मौताणे की बढ़ती प्रथा बनी चित्तौड़गढ़ की फैक्ट्रियों के लिए सिरदर्द, हादसे के बाद मुआवजे को लेकर फिर बढ़ा विवाद चित्तौड़गढ़ जिले में ‘मौताणा’ (मृत्यु पर मुआवजा देने की प्रथा) अब एक गंभीर सामाजिक और औद्योगिक चुनौती का रूप ले चुकी है। ताजा मामला शम्भूपुरा क्षेत्र का है, जहां एक हादसे के बाद फिर से यह परंपरा चर्चा में आ गई और फैक्ट्री प्रबंधन पर मुआवजे को लेकर दबाव बना। जानकारी के अनुसार, जोरावर खेड़ा निवासी 34 वर्षीय आजाद सिंह चुंडावत उर्फ चंदू, जो आदित्य सीमेंट फैक्ट्री में ठेका पद्धति पर कार्यरत था, गुरुवार रात ड्यूटी समाप्त होने के करीब पांच घंटे बाद घर लौट रहा था। इस दौरान शम्भूपुरा गोशाला के सामने, फैक्ट्री से लगभग दो किलोमीटर दूरी पर उसकी बाइक एक बैल से टकरा गई। गंभीर रूप से घायल आजाद सिंह को जिला चिकित्सालय ले जाया गया, जहां उपचार के दौरान उसकी मृत्यु हो गई। मृतक के परिवार में पांच वर्षीय एक बच्चा है, जबकि उसकी पत्नी गर्भवती है। घटना की सूचना मिलते ही शुक्रवार सुबह से ही समाजजन बड़ी संख्या में आदित्य सीमेंट फैक्ट्री के बाहर एकत्रित हो गए और 25 लाख रुपये मुआवजा, परिवार के एक सदस्य को नौकरी तथा बच्चों की आजीवन शिक्षा का खर्च उठाने की मांग करने लगे। मौके पर शम्भूपुरा थाना अधिकारी और पुलिस उपाधीक्षक मय जाप्ता पहुंचे और स्थिति को नियंत्रित किया। फैक्ट्री प्रबंधन और समाजजनों के बीच लंबी वार्ता के बाद दोपहर लगभग तीन बजे समझौता हुआ। आदित्य सिमेंट फेक्ट्री प्रबंधन ने मानवीय आधार पर 15 लाख रुपये मुआवजा, पीएफ सहित अन्य देयकों का भुगतान तथा मृतक की पत्नी को ठेका पद्धति पर रोजगार देने का आश्वासन दिया। इसके बाद मामला शांत हुआ। उल्लेखनीय है कि दुर्घटना के समय मृतक ड्यूटी पर नहीं था, फिर भी औद्योगिक कार्य में बाधा न आए और सामाजिक तनाव से बचने के उद्देश्य से प्रबंधन ने यह निर्णय लिया। मौताणा प्रथा: परंपरा बनाम कानून चित्तौड़गढ़ जिले में ‘मौताणा’ की प्रथा वर्ष 2000 के आसपास हिन्दुस्तान जिंक में शुरू हुई मानी जाती है और धीरे-धीरे यह एक सामाजिक दबाव का रूप ले चुकी है। किसी कर्मचारी—चाहे वह स्थायी हो या अस्थायी—की बीमारी या दुर्घटना से मृत्यु होने पर परिजन और समाजजन संबंधित फैक्ट्री से मुआवजा मांगते हैं, भले ही घटना कार्यस्थल या ड्यूटी के दौरान न हुई हो। कानूनी दृष्टि से, मुआवजा केवल उन मामलों में देय होता है, जहां मृत्यु कार्यस्थल पर या कार्य से संबंधित कारणों से हुई हो, जैसा कि श्रम कानूनों और कर्मचारी क्षतिपूर्ति अधिनियम में प्रावधानित है। इसके विपरीत, ‘मौताणा’ सामाजिक परंपरा पर आधारित है, जिसका कानून में कोई स्पष्ट प्रावधान नहीं है। औद्योगिक प्रबंधन की दुविधा फैक्ट्री प्रबंधन अक्सर उत्पादन बाधित होने, आर्थिक नुकसान और श्रमिक असंतोष या यूनियनबाजी से बचने के लिए दबाव में आकर मुआवजा देने को विवश हो जाते हैं। इससे यह प्रथा और अधिक मजबूत होती जा रही है। कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यदि इस विषय पर प्रशासनिक स्तर पर स्पष्ट दिशा-निर्देश और सख्ती नहीं अपनाई गई, तो भविष्य में यह प्रथा उद्योगों के लिए बड़ी समस्या बन सकती है। प्रशासन की भूमिका आवश्यक इस तरह की घटनाएं यह संकेत देती हैं कि सामाजिक संवेदनाओं और कानूनी प्रावधानों के बीच संतुलन बनाने की आवश्यकता है। प्रशासन, उद्योग और समाज के बीच संवाद स्थापित कर इस प्रथा को नियंत्रित करना समय की मांग बन चुका है।
मौताणे की बढ़ती प्रथा बनी चित्तौड़गढ़ की फैक्ट्रियों के लिए सिरदर्द, हादसे के बाद मुआवजे को लेकर फिर बढ़ा विवाद चित्तौड़गढ़ जिले में ‘मौताणा’ (मृत्यु पर मुआवजा देने की प्रथा) अब एक गंभीर सामाजिक और औद्योगिक चुनौती का रूप ले चुकी है। ताजा मामला शम्भूपुरा क्षेत्र का है, जहां एक हादसे के बाद फिर से यह परंपरा चर्चा में आ गई और फैक्ट्री प्रबंधन पर मुआवजे को लेकर दबाव बना। जानकारी के अनुसार, जोरावर खेड़ा निवासी 34 वर्षीय आजाद सिंह चुंडावत उर्फ चंदू, जो आदित्य सीमेंट फैक्ट्री में ठेका पद्धति पर कार्यरत था, गुरुवार रात ड्यूटी समाप्त होने के करीब पांच घंटे बाद घर लौट रहा था। इस दौरान शम्भूपुरा गोशाला के सामने, फैक्ट्री से लगभग दो किलोमीटर दूरी पर उसकी बाइक एक बैल से टकरा गई। गंभीर रूप से घायल आजाद सिंह को जिला
चिकित्सालय ले जाया गया, जहां उपचार के दौरान उसकी मृत्यु हो गई। मृतक के परिवार में पांच वर्षीय एक बच्चा है, जबकि उसकी पत्नी गर्भवती है। घटना की सूचना मिलते ही शुक्रवार सुबह से ही समाजजन बड़ी संख्या में आदित्य सीमेंट फैक्ट्री के बाहर एकत्रित हो गए और 25 लाख रुपये मुआवजा, परिवार के एक सदस्य को नौकरी तथा बच्चों की आजीवन शिक्षा का खर्च उठाने की मांग करने लगे। मौके पर शम्भूपुरा थाना अधिकारी और पुलिस उपाधीक्षक मय जाप्ता पहुंचे और स्थिति को नियंत्रित किया। फैक्ट्री प्रबंधन और समाजजनों के बीच लंबी वार्ता के बाद दोपहर लगभग तीन बजे समझौता हुआ। आदित्य सिमेंट फेक्ट्री प्रबंधन ने मानवीय आधार पर 15 लाख रुपये मुआवजा, पीएफ सहित अन्य देयकों का भुगतान तथा मृतक की पत्नी को ठेका पद्धति पर रोजगार देने का आश्वासन दिया। इसके बाद
मामला शांत हुआ। उल्लेखनीय है कि दुर्घटना के समय मृतक ड्यूटी पर नहीं था, फिर भी औद्योगिक कार्य में बाधा न आए और सामाजिक तनाव से बचने के उद्देश्य से प्रबंधन ने यह निर्णय लिया। मौताणा प्रथा: परंपरा बनाम कानून चित्तौड़गढ़ जिले में ‘मौताणा’ की प्रथा वर्ष 2000 के आसपास हिन्दुस्तान जिंक में शुरू हुई मानी जाती है और धीरे-धीरे यह एक सामाजिक दबाव का रूप ले चुकी है। किसी कर्मचारी—चाहे वह स्थायी हो या अस्थायी—की बीमारी या दुर्घटना से मृत्यु होने पर परिजन और समाजजन संबंधित फैक्ट्री से मुआवजा मांगते हैं, भले ही घटना कार्यस्थल या ड्यूटी के दौरान न हुई हो। कानूनी दृष्टि से, मुआवजा केवल उन मामलों में देय होता है, जहां मृत्यु कार्यस्थल पर या कार्य से संबंधित कारणों से हुई हो, जैसा कि श्रम कानूनों और कर्मचारी क्षतिपूर्ति अधिनियम में प्रावधानित है।
