चमत्कारी बालाजी मंदिर में ऐतिहासिक प्रथम हनुमान जन्मोत्सव कार्यक्रम हुआ संम्पन्न भक्ति के रंग में डूबा चिकारड़ा दिन रात गूंजे मंगल गीत चिकारड़ा- साँवलिया जी चौराहा स्थित चमत्कारी बालाजी मंदिर के इतिहास में आज का दिन स्वर्ण अक्षरों में दर्ज हो गया। मंदिर में पहला हनुमान जन्मोत्सव अत्यंत भव्यता और श्रद्धा के साथ मनाया गया। सुबह से शुरू हुआ उत्सव देर रात तक जारी रहा, आयोजित कार्यक्रम में क्षेत्र के सैकड़ों श्रद्धालुओं ने भाग लिया। इस मौके पर हनुमान जी मंदिर पर संध्या के समय विशेष आरती पूजा के साथ बालाजी महाराज को 16 किलो आटे का विशाल रोट अर्पित किया गया। ढोल-नगाड़ों की गूंज के बीच श्रद्धालुओं ने मिठाइयों का भोग लगाकर महाआरती की। विशेष आकर्षण महिलाओं का घूमर नृत्य रहा ढोल की थाप पर महिलाओं ने राजस्थानी नृत्य घूमर करते हुए अपने श्रद्धा अपनी आस्था अपना विश्वास बालाजी महाराज के सामने प्रकट किया । मंशापूर्ण महादेव की सेवा और भंडार दर्शन मंदिर प्रांगण में विराजित मंशापूर्ण महादेव को भी वैशाख के महीने में शीतलता प्रदान करने हेतु 'गलती' (पानी का घड़ा) बांधी गई। जिससे भोलेनाथ को शितिलता मिलती रहे। चैत्र पूर्णिमा के पावन अवसर पर बालाजी का भंडार खोला गया, जिसमें ₹10,745 की दान राशि प्राप्त हुई। देर रात तक चलता रहा भजनों का दौर यह आयोजन इस पर्व खास क्यों रहा यह आयोजन इस दिन खास इसलिए रहा कि उक्त मंदिर स्थापना के बाद पहला मौका होगा कि हनुमानजी का जन्मोत्सव मनाया गया । आरती और भोग के बाद भी भक्तों का उत्साह कम नहीं हुआ। देर रात तक महिलाएं मंदिर परिसर में एकत्रित होकर मंगल गीत और भजन गाती रहीं, जिससे पूरा वातावरण भक्ति के रस में सराबोर रहा। सेवादारों का रहा विशेष सहयोग मुख्य पुजारी हीरालाल वैष्णव के सानिध्य में संपन्न हुए इस कार्यक्रम में अम्बा लाल लोहार, दिनेश गायरी, देवी लाल लोहार, रमेश गायरी, नाना लाल सुथार, सागर , भगवती लाल लोहार, रामेश्वर खंडेलवाल सहित कई ग्रामीणों ने अपनी निस्वार्थ सेवाएं दीं। मान्यता यह है कि साँवलिया जी मुख्य मार्ग पर स्थित इस दरबार के बारे में कहा जाता है कि यहाँ आने वाला कोई भी भक्त खाली हाथ नहीं जाता। सच्चे मन से की गई हर मुराद यहाँ अवश्य पूरी होती है।
चमत्कारी बालाजी मंदिर में ऐतिहासिक प्रथम हनुमान जन्मोत्सव कार्यक्रम हुआ संम्पन्न भक्ति के रंग में डूबा चिकारड़ा दिन रात गूंजे मंगल गीत चिकारड़ा- साँवलिया जी चौराहा स्थित चमत्कारी बालाजी मंदिर के इतिहास में आज का दिन स्वर्ण अक्षरों में दर्ज हो गया। मंदिर में पहला हनुमान जन्मोत्सव अत्यंत भव्यता और श्रद्धा के साथ मनाया गया। सुबह से शुरू हुआ उत्सव देर रात तक जारी रहा, आयोजित कार्यक्रम में क्षेत्र के सैकड़ों श्रद्धालुओं ने भाग लिया। इस मौके पर हनुमान जी मंदिर पर संध्या के समय विशेष आरती पूजा के साथ बालाजी महाराज को 16 किलो आटे का विशाल रोट अर्पित किया गया। ढोल-नगाड़ों की गूंज के बीच श्रद्धालुओं ने मिठाइयों का भोग लगाकर महाआरती की। विशेष आकर्षण महिलाओं का
