज्ञानिकों के अनुसार बर्फ का नुकसान केवल सतह के पिघलने से नहीं हुआ। करीब 84 प्रतिशत बर्फ नुकसान तेज गति से समुद्र की ओर बहने वाले ग्लेशियरों के कारण हुआ, जबकि लगभग 16 प्रतिशत नुकसान सतह पर बर्फ पिघलने से जुड़ा है। गर्म समुद्री पानी के कारण बर्फ चादरों के किनारों और नीचे की ओर होने वाले बदलाव भी ग्लेशियरों की गति बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। 1990 के दशक के बाद बढ़ी बर्फ घटने की रफ्तार आंकड़ों में 1990 के दशक के बाद बर्फ नुकसान की गति में स्पष्ट तेजी दिखाई देती है। ग्रीनलैंड में 1980 के दशक के दौरान सालाना करीब 60 अरब मीट्रिक टन बर्फ कम हो रही थी, जो 2010 के दशक में बढ़कर लगभग 264 अरब टन प्रति वर्ष हो गई। अंटार्कटिका में भी इसी अवधि में बर्फ नुकसान की दर बढ़ी। हालांकि 2020 से 2023 के बीच बर्फ नुकसान में कुछ अस्थायी कमी देखी गई। वैज्ञानिकों के अनुसार पूर्वी अंटार्कटिका में अधिक बर्फबारी और ग्रीनलैंड में अपेक्षाकृत कम सतही पिघलाव ने इस अवधि में कुल नुकसान को कुछ हद तक कम किया। इसे दीर्घकालिक बर्फ नुकसान की प्रवृत्ति में बदलाव नहीं माना गया है। छह से नौ करोड़ नहीं, 60 से 90 लाख लोग अतिरिक्त जोखिम में समुद्र स्तर में करीब तीन सेंटीमीटर की वृद्धि छोटी लग सकती है, लेकिन IMBIE के सह-संस्थापक और नॉर्थम्ब्रिया यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर एंड्रयू शेफर्ड के अनुसार इससे लगभग 60 से 90 लाख अतिरिक्त लोग तटीय बाढ़ और कटाव के जोखिम में आ सकते हैं। निचले तटीय क्षेत्रों में समुद्र स्तर बढ़ने से बाढ़ और तटीय कटाव की संवेदनशीलता बढ़ती है। वैज्ञानिकों के लिए इस अध्ययन की खास अहमियत इसलिए है क्योंकि उपग्रहों से प्राप्त आधी सदी के आंकड़े बर्फ चादरों में हो रहे बदलाव को लगातार समझने में मदद करते हैं। भविष्य में समुद्र स्तर बढ़ने के अनुमानों को बेहतर बनाने के लिए ऐसे लंबे उपग्रह रिकॉर्ड महत्वपूर्ण माने जा रहे हैं। स्रोत: ESA, Northumbria University, IMBIE ESA की रिपोर्ट और आर्यभट्ट प्रेक्षण विज्ञान शोध संस्थान एरीज के पर्यावरण वैज्ञानिक डॉ नरेंद्र सिंह। फोटो कैप्शन: ग्रीनलैंड में बर्फीली चादर और ग्लेशियर। वैज्ञानिकों के अनुसार ग्रीनलैंड और अंटार्कटिका से 1970 के दशक के बाद से 12.5 ट्रिलियन अमेरिकी टन के बराबर बर्फ कम हुई है। फोटो क्रेडिट: Dr Sammie Buzzard संपादन: रमेश चंद्रा।
तेज पिघल रहे ग्लेशियर तो धरती के ध्रुवों से गायब होने लगी है बर्फ धरती के ध्रुवों से गायब होने लगी है बर्फ, 12.5 ट्रिलियन मीट्रिक टन बर्फ बनी पानी, बढ़ा समुद्र का जलस्तर एक ओर हिमालय के ग्लेशियरों के पिघलने की रफ्तार तेज हुई है तो दूसरी ओर ध्रुवों की बर्फ का समुद्र में समाने का क्रम जारी है। पृथ्वी के वातावरण के लिए यह खबरें चिंताजनक है। एक नए शोध के अनुसार धरती के ध्रुवों से 12.5 ट्रिलियन मीट्रिक टन बर्फ गायब हो चुकी है। जिसे विलुप्त होने में करीब 50 साल का समय लगा है। उधर थर्ड पोल हिमालय के ग्लेशियरों को देखें तो वह पिघलकर पीछे खिसकने लगे हैं। आर्यभट्ट प्रेक्षण