इसके विपरीत, ‘मौताणा’ सामाजिक परंपरा पर आधारित है, जिसका कानून में कोई स्पष्ट प्रावधान नहीं है। औद्योगिक प्रबंधन की दुविधा फैक्ट्री प्रबंधन अक्सर उत्पादन बाधित होने, आर्थिक नुकसान और श्रमिक असंतोष या यूनियनबाजी से बचने के लिए दबाव में आकर मुआवजा देने को विवश हो जाते हैं। इससे यह प्रथा और अधिक मजबूत होती जा रही है। कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यदि इस विषय पर प्रशासनिक स्तर पर स्पष्ट दिशा-निर्देश और सख्ती नहीं अपनाई गई, तो भविष्य में यह प्रथा उद्योगों के लिए बड़ी समस्या बन सकती है। प्रशासन की भूमिका आवश्यक इस तरह की घटनाएं यह संकेत देती हैं कि सामाजिक संवेदनाओं और कानूनी प्रावधानों के बीच संतुलन बनाने की आवश्यकता है। प्रशासन, उद्योग और समाज के बीच संवाद स्थापित कर इस प्रथा को नियंत्रित करना समय की मांग बन चुका है।
- चित्तौड़गढ़ जिले में ‘मौताणा’ (मृत्यु पर मुआवजा देने की प्रथा) अब एक गंभीर सामाजिक और औद्योगिक चुनौती का रूप ले चुकी है। ताजा मामला शम्भूपुरा क्षेत्र का है, जहां एक हादसे के बाद फिर से यह परंपरा चर्चा में आ गई और फैक्ट्री प्रबंधन पर मुआवजे को लेकर दबाव बना। जानकारी के अनुसार, जोरावर खेड़ा निवासी 34 वर्षीय आजाद सिंह चुंडावत उर्फ चंदू, जो आदित्य सीमेंट फैक्ट्री में ठेका पद्धति पर कार्यरत था, गुरुवार रात ड्यूटी समाप्त होने के करीब पांच घंटे बाद घर लौट रहा था। इस दौरान शम्भूपुरा गोशाला के सामने, फैक्ट्री से लगभग दो किलोमीटर दूरी पर उसकी बाइक एक बैल से टकरा गई। गंभीर रूप से घायल आजाद सिंह को जिला चिकित्सालय ले जाया गया, जहां उपचार के दौरान उसकी मृत्यु हो गई। मृतक के परिवार में पांच वर्षीय एक बच्चा है, जबकि उसकी पत्नी गर्भवती है। घटना की सूचना मिलते ही शुक्रवार सुबह से ही समाजजन बड़ी संख्या में आदित्य सीमेंट फैक्ट्री के बाहर एकत्रित हो गए और 25 लाख रुपये मुआवजा, परिवार के एक सदस्य को नौकरी तथा बच्चों की आजीवन शिक्षा का खर्च उठाने की मांग करने लगे। मौके पर शम्भूपुरा थाना अधिकारी और पुलिस उपाधीक्षक मय जाप्ता पहुंचे और स्थिति को नियंत्रित किया। फैक्ट्री प्रबंधन और समाजजनों के बीच लंबी वार्ता के बाद दोपहर लगभग तीन बजे समझौता हुआ। आदित्य सिमेंट फेक्ट्री प्रबंधन ने मानवीय आधार पर 15 लाख रुपये मुआवजा, पीएफ सहित अन्य देयकों का भुगतान तथा मृतक की पत्नी को ठेका पद्धति पर रोजगार देने का आश्वासन दिया। इसके बाद मामला शांत हुआ। उल्लेखनीय है कि दुर्घटना के समय मृतक ड्यूटी पर नहीं था, फिर भी औद्योगिक कार्य में बाधा न आए और सामाजिक तनाव से बचने के उद्देश्य से प्रबंधन ने यह निर्णय लिया। मौताणा प्रथा: परंपरा बनाम कानून चित्तौड़गढ़ जिले में ‘मौताणा’ की प्रथा वर्ष 2000 के आसपास हिन्दुस्तान जिंक में शुरू हुई मानी जाती