घूमर नृत्य रहा ढोल की थाप पर महिलाओं ने राजस्थानी नृत्य घूमर करते हुए अपने श्रद्धा अपनी आस्था अपना विश्वास बालाजी महाराज के सामने प्रकट किया । मंशापूर्ण महादेव की सेवा और भंडार दर्शन मंदिर प्रांगण में विराजित मंशापूर्ण महादेव को भी वैशाख के महीने में शीतलता प्रदान करने हेतु 'गलती' (पानी का घड़ा) बांधी गई। जिससे भोलेनाथ को शितिलता मिलती रहे। चैत्र पूर्णिमा के पावन अवसर पर बालाजी का भंडार खोला गया, जिसमें ₹10,745 की दान राशि प्राप्त हुई। देर रात तक चलता रहा भजनों का दौर यह आयोजन इस पर्व खास क्यों रहा यह आयोजन इस दिन खास इसलिए रहा कि उक्त मंदिर स्थापना के बाद पहला मौका होगा कि हनुमानजी का जन्मोत्सव मनाया गया । आरती
और भोग के बाद भी भक्तों का उत्साह कम नहीं हुआ। देर रात तक महिलाएं मंदिर परिसर में एकत्रित होकर मंगल गीत और भजन गाती रहीं, जिससे पूरा वातावरण भक्ति के रस में सराबोर रहा। सेवादारों का रहा विशेष सहयोग मुख्य पुजारी हीरालाल वैष्णव के सानिध्य में संपन्न हुए इस कार्यक्रम में अम्बा लाल लोहार, दिनेश गायरी, देवी लाल लोहार, रमेश गायरी, नाना लाल सुथार, सागर , भगवती लाल लोहार, रामेश्वर खंडेलवाल सहित कई ग्रामीणों ने अपनी निस्वार्थ सेवाएं दीं। मान्यता यह है कि साँवलिया जी मुख्य मार्ग पर स्थित इस दरबार के बारे में कहा जाता है कि यहाँ आने वाला कोई भी भक्त खाली हाथ नहीं जाता। सच्चे मन से की गई हर मुराद यहाँ अवश्य पूरी होती है।
- छोटी सादड़ी जिला अफीम अधिकारी आशीष भटनागर ने बताया कि उपखंड क्षेत्र के लगभग 4000 काश्तकार अपनी अफीम की फसल के उपज नारकोटिक्स विभाग के अधिकारियों को तोड़ लेंगे किसानों के छाया पानी की समुचित व्यवस्था की गई है4
- 🌹🙏🙏🏻🌹SRI Lakshminath Bhagvan ♥️ SIV SANKAR Ji Vasakraj 🙏🏽 Maharaj GOVIND SAWARIYA SETH 🌺 🙏🏽 JI Aapki JAY Ho SDA SARVDA AAP HI AAP HO HARI OM OM NMO BHAGVATE VASUYDEVAY HARI OM OM NMO BHAGVATE VASUYDEVAY HARI OM OM NMO BHAGVATE VASUYDEVAY HARI OM 🕉 SIVAY NAMAH1
