देवसर के जंगलों में तांडव: धधक रहे पहाड़, 'कुंभकर्णी' नींद में वन विभाग। बेजुबान जानवर गांवों की ओर भागे, बेशकीमती वन संपदा खाक; क्या सिर्फ बारिश के भरोसे है प्रशासन? सी न्यूज़ संवाददाता विशेष | सिंगरौली (देवसर) सिंगरौली जिले के देवसर परिक्षेत्र में आग का तांडव थमने का नाम नहीं ले रहा है। छीवा और अकोरी गांवों से सटे पहाड़ों में लगी भीषण आग ने विकराल रूप धारण कर लिया है। धुआं और लपटें इतनी तेज हैं कि दूर से ही तबाही का मंजर साफ देखा जा सकता है। हैरानी की बात यह है कि इस गंभीर स्थिति के बावजूद वन विभाग के जिम्मेदार अधिकारी गहरी नींद में सोए हुए हैं। गांवों की ओर पलायन कर रहे वन्यजीव। जंगलों में लगी इस बेकाबू आग के कारण प्राकृतिक आवास नष्ट हो रहे हैं। जान बचाने के लिए बेजुबान जानवर अब रिहाइशी इलाकों और गांवों की ओर भागने को मजबूर हैं। इससे न केवल वन्यजीवों की जान खतरे में है, बल्कि ग्रामीणों में भी दहशत का माहौल बना हुआ है। यदि समय रहते आग पर काबू नहीं पाया गया, तो मानव-वन्यजीव संघर्ष की स्थिति पैदा हो सकती है। करोड़ों की वन संपदा हो रही राख। देवसर का यह पहाड़ी इलाका जैव विविधता से समृद्ध है। आग की चपेट में आने से बेशकीमती पेड़-पौधे और जड़ी-बूटियां जलकर खाक हो चुकी हैं। स्थानीय लोगों का आरोप है कि आग लगने की सूचना के घंटों बाद भी वन अमला मौके पर नहीं पहुँचा। ऐसा लग रहा है मानो साहब को जंगल की फिक्र नहीं है और वे केवल मानसून की बारिश का इंतजार कर रहे हैं ताकि आग अपने आप बुझ जाए। मुख्य बिंदु: प्रशासन से उठते सवाल? १. निगरानी तंत्र फेल: जब जंगल धधक रहे थे, तब फायर वॉचर्स और मैदानी अमला कहाँ था? २. संसाधनों का अभाव: क्या विभाग के पास आग बुझाने के आधुनिक उपकरण नहीं हैं या इच्छाशक्ति की कमी है? कलेक्टर से गुहार: ग्रामीणों ने जिला प्रशासन और सिंगरौली कलेक्टर से मांग की है कि मामले में तत्काल संज्ञान लेकर दोषियों पर कार्रवाई की जाए और आग पर काबू पाया जाए। "जंगल की आग ने विकराल रूप ले लिया है। हम डरे हुए हैं कि कहीं आग बस्तियों तक न पहुँच जाए। अधिकारी फोन नहीं उठा रहे, हम किसके भरोसे रहें?" — एक स्थानीय ग्रामीण — प्रशासनिक अपडेट का इंतजार: इस पूरे मामले में अब सबकी नजरें जिला प्रशासन की कार्रवाई पर टिकी हैं। क्या देवसर के जंगलों को बचाने के लिए कोई ठोस कदम उठाया जाएगा या इसी तरह सरकारी उदासीनता की भेंट चढ़ती रहेगी हमारी प्रकृति?