है और धीरे-धीरे यह एक सामाजिक दबाव का रूप ले चुकी है। किसी कर्मचारी—चाहे वह स्थायी हो या अस्थायी—की बीमारी या दुर्घटना से मृत्यु होने पर परिजन और समाजजन संबंधित फैक्ट्री से मुआवजा मांगते हैं, भले ही घटना कार्यस्थल या ड्यूटी के दौरान न हुई हो। कानूनी दृष्टि से, मुआवजा केवल उन मामलों में देय होता है, जहां मृत्यु कार्यस्थल पर या कार्य से संबंधित कारणों से हुई हो, जैसा कि श्रम कानूनों और कर्मचारी क्षतिपूर्ति अधिनियम में प्रावधानित है। इसके विपरीत, ‘मौताणा’ सामाजिक परंपरा पर आधारित है, जिसका कानून में कोई स्पष्ट प्रावधान नहीं है। औद्योगिक प्रबंधन की दुविधा फैक्ट्री प्रबंधन अक्सर उत्पादन बाधित होने, आर्थिक नुकसान और श्रमिक असंतोष या यूनियनबाजी से बचने के लिए दबाव में आकर मुआवजा देने को विवश हो जाते हैं। इससे यह प्रथा और अधिक मजबूत होती जा रही है। कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यदि इस विषय पर प्रशासनिक स्तर पर स्पष्ट दिशा-निर्देश और सख्ती नहीं अपनाई गई, तो भविष्य में यह प्रथा उद्योगों के लिए बड़ी समस्या बन सकती है। प्रशासन की भूमिका आवश्यक इस तरह की घटनाएं यह संकेत देती हैं कि सामाजिक संवेदनाओं और कानूनी प्रावधानों के बीच संतुलन बनाने की आवश्यकता है। प्रशासन, उद्योग और समाज के बीच संवाद स्थापित कर इस प्रथा को नियंत्रित करना समय की मांग बन चुका है।1
- Post by Lucky sukhwal1
- रामाखेड़ा, भूपालसागर मे मोब्लिचिंग का मामला आया सामने शिकार पर गए युवकों पर ग्रामीणों ने किया हमला एक की गंभीर चोटे से मौत अन्य तीन घायल, पुलिस ने अज्ञात लोगो पर मामला दर्ज कर अनुसंधान शुरू किया1
- 🌹🙏SRI Lakshminath Bhagvan Siv Sankar Ji Vasakraj 🙏🏽 Maharaj GOVIND SAWARIYA SETH JI Aapki JAY Ho ♥️ 🌷 🌺 🔥1
- Post by Kalu Kumawat (banakiya ghurd)1
- गांव अचारी पोस्ट सुबी तहसील छोटी सादड़ी जिला प्रतापगढ़ राजस्थान 9660737539 90790081071
- *कथा में प्रतिदिन भण्डारे में 12 भट्टियों पर लकड़ियों से सुबह-शाम बनेगा 20 हजार भक्तों का भोजन* *श्री शिव महापुराण कथा के लिए महंत बाबूगिरी महाराज के सानिध्य में तीव्र गति से तैयारियां जारी* भीलवाड़ा, 3 अप्रेल। धर्मनगरी भीलवाड़ा में पहली बार 8 से 14 अप्रेल तक श्री शिव महापुराण कथा श्रवण कराने के लिए आ रहे देश के प्रख्यात कथावाचक ‘कुबेर भण्डारी’ पंडित प्रदीप मिश्रा के भव्य स्वागत अभिनंदन के साथ उनकी कथा श्रवण करने के लिए आने वाले लाखों श्रद्धालुओं के लिए भी व्यापक इन्तजाम किए जा रहे है। कथा के सूत्रधार संकटमोचन हनुमान मंदिर के महन्त बाबूगिरी महाराज के सानिध्य में श्री शिव महापुराण कथा आयोजन समिति के अध्यक्ष विधायक अशोक कोठारी एवं कार्यकारी अध्यक्ष राधेश्याम सोमानी एवं वरिष्ठ उपाध्यक्ष सुनील जागेटिया के नेतृत्व में सैकड़ो कार्यकर्ता विभिन्न तरह की व्यवस्थाओं को समय पर पूर्ण करने के लिए समर्पित भाव से जुटे हुए है। शहर के आजादनगर