- चित्तौड़गढ़ जिले में ‘मौताणा’ (मृत्यु पर मुआवजा देने की प्रथा) अब एक गंभीर सामाजिक और औद्योगिक चुनौती का रूप ले चुकी है। ताजा मामला शम्भूपुरा क्षेत्र का है, जहां एक हादसे के बाद फिर से यह परंपरा चर्चा में आ गई और फैक्ट्री प्रबंधन पर मुआवजे को लेकर दबाव बना। जानकारी के अनुसार, जोरावर खेड़ा निवासी 34 वर्षीय आजाद सिंह चुंडावत उर्फ चंदू, जो आदित्य सीमेंट फैक्ट्री में ठेका पद्धति पर कार्यरत था, गुरुवार रात ड्यूटी समाप्त होने के करीब पांच घंटे बाद घर लौट रहा था। इस दौरान शम्भूपुरा गोशाला के सामने, फैक्ट्री से लगभग दो किलोमीटर दूरी पर उसकी बाइक एक बैल से टकरा गई। गंभीर रूप से घायल आजाद सिंह को जिला चिकित्सालय ले जाया गया, जहां उपचार के दौरान उसकी मृत्यु हो गई। मृतक के परिवार में पांच वर्षीय एक बच्चा है, जबकि उसकी पत्नी गर्भवती है। घटना की सूचना मिलते ही शुक्रवार सुबह से ही समाजजन बड़ी संख्या में आदित्य सीमेंट फैक्ट्री के बाहर एकत्रित हो गए और 25 लाख रुपये मुआवजा, परिवार के एक सदस्य को नौकरी तथा बच्चों की आजीवन शिक्षा का खर्च उठाने की मांग करने लगे। मौके पर शम्भूपुरा थाना अधिकारी और पुलिस उपाधीक्षक मय जाप्ता पहुंचे और स्थिति को नियंत्रित किया। फैक्ट्री प्रबंधन और समाजजनों के बीच लंबी वार्ता के बाद दोपहर लगभग तीन बजे समझौता हुआ। आदित्य सिमेंट फेक्ट्री प्रबंधन ने मानवीय आधार पर 15 लाख रुपये मुआवजा, पीएफ सहित अन्य देयकों का भुगतान तथा मृतक की पत्नी को ठेका पद्धति पर रोजगार देने का आश्वासन दिया। इसके बाद मामला शांत हुआ। उल्लेखनीय है कि दुर्घटना के समय मृतक ड्यूटी पर नहीं था, फिर भी औद्योगिक कार्य में बाधा न आए और सामाजिक तनाव से बचने के उद्देश्य से प्रबंधन ने यह निर्णय लिया। मौताणा प्रथा: परंपरा बनाम कानून चित्तौड़गढ़ जिले में ‘मौताणा’ की प्रथा वर्ष 2000 के आसपास हिन्दुस्तान जिंक में शुरू हुई मानी जाती है और धीरे-धीरे यह एक सामाजिक दबाव का रूप ले चुकी है। किसी कर्मचारी—चाहे वह स्थायी हो या अस्थायी—की बीमारी या दुर्घटना से मृत्यु होने पर परिजन और समाजजन संबंधित फैक्ट्री से मुआवजा मांगते हैं, भले ही घटना कार्यस्थल या ड्यूटी के दौरान न हुई हो। कानूनी दृष्टि से, मुआवजा केवल उन मामलों में देय होता है, जहां मृत्यु कार्यस्थल पर या कार्य से संबंधित कारणों से हुई हो, जैसा कि श्रम कानूनों और कर्मचारी क्षतिपूर्ति अधिनियम में प्रावधानित है। इसके विपरीत, ‘मौताणा’ सामाजिक परंपरा पर आधारित है, जिसका कानून में कोई स्पष्ट प्रावधान नहीं है। औद्योगिक प्रबंधन की दुविधा फैक्ट्री प्रबंधन अक्सर उत्पादन बाधित होने, आर्थिक नुकसान और श्रमिक असंतोष या यूनियनबाजी से बचने के लिए दबाव में आकर मुआवजा देने को विवश हो जाते हैं। इससे यह प्रथा और अधिक मजबूत होती जा रही है। कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यदि