विज्ञान शोध संस्थान एरीज के वरिष्ठ वायुमंडलीय वैज्ञानिक डॉ नरेंद्र सिंह बताते हैं कि वर्ष 2018 में ग्लेशियरों के पीछे खिसकने को लेकर अध्ययन किया गया था, जो प्रतिवर्ष 20 मीटर पीछे खिसक रहे थे, लेकिन इसके बाद खिसकने की दर अधिक तेज हो चली है, जो अब प्रति वर्ष 25 मीटर पीछे खिसकने लगे हैं। ग्लेशियरों के पिघलने से हिमालय से निकलने वाली नदियों के लिए खतरा उत्पन्न होने लगे है। स्थिति यही रही तो भविष्य में नदियों में जल की मात्रा घट जाएगी और कई छोटी नदियां सूख जाएंगी। इस परिस्थिति में उत्तर भारत समेत बांग्लादेश व नेपाल समेत कुछ अन्य हिस्से प्रभावित होंगे, जो हिमालय से निकलने वाली नदियों के जल पर निर्भर हैं। उन्हें पलायन के मजबूर होना पड़ेगा। डा नरेंद्र सिंह ग्लेशियर पिघलने की मुख्य वजह ग्लोबल वार्मिंग बताते हैं। वह कहते हैं कि अभी तक हुए तमाम शोध बताते हैं कि ग्लोबल वार्मिंग का सावधिक प्रभाव बर्फीले क्षेत्रों पर पड़ रहा है। हिमालय में वैश्विक तापमान बढ़ने की दर दूसरे क्षेत्रों की अपेक्षा कहीं अधिक है। हालिया शोध बताते हैं कि हिमालय में ग्लोबल वॉर्मिंग 2 डिग्री सेल्सियस पहुंच गई है, जो वास्तव में चिंताजनक है और इस सदी के अंत तक हिमालय क्षेत्र में वैश्विक तापमान 5 से 7 डिग्री सेल्सियस तक बढ़ने का पूर्वानुमान है। यदि यह स्थिति रही तो हिमालय के ग्लेशियरों की स्थिति और बर्फ का सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है। अब जो खबर पृथ्वी के ध्रुवों से आ रही है, वह सचेत करने वाली है। नए शोध से पता चला है कि ग्रीनलैंड और अंटार्कटिका की विशाल बर्फ की मोटी चादरों में पिछले करीब पांच दशकों में भारी कमी दर्ज की गई है। वैज्ञानिकों का कहना है कि 1970 से लेकर 2023 तक के आंकड़ों के आधार पर 12.5 ट्रिलियन अमेरिकी टन (लगभग 11.3 ट्रिलियन मीट्रिक टन) बर्फ कम हो चुकी है। यह शोध उपग्रहों से लिए आंकड़ों के आधार पर किया गया है और यह शोध सबसे लंबे समय के रिकार्ड पर आधारित है।
इस शोध में 27 उपग्रहों के मिशनों से लिए गए आंकड़ों का विश्लेषण है। इससे वैश्विक समुद्र के जल स्तर में लगभग 3.1 सेंटीमीटर की वृद्धि हुई है। यह अध्ययन Ice Sheet Mass Balance Inter-comparison Exercise (IMBIE) के तहत किया गया। अंतरराष्ट्रीय वैज्ञानिक टीम ने 42 स्वतंत्र उपग्रह सर्वेक्षणों और 27 उपग्रह मिशनों से मिले आंकड़ों को एक साथ विश्लेषित किया। रिकॉर्ड में ग्रीनलैंड के लिए 1972 और अंटार्कटिका के लिए 1979 से लेकर 2023 तक के आंकड़े शामिल हैं। वैज्ञानिकों के अनुसार बर्फ का नुकसान केवल सतह के पिघलने से नहीं हुआ। करीब 84 प्रतिशत बर्फ नुकसान तेज गति से समुद्र की ओर बहने वाले ग्लेशियरों के कारण हुआ, जबकि लगभग 16 प्रतिशत नुकसान सतह पर बर्फ पिघलने से जुड़ा है। गर्म समुद्री पानी के कारण बर्फ चादरों के किनारों और नीचे की ओर होने वाले बदलाव भी ग्लेशियरों की गति बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। 