देवसर के जंगलों में तांडव: धधक रहे पहाड़, 'कुंभकर्णी' नींद में वन विभाग। बेजुबान जानवर गांवों की ओर भागे, बेशकीमती वन संपदा खाक; क्या सिर्फ बारिश के भरोसे है प्रशासन? सी न्यूज़ संवाददाता विशेष | सिंगरौली (देवसर) सिंगरौली जिले के देवसर परिक्षेत्र में आग का तांडव थमने का नाम नहीं ले रहा है। छीवा
और अकोरी गांवों से सटे पहाड़ों में लगी भीषण आग ने विकराल रूप धारण कर लिया है। धुआं और लपटें इतनी तेज हैं कि दूर से ही तबाही का मंजर साफ देखा जा सकता है। हैरानी की बात यह है कि इस गंभीर स्थिति के बावजूद वन विभाग के जिम्मेदार अधिकारी
गहरी नींद में सोए हुए हैं। गांवों की ओर पलायन कर रहे वन्यजीव। जंगलों में लगी इस बेकाबू आग के कारण प्राकृतिक आवास नष्ट हो रहे हैं। जान बचाने के लिए बेजुबान जानवर अब रिहाइशी इलाकों और गांवों की ओर भागने को मजबूर हैं। इससे न केवल वन्यजीवों की जान खतरे में है,
बल्कि ग्रामीणों में भी दहशत का माहौल बना हुआ है। यदि समय रहते आग पर काबू नहीं पाया गया, तो मानव-वन्यजीव संघर्ष की स्थिति पैदा हो सकती है। करोड़ों की वन संपदा हो रही राख। देवसर का यह पहाड़ी इलाका जैव विविधता से समृद्ध है। आग की चपेट में आने से बेशकीमती पेड़-पौधे
और जड़ी-बूटियां जलकर खाक हो चुकी हैं। स्थानीय लोगों का आरोप है कि आग लगने की सूचना के घंटों बाद भी वन अमला मौके पर नहीं पहुँचा। ऐसा लग रहा है मानो साहब को जंगल की फिक्र नहीं है और वे केवल मानसून की बारिश का इंतजार कर रहे हैं ताकि
आग अपने आप बुझ जाए। मुख्य बिंदु: प्रशासन से उठते सवाल? १. निगरानी तंत्र फेल: जब जंगल धधक रहे थे, तब फायर वॉचर्स और मैदानी अमला कहाँ था? २. संसाधनों का अभाव: क्या विभाग के पास आग बुझाने के आधुनिक उपकरण नहीं हैं या इच्छाशक्ति की कमी है? कलेक्टर से गुहार: ग्रामीणों ने जिला प्रशासन
और सिंगरौली कलेक्टर से मांग की है कि मामले में तत्काल संज्ञान लेकर दोषियों पर कार्रवाई की जाए और आग पर काबू पाया जाए। "जंगल की आग ने विकराल रूप ले लिया है। हम डरे हुए हैं कि कहीं आग बस्तियों तक न पहुँच जाए। अधिकारी फोन नहीं उठा रहे, हम किसके
भरोसे रहें?" — एक स्थानीय ग्रामीण — प्रशासनिक अपडेट का इंतजार: इस पूरे मामले में अब सबकी नजरें जिला प्रशासन की कार्रवाई पर टिकी हैं। क्या देवसर के जंगलों को बचाने के लिए कोई ठोस कदम उठाया जाएगा या इसी तरह सरकारी उदासीनता की भेंट चढ़ती रहेगी हमारी प्रकृति?
- बेजुबान जानवर गांवों की ओर भागे, बेशकीमती वन संपदा खाक; क्या सिर्फ बारिश के भरोसे है प्रशासन? सी न्यूज़ संवाददाता विशेष | सिंगरौली (देवसर) सिंगरौली जिले के देवसर परिक्षेत्र में आग का तांडव थमने का नाम नहीं ले रहा है। छीवा और अकोरी गांवों से सटे पहाड़ों में लगी भीषण आग ने विकराल रूप धारण कर लिया है। धुआं और लपटें इतनी तेज हैं कि दूर से ही तबाही का मंजर साफ देखा जा सकता है। हैरानी की बात यह है कि इस गंभीर स्थिति के बावजूद वन विभाग के जिम्मेदार अधिकारी गहरी नींद में सोए हुए हैं। गांवों की ओर पलायन कर रहे वन्यजीव। जंगलों में लगी इस बेकाबू आग के कारण प्राकृतिक आवास नष्ट हो रहे हैं। जान बचाने के लिए बेजुबान जानवर अब रिहाइशी इलाकों और गांवों की ओर भागने को मजबूर हैं। इससे न केवल वन्यजीवों की जान खतरे में है, बल्कि ग्रामीणों में भी दहशत का माहौल बना हुआ है। यदि समय रहते आग पर काबू नहीं पाया गया, तो मानव-वन्यजीव संघर्ष की स्थिति पैदा हो सकती है। करोड़ों की वन संपदा हो रही राख। देवसर का यह पहाड़ी इलाका जैव विविधता से समृद्ध है। आग की चपेट में आने से बेशकीमती पेड़-पौधे और