इस विषय पर प्रशासनिक स्तर पर स्पष्ट दिशा-निर्देश और सख्ती नहीं अपनाई गई, तो भविष्य में यह प्रथा उद्योगों के लिए बड़ी समस्या बन सकती है। प्रशासन की भूमिका आवश्यक इस तरह की घटनाएं यह संकेत देती हैं कि सामाजिक संवेदनाओं और कानूनी प्रावधानों के बीच संतुलन बनाने की आवश्यकता है। प्रशासन, उद्योग और समाज के बीच संवाद स्थापित कर इस प्रथा को नियंत्रित करना समय की मांग बन चुका है।1
- Post by Lucky sukhwal1
- Ramesh Aeena👍 Ramesh Aeena Ramesh Ramesh Aeena👍 Ramesh Aeena👍 Ramesh Aeena👍 Ramesh Aeena👍 Ramesh Aeena👍 Ramesh Aeena👍 Ramesh Aeena👍 Ramesh Aeena👍 Ramesh Aeena👍 Ramesh Aeena👍 Ramesh Aeena👍4
- प्रतापगढ़ शहर के गांधी चौराहा पर उस वक्त हड़कंप मच गया… जब एक खड़ी बाइक में अचानक आग लग गई… 🔥 देखते ही देखते बाइक आग की लपटों में घिर गई… और मौके पर अफरा-तफरी का माहौल बन गया… 👮♂️ लेकिन इसी बीच… मौके पर मौजूद पुलिसकर्मी प्रकाश जी आचार्य ने बहादुरी और सूझबूझ दिखाते हुए… तुरंत आग पर काबू पा लिया… ✅ जिससे एक बड़ा हादसा टल गया… 👀 प्रत्यक्षदर्शियों के मुताबिक… अगर समय रहते आग नहीं बुझाई जाती… तो आसपास खड़े अन्य वाहनों को भी नुकसान हो सकता था… 🔥 देखते ही देखते बाइक आग की लपटों में घिर गई… और मौके पर अफरा-तफरी का माहौल बन गया… 👮♂️ लेकिन इसी बीच… मौके पर मौजूद पुलिसकर्मी प्रकाश जी आचार्य ने बहादुरी और सूझबूझ दिखाते हुए… तुरंत आग पर काबू पा लिया… ✅ जिससे एक बड़ा हादसा टल गया… 👀 प्रत्यक्षदर्शियों के मुताबिक… अगर समय रहते आग नहीं बुझाई जाती… तो आसपास खड़े अन्य वाहनों को भी नुकसान हो सकता था…1
- गांव अचारी पोस्ट सुबी तहसील छोटी सादड़ी जिला प्रतापगढ़ राजस्थान 9660737539 90790081071
- छोटी सादड़ी यादव मोहल्ला स्थित बालाजी के मंदिर से हनुमान जी का जुलुस गांधी चौराहे पर पहुंचा गांधी चौराहे पर नगर पालिका अधिशासी अधिकारी मुकेश मोहिल व स्टाफ ने जुलूस का स्वागत किया4
- चित्तौड़गढ़ जिले में ‘मौताणा’ (मृत्यु पर मुआवजा देने की प्रथा) अब एक गंभीर सामाजिक और औद्योगिक चुनौती का रूप ले चुकी है। ताजा मामला शम्भूपुरा क्षेत्र का है, जहां एक हादसे के बाद फिर से यह परंपरा चर्चा में आ गई और फैक्ट्री प्रबंधन पर मुआवजे को लेकर दबाव बना। जानकारी के अनुसार, जोरावर खेड़ा निवासी 34 वर्षीय आजाद सिंह चुंडावत उर्फ चंदू, जो आदित्य सीमेंट फैक्ट्री में ठेका पद्धति पर कार्यरत था, गुरुवार रात ड्यूटी समाप्त होने के करीब पांच घंटे बाद घर लौट रहा था। इस दौरान शम्भूपुरा गोशाला के सामने, फैक्ट्री से लगभग दो किलोमीटर दूरी पर उसकी बाइक एक बैल से टकरा गई। गंभीर