मेडिसिटी ग्राउण्ड पर प्रतिदिन दोपहर 2 से 5 बजे तक कथा श्रवण करने के लिए भीलवाड़ा जिले के साथ राजस्थान के विभिन्न क्षेत्रों एवं अन्य प्रदेशों से भी बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचने की संभावना है। कथा में बाहर से आने वाले श्रद्धालुओं के लिए सुबह-शाम भोजन की व्यवस्था भी आयोजन समिति द्वारा की जा रही हैै। इसके लिए कथा स्थल के पास पन्नाधाय सर्किल के नजदीक भोजनशाला तैयार की गई है। यहां ईंट व मिट्टी से 12 भट्टियां तैयारियां की जा रही है। वर्तमान में अमरीका-इरान युद्ध के चलते कॉमर्शियल एलपीजी सिलेण्डर की कमी के चलते इन भट्टियों में ईंधन के रूप में लकड़ी का उपयोग ही प्रमुखता से होगा। आयोजन समिति के भोजन व्यवस्था प्रभारी राजेश कुदाल ने बताया कि प्रतिदिन सुबह-शाम करीब 20- 20 हजार श्रद्धालुओं के लिए भोजन का प्रबंध किया जा रहा है। श्रद्धालुओं की संख्या बढ़ने पर भी कोई परेशानी नहीं आए इसके लिए पहले से प्रबंध किए गए है। भोजन बनाने के लिए 70 से अधिक हलवाई कार्य करेंगे। भोजन निर्माण से लेकर वितरण तक के कार्य में 250 से अधिक लोगों की टीम सेवाएं देंगी। प्रतिदिन एक समय के भोजन वितरण में महिला कार्यकर्ताओं की सेवा रहेगी। कथा स्थल पर भी श्रद्धालुओं के लिए पेयजल एवं अन्य जरूरी सुविधाओं का इन्तजाम रहेगा। मेडिसिटी ग्राउण्ड पर करीब साढ़े चार लाख वर्ग फीट भूमि पर तीन विशालकाय वाटरप्रूफ डोम एवं पाइप पांडाल का निर्माण कार्य अंतिम चरण में है। प्रचण्ड गर्मी से बचाव के लिए पांडाल में कूलर पंखे आदि का प्रबंध रहेगा। *कथा प्रांगण में श्रमदान के माध्यम से सफाई अभियान जारी* कथास्थल आजादनगर मेडिसिटी ग्राउण्ड पर सेवा की भावना से स्वेच्छा से श्रमदान कर सफाई का कार्य दूसरे दिन शुक्रवार को भी जारी रहा। सुबह 7.15 से 8.15 बजे तक श्री शिव महापुराण कथा आयोजन समिति के अध्यक्ष विधायक अशोक कोठारी के नेतृत्व में समिति के सदस्यों एवं आम श्रद्धालुओं ने सफाई कार्य में सेवाएं प्रदान की। श्रमदान करने में बुर्जुगों से लेकर मातृशक्ति तक ने भी पूरा जोश दिखाया। युवा कार्यकर्ता भी उत्साहित दिखे ओर बढ चढ़कर श्रमदान में अग्रणी रहे। महन्त बाबूगिरीजी महाराज ने श्रमदान करने वालों के प्रति मंगलभावनाएं व्यक्त की। आयोजन समिति के कार्यकारी अध्यक्ष राधेश्याम सोमानी ने बताया कि शनिवार सुबह भी सुबह 7.15 से 8.15 बजे तक कार्यकर्ता व श्रद्धालु कथा प्रांगण की सफाई व स्वच्छता के लिए श्रमदान करेंगे। *निलेश कांठेड़* मीडिया प्रभारी श्री शिव महापुराण कथा आयोजन समिति,भीलवाड़ा4