जड़ी-बूटियां जलकर खाक हो चुकी हैं। स्थानीय लोगों का आरोप है कि आग लगने की सूचना के घंटों बाद भी वन अमला मौके पर नहीं पहुँचा। ऐसा लग रहा है मानो साहब को जंगल की फिक्र नहीं है और वे केवल मानसून की बारिश का इंतजार कर रहे हैं ताकि आग अपने आप बुझ जाए। मुख्य बिंदु: प्रशासन से उठते सवाल? १. निगरानी तंत्र फेल: जब जंगल धधक रहे थे, तब फायर वॉचर्स और मैदानी अमला कहाँ था? २. संसाधनों का अभाव: क्या विभाग के पास आग बुझाने के आधुनिक उपकरण नहीं हैं या इच्छाशक्ति की कमी है? कलेक्टर से गुहार: ग्रामीणों ने जिला प्रशासन और सिंगरौली कलेक्टर से मांग की है कि मामले में तत्काल संज्ञान लेकर दोषियों पर कार्रवाई की जाए और आग पर काबू पाया जाए। "जंगल की आग ने विकराल रूप ले लिया है। हम डरे हुए हैं कि कहीं आग बस्तियों तक न पहुँच जाए। अधिकारी फोन नहीं उठा रहे, हम किसके भरोसे रहें?" — एक स्थानीय ग्रामीण — प्रशासनिक अपडेट का इंतजार: इस पूरे मामले में अब सबकी नजरें जिला प्रशासन की कार्रवाई पर टिकी हैं। क्या देवसर के जंगलों को बचाने के लिए कोई ठोस कदम उठाया जाएगा या इसी तरह सरकारी उदासीनता की भेंट चढ़ती रहेगी हमारी प्रकृति?8
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- बैढ़न | सत्ता के दबाव में बेकसूरों को जेल भेजने का आरोप, पीड़ित महिला मीना जायसवाल के मामले में अब तक कार्रवाई शून्य। सिंगरौली। जिले में पुलिस और प्रशासन की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े होने लगे हैं। पत्रकार विकास दुबे की गिरफ्तारी और भाजपा नेत्री पूनम गुप्ता द्वारा लगाए गए 'अश्लील इशारे' के आरोपों को लेकर पत्रकारों और स्थानीय लोगों में भारी असंतोष है। आरोप है कि पुलिस सत्ता के दबाव में एकतरफा कार्रवाई कर रही है, जबकि वास्तविक अपराधियों को संरक्षण दिया जा रहा है। आधारहीन आरोपों पर हुई कार्रवाई! पत्रकार सहयोगियों का कहना है कि विकास दुबे पर लगाए गए 'पीछा करने' और 'अश्लील इशारे' करने के आरोप पूरी तरह फर्जी और आधारहीन हैं। घटना के समय (7 अप्रैल, शाम 7 बजे) पत्रकार के वहां होने का न तो कोई सीसीटीवी फुटेज है और न ही कोई तकनीकी प्रमाण। इसके बावजूद, पुलिस ने बिना निष्पक्ष जांच किए गिरफ्तारी की प्रक्रिया पूरी कर ली। इस संबंध में एसपी और एसडीएम कार्यालय में जांच के लिए आवेदन दिए गए थे, लेकिन प्रशासन ने इस ओर ध्यान नहीं दिया। दोहरा मापदंड: मीना जायसवाल को नहीं मिला न्याय। प्रशासन की निष्पक्षता पर सवाल उठाते हुए लोगों ने 'प्रधानमंत्री आवास' में रहने वाली मीना जायसवाल का उदाहरण दिया। मीना के साथ गुंडों ने घर में घुसकर मारपीट की और अभद्रता की। जब वह रिपोर्ट लिखाने बैढ़न थाने पहुंचीं, तो वहां भी आरोपियों ने उन्हें धमकाया। आज भी आरोपी खुलेआम घूम रहे हैं और पीड़िता को धमका रहे हैं, लेकिन पुलिस ने अब तक उनकी गिरफ्तारी सुनिश्चित नहीं की है। विपक्ष और जनता का सवाल: क्या यही है 'रामराज्य'? स्थानीय लोगों और पत्रकार जगत का कहना है कि सिंगरौली में अब माफिया और वसूली करने वालों का बोलबाला है। बेकसूर लोगों को जेल भेजा जा रहा है जबकि असली गुंडे पुलिस की पहुंच से बाहर हैं। लोगों का कहना है कि प्रशासन केवल सत्ताधारी दल के एजेंट के रूप में काम कर रहा है, जिससे आम जनता का भरोसा कानून-व्यवस्था से पूरी तरह उठ चुका है। इनका कहना है: "सत्ता के दबाव में पुलिस और प्रशासन पूरी तरह से पक्षपाती हो चुका है। सिंगरौली में माफियाओं का राज है और न्याय की उम्मीद खत्म होती जा रही है। हम इस मामले की उच्च स्तरीय जांच की मांग करते हैं।" — पत्रकार समूह एवं पीड़ित पक्ष7