1990 के दशक के बाद बढ़ी बर्फ घटने की रफ्तार आंकड़ों में 1990 के दशक के बाद बर्फ नुकसान की गति में स्पष्ट तेजी दिखाई देती है। ग्रीनलैंड में 1980 के दशक के दौरान सालाना करीब 60 अरब मीट्रिक टन बर्फ कम हो रही थी, जो 2010 के दशक में बढ़कर लगभग 264 अरब टन प्रति वर्ष हो गई। अंटार्कटिका में भी इसी अवधि में बर्फ नुकसान की दर बढ़ी। हालांकि 2020 से 2023 के बीच बर्फ नुकसान में कुछ अस्थायी कमी देखी गई। वैज्ञानिकों के अनुसार पूर्वी अंटार्कटिका में अधिक बर्फबारी और ग्रीनलैंड में अपेक्षाकृत कम सतही पिघलाव ने इस अवधि में कुल नुकसान को कुछ हद तक कम किया। इसे दीर्घकालिक बर्फ नुकसान की प्रवृत्ति में बदलाव नहीं माना गया है। छह से नौ करोड़ नहीं, 60 से 90 लाख लोग अतिरिक्त जोखिम में समुद्र स्तर में करीब तीन सेंटीमीटर की वृद्धि छोटी लग सकती है, लेकिन IMBIE के सह-संस्थापक और नॉर्थम्ब्रिया यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर एंड्रयू शेफर्ड के अनुसार इससे लगभग 60 से 90 लाख अतिरिक्त लोग तटीय बाढ़ और कटाव के जोखिम में आ सकते हैं। निचले तटीय क्षेत्रों में समुद्र स्तर बढ़ने से बाढ़ और तटीय कटाव की संवेदनशीलता बढ़ती है। वैज्ञानिकों के लिए इस अध्ययन की खास अहमियत इसलिए है क्योंकि उपग्रहों से प्राप्त आधी सदी के आंकड़े बर्फ चादरों में हो रहे बदलाव को लगातार समझने में मदद करते हैं। भविष्य में समुद्र स्तर बढ़ने के अनुमानों को बेहतर बनाने के लिए ऐसे लंबे उपग्रह रिकॉर्ड महत्वपूर्ण माने जा रहे हैं। स्रोत: ESA, Northumbria University, IMBIE ESA की रिपोर्ट और आर्यभट्ट प्रेक्षण विज्ञान शोध संस्थान एरीज के पर्यावरण वैज्ञानिक डॉ नरेंद्र सिंह। फोटो कैप्शन: ग्रीनलैंड में बर्फीली चादर और ग्लेशियर। वैज्ञानिकों के अनुसार ग्रीनलैंड और अंटार्कटिका से 1970 के दशक के बाद से 12.5 ट्रिलियन अमेरिकी टन के बराबर बर्फ कम हुई है। फोटो क्रेडिट: Dr Sammie Buzzard संपादन: रमेश चंद्रा।
- Dr, dr Dr, drओखलकांडा, नैनीताल, उत्तराखंड🙏19 hrs ago
- • नैनीताल बैंक का रिकॉर्ड प्रदर्शन: नेटवर्थ में 26.86% का सुधार, एमडी सुशी कुमार लाल ने साझा किए आंकड़े नैनीताल। द नैनीताल बैंक लिमिटेड की 104वीं वार्षिक आम बैठक में वित्त वर्ष 2025-26 के शानदार वित्तीय नतीजे घोषित किए गए। बैंक के परिचालन लाभ में 30.66% की वृद्धि दर्ज की गई, जो बढ़कर 116.33 करोड़ रुपये हो गया। वहीं, शुद्ध लाभ भी 24.96% की बढ़त के साथ 63.24 करोड़ रुपये पर पहुँच गया। एमडी एवं सीईओ सुशी कुमार लाल के अनुसार, बैंक का कुल व्यवसाय 6.75% बढ़कर 14,118.02 करोड़ रुपये हो गया है। इसके अलावा, नेटवर्थ में 26.86% का सुधार हुआ है और शुद्ध एनपीए घटकर महज 0.27% रह गया है। बैंक ने डिजिटल बैंकिंग को मजबूत करने के लिए 'नैनी नियो' ऐप और साउंड बॉक्स जैसी नई सुविधाएँ भी शुरू की हैं।1