- चित्तौड़गढ़ जिले में ‘मौताणा’ (मृत्यु पर मुआवजा देने की प्रथा) अब एक गंभीर सामाजिक और औद्योगिक चुनौती का रूप ले चुकी है। ताजा मामला शम्भूपुरा क्षेत्र का है, जहां एक हादसे के बाद फिर से यह परंपरा चर्चा में आ गई और फैक्ट्री प्रबंधन पर मुआवजे को लेकर दबाव बना। जानकारी के अनुसार, जोरावर खेड़ा निवासी 34 वर्षीय आजाद सिंह चुंडावत उर्फ चंदू, जो आदित्य सीमेंट फैक्ट्री में ठेका पद्धति पर कार्यरत था, गुरुवार रात ड्यूटी समाप्त होने के करीब पांच घंटे बाद घर लौट रहा था। इस दौरान शम्भूपुरा गोशाला के सामने, फैक्ट्री से लगभग दो किलोमीटर दूरी पर उसकी बाइक एक बैल से टकरा गई। गंभीर रूप से घायल आजाद सिंह को जिला चिकित्सालय ले जाया गया, जहां उपचार के दौरान उसकी मृत्यु हो गई। मृतक के परिवार में पांच वर्षीय एक बच्चा है, जबकि उसकी पत्नी गर्भवती है। घटना की सूचना मिलते ही शुक्रवार सुबह से ही समाजजन बड़ी संख्या में आदित्य सीमेंट फैक्ट्री के बाहर एकत्रित हो गए और 25 लाख रुपये मुआवजा, परिवार के एक सदस्य को नौकरी तथा बच्चों की आजीवन शिक्षा का खर्च उठाने की मांग करने लगे। मौके पर शम्भूपुरा थाना अधिकारी और पुलिस उपाधीक्षक मय जाप्ता पहुंचे और स्थिति को नियंत्रित किया। फैक्ट्री प्रबंधन और समाजजनों के बीच लंबी वार्ता के बाद दोपहर लगभग तीन बजे समझौता हुआ। आदित्य सिमेंट फेक्ट्री प्रबंधन ने मानवीय आधार पर 15 लाख रुपये मुआवजा, पीएफ सहित अन्य देयकों का भुगतान तथा मृतक की पत्नी को ठेका पद्धति पर रोजगार देने का आश्वासन दिया। इसके बाद मामला शांत हुआ। उल्लेखनीय है कि दुर्घटना के समय मृतक ड्यूटी पर नहीं था, फिर भी औद्योगिक कार्य में बाधा न आए और सामाजिक तनाव से बचने के उद्देश्य से प्रबंधन ने यह निर्णय लिया। मौताणा प्रथा: परंपरा बनाम कानून चित्तौड़गढ़ जिले में ‘मौताणा’ की प्रथा वर्ष 2000 के आसपास हिन्दुस्तान जिंक में शुरू हुई मानी जाती है और धीरे-धीरे यह एक सामाजिक दबाव का रूप ले चुकी है। किसी कर्मचारी—चाहे वह स्थायी हो या अस्थायी—की बीमारी या दुर्घटना से मृत्यु होने पर परिजन और समाजजन संबंधित फैक्ट्री से मुआवजा मांगते हैं, भले ही घटना कार्यस्थल या ड्यूटी के दौरान न हुई हो। कानूनी दृष्टि से, मुआवजा केवल उन मामलों में देय होता है, जहां मृत्यु कार्यस्थल पर या कार्य से संबंधित कारणों से हुई हो, जैसा कि श्रम कानूनों और कर्मचारी क्षतिपूर्ति अधिनियम में प्रावधानित है। इसके विपरीत, ‘मौताणा’ सामाजिक परंपरा पर आधारित है, जिसका कानून में कोई स्पष्ट प्रावधान नहीं है। औद्योगिक प्रबंधन की दुविधा फैक्ट्री प्रबंधन अक्सर उत्पादन बाधित होने, आर्थिक नुकसान और श्रमिक असंतोष या यूनियनबाजी से बचने के लिए दबाव में आकर मुआवजा देने को विवश हो जाते हैं। इससे यह प्रथा और अधिक मजबूत होती जा रही है। कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यदि इस विषय पर प्रशासनिक स्तर पर स्पष्ट दिशा-निर्देश और सख्ती नहीं अपनाई गई, तो भविष्य में यह प्रथा उद्योगों के लिए बड़ी समस्या बन सकती है। प्रशासन की भूमिका आवश्यक इस तरह की घटनाएं यह संकेत देती हैं कि सामाजिक संवेदनाओं और कानूनी प्रावधानों के बीच संतुलन बनाने की आवश्यकता है। प्रशासन, उद्योग और समाज के बीच संवाद स्थापित कर इस प्रथा को नियंत्रित करना समय की मांग बन चुका है।4