रूप से घायल आजाद सिंह को जिला चिकित्सालय ले जाया गया, जहां उपचार के दौरान उसकी मृत्यु हो गई। मृतक के परिवार में पांच वर्षीय एक बच्चा है, जबकि उसकी पत्नी गर्भवती है। घटना की सूचना मिलते ही शुक्रवार सुबह से ही समाजजन बड़ी संख्या में आदित्य सीमेंट फैक्ट्री के बाहर एकत्रित हो गए और 25 लाख रुपये मुआवजा, परिवार के एक सदस्य को नौकरी तथा बच्चों की आजीवन शिक्षा का खर्च उठाने की मांग करने लगे। मौके पर शम्भूपुरा थाना अधिकारी और पुलिस उपाधीक्षक मय जाप्ता पहुंचे और स्थिति को नियंत्रित किया। फैक्ट्री प्रबंधन और समाजजनों के बीच लंबी वार्ता के बाद दोपहर लगभग तीन बजे समझौता हुआ। आदित्य सिमेंट फेक्ट्री प्रबंधन ने मानवीय आधार पर 15 लाख रुपये मुआवजा, पीएफ सहित अन्य देयकों का भुगतान तथा मृतक की पत्नी को ठेका पद्धति पर रोजगार देने का आश्वासन दिया। इसके बाद मामला शांत हुआ। उल्लेखनीय है कि दुर्घटना के समय मृतक ड्यूटी पर नहीं था, फिर भी औद्योगिक कार्य में बाधा न आए और सामाजिक तनाव से बचने के उद्देश्य से प्रबंधन ने यह निर्णय लिया। मौताणा प्रथा: परंपरा बनाम कानून चित्तौड़गढ़ जिले में ‘मौताणा’ की प्रथा वर्ष 2000 के आसपास हिन्दुस्तान जिंक में शुरू हुई मानी जाती है और धीरे-धीरे यह एक सामाजिक दबाव का रूप ले चुकी है। किसी कर्मचारी—चाहे वह स्थायी हो या अस्थायी—की बीमारी या दुर्घटना से मृत्यु होने पर परिजन और समाजजन संबंधित फैक्ट्री से मुआवजा मांगते हैं, भले ही घटना कार्यस्थल या ड्यूटी के दौरान न हुई हो। कानूनी दृष्टि से, मुआवजा केवल उन मामलों में देय होता है, जहां मृत्यु कार्यस्थल पर या कार्य से संबंधित कारणों से हुई हो, जैसा कि श्रम कानूनों और कर्मचारी क्षतिपूर्ति अधिनियम में प्रावधानित है। इसके विपरीत, ‘मौताणा’ सामाजिक परंपरा पर आधारित है, जिसका कानून में कोई स्पष्ट प्रावधान नहीं है। औद्योगिक प्रबंधन की दुविधा फैक्ट्री प्रबंधन अक्सर उत्पादन बाधित होने, आर्थिक नुकसान और श्रमिक असंतोष या यूनियनबाजी से बचने के लिए दबाव में आकर मुआवजा देने को विवश हो जाते हैं। इससे यह प्रथा और अधिक मजबूत होती जा रही है। कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यदि इस विषय पर प्रशासनिक स्तर पर स्पष्ट दिशा-निर्देश और सख्ती नहीं अपनाई गई, तो भविष्य में यह प्रथा उद्योगों के लिए बड़ी समस्या बन सकती है। प्रशासन की भूमिका आवश्यक इस तरह की घटनाएं यह संकेत देती हैं कि सामाजिक संवेदनाओं और कानूनी प्रावधानों के बीच संतुलन बनाने की आवश्यकता है। प्रशासन, उद्योग और समाज के बीच संवाद स्थापित कर इस प्रथा को नियंत्रित करना समय की मांग बन चुका है।4