- लेजर होटल्स ग्रुप का स्थापना दिवस धूमधाम से मनाया गया।। नैनीताल के प्रतिष्ठित होटल नैनी रिट्रीट में मंगलवार को लेजर होटल्स ग्रुप का 37 वां स्थापना दिवस समारोह धूमधाम से मनाया गया। इस अवसर पर लेजर ग्रुप की उपलब्धियों का बखान किया गया और होटल समूह द्वारा पर्वतीय क्षेत्र के पर्यटन को बढ़ावा देने स्थानीय युवाओं को रोजगार प्रदान किए जाने में सहयोग दिए जाने की बात कही गई। इस अवसर पर सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित जीत किए। जिनमें कुमाऊंनी और लोक गीतों की धूम रही। साथ ही कुमाऊनी व्यंजन परोसे गए। केक काटकर कार्यक्रम का शुभारंभ किया गया। अतिथियों का कुमाऊनी परंपरा के अनुसार स्वागत किया गया। समारोह में नगर के होटल और पर्यटन कारोबारियों समेत होटल कर्मचारियों, पर्यटक भी शामिल हुए। इस अवसर पर नैनीताल होटल एंड रेस्टोरेंट एसोसिएशन अध्यक्ष दिग्विजय सिंह बिष्ट, महासचिव वेद साह, कमल बोरा, महाप्रबंधक डीएस जीना, यूएस राणा, हरीश सिंह परिहार,धीरज उप्रेती, संजय,सुरेश,पवन और श्याम समेत अन्य लोग मौजूद थे।2
- छात्रसंघ चुनाव को लेकर नैनीताल पुलिस मुस्तैद, की जा रही है सघन निगरानी और चेकिंग SSP डॉ. मंजूनाथ टी.सी. के निर्देशन में छात्रसंघ चुनाव को सकुशल एवं शांतिपूर्ण संपन्न कराने हेतु नैनीताल पुलिस द्वारा शहर के प्रमुख चौक-चौराहों एवं डायवर्जन प्वाइंटों पर पुलिस बल तैनात कर सघन निगरानी एवं चेकिंग की जा रही है। डिग्री कॉलेज तिराहा, कुल्यालपुरा चौराहा, तिकोनिया, नरीमन तिराहा काठगोदाम, कॉलटैक्स तिराहा सहित प्रमुख डायवर्जन प्वाइंटों पर पुलिस मुस्तैद है।1
- Mbpg कॉलेज में फिर बवाल आपस में भिड़े दो छात्रों गुट Haldwani1
- आशाओं ने की मानदेय बढ़ाने और स्थायी कर्मचारी का दर्जा देने की मांग अल्मोड़ा। मानदेय वृद्धि, नियमितीकरण समेत विभिन्न मांगों को लेकर ऐक्टू से संबद्ध उत्तराखंड आशा हेल्थ वर्कर्स यूनियन ने मंगलवार को नगर के गांधी पार्क में धरना-प्रदर्शन किया। इस दौरान आशा कार्यकर्ताओं ने सरकार के खिलाफ नारेबाजी करते हुए अपनी मांगों के जल्द समाधान की मांग उठाई। वक्ताओं ने कहा कि 31 अगस्त 2021 को खटीमा वार्ता में सरकार ने आशाओं को 11,500 रुपये मासिक मानदेय देने का वादा किया था, लेकिन करीब पांच साल बीतने के बाद भी यह प्रस्ताव लागू नहीं हुआ है। उन्होंने कहा कि आशाएं 24 घंटे मातृ-शिशु सुरक्षा से जुड़ी सेवाओं में जुटी रहती हैं, इसके बावजूद उन्हें दैनिक मजदूर से भी कम भुगतान किया जा रहा है। प्रदर्शन के दौरान आशा कार्यकर्ताओं ने दरज़ामंत्री कुंदन लटवाल के माध्यम से मुख्यमंत्री को ज्ञापन भेजा। ज्ञापन में वर्ष 2021 के प्रस्ताव को तत्काल लागू करने, आशाओं को स्थायी कर्मचारी का दर्जा देने और सेवानिवृत्ति के बाद आजीवन पेंशन की नीति बनाने की मांग की गई। आशाओं ने कहा कि जब तक स्थायी कर्मचारी का दर्जा नहीं दिया जाता, तब तक सेवामुक्त होने वाली आशाओं को 10 लाख रुपये की एकमुश्त राशि दी जाए। इसके अलावा महीनों से लंबित भुगतान जारी करने, पल्स पोलियो अभियान और प्रशिक्षण के लिए 500 रुपये प्रतिदिन का भत्ता देने तथा सरकारी अस्पतालों में आशाओं के साथ होने वाली बदसलूकी पर रोक लगाने की मांग भी की गई। आशा कार्यकर्ताओं ने चेतावनी दी कि यदि उनकी मांगों पर सकारात्मक कार्रवाई नहीं हुई तो वे आंदोलन को और उग्र करने के लिए मजबूर होंगी।1
- जय बद्री विशाल प्रभु सभी भक्तों पर कृपा कीजिए जय श्री बद्री विशाल1